सचिन के सामने हिट विकेट का खतरा

आने वाले समय में राजस्थान की राजनीति के ऊंट की करवट का इंतजार सबको रहेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सचिन शतकवीर साबित होते हैं, हिट विकेट होते हैं, रन आउट होते हैं या विकेट के पीछे कैच थमाते हैं।

राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की कांग्रेस में यदि यह कहकर उपेक्षा की गई थी कि वे अपेक्षाकृत कम अनुभवी हैं, परिपक्व नहीं हैं तो सचिन ने खुद ही यह साबित कर दिखाया। वे चाहते तो ज्योतिरादित्य सिंधिया से मशवरा कर सकते थे, जिन्होंने लुहार की चोट कर कांग्रेेस छोड़़ी, अपने अधिकतम समर्थकों को डंके की चोट पर महत्वपूर्ण विभागों का मंत्री बनाया, खुद राज्यसभा के लिए टिकट पा गए और अब केंद्र में मंत्री भी बन ही जाएंगे। सचिन जिस दुविधापूर्ण स्थिति में आ गए हैं, वह खुद सचिन के लिए चुनौती है।

राजनीति हो या युद्ध का मैदान, एक चाल भी सारी बाजी पलट देती है। फिलहाल तो लगता है, सचिन पायलट हड़बड़ी कर बैठे। उनका कांग्रेस से विद्रोह कितना ही अनायास हुआ हो, चिंगारी तो राख में दबी पड़ी थी। जब 2018 में राजस्थान में कांग्रेस बहुमत में आई तो सचिन समेत सभी को उम्मीद तो यही थी कि वे मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे। वजह थी उनका प्रदेशाध्यक्ष रहते राजस्थान नापना और कांग्रेस को खड़ा करना,भाजपा सरकार की नाकामी उजागर करना। वे कामयाब रहे, लेकिन सिंहासन पर आसीन होने से पहले अचानक अशोक गेहलोत प्रकट हो गए। कांग्रेस की राजनीति करने वाले इस तरह के मोड़ से वाकिफ होते हैं। सचिन बच्चे ही तो ठहरे। ऐसा मप्र मेें भी 1980 में हुआ था, जब कांग्रेस के विधायकों ने मुख्यमंत्री के लिए पर्यवेक्षक के समक्ष समर्थन तो शिवभानु सिंह सोलंकी को दिया था, जो आदिवासी थे, किंतु मुख्यमंत्री बना दिए गए अर्जुनसिंह, जो ठाकुर थे।

कांग्रेस का पुराना खेल है। जो ज्यादा उम्मीद से रहता है, उसे जमीन दिखाने में वह माहिर है। सचिन कुछ रूठे, कुछ अनमने रहे, लेकिन गांधी साम्राज्य के आगे वे करते भी क्या? जो मिल रहा था, उससे वंचित रहने से बेहतर था, ले लिया जाए। सिंधिया ने वैसा कुछ नहीं लिया तो उनमें ये माद्दा था कि आगे बढक़र हासिल कर लिया। फिर कांग्रेस में न सही, भाजपा में। चतुर खिलाड़ी का एक ही लक्ष्य होता है, जीत। नीति-नियम के चक्कर में पडऩे वाला चक्रव्यूह में मारा जाता है। बहरहाल।

सचिन से दो-तीन बड़ी भूल हुईं वे यह कि एक तो वे अपने समर्थकों की निष्ठा को तौल नहीं पाए। दूसरा, संख्या बल बढ़ाने में चूक गए। तीसरा, कांग्रेस को झटका देने से पहले रणनीति नहीं बनाई कि आखिरकार उन्हें करना क्या है? चौथा, यह भी शायद तय नहीं कर पाए कि नई पार्टी बनाएंगे, भाजपा में जाएंगे या कांग्रेस से ही सौदेबाजी कर मुख्यमंत्री पद पाएंगे। तैयारी न कर पाने की वजह से ही जब वे हड़बड़ी में अपने विधायक लेकर हरियाणा पहुंचे तो अशोक गहलोत ने अपने समर्थकों को जयपुर के होटल में ही जमा कर लिया। इससे वे खरीद-फरोख्त से बच गए।

200 सीटों वाली विधान सभा में कांग्रेस के 107 विधायक हैं और 18 अन्य पार्टी व निर्दलीय विधायकों के समर्थन से कांग्रेस सरकार आराम से चल रही थी। भाजपा की केवल 72 सीट हैं और तोडफ़ोड़ के लिए उसे 29 सीट चाहिए थी, जो मुश्किल आंकड़ा है। सचिन के साथ करीब 25 कांग्रेस विधायकों के जाने की संभावना थी, लेकिन बताते हैं कि वे 19 से आगे नहीं बढ़ पाए। यहां सचिन चूक गए। दूसरी प्रमुख बात जो सचिन ने कही वह यह कि वे भाजपा के साथ नहीं जा रहे हैं, जिससे उनके कुछ समर्थक बिदक गए होंगे। उन्होंने अपने साथी विधायकों को मप्र में मलाई बटोरते देखा था तो सोच रहे थे कि भाजपा के साथ से सरकार बनी तो उनकी हैसियत बेहतर हो सकती है।

अब एक तरफ उनकी सदस्यता पर खतरा मंडरा रहा है। मामला हाईकोर्ट में है और जान सांसत में। पहले किसी कांग्रेस नेता के हाथ न आने वाले सचिन ने बाद में प्रियंका व चिदंबरम से बात भी की। याने बर्फ पिघल सकती है। बावजूद इसके इतना साफ है कि सचिन अब कांग्रेस में तो घाटे में ही रहेंगे। अव्वल तो उन्हें गहलोत बरदाश्त नहीं करेंगे। वे पूरे समय आशंकित रहेंगे कि सचिन कब हरकत करें पता नहीं। दूसरा कांग्रेस आलाकमान भी संशय में डूबा रहेगा कि सचिन कहीं पूरी सरकार लेकर ही अलग पार्टी न बना लें या भाजपा में न चले जाए। यूं भी कांग्रेस आलाकमान भी इतनी जल्दी तो उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं देगा, क्योंकि इससे गलत संदेश जाएगा कि बगावत करो और कुर्सी पाओ।

आने वाले समय में राजस्थान की राजनीति के ऊंट की करवट का इंतजार सबको रहेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सचिन शतकवीर साबित होते हैं, हिट विकेट होते हैं, रन आउट होते हैं या विकेट के पीछे कैच थमाते हैं। उनका कोई भी कदम खुद उनका भविष्य और राजस्थान में कांग्रेस-भाजापा की रणनीति को उजागर करेगा। राजनीतिक विश्लेषक भी इसके अंजाम को जानने को बेताब हैं।

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