मल्टीप्लेक्स


जब क्रिकेट फार्म में हो तो बड़े निर्माताओं की भी अपनी लांच करने की हिम्मत नहीं होती। ऐसे समय में डब या थ्री-डी फिल्मों को प्रदर्शित करने से अच्छा है कि टी-20 क्रिकेट दिखाया जाये। इनका जादू भी नासिर हुसैन, मनमोहन देसाई, डेविड धवन, अनिल बज्मी की ‘मसाला मैजिक’ से कम नहीं है।

‘क्रिकेट मैच न होने पर ही इस मल्टीप्लेक्स में फिल्म दिखाई जायेगी। ’ आनेवाले कुछ समय में मल्टीप्लेक्स मालिकों ने अगर इस तरह का संकेत दिया तो कोई आश्चर्य नहीं होगा ।

मल्टीप्लेक्स बूम के कारण किसी फिल्म के एक दिन में दिखाये जानेवाले खेलों की संख्या बढ़ी है और इससे फिल्म उद्योग के फायदे में भी बढ़ोतरी हुई है। मगर यह सकारात्मक तथ्य संपूर्ण वर्ष में प्रदर्शित हुई डेढ़ सौ में से कुछ ही फिल्मों के लिए सही साबित हुआ है।

‘दबंग’ जैसी फिल्म ने बड़े पैमाने पर, ‘फालतू ’ ने थोड़े पैमाने पर हाउसफुल का बोर्ड देखा; लेकिन ’गेम’ जैसी अन्य कई फिल्मों को खाली कुर्सियां ही नसीब हुईं। एक पर्दे वाले सिनेमाघरों की अवस्था तो इससे भी बदतर है। मनोरंजन जैसे मुद्दों के विरोध में कई दिनों से उनका प्रदर्शन जारी है। एक दशक पूर्व तक देशभर में जितने सिनेमा घर थे, उनमें से अब आधे ही रह गये हैं । डीवीडी, होम थिएटर, इंटरनेट से डाउनलोड करने की सुविधा आदि नये-नये विकल्प उपलब्ध होने के कारण भी सिनेमा घरों को अधिक खतरा है। अत: अब फिल्म प्रदर्शन के स्थान पर इन सिनेमा घरों और मल्टीप्लेक्स में क्रिकेट मैच दिखाना ज्यादा फायदेमंद हो गया है।

तकरीबन दो वर्ष पूर्व आइपीएल क्रिकेट मैचौं के दौरान क्रिकेट ने मल्टीप्लेक्स में प्रवेश किय। इस वर्ष के क्रिकेट विश्वकप ने मल्टीप्लेक्स क्रिकेट को एक नया मोड़ दे दिया। आजकल तो लोग भी बड़ी शान से बताते हैं कि हम मल्टीप्लेक्स में केवल क्रिकेट ही देखने जाते ह। यह बदली हुई समाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति का परिणाम है। इन सारे परिणामों को अपनाने के अलावा फिल्म इंडस्ट्री के पास और कोई चारा नहीं है।

एक महत्वपूर्ण बात और है कि क्रिकेट मैचों की टिकट दर फिल्मों की तुलना में सस्ती ह। सभी जानते हैं कि मल्टीप्लेक्स में फिल्मों के लिए दिन और समय के अनुसार टिकटों की कीमत निर्धारित होती ह। बुधवार और गुरुवार की सुबह नौ बजे दिखाये जाने वाले शो की कीमत साठ रुपये होगी, तो इसी फिल्म के रविवार की रात दस बजे के शो के टिकट की कीमत साढ़े तीन सौ रुपये होती है। फिल्मों की एक बड़ी समस्या है कि पब्लिक रिपोर्ट खराब आते ही अन्य दर्शक उस फिल्म से मुंह मोड़ लेते ह। क्रिकेट मैच के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं होता। मैच के फिक्स होने या किसी खिलाड़ी के स्पाट -फिक्सिंग में फंसे होने की आशंका या विश्वास होने के बावजूद भी लोग मैच बड़े उत्साह से देखते हैं। तात्पर्य यह है कि आज की दिशाहीन और कथाविहीन फिल्मों की अपेक्षा लोगों में मैच की लोकप्रियता अधिक है। पचास-पचास ओवर के मैचों (अर्थात आठ घंटे) के लिए मल्टीप्लेक्स में तीन सौ से साढ़े तीन सौ रुपये टिकट होता है ।

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