पर्यावरण सरंक्षण और भारतीय मूल्य

विश्व पर्यावरण दिवस, 2020 प्रकृ ति के साथ हमारे सह-अस्तित्व एवं साहचर्य की ओर ध्यानाकर्षण का एक विशेष अवसर है। प्रारंभ से ही, मानव जाति स्थानीय से वैश्विक स्तर तक- प्रकृ ति के साथ सम्यक् संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रही है। प्राकृ तिक संसाधनों के दोहन को लेकर मनुष्य के बढ़ते लालच का परिणाम संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए विनाशकारी साबित हुआ है। पर्यावरणीय प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के खतरे बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच गए हैं और मनुष्य इस बात के लिए विवश हुआ है कि वह तथ्य को अधिक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना सीखे ताकि हम भविष्योन्मुखी और समग्र कृ ष्टिकोण को अपना सकें और भावी पीढ़ियों के लिए बेहतर पर्यावरण छोड़ सकें। पृथ्वी पर सभी जीवधारियों का जीवन एक-दूसरे से जूड़ा हुआ है। संयुक्त राश्ट्र द्वारा इस वर्श को ‘जैवविविधता‘ को समर्पित किया जाना इस सह-अस्तित्व को और बल प्रदान करता है। सहिष्णुता सिखाने और मनुष्य के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने का प्रकृ ति का अपना विशिष्ट तरीका है और इस संबंध को फिर से आत्मसात करने का यह उपयुक्त अवसर है।

 

जहां तक पर्यावरण संरक्षण की बात है, भारत सांस्कृ तिक मूल्यों और धार्मिक लोकाचार की समृद्ध परम्परा वाला देश रहा है। वेदों और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पृथ्वी को माता का दर्जा दिया गया है। अथर्ववेद में कहा गया है  ‘माता भूमि:, पुत्रो अहंम् प्रथिव्या:‘ अर्थात यह भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूं। यहां प्रकृ ति के पंचतत्वों अर्थात, जल, अग्नि, आकाश, पृथ्वी और वायु की पूजा पीढ़ियों से होती रही है। देश भर में पेड़-पौधे, पहाड़, नदियों और फसलों की पूजा की विभिन्न धार्मिक मान्यताएं रही हैं। गोवर्धन पूजा, छठ पूजा, तुलसी, आक, वटवृक्ष पूजा, बैसाखी, गोदावरी पुष्करम, बिहू, राजापर्बा, मकर संक्रांति या पोंगल जैसे त्यौहारों की जड़ें प्रकृ ति से जुड़ी  हैं और ये प्रकृ ति संरक्षण और सम्मान का शाश्वत संदेश देते हैं। भारत विष्व का एक मात्र देष है, जिसे ईष्वर ने 6 विभिन्न ॠतुओं से सुषोभित किया है यथा :- ग्रीश्म, षरद, वर्शा, हेमंत, षिषिर और बसंत। ये 6 ॠतुएं हमें प्रकृति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की षिक्षा भी प्रदान करती हैं। लगभग एक सदी पहले  महान भारतीय वैज्ञाानिक जगदीष चन्द्र बसू ने ही यह सिद्ध किया था की पेड़-पौधों, वनस्पति में भी जीवन होता है, ये भी हमारी तरह ही लगाव एवं दर्द महसूस करते हैं। यहां बिष्नोई समाज का जिक्र करना प्रासंगिक प्रतीत होता है, जिसनें हमेषा से ही प्रकृति एवं पर्यावरण सरंक्षण का षाष्वत संदेष दिया है। 1730 के खेजड़ली नरसंहार को याद कीजिए जब अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 महिलाओं ने खेजड़ली वृक्ष के संरक्षण के लिए अपना जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया था। इन सदियों पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों के कारण प्रकृ ति के साथ हमारा एक भावनात्मक और सहज संबंध रहा है।

 

पर्यावरण संरक्षण भारतीय मूल्यों में अंतर्निहित रहा है और वैश्विक सम्मेलनों और संधियों में हमारी भागीदारी में भी यह भाव दिखाई देता है। खतरनाक कचरे को सीमापार ले जाने को नियंत्रित करने संबंधी बेसल कन्वेंशन, रसायन और कीटनाशी के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संबंधी रॉटरडैम कन्वेंशन, लगातार जैविक प्रदूषण (पीओपी) से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा के लिए स्टॉकहोम कन्वेंशन, तापमान के संबंध में वैश्विक रूप से बाध्यकारी साधन विकसित करने के लिए मिनामाटा कन्वेंशन, जैव विविधता संबंधी रियो डी जेनेरियो कन्वेंशन, आर्द्रभूमि के संरक्षण के लिए रामसर कन्वेंशन, ओजोन परत की रक्षा के लिए वियना कन्वेंशन, जलवायु परिवर्तन संबंधी संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के लिए पेरिस समझौते जरुरी मुद्दों को उठाते हैं और अब हमारी नीतियों की आधारशिला हैं। 1987 में प्रकाषित ‘आवर कॉमन फयूचर‘ जिसे ब्रुटलैण्ड रिपोर्ट भी कहते हैं, मैं सतत विकास को परिभाशित करते हुए कहा गया कि “हमें प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना चाहिए की आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों की कमी न हो।“ भारत प्राचीनकाल से ही संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर बल देता है।  भारत अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के माध्यम से, सौर ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की वैश्विक मुहिम का नेतृत्व कर रहा है। गौरतलब है कि महज छह महीने पहले ही, तमाम देश 2020 से पूर्व के क्योटो प्रोटोकॉल की जगह 2020 के बाद पेरिस समझौते को अपनाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन, अब कोरोना महामारी ने स्थितियां पूरी तरह से बदल दी हैं और हमें कोविड पश्चात् के समय के लिए नए नियम अपनाने होंगे। अब हमें मानवता और प्रकृ ति की रक्षा के लिए अधिक मुखर और व्यापक होकर तथा सामूहिकता की भावना से कार्य करने होंगे।

 

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में, अलग-अलग जिम्मेदारियों और क्षमता (सीबीडीआर-आरसी) के बावजूद समानतापूर्ण और साझा सिद्धांतों को अपनाने के प्रति भारत का कृ ष्टिकोण इस बात का प्रमाण है कि हम प्रकृ ति और मानवता के बीच सौहार्दपूर्ण और टिकाऊ संतुलन प्राप्त करने में विश्वास रखते हैं। हाल ही में विषाखापट्टनम में गैस लीकेज की घटना एवं केरल के मल्लापुरम में गर्भवती हथिनी की निर्मम अमानवीय हत्या हमारे लिए चिंता का विशय है। इन विशयों में त्वरित कार्यवाही एवं जागरूकता की महती आवष्यकता है ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। पर्यावरण सरंक्षण और सभी जीवधारियों एवं प्रकृति के साथ साहचर्य विकसित करने के लिए मानव जाति को ज्यादा सघ्घ्घ्घ्, करूणा तथा प्रेम का परिचय देना होगा और प्रकृति सरंक्षण के सामूहिक प्रयासों को अधिक गति देनी होगी।

 

5 सितंबर 2014 को, शिक्षक दिवस पर, विद्यार्थियों के साथ संवाद के दौरान, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने घरों की बिजली बंद करके प्रकृ ति के साथ संबंध स्थापित करने के लिए पूर्णिमा पर ‘एक रात चाँद के साथ‘ की अवधारणा सामने रखी थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रकृ ति से जुड़ने के लिए बड़े-बड़े काम करना ही जरुरी नहीं, बल्कि ऐसी छोटी-छोटी पहलों से भी सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है। तब से, कई बार, पूर्णिमा की रात को मैंने व्यक्तिगत रूप से ” एक रात चांद के साथ“ व्यतीत करने का आनंद लिया और प्रकृ ति के संरक्षण के लिए छोटे-छोटे व्यक्तिपरक कार्यों और जिम्मेदारी की भावना से जागरूकता बढ़ाने की कोशिश की है।

 

भारत आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे सुधार कार्य और व्यवस्थागत परिवर्तन आत्मनिर्भरता के आधार को और मजबूती प्रदान कर रहे हैं। समय आ गया है कि हम अपनी विकास प्रक्रिया में, पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता को अपनी योजनाओं और नीतियों के साथ प्रारंभ से ही जोड़े रखें और इसके लिए हमें अपने पर्यावरण प्रभाव आकलन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना होगा। बेहतर तालमेल और सभी संबंधित पक्षों के साथ सूचना को तुरन्त साझा करने के लिए आवश्यक है कि तकनीकी उपकरणों का लाभ उठाया  जाए और ई-गवर्नेंस प्रक्रिया को अपनाया जाए और संस्थागत जड़ता को तोड़ा जाए ताकि अधिक कुशलतापूर्वक निर्णय लिए जा सके। प्राकृ तिक संसाधनों, मीठे पानी,  वनस्पतियों, जीवों, खनिजों आदि के वितरण को तत्क्षण मापा जाना चाहिए और इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र में वस्तुओं के आईओटी (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) तकनीक को आधार बनाया जाना चाहिए।

अर्जुन राम मेघवाल केंद्रीय राज्य मंत्री, संसदीय कार्य मंत्रालय और भारी उद्योग एवं लोक उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार तथा सांसद बीकानेर राजस्थान

गंगा कायाकल्प और अन्य नदी सफाई परियोजनाओं में प्रगति हो रही है और सरकार के प्रयासों के सद्परिणाम दिखने लगे हैं। हमारे इंजीनियरों ने एशिया के सबसे पुराने सीसामऊ नाले से गंगा नदी में सीवेज के प्रवाह को रोकने में सफलता हासिल की है। वास्तव में, ये हमारे सामूहिक प्रयासों पर गर्व करने वाली चीजें हैं, लेकिन परिस्थितियों की मांग है कि प्रयास लगातार जारी रखे जाएं और हम अपने कार्य का दायरा भी बढ़ाएं।

 

भारत के संघीय ढांचे में, पर्यावरणीय कार्य पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का कार्य-क्षेत्र है। बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया, भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण, भारतीय वन सर्वेक्षण, भारतीय वन्य जीव संस्थान, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो, भारतीय जीव कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई), केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, राष्ट्रीय वानिकी और पारिस्थितिकी विकास बोर्ड, राष्ट्रीय हरित ट्राइब्यूनल और अन्य स्वायत्त निकाय पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा के उपायों को लागू करने और उनकी निगरानी के काम में सक्रियतापूर्वक जुटे हैं। विकास योजना के सफल कार्यान्वयन और पर्यावरण संरक्षण उपायों के पालन में प्रबुद्ध समाज, वैज्ञानिक, व्यवसायी और उद्योग जगत, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य सभी संबंधित पक्षों की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। जोखिमकारी पदार्थ प्रबंधन, रासायनिक सुरक्षा, ई-कचरा प्रबंधन, अपशिष्ट से ऊर्जा निर्माण, ठोस और प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन योजना और अन्य योजना के लिए संस्थागत से लेकर व्यक्तिगत स्तर तक सभी हितधारकों को सक्रिय भागीदारी निभानी होगी और साझा जिम्मेदारी वहन करनी होगी।

 

भारत कोरोना वैष्विक महामारी के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी भूमि का निर्वाह कर रहा है और यह पूरी दुनिया की कार्यनीतियों में बदलाव के लिए एक भरोसेमंद साथी बनकर उभरा है। निश्चय ही, यह संघर्ष हमें बहुत कुछ सिखाएगा और विश्व पर्यावरण दिवस 2020 इस सबक को सर्वोत्तम तरीके से सीखने का एक अवसर है। समय आ गया है कि हम संकुचित दायरे से बाहर निकलें और पर्यावरणीय हितों के लिए एकजुट हों क्योंकि तभी हम वैयक्तिक, स्थानीय और वैश्विक प्रयासों को मजबूती प्रदान कर पाएंगे। हमें अपनी दैनिक जीवन-शैली में पर्यावरण संरक्षण के उपायों पर संवाद करना होगा और पर्यावरण संरक्षण के उपायों को निरंतर कार्यान्वित करना होगा, तभी र्प्यावरण दिवस सार्थक हो

 

 

 

 

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