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****रामचंद्र सुर्वे*****

            संपूर्ण  विश्व के द्वारा                     गौरावान्वित हमारी भारतीय योगविद्या हम भारतवासियों के लिए अज्ञात नहीं है। भारतीय ऋषि-मुनियों ने उसे आत्मसात करके मानवकल्याण के लिए उसका उपयोग किया है। विशेषतः गृहस्थाश्रमियों के लिए ही इसका मार्गदर्शन किया गया है। हमारे अधिकतर ऋषि-मुनि गृहस्थ ही थे। हम भारतीयों में कोई भी व्यक्ति इस अमृततुल्य योगविद्या से अपरिचित नहीं रह सकता। भारत योग और अध्यात्म की प्ाुण्यभूमि है, इसी कारण ही पाश्चात्य देश हमारी तरफ आशा और आदर्श की दृष्टि से देखते हैं। भारतीय योगविद्या के प्रति आज उनमें केवल गहरा आकर्षण ही नहीं बल्कि सच्चे अर्थ में वेही योगविद्या का प्ाूरा अनुभवले रहे हैं। योग संसारियों के लिए बडा कठिन है, यह गलत धारणा लेकर हम बैठे हैं। यह हमारा अज्ञान है। हर एक मनुष्य सुख और शान्ति की खोज कर रहा है। लेकिन उसकी स्पष्ट कल्पना उसे नहीं है। आर्थिक संपन्नता या स्थिरता यहीं तक उसकी कल्पना मर्यादित रहती है। लेकिन वह पाने के बाद उसे पता चलता है कि सुख और शान्ति का साधन यह शरीर व्याधियों का स्थान बन चुका है। चित्त की चंचलता गतिमान वाय्ाु का रूप धारण कर बैठी है। आरोग्य तथा आय्ाु क्षीण होती जा रही है। शारीरिक और मानसिक दुर्बलता बढती जा रही है। बीमारी दूर करने के लिए दिनोंदिन दवाईयों की ओर हमारा आकर्षण बढता जा रहा है और तंदुरुस्ती के बजाय शारीरिक हानियां हो रही हैं। मनुष्य जितनी कृत्रिमता को अपना रहा है, उतना ही वह प्रकृति के खिलाफ जा रहा है, उतना ही उसका शरीर कीर्यहीन, बलहीन और निस्तेज बन रहा है। इस कारण मन से भी कमजोर बनकर, वह अपना आत्मविश्वास खो रहा है, परावलंबी बन रहा है। जिसका खुद पर विश्वास नही वह कैसे किसी पर विश्वास करेगा? और फिर ऐसे व्यक्ति की मानवतो क्या परमेश्वर भी मदद नहीं कर सकते।

 ‘प्राणिनाम्आर्तिनाशनम’ इस ध्येय से प्रेरित होकर ही पू. हठयोगी निकम गुरुजी ने स्वास्थ्य अभियान शुरु किया। सन १९६५ में चैत्र शु. प्रतिपदा को श्रीअंबिका योग कुटीर की स्थापना हुई। इस सेवाभावी संस्था की स्थापना गिरगांवमें उनके घर में हुई और आज तक अर्थात पूरे पचास साल यह संस्था योग के माध्मम से निःशुल्क जनसेवा कर रही है। आजकल के ‘अर्थोनारायणो हरि’ के य्ाुग में लगातार बिना मूल्य सेवा करना संस्था की विशेषता है। सर्वसाधारण मनुष्य के लिए कुटीर की स्थापना किसी ईश्वरीय देन से कम नहीं है। कुटीर केवल मानवता ही धर्म मानता है और साधना-सेवा-सत्संग इस त्रिसूत्री तत्त्वपर कार्यरत है। १९६५ से ७५ तक कुटीर का काम गिरगावमें पू.गुरुजी के घर में ही चलता था। प्ाुलिस डिपार्टमेंट से निवृत्ती के बाद गुरुजी ठाणे में श्रीरंग सोसायटी में रहने आये और वहां भी उनके घर में ही योगवर्ग शुरू हो गये। १९८२ में कुटीर का सार्वजनिक विश्वस्त संस्था के रूप मेंरजिस्ट्रेशन हुआ। १९९२ से बि. के. मिलकंपाउंड की आज इमारत में योगवर्ग शुरु हुए।

 प्ाू.गुरुजी के जीवन में हुए एकप्रसंग के कारण उन्हें योगविद्या में दिलचस्पी निर्माण हुई और इस विषय की तरफ वेबहुत आकर्षित हो गये। फिर विविध ग्रंथों का अभ्यास करके,सभी प्रयोग खुद पर करके, अथक परिश्रम से गुरुजी ने योगविद्या आत्मसात कर ली। योग की रोगप्रतिबंधक तथा रोगनिवारक क्षमता पर दृढ विश्वास हो गया और आजीवन लोकहितार्थ योग का प्रसार करने का निश्चय करके कुटीर का सेवाकार्य शुरु हुआ। अपने माता-पिता से वनौषधी और आय्ाुर्वेद का ज्ञान भी उन्हें प्राप्त हुआ था। व्याधिग्रस्त लोगों को स्वस्थ करने के लिए योगोपचार के साथ-साथ वनौषधी और आय्ाुर्वेद की भी गुरुजी सहायता लेते थे। आज संसारियों को व्यावहारिक, आध्यात्मिक ज्ञान की जरूरत है, यह उन्होंने भलीभांति जाना था। योग के द्वारा ही आज व्यक्ति अपने मन को ेस्थिर कर सकता है, मनुष्य प्रगतिशील बन सकता है, और प्रगतिशील व्यक्ति से ही प्रगतिशील समाज बन सकता है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए शरीर ही सबसे प्रथम और मुख्य साधन है।  पू.गुरुजी कहते थे कि,मानवी शरीर ईश्वरी शक्ति का खजाना है और वह खजाना खोलने की चाबी है ‘योग’। संप्ाूर्ण आरोग्य और व्यक्ति विकास के लिए योग जैसा समर्थ माध्यम नहीं है। लेकिन बिना निर्मल शरीर के योगमार्ग की प्रथम सीढी पर भी कदम नहीं रख सकते है। इसका खयाल रखते हुए गुरुजी ने त्रैमासिक वर्ग में शुध्दि को प्रथम महत्त्वदिया है। लोकानुनय करने का खयाल न रखते हुए बहुत ही सोच-समझकर एक परिप्ाूर्ण योग का अभ्यास गुरुजी ने तैयार किया है। यह निश्चित रुप से रोगनिवारक और रोगप्रतिबंधक के रुप में उपय्ाुक्त है। इसके द्वारा हर एक मनुष्य संप्ाूर्ण आरोग्य, स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है। मनुष्य जन्म मिलना आसान है लेकिन निरोगता, स्वास्थ्य भाग्य से ही पा सकते है। ‘धर्मार्थकामयोगाणां आरोग्यं मूलकारकम्। आरोग्यं परमं भाग्यम् स्वास्थ्यं सेवार्थ साधकम्।’ निरोगता प्राप्त करने का, स्वस्थ रहने का अधिकार हर एक मनुष्य को है और इसके लिए सुयोग्य, परिप्ाूर्ण योगाभ्यास की उपलब्धि होना जरुरी है। इसलिए नि:स्पृह, निष्काम सेवावृत्ति से कैसे काम करना है, यह आदर्श गुरुजी ने कुटीर के कार्यकर्ताओं के सामने रखा है। कुटीर में योग शिक्षक होने के लिए पहले खुद स्वस्थ होकर कम से कम एक साल सेवा करने के बाद ही योग शिक्षक के अभ्यास वर्ग में जाने की अनुमति मिलती है। इसके साथ कुटीर की बहुत ही महत्त्वप्ाूर्ण विशेषता याने कुटीर में अष्ट प्राणायाम, दशमुद्रा, बंध आदि का अभ्यास भी कराया जाता है।

 इसी कारण से गुरुजी के साथ अनेक समविचारी अनेक सहकारी, कार्यकर्ता सेवाकार्य में जुट गये है। ‘आत्मोन्नति के लिए सेवा ’ इस सूत्र से एक बार जो व्यक्ति कुटीर के साथ जुड जाता है वह हमेशा के लिये से जुड जाता है। यही श्री अंबिका योग कुटीर के विस्तार का मर्म है। यहां सभी प्रकार का प्रशिक्षण बिना किसी मूल्य के दिया जाये यह गुरुजी की प्रमुख शर्त है। अर्थार्जन के उद्देश्य से आये हुए व्यक्ति को कुटीर में स्थान नहीं है। इसी कारण कुटीर का माहौल बहुत ही मंगलमय, पवित्र, सकारात्मक बना हुआ है। गुरुजी का परिसस्पर्श, उनका सहवास जिस व्यक्ति को मिला उसके जीवन में अंतर्बाह्य उजाला ही उजाला हो गया। योगाभ्यास के विविध लाभ जैसे व्याधिमुक्ति, व्यसनमुक्ति, तनावनियोजन, मनोकायिक व्याधि नियंत्रण, एकाग्रता, व्यक्तित्व विकास इत्यादि का सभी लोग अनुभवकर रहे हैं। योग तो अनुभवका शास्त्र है। इसलिए योगाभ्यास नियमित रुप से करने की आवश्यकता होती है। योग सभी लोगों के लिए है। किसी भी क्षेत्र में कार्य करनेवाला व्यक्ति हो यौगिक आचरण से उसकी कार्यकुशलता अवश्यबढती है। शरीर-मन-बुद्धि सभी स्तरों पर वह उन्नत होता है। इसी कारण विविध क्षेत्रों जैसे बैंक, सरकारी कार्यालय, कंपनी, अस्पताल, पोलिस, जेल, पाठशाला, महाविद्यालय में योग प्रशिक्षण के लिए उत्सुकता है। सभी क्षेत्र में कुटीर के कार्यकर्ता निःस्पृहता से, प्रामाणिकता से, मन से, लगन से बिना मूल्य सेवा कर रहे हैं। इसी कारण आज भारत और विदेशों में (जैसे, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कॅनडा, मॉरिशस, दुबई) कुटीर की ८७ शाखाएं कार्यरत है। माहीम और सी.बी.डी. बेलाप्ाूर इन दो स्थानों पर योग वनौषधि निसर्गोपचार केंद्र स्थापित हुए हैं। यहां पर औषधि वनस्पतीयों का संगोपन किया जाता है। पू.निकम गुरुजी और श्री अंबिका योग कुटीर को समाजमान्यता तथा राजमान्यता प्राप्त हुई है।

 ‘जनसेवा ही ईश्वर सेवा’ का भाव लेकर गुरुजी द्वारा शुरु किया हुआ यह सेवाकार्य आज पचास साल से लगातार चल रहा है। विविध क्षेत्र के लोगों को योग प्रशिक्षण देकर यौगिक जीवनपद्धति की तरफ बढाना, आत्मज्ञान के मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करना यही उद्देश रखते हुए कुटीर का पचासवां वर्ष अर्थात सुकर्णमहोत्सवी वर्ष मनाया गया। यह योग प्रशिक्षण सेवा यज्ञ अविरत चलता रहे यही गायत्री माता के चरणों में प्रार्थना।

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