युद्धस्तर पर हो मजदूरों की वापसी

सन 1947 में देश का बंटवारा होने के बाद वर्ष 2020 में सबसे बड़ी पलायन की समस्या देश के सामने खड़ी है। उस समय तो हमारा देश चुनौतियों का सामना करने में समर्थ नहीं था। आजादी मिली ही थी कि बंटवारे के दर्द ने जख्म गहरा कर दिया और करोड़ों लोगों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा। इस बार कोरोना संकट एवं लॉकडाउन के कारण प्रवासी मजदूरों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है। लेकिन अब पहले जैसी भारत की स्थिति नहीं है। आज का नया भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में समर्थ और शक्तिशाली है। दुनिया की एक महाशक्ति है। मोदी सरकार के सही
समय पर लिए गए सही क़दमों के चलते विकसित राष्ट्रों की तुलना में भारत ने कोरोना संक्रमण की तेज रफ्तार को नियंत्रित करने में सफलता पाई है। बावजूद इसके मजदूरों का पलायन सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। क्या वाकई पलायन सबसे बड़ी समस्या है या जानबूझकर इस समस्या को बढ़ाया जा रहा है या फिर लाचार मजबूर मजदूर गंदी राजनीति की भेंट चढ़ रहे हैं?
अभी हाल ही में कांग्रेस की प्रियंका राबर्ट वाड्रा द्वारा 1000 बसों का इंतजाम करने का फर्जी मामला सामने आया था। इसी से कांग्रेस पार्टी की संवेदनहीनता के साथ मानसिक दीवालियेपन एवं निर्लज्जता का परिचय हो जाता है। इस घटना के प्रकाश में आने के बाद संभावना जताई जा रही है कि आगे भी मजदूरों को बलि का बकरा बनाकर राजनीतिक खेल खेला जा सकता है। बहरहाल हम बात करते हैं उन प्रवासी मजदूरों के दर्दनाक सफ़र
की, जिन्होंने ट्रेन, टेम्पो, ट्रक और पैदल यात्रा की है।

ट्रेन का मुश्किल सफ़र

अभी हाल ही में मेरे एक मित्र जीतेन्द्र शर्मा ने मुंबई से जौनपुर (यूपी) तक की यात्रा ट्रेन से तय की है। उन्होंने अपनी यात्रा का अनुभव हमसे साझा करते हुए कहा कि जब वह अनुमति के लिए पुलिस थाना गए तब उन्होंने वहां पर मजदूरों की लम्बी – लम्बी कतारे देखीं। पुलिस से उन्हें किसी प्रकार का सहयोग नहीं मिल रहा था। डरे सहमे मजदूर लाचार स्थिति में खड़े थे। उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। पुलिसवाले लेटलतीफी कर रहे थे और रोज नए बहाने और ओशासन देकर चलता कर रहे थे। मजदूरों की सहायता के लिए किसी जनप्रतिनिधि ने प्रयास तक नहीं किया। यही हाल कमोबेश सभी जगहों पर देखा गया। हालांकि कुछ जगह अपवाद भी थे, जहां पर प्रशासन द्वारा सहयोग भी किया जा रहा था। किसी तरह उन्हें अनुमति मिल गई और वह परिवार के साथ ट्रेन में बैठ गए। ट्रेनों में खचाखच भीड़ थी। सोशल एवं फिजिकल डिस्टसिंग के लिए ट्रेन में जगह ही नहीं बची थी। तीन दिनों के सफ़र में केवल दो जगहों पर ही उन्हें पीने का पानी मिला। बाकी समय उन्हें प्यासा ही रहना पड़ा। कुछ जगहों पर भोजन बांटा जा रहा था लेकिन गेट पर खड़े लोग ही नीचे उतर कर सबसे पहले झपट्टा मार रहे थे। अंदर बैठी महिलाएं एवं बच्चों सहित अभिभावकों को भोजन का निवाला भी नसीब नहीं हुआ। जो घर से खाद्य पदार्थ लाए थे बस उससे ही उन्हें गुजारा करना पड़ा। ट्रेन में चारों ओर अफरातफरी का माहौल था। प्राथमिक उपचार तक की सुविधा कहीं दिखाई नहीं दी।

टेम्पो द्वारा मुंबई से उत्तर प्रदेश का भयानक सफ़र

मेरे ही पड़ोस में रहने वाले मेरे एक मित्र संतोष प्रजापति ने टेम्पो द्वारा सड़क मार्ग से गोरखपुर (उप्र) का सफ़र तय किया। ट्रेन से गांव जाने का कोई विकल्प नहीं होने के कारण उन्होंने अपने गांव के कुछ मित्रों के साथ टेम्पो में बैठकर सड़क मार्ग से अपनी यात्रा प्रारंभ की। बड़ी संख्या में ट्रक, बस एवं टेम्पो से प्रवासी मजदूर अपने गांव की ओर प्रस्थान कर रहे थे। इसलिए सड़कों पर ट्राफिक जाम की स्थिति बनी हुई थी। इस बीच मोबाईल पर यहां – वहां सड़क दुर्घटना की खबरें भी आ रही थी। सभी के मन में यह भय समाया हुआ था कि कहीं कोई हादसा न हो जाए। जिसके चलते सभी भयभीत थे और सभी ईेशर से प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह वे सही सलामत अपने घर पहुंच जाए। संतोष प्रजापति ने बताया कि सफ़र में महाराष्ट्र सीमा तक रास्ते में उन्हें कही भी खानेपीने की सुविधा नहीं मिली। लेकिन मध्यप्रदेश पहुंचते ही उन्हें भरपूर खानेपीने और नाश्ता पानी की सुविधा प्राप्त हुई। वहां पर अनेक सामाजिक संगठनों द्वारा सड़कों के इर्दगिर्द सेवा कार्य चलाए जा रहे थे। जगह – जगह पर हजारों यात्रियों ने इस सुविधा का लाभ उठाया। सभी ने एक स्वर में मध्यप्रदेश में किए जा रहे सेवा कार्यों की खुले दिल से सराहना की और उनका आभार माना।

गांव जाने पर मिला तिरस्कार और भेदभाव

संतोष ने किसी तरह 4 दिन का संघर्ष भरा सफ़र तो तय कर लिया लेकिन अपने गांव जाने पर उन्हें भेदभाव एवं तिरस्कार का सामना करना पड़ा। जब वे अपने गांव के बाजार में पहुंचे तो उन्होंने एक दुकान से मिठाई मांगी। तब दुकानदार ने उन्हें मिठाई तो दे दी लेकिन उसके पैसे लेने से इंकार कर दिया। इसी तरह जब उन्होंने दूसरी दुकान से समोसा लेकर खाया और उसके पैसे देने लगे तो उस दुकानदार ने भी उनसे पैसे नहीं लिए। संतोष ने बताया कि गांव वाले बाहरी राज्यों से आने वाले लोगों को कोरोना वायरस का प्रसारक मानते हैं इसलिए वह उनसे दूरी बनाए रखते हैं। यहां तक कि वे उनसे बातचीत भी नहीं कर रहे हैं और उन्हें तिरस्कार भरी नजरों से देख रहे हैं।

प्रवासी मजदूरों की पैदल यात्रा

लगभग 100 किलोमीटर से अधिक दूरी को अपने क़दमों से नाप कर मध्यप्रदेश से रायबरेली (उप्र) अपने घर पहुंचे धरमपाल ने बताया कि सिंगरौली से बस द्वारा उत्तर प्रदेश की सीमा पर छोड़ा गया। उसके बाद आगे का सफ़र हमने पैदल ही तय किया। बीच – बीच में ट्रक आदि वाहनों ने भी हमें कुछ दूरी तक छोड़ा। लेकिन आगे वाहन का कोई साधन नहीं होने से हमें पैदल ही चलना पड़ा। मेरे पैरों में छाले पड़ गए। सड़क पर चलते समय आसपास रहने वालों से जब हमने भोजन पानी मांगा तो उन्होंने भोजन देने से इनकार कर दिया। रास्ते में हमें एक डॉक्टर मिले जिन्होंने हमारा हालचाल जाना और कुछ दवाइयां व खाद्य सामग्री देकर हमारी सहायता की। हम उनके हमेशा शुक्रगुजार रहेंगे। वे हमारे लिए भगवान बनकर आए।

राज्य सरकारों के बीच समन्वय स्थापित कर प्रवासी मजदूरों की घर वापसी आसानी से कराई जा सकती है। जिन मजदूरों ने अपने परिश्रम से पसीना बहाकर शहरों एवं राज्यों को समृद्ध बनाया है, जिन मजदूरों के कंधों पर नए भारत का नवनिर्माण टिका हुआ है उन शौर्यवान मेहनत पसंद मजदूरों की घर वापसी में देरी क्यों? क्या मजदूरों की सुरक्षित सम्मानजनक घर वापसी कराना राज्य सरकारों का उत्तरदायित्व नहीं है? फिर मजदूरों को अपमान व तिरस्कार का घूंट क्यों पीना पड़ रहा है? संकट के समय में मजदूरों की घर वापसी हर राज्य की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। मजदूरों के दुख-दर्द, तकलीफों को समझते हुए मानवता की दृष्टि से एवं कर्तव्य भाव से केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को आपसी तालमेल बिठाकर युद्धस्तर पर प्रवासी मजदूरों की घर वापसी सुनिश्चित करनी चाहिए और सभी प्रकार की आवश्यक सुविधाएं तत्काल उपलब्ध करवानी चाहिए।

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