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पर्यावरण या इंसान : किसका कद ऊंचा?

सृष्टि के हर जीव को जीने का सुंदर वातावरण मिले, यही पर्यावरण की परिभाषा है। किंतु विकास की अति लालसा और औद्योगिकरण की तथाकथित प्रगति के लिए मनुष्य ने प्रकृति को ही गुलाम बनाने का संकल्प किया है। मनुष्य के मन में यह अहंकार पैदा हुआ है कि वह अपनी बुद्धि के बल पर प्रति-सृष्टि पैदा कर सकता है। पर्यावरण में पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश इन पंचमहाभूतों का समावेश है। इन सबके आपसी तालमेल से सृष्टि का काम ठीक चलता है। लेकिन मनुष्य ने आज अपने स्वार्थ के लिए इन सारी बातों का शोषण शुरू किया है और फलस्वरूप शुद्ध पर्यावरण का दम घुट रहा है। बेहिसाब जंगल काटे जा रहे हैं। आस्ट्रेलिया में तो सम्पूर्ण जंगल और उसके बाशिंदे जीव, वनस्पति दावानल में स्वाहा हो रहे हैं। कहीं अति वृष्टि से कई शहर ही बाढ़ की पानी में डूब रहे हैं। अंतरिक्ष के खालीपन से लेकर समुद्र की गहराई तक मनुष्य निर्मित कूड़े का साम्राज्य फैला हुआ है। इन सारी स्थितियों में मनुष्य को अपने अस्तित्व का संकट साफ दिखाई दे रहा है। इसलिए वह अब पर्यावरण के बारे में जनजागरण की दिशा में कदम उठा रहा है।

मनुष्य की रोजमर्रे की जिंदगी भी पर्यावरण का ही अंग है। रोज के जीवन में मनुष्य प्रकृति के नियमों का पालन करता है। मनुष्य के मन पर पर्यावरण के बारे में हुए संस्कारों पर ही पर्यावरण के संवर्धन की बात निर्भर है। इसलिए इस बारे में पहले खुद अपना संवर्धन करना होगा। क्या ऐसा हो रहा है? इस प्रश्न का उत्तर ना में ही है।

आजकल इमारतें पेड़ों से अधिक ऊंची होने लगी हैं। हमारे बचपन में हमारी बस्ती में ऐसे अनेक वृक्ष थे। वे वृक्ष हमारे घर से ऊंचे थे। उन वृक्षों की शाखाएं हमारे घर पर और हम जहां खेलते थे उस मैदान तक फैली हुई थी। उस समय पंछियों को देखने के लिए हमें नीचे से ही वृक्षों या आकाश की ओर देखना होता था। हमें वृक्षों से आकाश में उड़ते पंछी दिखाई दिया करते थे। यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। कोई चालीस साल पहले की बात होगी। उस समय पेड़ भी घरों से ऊंचे हुआ करते थे। आज इमारतें वृक्षों से भी कई गुना ऊंची हो गई हैं। मनुष्य ने भौतिक विकास किया परंतु वृक्षों को बौना बना दिया। मनुष्य ने जो भौतिक विकास किया, क्या उससे मनुष्य की ऊंचाई बढ़ गई? इस प्रश्न का उत्तर अधर में ही है।

वृक्षों की बेतहाशा कटाई ही केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। वह तो मानवी मूल्यों के तेजी से हो रहे क्षरण को दिखाने वाला मुद्दा है। शहरों में कम होती पेड़ों की संख्या मानवी मूल्यों का किस तरह अवमूल्यन हो रहा इसे प्रदर्शित करती है। जंगलों में शहर घुस गए हैं। जंगल के रूप में जंगल का जो वैभव था वह नष्ट हो ही रहा है। जंगल के सजीव और वनस्पतियां सबकुछ खत्म हो रहा है।

हर व्यक्ति स्वच्छ पर्यावरण का आंनद लें यह उसका मूलभूत अधिकार है, जिसे हमारे संविधान ने निर्धारित किया है। लेकिन स्वार्थ में अंधा हुआ आदमी अपना यह अधिकार प्राप्त करने मेें भी विफल हुआ है। इसके अन्य कोई नहीं, हम खुद जिम्मेदार हैं। पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्य को हम भूल चुके हैं। हमारे अधिकार क्या है, इस पर ही हमारा ध्यान केंद्रित हो रहा है।

पर्यावरण का अधिकार लड़ कर, संघर्ष कर हमें प्राप्त करना चाहिए यह सच है। लेकिन उसके साथ पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी हमारे बीच आनी चाहिए। यूरोप व अमेरिका में साठ के दशक में पर्यावरण असंतुलन व प्रदूषण को लेकर जनता में जागरूकता आरंभ हुई। पर्यावरण के विभिन्न स्तरों पर संघर्ष आरंभ हुआ। उसके परिणाम आज कुछ मात्रा में हमें दिखाई दे रहे हैं। पर्यावरण के बारे में संघर्ष बहुत दीर्घकालिन होता है। उसके सकारात्मक परिणाम आने में देर लगती है। भारत में पर्यावरण के बारे में जागरूकता बहुत कम है। शहरी इलाकों में पर्यावरण के बारे में जागरूकता कम और भौतिक विकास की चिंता अधिक होती है। जब शहरों के सुशिक्षित समाज की पर्यावरण के बारे में अनुभूतियां भोथरी होती हैं तब पर्यावरण के क्षेत्र में कार्यरत कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती हैं।

आध्यात्मिक ग्रंथ में प्रस्तुत करना और वही विचार सार्वजनिक नीति के रूप में सम्पूर्ण जनता व सरकार द्वारा स्वीकार किया जाना इस तरह का कोई संतुलन हमारे भारतीय समाज में दिखाई नहीं देता। पर्यावरण के बारे में दो तरह से विचार किया जा सकता है- एक, पर्यावरण वाद और दूसरा पर्यावरण नीतिशास्त्र। पर्यावरण वाद में पर्यावरण के बारे में विभिन्न सिद्धांत, पर्यावरण प्रणाली, सामाजिक आंदोलन, दबाव समूह तैयार करना, पर्यावरण के बारे में प्रशिक्षण देना, पर्यावरण के लिए अभियान चलाना आदि शामिल हैं। पर्यावरण नीतिशास्त्र में पर्यावरण समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, भूगोल, विज्ञान आदि बातें शामिल हैं।

आज सम्पूर्ण दुनिया में तथा भारत में पर्यावरण असंतुलन के कारण जो संकट पैदा हो रहा है उसकी भयावहता का अनुभव तो हमें आ रहा है, लेकिन आर्थिक विकास मनुष्य के मन पर हावी है। पर्यावरण को हानि पहुंचा कर निर्मित उपभोग के साधन हमें और हमारी भावी पीढ़ियों को स्वस्थ, सुखी और संतोषप्रद जीवन नहीं दे सकेंगे। इसलिए पर्यावरण नीतिशास्त्र पर गौर करते हुए पर्यावरण व विकास दोनों का समन्वय स्थापित करने वाला वैकल्पिक मॉडल हमें प्रस्तुत करना होगा। यह ऐसा मॉडल होगा जिसमें पर्यावरण के संवर्धन के साथ मानवी सुरक्षा और रक्षा का विचार समाहित होगा। वैश्विक स्तर पर पर्यावरण परिषदों में इस पर मंथन चलता रहता है। लेकिन उसकी अंतिम फलश्रुति क्या है? शायद कुछ नहीं। क्योंकि, पर्यावरण दूषित होने के निश्चित कारण और उपायों पर कभी सहमति नहीं हो पाती। इसलिए सफल मनुष्य की सफलता का रहस्य मनुष्य कुछ भी समझें परंतु प्रकृति के साथ खेल करेंगे तो वह आपको और आपकी अगली पीढ़ियों के सफल जीवन को तबाह किए बिना नहीं छोड़ेगी। भविष्य में होने वाली इस दुर्घटना के लिए फिर प्रकृति को दोष नहीं दे सकेंगे। अंधाधुंध विकास के पीछे भागता मनुष्य ही इसके लिए जिम्मेदार होगा।

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