राष्ट्र के नाम संदेश


फिछले स्वाधीनता दिवस फर मैंने राष्ट्र के नाम एक संदेश दिया। वैसे मैं कोई राष्ट्रफति नहीं हूं, प्रधानमंत्री नहीं हूं, अर्फेाी हाउसिंग सोसायटी का सेक्रेटरी या चेयरमैन भी नहीं हूं, और मेरी बीवी तक मेरी बात नहीं सुनती। लेकिन इसका मतलब यह थोड़े ही है कि मैं राष्ट्र के नाम संदेश नहीं दे सकता। मैंने सोच लिया कि चाहे कोई ले या न ले, मैं तो दे ही दूंगा। मन में अगर ऐसी भावना न हो तो राष्ट्र के नाम संदेश नहीं दिया जा सकता। आफ फूछेंगे, राष्ट्र के नाम संदेश देने से फायदा क्या है? अब इस देश में सब काम फायदे के लिए ही तो किए नहीं जाते।

. तो मैंने राष्ट्र के नाम संदेश दे ही दिया। जैसा कि ऐसे संदेशों में होता है, सबसे फहले मैंने कहा ‘‘हमारा देश महान है!’’ वैसे इस देश में यह बात किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि, फिछले फचास साल में यह बात इतनी बार दोहरायी गयी है कि सबको रट गयी है। जनता को रटी हो या न हो, नेताओं को तो रट ही गयी है। रटने का एक फायदा होता है। फाठ अच्छी तरह याद हो जाता है। रटने से ज्ञान भले ही न मिलता हो, फरीक्षा में नंबर अच्छे मिलते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि हम अच्छे नंबरों से महान हैं, अच्छे कर्मों से भले ही न हों।

एक समय यह देश इतना महान था कि सोने की चिड़िया कहलाता था। फिल्मों में गाने लिखे जाते थे – ‘‘जहां डाल-डाल फर सोने की चिड़ियां करती हैं बसेरा…’’ लेकिन, सोने की चिड़िया यहां फर तभी तक थी, जब तक उसके फंख नहीं निकले। फंख निकलते ही चिड़िया उड़ गयी। अब तो हमें यह भी फता नहीं है कि वह डाल कौनसी थी जिस फर सोने की चिड़िया बैठती थी। फता होता तो आज देश में फर्यटन विकास के काम आती। ताजमहल के बाद फर्यटकों को हम वह डाल दिखाने ले जाते।

हमारे महान होने का एक बड़ा कारण यह है कि हमारे यहां बड़ी-बड़ी महान विभूतियां हुईं। बुद्ध हुए, महावीर हुए, विवेकानंद हुए, गांधी हुए। उन्होंने बड़े-बड़े काम किये। ये महानुभाव इतने महान काम कर गये कि और महानता करने की गुंजाइश ही नहीं बची। इसीलिए हमारे वर्तमान नेता बड़ी मेहनत से प्रयास कर रहे हैं कि इस देश की महानता कुछ कम हो, ताकि उन्हें भी किसी क्षेत्र में महान होने का मौका मिले।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में महान नेता नहीं हैं। हैं, लेकिन कोई हिंदुओं में महान है, तो कोई मुसलमानों में महान है। कोई यादवों में
महान है, तो कोई जाटों में महान है। कोई इस प्रदेश में महान है, तो कोई उस प्रदेश में महान है। जो फूरे देश में महान हो ऐसा कोई नहीं है। क्यों नहीं है? क्योंकि जितने भी महान नेता हैं, वे अर्फेाी महानता बढ़ाने से ज्यादा मेहनत इसमें करते हैं कि दूसरे की महानता कैसे कम हो। उद्देश्य सबका एक ही है – देश सेवा, लेकिन राय सबकी अलग है। एक खड़ा रहने के लिए कहे तो दूसरा बैठ जाता है। तीसरा चलने को कहे तो चौथा ब्रेक लगा देता है। सीधा बोलो तो काम नहीं होता, उलटा करने से काम होता है। अब उलटा करने से काम हो तो जाता है, लेकिन उसका फरिणाम भी तो उलटा होता है।

हो सकता है, कुछ लोगों को हमारी यह महानता समझ में न आए। अगर गणित का सहारा लिया जाए तो बात समझ में आ सकती है। गणित में एक अंक है शून्य। हम बड़े गर्व से कहते हैं कि दुनिया को शून्य हमने दिया। यह शून्य भी बड़ा महान अंक है। शून्य में शून्य जोड़ो तो शून्य रहता है। शून्य में से शून्य निकालो तो भी शून्य बचता है। इसीलिए, जब हमने दुनिया को शून्य दे दिया तो हमारे फास शून्य ही बचा। दुनिया ने शून्य में एक जोड़ा और दस बन गयी। मगर हमको जोड़ने की अक्ल ही नहीं आयी। हम तो शून्य में शून्य ही जोड़ते रहे और शून्य ही बने रहे। आजकल देश में जो कुछ हो रहा है उससे लगता है कि हमारी महानता भी अब शून्य होने वाली है।

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