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कॉरिडोर की आड़ में…

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने, आशंका व्यक्त की है कि पाकिस्तान द्वारा, भारत में खालिस्तान आंदोलन को फिर शुरु करने के लिए इस करतारपुर कॉरिडोर के प्रयोग की प्रबल संभावना है। करतारपुर कॉरिडोर की आड़ में, पाकिस्तान को भारत में अशांति एवं अस्थिरता उत्पन्न करने का अवसर मिल जाएगा और इस तरह वह खालिस्तानी आतंकवाद को पुनर्जीवित करने का प्रयास करेगा।

पिछले सप्ताह ही करतारपुर गलियारे (कॉरिडोर) का   उद्घाटन कर, पाकिस्तान स्थित विश्व के सबसे बड़े गुरुद्वारे को भारतीयों के दर्शन हेतु खोल दिया गया है। इस गुरुद्वारे का निर्माण, सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेवजी ने करवाया था एवं अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष उन्होंने वहीं निवास किया था। इतना ही नहीं, उनकी मृत्यु भी वहीं हुई थी। इसलिए केवल सिख धर्म ही नहीं वरन संपूर्ण हिंदू समाज की दृष्टि से भी इस गुरुद्वारे को असाधारण महत्व प्राप्त है। यह गुरुद्वारा, भारत-पाकिस्तान सीमा से 5 कि.मी. दूर स्थित है, जो भारत-पाक विभाजन के कारण पाकिस्तान में चला गया। वास्तव में, विभाजन के समय ही अनुरोध कर इसे भारत में सम्मिलित किया जा सकता था, किंतु तत्कालीन शीर्ष नेताओं को यह बात सूझी ही नहीं। भारत-पाक के बीच लगातार तनाव के चलते, भारतीयों का वहां जाना मुश्किल हो गया था किंतु अब यह यात्रा आसान हो गई है।

सिर्फ करतारपुर कॉरिडोर को ही क्यों?

पाकिस्तान स्थित हिंदुओं के कई तीर्थ स्थानों में से, उसने केवल करतारपुर को ही भारतीयों के लिए खोलने का निर्णय किया। 5 अगस्त को, काश्मीर में लागू धारा 370 के रद्द किए जाने के बाद तो जैसे पाकिस्तान में, करतारपुर कॉरिडोर की परियोजना को तत्परता से पूर्ण करने की हड़बड़ी ही मच गई; अन्यथा सर्जिकल स्ट्राइक एवं बालाकोट हवाई हमले के बहाने पाकिस्तान यह परियोजना लंबित कर सकता था।

पिछले छः दशकों से भी अधिक समय से, भारत के सिख श्रद्धालुओं द्वारा करतारपुर के दर्शन करने की अनुमति देने एवं संबंधित मार्ग को खोलने की मांग की जा रही थी। इस गलियारे के उद्घाटन के अवसर पर करतारपुर में जो पोस्टर लगाए गए थे, उनमें मुख्यतः सिख आतंकवादियों की तस्वीरें ही दिखाई दे रहीं थीं। कॉरिडोर के उद्घाटन के कुछ दिनों पूर्व ही, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा, खालिस्तानी अलगाववादी नेताओं के पोस्टरों वाला एक विज्ञापन वीडियो भी जाहिर किया गया था। इस वीडियों में, 1984 में स्वर्ण मंदिर में भारतीय सेना द्वारा मारे गए जनरैल सिंह भिंडरांवाले एवं अन्य सिख अलगाववादियों को दिखाया गया था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि पाकिस्तान वास्तव में क्या चाहता है।

इस सद्बुुद्धि का कारण

पिछले कई वर्षों में, जबकि पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच चुका है, पाकिस्तान को यह सद्बुद्धि अभी ही कैसे उत्पन्न हुई? इसी कारण पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने, आशंका व्यक्त की है कि पाकिस्तान द्वारा, भारत में खालिस्तान आंदोलन को फिर शुरु करने के लिए इस करतारपुर कॉरिडोर के प्रयोग की प्रबल संभावना है। दुनियाभर के सिखों ने भी यही आशंका जताई है। इसके पीछे की वजह, पाकिस्तान में आश्रय पाए खालिस्तानवादी नेता गोपालसिंह चावला के इस मामले में सक्रिय होना बताई जा रही है। भले ही भारत से खालिस्तान आंदोलन का नामो-निशान मिट गया हो किंतु अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया एवं इंग्लैंड आदि देशों में खालिस्तान उग्रवादियों द्वारा बीच-बीच में आंदोलन करना जारी ही है। करतारपुर कॉरिडोर की आड़ में, पाकिस्तान को भारत में अशांति एवं अस्थिरता उत्पन्न करने का अवसर मिल जाएगा और इस तरह वह खालिस्तानी आतंकवाद को पुनर्जीवित करने का प्रयास करेगा।

सिखों एवं हिंदुओं में फूट अटल है

करतारपुर में बड़ी संख्या में आए भारतीयों का स्वागत करने के बाद, पाकिस्तान को भरोसा है कि अब उसे दुनियाभर के एवं भारतीय सिखों के मत परिवर्तन करने का सुनहरा मौका मिल गया है। करतारपुर साहिब के मुद्दे पर भारत, इमरान खान, पाकिस्तानी सेना एवं आईएसआई को लेकर चिंतित हो गया है। करतारपुर साहिब के बहाने पाकिस्तान को, उग्रवादियों को बढ़ावा देने का अवसर मिल जाएगा। इमरान खान इस पुरानी विचारधारा को मानते हैं कि सिखों एवं हिंदुओं में फूट पड़ना अटल है। 1950 के दशक से, यानी जब विभाजन का घाव हरा ही था, तभी से पाकिस्तान यह कुटिल कल्पना कर रहा है। उसने 1960 में ही इस दिशा में अपना पहला कदम बढ़ा दिया था। 1960 एवं 1982-84 के दौरान उसके दो प्रयास असफल हो चुके हैं। विदेशों, खासकर कनाडा में स्थित सिख संगठनों को पाकिस्तान के अनिवासी समूह से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्हें कश्मीरी समूहों के साथ जोड़ा जा रहा है।

खालिस्तानी हिंसा भड़काने का प्रयास

भले ही यह कॉरिडोर, भारत एवं पाकिस्तान के नागरिकों के परस्पर संपर्क द्वारा शांति एवं सौहार्द्र बनाए रखने के उदात्त उद्देश्य से निर्मित किया गया हो; किंतु पाकिस्तान ने दिखा दिया है कि यह केवल एक गलतफहमी है। इस गलियारे का प्रयोग कर, भारत से प्रतिदिन 5000 तीर्थयात्रियों को प्रवेश की अनुमति दी गई है, जिसमें अधिकतर सिख श्रद्धालु होंगे। पाक द्वारा इस बात का भरसक प्रयास किया जाएगा कि इतनी बड़ी तादाद में पहुंचने वाले इन तीर्थयात्रियों के मन में अलगाववाद के बीज बोए जाएं। करतारपुर कॉरिडोर के कारण आतंकवाद को बढ़ावा मिलने की संभावना बहुत अधिक है।

70 के दशक से ही पाकिस्तान भारत को तोड़ने का प्रयास कर रहा है। 80-90 के दशक में पंजाब में आतंकवाद एवं अलगाववाद उफान पर था, जिसे पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त था। सैकड़ों लोग उसकी बलि चढ़ गए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जीवन भी इसी सिख आतंकवाद की भेंट चढ़ गया था। हालांकि, पंजाब पुलिस एवं भारतीय सेना द्वारा चलाए गए आतंकवाद विरोधी अभियान के कारण भारत इस आतंकवाद को समाप्त करने में सफल हो गया।

पाकिस्तान में सिख सुरक्षित नहीं

पाकिस्तान को न तो सिख समुदाय से कोई लगाव है और न ही वहां के सिखों का जीवन सुरक्षित है। समय-समय पर उन पर धर्मांतरण के लिए दबाव डाला जाता है। हिंदुओं की तरह ही सिख लड़कियों का अपहरण कर, उनका बलात धर्म परिवर्तन करवाकर, मुस्लिम व्यक्तियों से उनका निकाह करवा दिया जाता है। विगत कुछ महिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं। पाकिस्तान में सिखों की जनसंख्या में तेजी से कमी आ रही है। अपने देश के सिख समुदाय के साथ ऐसी अमानवीय हरकतें करने वाला पाकिस्तान, भारतीय सिख समुदाय का स्नेहभाजन बनने का बड़ा प्रयास कर रहा है। बहुत जरूरी है कि देश व सिख समुदाय उसकी यह चाल समझे। भारत का सिख समाज शांतिप्रिय, परिश्रमी, देशभक्त एवं राष्ट्रीय विचारों का है। देश की अर्थव्यवस्था एवं रक्षा के क्षेत्र में इस समुदाय का योगदान अतुल्य है। हालांकि पाकिस्तान, इस समाज के कुछ समाजकंटकों को पिट्टू बनाकर, भारत में खून-खराबा और अराजकता फैलाने की तैयारी में है।

अब इस कॉरिडोर के कारण, करतारपुर गुरुद्वारे में प्रतिदिन हजारों की संख्या में सिख श्रद्धालु आएंगे, जिनमें से कुछ को स्वतंत्र खालिस्तान के मुद्दे पर बरगलाना पाकिस्तान के लिए आसान हो जाएगा। खालिस्तानवादियों ने, खालिस्तान के मामले पर जनमतसंग्रह का काम शुरु कर दिया है, जिसे 2020 तक पूरा किया जाना है। भारतीय सिखों के मन में खालिस्तान के समर्थन में विचार उत्पन्न करना एक दुरुह कार्य था। अब चूंकि ये सिख सहज ही करतारपुर आएंगे, तो पाकिस्तान के लिए, उनके हृदय में खालिस्तान का बीजारोपण करना सरल हो जाएगा। खालिस्तान के निर्माण के लिए बहुमत जुटाते ही ये खालिस्तानवादी, संयुक्त राष्ट्र संघ में जाकर स्वतंत्र खालिस्तान की मांग कर देंगे। भारत के प्रति निष्ठा रखने वाले सिखों की शंका निराधार नहीं है।

क्या करें?

पाकिस्तान, अपने यहां आनेवाले भारतीय सिख तीर्थयात्रियों के कट्टरपंथीकरण का प्रयास करेगा। यदि वह झूठा प्रचार कर इस तरह कुछ भारतीय सिख तीर्थयात्रियों के मन में भी कट्टरपंथी भावना जगाने में कामयाब हो गया तो यह भारत के लिए किसी महत्वपूर्ण युद्ध को हारने के समान होगा। इसे रोकने के लिए भारत को अथक प्रयास करने होंगे। यह तो तय है कि खालिस्तान की, ‘सार्वमत 2020’ के आयोजन की यह योजना कारगर साबित नहीं होगी; किंतु इसके लिए सुरक्षा व्यवस्था को आंखों में तेल डालकर सावधान रहने एवं साथ ही सुरक्षा के मामले में सदैव सतर्क रहने की आवश्यकता है। उन्हें इस बात पर नजर रखनी होगी कि करतारपुर जानेवाले सिख यात्रियों को पाकिस्तान क्या संदेश देता है एवं उसका उनपर क्या असर होता है। पाक के दांव-पेंच समझकर उसे धूल चटाने के लिए भारतीय सुरक्षा व्यवस्था को एड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा। इसके लिए सुरक्षा विभाग और गुप्तचर विभाग को सुसज्जित रहना होगा। श्रद्धालुओं को प्रवचन/ उपदेश आदि के माध्यम से भी पाक के षडयंत्रों एवं दांव-पेंचों के बारे में अवगत कराना होगा। देशहित के लिए यदि फिर सर्जिकल स्ट्राइक करनी पड़े तो भारत पीछे नहीं हटेगा; इसलिए पाकिस्तान, नुकसान उठाने के लिए तैयार रहे। करतारपुर कॉरिडोर खोलकर भारत ने बड़ा खतरा मोल लिया है, इसलिए उसे संभावित खतरों का सामना करने के लिए अभी से सुसज्जित रहना होगा।

 

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