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दो सितारों का टूटना

“इरफान खान और ॠषि कपूर के रूप में हमने दो उम्दा कलाकारों को तो खोया ही दो ऐसे व्यक्तियों को भी खोया जो समाज की बुराइयों पर बेबाकी से अपनी राय रखते थे। वे दोनों ही अपनी तरह अकेले ही थे, उनके जैसा दूसरा होना संभव नहीं।”

खगोलशास्त्री अप्रैल की 29-30 तारीख को किसी उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने का अनुमान लगा रहे थे। अगर यह उल्कापिंड पृथ्वी से टकराता तो भारी नुकसान की सम्भावना थी। सौभाग्य से ऐसा हुआ नहीं। वह उल्कापिंड अत्यंत तीव्र गति के साथ परंतु पृथ्वी से कुछ अंतर रखकर निकल गया। आसमान की इस घटना का तो पृथ्वी पर कोई असर नहीं हुआ परंतु भारतीय फिल्म जगत के दो सितारों का लगातार दो दिनों में निधन भारतीय फिल्म जगत के आकाश को सूना कर गया।

क्रमश: 29 और 30 अप्रैल को इरफान खान और ॠषि कपूर का निधन भारतीय दर्शकों को स्तब्ध कर देने वाला रहा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से दोनों की बीमारियों की, विदेश में इलाज कराने की खबरें निरंतर आती रहीं थीं परंतु दोनों ने ही इससे उबरकर अपनी दूसरी पारी की शुरआत कर दी थी। अत: दर्शक यह मान रहे थे कि अगले कुछ सालों तक उनकी बेहतर अदाकारी फिर से देखने को मिलेगी। परंतु नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।

ॠषि कपूर और इरफान खान की हालांकि किसी भी पैमाने पर कोई तुलना नहीं की जा सकती परंतु चूंकि इस एक ही आलेख में दोनों की बात करनी है इसलिए कुछ समान मुद्दों पर चर्चा की जा सकती है। ॠषि                            कपूर और इरफान खान दोनों ने ही एक लम्बा समय भारतीय फिल्म उद्योग में तो गुजारा ही हॉलिवुड की फिल्मों में भी अपने अभिनय का डंका बजाया था। ॠषि कपूर को अभिनय और फिल्मी वातावरण विरासत में मिला था और इरफान के मामाजी ने उनका परिचय थियेटर से कराया। बीस साल की उम्र दोनों के लिए ही विशेष रही। ॠषि कपूर ने बॉबी से अपने दमदार अभिनय का परिचय दिया तो इरफान ने क्रिकेट छोड़कर जयपुर के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया। अभिनय के दृष्टिकोण से देखें तो इरफान की आंखें बोलती थीं और ॠषि कपूर का पूरा शरीर, परंतु दोनों ही आज के ‘हीरो’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठते थे। न तो दोनों की वो जिम वाली बॉडी थी, न ही दोनों फायटिंग स्टंट करने में माहिर थे, फिर भी दोनों ने अपनी-अपनी अभिनय शैली से सभी का दिल जीत लिया था। ॠषि कपूर की फिल्में देखकर जो लोग ‘जवान’ हुए हैं, वे इस बात को बखूबी जानते हैं कि किस तरह उनके द्वारा हर फिल्म में निभाए गए नायक के किरदार से लोग अपने आप को जोड़ लेते थे। बॉबी, खेल-खेल में, लैला-मजनू, हम किसी से कम नहीं, सरगम, कर्ज, प्रेम रोग, सागर, नगीना, चांदनी, हिना, दीवाना, बोल राधा बोल, दामिनी, प्रेमग्रंथ जैसी फिल्मों की एक लंबी सूची है जो उनके चॉकलेटी हीरो वाली छवि को यादगार बनाती हैं। उन्होंने अपने तीस साल के लंबे फिल्मी सफर में लगभग हर दौर की अभिनेत्रियों के साथ काम किया। डिंपल कपाडिया से लेकर अपनी भतीजी करिष्मा कपूर के उम्र की दिव्या भारती, माधुरी दीक्षित और रवीना टंडन तक सभी उनकी पर्दे की प्रेमिकाएं रहीं, परंतु नीतू सिंह को उन्होंने अपनी जीवन संगिनी बनाया। पर्दे पर भी इन दोनों की केमिस्ट्री को दर्शकों ने बहुत पसंद किया था।

सामान्य अभिनय के अलावा उनकी एक और बात जो दर्शकों को लुभाती थी वह थी उनका वाद्य बजाने का अभिनय और कव्वाल का अभिनय। गिटार, डफली जैसे जो भी वाद्य उनके हाथ में रहे वे ऐसे अभिनय करते थे जैसे खुद बजा रहे हों। फिल्मी गीतों में जितनी भी कव्वालियां शामिल हैं वे उनमें से अधिकतम याद रहने वाली कव्वालियां ॠषि कपूर पर चित्रित हैं। कव्वाली गाते समय कव्वाल के हाव-भाव, अंग संचालन का तरीका, अपने साथी कव्वालों से गिव एंड टेका का तरीका उन्होंने बखूबी अपने अभिनय में उतारा था। ॠषि कपूर की नृत्य प्रतिभा भी जोरदार रही। विशेषकर ऐसे नृत्य जो स्टेज पर चित्रित किए गए हों। उनकी स्थूल शारीरिक संरचना कभी उनके नृत्य के आड़े नहीं आई। ‘कर्ज’ के गीत ‘मेरी उमर के नौजवानों’ से लेकर ‘दीवाना’ के ‘सोचेंगे तुम्हें प्यार करें के नहीं’ तक उनकी नृत्य की गति में कोई परिवर्तन नहीं आया था। यहां तक कि ‘स्टूडेंट ऑफ द इयर’ के गीत में जहां ‘डफली वाले डफली बजा’ का कुछ हिस्सा रीमिक्स करके लिया गया है उसमें भी वे आज के नौजवानों को नृत्य में माते दिखाई दिए थे। ‘स्टूडेंट ऑफ द इयर’ जैसी नए दौर की फिल्मों में भी उनके द्वारा निभाए गए किरदार सभी को याद रहे। इस चॉकलेटी हीरो ने ‘अग्निपथ (पार्ट-2)’ में और ‘डी-डे’ में खलनायक का जो किरदार निभाया वह भी अपनी अलग छाप छोड़ गया। ‘डी-डे’ में ॠषि कपूर ने एक अंडरवर्ल्ड डॉन (दाऊद) की भूमिका निभाई जिसे पकड़ने का जिम्मा रॉ ऑफिसर का किरदार निभाने वाले इरफान खान पर था। इरफान खान ने भी अपने सशक्त अभिनय से ॠषि कपूर को जोरदार टक्कर दी थी।

इरफान खान के अभिनय का लोहा तो लोग तभी से मान चुके थे जब उन्होंने नीरजा गुलेरी के धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ में दोहरी भूमिका निभाई थी। बेहद गंभीर चेहरे वाले इरफान ने इस धारावाहिक में की गई अपनी दोहरी भूमिका से यह भी दिखा दिया था कि वे दर्शकों को हंसा भी सकते हैं। वे फिल्में, धारावाहिक और वेब सीरीज जैसी मनोरंजन की हर श्रेणी में सक्रिय रहे। लोगों ने उन्हें हर किरदार में पसंद किया। वे रोमांटिक हीरो के रूप में दर्शकों के सामने कभी नहीं आए परंतु जिन फिल्मों में उन्होंने लीड रोल किया उनके कथानक और इरफान खान का किरदार दोनों ही जबरजस्त थे। इस तरह की फिल्मों को पसंद करने वाला एक अलग वर्ग है जो ‘रियलिस्टिक फिल्में’ और अभिनय पसंद करता है। ऐसी पसंद को इरफान ने बखूबी पहचाना और किस्सा, मकबूल, पजल, नेमसेक, लंचबॉक्स, लाइफ ऑफ पाई, करीब-करीब सिंगल, हिंदी मीडियम और पीकू जैसी फिल्में कीं। ‘वर्सटाइल एक्टर’ की नई परिभाषा इरफान ने गढ़ी थी। ‘काँस्ट्रीपेशन’ जैसे बिलकुल साधारण विषय पर फिल्म बनाना और उसमें अमिताभ बच्चन, दीपिका पादुकोण और इरफान खान जैसे दिग्गज कलाकारों का काम करना सुखद संयोग था। फिल्म में कौन किस पर भारी रहा यह आज तक दर्शक समझ नहीं सके। इरफान खान ने इस फिल्म में बिना किसी अतिरिक्त अनावश्यक अंग संचालन के भी केवल अपनी आंखों तथा चेहरे के हावभाव और संवाद प्रेषण से लोगों को पेट पकड़- पकड़कर हंसने पर मजबूर कर दिया था। वे अपने किरदार के लिए कितनी तैयारी करते थे यह इस बात से पता चलता है कि पान सिंग तोमर का किरदार निभाने के लिए उन्होंने असली पानसिंग तोमर के भतीजे (जिन्होंने असली पानसिंग तोमर की मृत्यु के पश्चात आत्मसमर्पण कर दिया था) के साथ दो-तीन महीने गुजारे और पानसिंग तोमर की हर बारीकी को आत्मसात करने की कोशिश की।

इरफान खान और ॠषि कपूर दोनों रील लाइफ जितने उम्दा कलाकार थे, रियल लाइफ में उतने ही बेबाक व्यक्ति। सोशल मीडिया पर वे जब भी बोलते थे वह चर्चा का विषय रहता था। चाहे ॠषि कपूर का प्रधान मंत्री मोदी की खुले आम तारीफ और पाकिस्तान के प्रधान मंत्री को खरी खोटी सुनाना हो या इरफान खान का खुले आम मुस्लिम समाज की कुरीतियों पर टिप्पणी करना हो, दोनों ने ही हंगामा मचा दिया था।

दोनों को इसके लिए विरोध का भी सामना करना पड़ा था। इरफान खान को तो मौलवियों से धमकी भी मिल गई थी परंतु वे अपनी बात से पीछे नहीं हटे। लगातार दो दिनों में इन दो कलाकारों का निधन होना भारतीय फिल्म जगत को जितनी क्षति पहुंचा गया उतनी ही क्षति आम समाज को हुई। हमने दो उम्दा कलाकारों को तो खोया ही दो ऐसे व्यक्तियों को भी खोया जो समाज की बुराइयों पर बेबाकी से अपनी राय रखते थे। वे दोनों ही अपनी तरह अकेले ही थे, उनके जैसा दूसरा होना संभव नहीं।

This Post Has 3 Comments

  1. बहुत अच्छी तरह लिखा गया आलेख।इरफान खान का धारावाहिक चाणक्य में किया गया अभिनय कभी भुलाया नही जा सकेगा।
    डॉ.सुषमा श्रीराव

  2. श्रधान्जली

  3. सच में दोनों इस तरह एक साथ जाना दुखद है.श्रद्धांजलि🙏🙏

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