लक्ष्य 5 ट्रिलियन का

शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक अर्थव्यवस्था में सुधार के लक्षण हैं। कर घट गए हैं, महंगाई कम हो रही है, भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है, जीवन स्तर सुधर रहा है और ऐसा भारत धीरे-धीरे बन रहा है जिसका हम सभी इंतजार कर रहे थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय सत्ता सम्हाली थी, जब भारत विश्व की 5 बड़ी संवेदनशील अर्थव्यवस्थाओं में शुमार था। इसके पूर्व यूपीए शासन के पांच वर्षों में भ्रष्टाचार तेजी से फैला था, महंगाई भी बढ़ रही थी। महंगाई की दर 10 प्रतिशत याने बहुत अधिक थी। महंगाई गरीबों को तबाह कर देती है और भ्रष्टाचार उन्हें जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित कर देता है; क्योंकि पैसा लाभार्थियों के हाथ में पहुंचने के बजाए बिचौलिए ही खा जाते हैं। राजकोषीय घाटा बेहद बढ़ गया था, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कम्पनियों का घाटा बढ़ता जा रहा था तथा बैंकों की हालत खस्ता हो गई थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। चारों ओर धुंधलका था।

मोदीजी के पास गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 12 साल का प्रदीर्घ अनुभव था। इसलिए उनके पास देश के प्रति विजन था। इस दिशा में उन्होंने तत्काल काम शुरू कर दिया। उनके देश के ‘प्रधान सेवक’ बनने से लोग भी बहुत आश्वस्त थे। इस बीच, तेल की कीमतें उतरने लगीं और उन्हें कठिन समस्याओं का एक के बाद एक समाधान करने का अवसर मिल गया। पिछले पांच सालों में उनकी सरकार ने क्या-क्या किया इसके विवरण मैं जाना नहीं चाहता, क्योंकि यह इस लेख का उद्देश्य नहीं है। मैं तो आने वाले भविष्य की चर्चा करना चाहता हूं, जब भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

सबसे पहले हम कहां हैं इस पर विचार करें। आज हम अभूतपूर्व वित्तीय समावेशन की स्थिति में पहुंच गए हैं। बैंकों में 34 करोड़ खाते खोले गए हैं, जिससे वित्तीय लाभों को बिना किसी चोरी-चपाटी के सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाना आसान हो गया है। ग्रामीण इलाकों में जीवन को सुकर बनाने के लिए 9 करोड़ शौचालय बनाए गए हैं। बिजली और रसोई गैस लगभग हर व्यक्ति तक पहुंच गया है; बशर्तें कि वह नियमित भुगतान करें। 2022 तक हरेक को मकान उपलब्ध होगा। ये बहुत छोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन इनसे ही देशभर में एक अभूतपूर्व अवसर उपलब्ध होंगे। समाज के वंचित वर्ग के पास प्रतिभा की कमी नहीं है। वे केवल अवसरों के इंतजार में है।

ठीक यही होने जा रहा है। देश के हर कोने-कोने में इंटरनेट व परिवहन पहुंचाने पर बल दिया जा रहा है, ताकि विकास के भरपूर अवसर मुहैया हो। एक और उपलब्धि यह है कि एकीकृत अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के जरिए पूरे देश को जोड़ा जा रहा है। सांस्कृतिक दृष्टि से हम प्राचीन समय से एक हैं ही। 1947 में ब्रिटिशों से स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद हम राजनीतिक रूप से एक हुए, जबकि भारत दो हिस्सों में बंट गया। यही क्यों, 2017 तक भी हम आर्थिक रूप से बंटे हुए ही थे, क्योंकि हर राज्य की अपनी कराधान प्रणाली थी। यूरोप की तुलना में यह व्यवस्था बिलकुल विपरीत थी। यूरोप राजनीति व भाषा की दृष्टि से भले अलग हो, लेकिन उनकी बाजार प्रणाली एक है। एक दशक से रुका हुआ जीएसटी सुधार आने से भारत एक आर्थिक शक्ति में तब्दील हो गया है और इसके इस्तेमाल के लिए वह अब तैयार है। देश में माल की आवाजाही तेज और आसान हो गई है। पिछले पांच वर्षों में आधारभूत सुविधाओं के तीव्र विकास के कारण भी माल देश के कोने-कोने में तेजी से पहुंचाना सहज हो गया है। सरकार ने इन बुनियादी बातों पर समय पर और बेहतरीन ढंग से ध्यान दिया, जिससे अभूतपूर्व अवसर उपलब्ध होंगे। आइए, आने वाले भविष्य पर गौर करें।

आज की युवा पीढ़ी अधिक जोखिम उठाना चाहती है और इसीलिए भारत तेजी से स्टार्ट-अप का केंद्र बनता जा रहा है।

 सरकार धीरे-धीरे किसानों को अवगत करा रही है कि वे न केवल ‘अन्नदाता’ हैं, बल्कि अपनी बंजर भूमि सौर बिजली बनाने के लिए देकर ‘ऊर्जादाता’ भी बन सकते हैं।

 प्रसिद्ध पर्यटन केंद्रों को स्थानीय हस्तशिल्प से जोड़ा जाना चाहिए ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हो।

 भारतीय उद्योग इनोवेशन याने नवाचार के जरिए उत्पादकता बढ़ाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है तथा छोटी कारों व दो/तीन पहिया वाहनों जैसे कई क्षेत्रों में यह परिलक्षित भी हो रहा है।

नया भारत पहले के भारत से बिलकुल अलग होगा। पहले लोग 10 से 5 नौकरी और निवृत्ति के बाद पेंशन की अपेक्षा में जीते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। सरकार खुद उद्यमशीलता दिखा रही है। सूचनाओं को प्रदान करने, लोगों को प्रेरित करने और उद्यमशीलता का माहौल बनाने के लिए विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं।

मुद्रा और अन्य योजनाओं के जरिए महिला उद्यमियों को धन उपलब्ध करने और जीवन सुकर बनने से उद्यमशीलता की ओर तेजी से बढ़ना संभव हुआ है। आज की युवा पीढ़ी अधिक जोखिम उठाना चाहती है और इसीलिए भारत तेजी से स्टार्ट-अप का केंद्र बनता जा रहा है। मिसाल के तौर पर भारत में स्थापित ओला टैक्सी और ओयो रूम्स ने न केवल अपने देश में बल्कि विदेशों में भी सेवाएं देनी शुरू कर दी हैं। देश की आर्थिक नीतियां ऐसी होनी चाहिए जिससे उद्यमिता को प्रोत्साहन मिले और सरकार ने उस दिशा में अपनी नीतियों को मोड़ दिया है जैसे कि छोटी कम्पनियों पर करों में कटौती। जीवन को सुकर बनाने के साथ ही सरकार व्यवसाय करना भी सुकर बनाने में लगी हुई है। कई सरकारी सेवाएं मानवी हस्तक्षेप के बिना ही उपलब्ध होने लगी हैं। इससे निम्न स्तर पर भी भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर कम हो रहा है, जिससे उद्यमियों को बहुत प्रोत्साहन मिलेगा और विदेशी निवेश भी आएगा।

किसानों की आय को बढ़ाने के लिए ग्रामीण इलाकों में खेती व अन्य क्षेत्रों में नए प्रयोग किए जा रहे हैं। हाल के बजट में जिस ज़ीरो बजट खेती का पहली बार उल्लेख हुआ है, उससे नए युग का सूत्रपात होगा। अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ वर्ष पूर्व आरंभ रासायनिक खेती चरम पर पहुंच चुकी है तथा उसके दुष्परिणाम न केवल लोगों के स्वास्थ्य पर अपितु किसानों की आय पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। खेती पहले सर्वोत्तम व्यवसाय मानी जाती थी, जो अब किसानों के लिए नुकसानदेह बन गई है। जीरो बजट खेती प्राकृतिक आधार पर होने से भारत की जैव-विविधता का पुनरुज्जीवन होगा। जैविक खेती से किसानों को स्वदेश में व निर्यात से अपनी आय बढ़ाने के अभूतपूर्व अवसर प्राप्त होंगे। सरकार धीरे-धीरे किसानों को अवगत करा रही है कि वे न केवल ‘अन्नदाता’ हैं, बल्कि अपनी बंजर भूमि सौर बिजली बनाने के लिए देकर ‘ऊर्जादाता’ भी बन सकते हैं। खेती को लाभप्रद बनाने के लिए सरकार जल संरक्षण एवं नदियों को जोड़ने पर भी विचार कर रही है। इस तरह ग्रामीण इलाकों की क्रयशक्ति में तीव्र इजाफा होगा। इन इलाकों में कई दिलचस्प व्यवसाय मॉडल भी उभर कर सामने आ रहे हैं।

सरकार द्वारा आरंभ ‘स्वच्छ भारत’ अभियान का कई विपक्षी नेताओं ने ‘मजाक’ उड़ाया। लेकिन, आधारभूत सुविधाओं में तेजी से विकास के साथ, स्वच्छ भारत में पर्यटन के क्षेत्र में बहुत अवसर उपलब्ध होंगे। सरकार ने अपने पिछले बजट में कुछ चुनिंदा स्थानोेंं को विश्व स्तर के पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित करने का उल्लेख किया है। हर राज्य में ऐसे 5 स्थानों को विश्वस्तरीय बनाया जा सकता है। पर्यटन बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाला व्यवसाय है और इसकी खासियत यह है कि इससे कोई प्रदूषण भी नहीं होता। प्रसिद्ध पर्यटन केंद्रों को स्थानीय हस्तशिल्प से जोड़ा जाना चाहिए ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हो। इससे पर्यटन के लिए विदेशों में जाने वाले कोई 2 करोड़ पर्यटक इन केंद्रों पर आ सकते हैं, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत तो होगी ही, ग्रामवासियों की क्रयशक्ति बढ़ाने में भी वे सहायक होंगे। ‘उड़ान’ योजना के अंतर्गत कोई 100 हवाई अड्डे अब कार्यरत हो गए हैं और इससे भारत विश्व पर्यटन नक्शे पर और आगे बढ़ेगा। स्वच्छ और सुंदर रेलवे स्टेशनों के साथ ही, और उम्मीद है कि जलमार्गों से भी, विश्व के पर्यटक इस देश की सुंदरता को देखने और इस देश के सुंदर लोगों से मिलने आएंगे।

पिछली कुछ शताब्दियां छोड़ दी जाए तो हमारा देश सदा ‘विश्वगुरु’ रहा है और हम सभी को उस गौरव को प्राप्त करना है। आज कई भारतीय उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं। सरकार इस स्थिति को बदलना चाहती है और जो वैश्विक स्तर की शिक्षा पाना चाहते हैं उन्हें भारत में ही ऐसे अवसर उपलब्ध कराने पर बल दिया जा रहा है। शिक्षा नीति में बदलाव किया जा रहा है और कुछ ही समय में भारत सरकार विदेशी विश्वविद्यालयों को यहां अपने केंद्र स्थापित करने की अनुमति दें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। यही नहीं, सरकार विश्वविद्यालयों की अनुसंधान क्षमता बढ़ाने पर भी अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। इन प्रयासों से देश में ही बौद्धिक सम्पदा का निर्माण होगा और उच्च शिक्षा के लिए विदेशों में जाना रुक सकेगा।

हमारा देश विदेशी छात्रों को और अधिक संख्या में आकर्षित करेगा तथा भारत उच्च विद्या के केंद्र के रूप में पुनर्स्थापित हो तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इसके साथ ही भारत की प्राचीन प्रज्ञा का बड़े पैमाने पर पुनरुज्जीवन किया जा रहा है और इस ज्ञान को सार्वदेशिक इंटरनेट तथा सोशल मीडिया के जरिए विश्व भर में इच्छुकों को प्रदान किया जा सकता है। युद्धों और आतंकवाद से बेहाल वर्तमान विश्व को भारत के इस कालातीत ज्ञान की आज नितांत आवश्यकता है।

भारत सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के लिए विश्वभर में जाना जाता है और शिक्षा के क्षेत्र में उसका प्रयोग करने में भारत सक्षम है, हमें भारत में विनिर्माण क्षेत्र में इसके उपयोग को सोचना होगा। ‘मेक इन इंडिया’ के साथ ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’, बेहतर आधारभूत सुविधाएं और सरल कर प्रणाली के कारण स्थानीय उद्यमों के अलावा वैश्विक उत्पादक भी भारत आ सकते हैं। भारतीय उद्योग इनोवेशन याने नवाचार के जरिए उत्पादकता बढ़ाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है तथा छोटी कारों व दो/तीन पहिया वाहनों जैसे कई क्षेत्रों में यह परिलक्षित भी हो रहा है। हमें रक्षा उत्पादन, ट्रेनों के निर्माण और इंजीनियरिंग साजोसामान के उत्पादन में भी अपने कदम मजबूती से जमाने हैं। बिजली पर चलने वाले वाहनों के निर्माण के क्षेत्र में अगुवाई के बेहतर अवसर भारत के पास हैं। हम सौर-ऊर्जा के क्षेत्र में मार्गदर्शक बन गए हैं। भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में लम्बी छलांग लगा रहा है तथा कम लागत में प्रक्षेपण में उसका विश्वभर में नाम है। भारत में विनिर्माण बढ़ाने के लिए छोटे और मध्यम उद्यमों को भी आजीवन ‘बौना’ रहने की बजाए बड़ा बनने पर सोचना चाहिए। आज छोटा रहना कोई फायदे की चीज नहीं है। जो बढ़ना चाहते हैं उनके लिए सरकार की प्रोत्साहन योजनाएं हैं।

कहते हैं कि भगवान श्रीराम ने भरत को राज्य की कराधान व्यवस्था के बारे में सलाह दी थी। उन्होंने भरत से कहा था कि कर ऐसे हों कि नागरिकों को पता ही न चलें कि वे दे रहे हैं- ठीक उसी तरह जैसे धूप से पानी की भाप बनती है और किसी को पता भी नहीं चलता। इन करों को जनकल्याण की योजनाओं के रूप में जनता को इस तरह लौटाना है कि जनता अभिभूत हो जैसे कि बारिश होने से होता है। सरकार इसी सलाह पर चल रही है। मिसाल के तौर पर जीएसटी की दरें जीवनावश्यक वस्तुओं पर लगातार घटाई जा रही हैं, ताकि वे अधिकाधिक लोगों की क्रयशक्ति की सीमा में आए। लगभग 99% कम्पनियों पर लागू कम्पनी कर घटा दिया गया है और शेष कम्पनियों के बारे में भी सोचा जा रहा है। सरकार नियमों को सरल बना रही है, कर घटा रही है, उस पर अमल कर रही है और जो नियमों का ठीक से पालन नहीं करते या करों का ठीक से भुगतान नहीं करते उन पर कड़ी कार्रवाई भी की जा रही है। महंगाई पर अच्छा अंकुश लगा हुआ है और प्रणाली में अक्षमता धीरे-धीरे कम हो रही है। कर और महंगाई कम हो रही है और भ्रष्टाचार, कम से कम उच्च स्तर पर, अब बीते दिनों की बात है, लोगों के जीवनस्तर में तेजी से सुधार हो रहा है और वे अर्थव्यवस्था में भी अधिक योगदान दे रहे हैं। इससे साफ है कि देश में निवेश बढ़ेगा और एक ऐसी स्थिति बनेगी जिसका हम सभी इंतजार कर रहे हैं।

लेखक वरिष्ठ अर्थ विशेषक हैं।

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