कारगिल युद्ध- वीरता की अनुपम मिसाल

26 जुलाई का दिन देशभर में कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह विजय भारतीय सेना की अनुपम वीरता की मिसाल है। चोटियों पर सन्नद्ध पाकिस्तानी सैनिकों की बौछारों के बीच चोटी काबिज कर दुश्मन को मार देना आसान नहीं होता। लेकिन हमारे जांबाजों ने ऐसे करतब दिखाए कि दुश्मन को दुम दबाकर भागना पड़ा या मौत की नींद सोना पड़ा।

हर वर्ष द्रास कारगिल युद्ध स्मारक के विशाल प्रांगण में बिगुल की पुकार से भारतीय सेना के बहादुर जवानों और अधिकारियों की शहादत को पुनः याद कर विनम्र श्रधंजलि दी जाती है – विजय दिवस के उपलक्ष्य में। सेना प्रमुख स्वयं उपस्थित रहते हैं इस मौके पर उन परिवारों के बीच जिनके अपने कारगिल की जंग में शहीद हुए थे। जाबांजों के परिवार से मिलने का एक ऐसा मौका जब दिल की आवाज़ आंखों से बयां होती है। यह दिन परिवार के सदस्यों के लिए एक तरफ गर्व से भरा होता है जब वे उस इला़के में पहुंचते हैं जहां उनके अपनों ने प्राणों की आहुति दी थी। कारगिल की पहाड़ियों तक पहुंचकर स्वयं को अपनों के बीच सुकून पाते हैं – यहां दिल से आत्मा का मिलन होता है। कारगिल युद्ध के दौरान जो पत्नियां गर्भ से थी, वे अपने बच्चों में सालों बाद अपने पति को देखती हैं। इस भाव को शब्दों में बयां करना बेहद मुश्किल है यह स़िर्फ महसूस किया जा सकता है।

26 जुलाई: हर वर्ष इस दिन पूरे देश में विजय दिवस मनाया जाता है। यह युद्ध हम पर थोपा गया था और यह पाकिस्तान की सोची समझी साजिश थी, जब एक तरफ हम बस डिप्लोमसी में व्यस्त थे तब जनरल मुशर्रफ अपने युद्ध के नक्शे पर काम कर रहे थे। खुफिया जानकारी की विफलता के चलते सही आकलन करने में भारतीय सेना को जबरदस्त कीमत चुकानी पड़ी थी। पाकिस्तान ने लगभग 3000 मुजाहिदों को सेना की चौकियों में भेजा था। तब भारत का स्वयं का कोई उपग्रह मौजूद नहीं था इसलिए भी हम खुफिया जानकारी से वंचित रह गये थे।

इस युद्ध में भारतीय सेना ने घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए लगभग पांच इंफेंट्री डिवीजन, पांच स्वतंत्र ब्रिगेड, 44 अर्ध सैनिक बलों की बटालियन और अन्य यूनिटों ने अपने दमखम तथा वायु सेना की मदद से हिम-आच्छादित कारगिल की विभिन्न चोटियों से पाकिस्तान के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया था। भारत ने इस थोपी हुई जंग की कीमत जरूर चुकाई, लेकिन समय रहते सभी चौकियों को वापस अपने कब्ज़े में करने में भारतीय सेना को सफलता मिली।

ये दिल मांगे मोर के जयघोष से वीरता का अनुपम स्वरूप देश वासियों को देखने को मिला। लेकिन हमने अपने 527 वीर सैनिकों की शहादत जरूर इतिहास के पन्नों में समेट ली, गर्व से और शान से वे – शूरवीर और शहीद कहलाए!

युद्ध की पृष्ठभूमि

कश्मीर में जो कोलाहल इस समय छाया हुआ है उससे उबरने में शायद और थोड़ा वक्त लगेगा लेकिन श्रीनगर की वादियों में भी ऐसे कई परिवार हैं जिनके बच्चे देश की सीमा पर तैनात हैं या कारगिल युद्ध में अपना सर्वस्व निछावर कर धरती की गोद में समा गए थे – अपना धर्म और अपना कर्म करते हुए! गर्व है ऐसे युवाओं पर। हिमाचल की पहाड़ी इलाक़ों से आने वाले विक्रम बत्रा जैसे सपूतों के परिवार के आंसू आज भी नहीं थमते। कारगिल शहर श्रीनगर से 205 किलोमीटर दूर है और दूसरी तरफ द्रास लगभग 160 किलोमीटर। उत्तरी पहाड़ियों की शृंखला के एक तरफ है लाइन ऑफ कंट्रोल और दूसरी तरफ़ है श्रीनगर – लेह राष्ट्रीय राजमार्ग। इस पहाड़ी शृंखला पर मौजूद है हमारी चौकियां जिन्हें हम सर्द मौसम में खाली करते हैं और मौसम के ठीक होते ही वापस सैनिकों को भेज देते हैं। नवंबर 1998 में कारगिल द्रास और मश्को घाटी में मौजूद 150 से ज्याादा बर्फीले चोटियों को भारतीय सेना ने खाली किया था। अप्रैल 1999 में पाकिस्तान ने कारगिल के पश्चिम और उत्तर में एक गहरी चाल चली थी।

पाकिस्तान ने इसका फायदा उठाया और अपनी फौज को समय से पहले ही इस बर्फीली ऊंचाई पर हमारे मोर्चों पर कब्जा करने भेज दिए। पाकिस्तानी सेना ने भेस बदलकर हथियार और राशन पानी के साथ हमारे कब्जे वाले तमाम मोर्चों पर अपना वर्चस्व बना लिया। यह थी असली शुरूआत कारगिल युद्ध की। यह एक सोची समझी साजिश थी जिसमें पाकिस्तानी सेना के मुजाहीदीन लड़ाकों ने 168 किलोमीटर की लाइन ऑफ कंट्रोल को पार कर बेहद खुफिया तरीके से पहाड़ियों की चोटियों पर अपने मोर्चे और कुछ भारतीय सेना के मोर्चे अपने कब्ज़े में कर लिए थे – इलाका 18,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर था। बेहद सोची समझी साजिश को जनरल मुशर्रफ और आईएसआई की मदद से अंजाम दिया गया। धीरे – धीरे की गई इस कार्रवाई को भारतीय खुफिया तंत्र – रॉ, आईबी और सेना की मिलिटरी इंटेलिजन्स सही तरीके और सही समय में दुश्मन की चाल का अनुमान लगाने में विफल रही! इस बात को हमें मानना पड़ेगा कि हमारी कमजोरी क्या थी क्योंकि इसीमें लिखा होता हैं सैन्य इतिहास और देश का भविष्य! यही कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि थी।

एक तरफ पाकिस्तान हमारी सरहद पर अपने पत्थरों से संगर (मोर्चे) बना रहा था और हम दिल्ली-लाहौर बस की राजनीतिक हलचल को चला रहे थे। कारगिल – द्रास – बटालिक सेक्टर में 1999 के मई महीने में शुरू हुआ भारतीय आक्रमण। सबसे पहले 25 मई को भारतीय वायुसेना के ऑपरेशन सफेद सागर शुरू हुआ और दूसरे दिन थल सेना ने ऑपरेशन ‘विजय’ का आगाज किया था। पहाड़ों की लड़ाई कभी आसान नहीं होती और जब ऊंचाई 18,000 फुट से ज्यादा हो तब सैनिकों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। दुश्मन हम पर हावी होने के लिए हमें नीचे से ऊपर आते हुए देखता है और यही उसके लिए फायदा साबित होता है एवं कम तादाद में ज्यादा इलाके पर वर्चस्व बनाया जा सकता है। इसके बनिस्पत आक्रमण करने वाली सेना को 8 – 9 गुना अधिक ताकत से पहाड़ों को समेटना पड़ता हैै।

ज़्यादा सैनिक, बमवर्षक जहाज, गरजने वाली लंबी दूरी की आर्टिलारी की तोपें और सैनिकों के पास पहाड़ चढ़ने के साधन और गोलाबारूद बेहद जरूरी हो जाता है। पहाड़ों की ऊंचाई चढ़ने में समय तो लगता ही है परंतु यदि बर्फ को भी पार करना पड़े तब हालत बहुत ही भिन्न हो जाते हैं। 14 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की। 26 जुलाई को भारतीय सेना मुख्यालय ने 1042 पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि की और ऑपरेशन विजय की समाप्ति हुई थी।

ऑपरेशन विजय

इस ऑपरेशन में हमने सेना की दो डिवीजन को शुरू में तैनात किया था लेकिन जब ऑपरेशन अपनी चरम सीमा पर था तब लगभग 2 लाख सैनिक इस जंग के इला़के में उलझे हुए थे। भारतीय थल सेना को जनरल वी पी मलिक सेनाध्यक्ष की हैसियत से संभाले हुए थे। एक बेहद संघर्षमय आक्रमण में 4 जुलाई को टाइगर हिल, पॉइंट 4590 (जहां से श्रीनगर – लेह राजमार्ग आसानी से काबू किया जा सकता है), पॉइंट 5353 पर तिरंगा फहराया था।

लेकिन पहाड़ी इला़के की वजह से बटालियन स्तर पर कार्रवाई को अंजाम देने की योजना बनी। साथ में लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली आर्टिलारी को भी ले जाया गया। हमारी बोफोर्स तोपों ने पहाड़ियों की चोटियों पर निशाना साधा। पाठकों को याद होगा कई मर्तबा टेलीविज़न पर यह सब हमने लाइव देखा था। मल्टी बेरेल रॉकेट लाँचर से दुश्मन पर बिना रुके तेज़ी से फायर किया गया। दुश्मन अपने बंकरों (संगर) में जगह बदल बदल कर छुपा रहा। भारतीय थल सेना की कई यूनिट अलग अलग इलाक़ों से अपनी पूरी ताक़त के साथ पहाड़ों पर चढ़ाई करने निकल पड़ी थी।

इन प्रमुख चोटियों और इला़के में भारतीय जांबाजों ने दुश्मन से लोहा लिया था. पॉइंट 4268, 4540, 4590, 4700, 4745, 4812, 4875, 5140, 5203, 5285, 5770, टाइगर हिल, ख़ालुबार, मश्कोह, द्रास घाटी, तोलोलिंग, चोरबट ला, बटालिक सेक्टर।

ऑपरेशन सफेद सागर

वायु सेना के लिए बहुत ही अहम चुनौती थी क्योंकि 20 गुणा 20 किलोमीटर के दायरे में एलओसी को ना पार करते हुए तेज गति से फाइटर जेट से बम बरसाना कोई मामूली बात नहीं थी – वह भी पहाड़ी के ऊपरी हिस्से में महज छोटे मोर्चों पर। वायुसेना ने सबसे पहले अपने टोह लेने की कार्रवाई के लिए जगुआर और मिग लड़ाकू जहाजों को भेजा था। लेकिन दूसरे ही दिन भारतीय वायुसेना का एक मिग-21 बटालिक सेक्टर में दुश्मन की जमीन से फायर की हुई मिसाइल से ध्वस्त हुआ तथा दूसरा मिग-27 इंजन में खराबी से बर्बाद हुआ था। इसके तुरंत बाद अगले ही दिन टोलोलिंग के इला़के में एक एमआई-17 हेलिकॉप्टर पाकिस्तानी स्टींगर मिसाइल का निशाना बना। वायुसेना में हलचल हो गई। एक साथ इतना नुकसान! दुश्मन द्वारा जमीन से स्टींगर मिसाइल का उपयोग किए जाने के फलस्वरूप अब हमारे जंगी जहाजों को इनकी मारक क्षमता से ऊपर रहने की जरूरत थी। अर्थात लगभग 26,000 से 32,000 फुट की ऊंचाई पर से हमारे हवाई हमलों को अंजाम देना जरूरी हुआ। इतनी ऊंचाई पर जहाज की काबलियत पर भी असर पड़ता है और पायलट की जिम्मेवारी बढ़ जाती है। इसके साथ पहाड़ी की दूसरी तरफ सूरज की रोशनी ना पहुंचने से परबत की छाया ही अवरोध बन गई थी। ऐसे में बेहद अचूक निशाना लगाना मुश्किल हो रहा था। 11 बजे के बाद बादल घेर लेते थे इस वजह से सुबह 8 से 11 बजे के बीच का समय ही उपयुक्त था।

30 मई को नंबर 7 स्क्वाड्रन के मिराज 2000 जंगी जहाजों ने 250 किलोग्राम भार के बम द्रास सेक्टर में मुन्थो धालो, टाइगर हिल, पॉइंट 4388 में छुपे दुश्मन के ठिकानो पर बरसाए। इसका आकलन किया गया और तब लेजर बम की जरूरत महसूस हुई जिसकी बदौलत दिए गए छोटे से छोटे टारगेट को ध्वस्त करने की काबलियत थी। मिराज 2000 का मुख्य बेस ग्वालियर था, लेकिन युद्ध की स्थिति में यहां से जहाज और इंजीनियर कार्मिक उत्तरी इलाके में भेजे गए – तीन वायुसेना अड्डों पर मिराज जंगी जहाज को अग्रिम मोर्चे पर लाया गया था। 250 किलो के बम 1971 की लड़ाई के मौजूद थे जिन्हें मिराज 2000 के भीतर ले जाने का बंदोबस्त किया गया। इसमें भी हमारे कार्मिकों ने जुगाड़ से कई नई तकनीक विकसित की थी। 1 जून को राजस्थान की महाजन रेंज पर इस बम को मिराज से गिराया गया इसकी काबलियत और असर को देखने के लिए। इस काम मे सफलता मिलते ही इस किस्म के बमों को अग्रिम वायुसेना अड्डों पर भेजा गया। एक मिराज में इस किस्म के 12 बम रखे जा सकते थे, इसके अलावा 2 हवा से हवा में मार करने वाली मेजिक 2 मिसाइल भी मिराज का हिस्सा बनी।

फिर बारी आई लेजर गाइडेड बमों की – इन बमों को ‘पेव्ह वे’ नाम से जाना जाता है। पहली बार भारतीय वायुसेना इस किस्म के बमों का इस्तेमाल कर रही थी। 24 जून को पहली बार वायुसेना प्रमुख टिपणिस ने एक मिराज की पिछली सीट पर बैठ कर युद्ध क्षेत्र में हो रहे इस आक्रमण का लाइव जायजा लिया था। जून के मध्य में सभी पाकिस्तानी पोस्ट की जानकारी मिल चुकी थी। सेना ने भी अपना आक्रमण करने की मंशा बना ली थी। बटालिक सेक्टर में 7 स्क्वाड्रन के मिराज ने अपना रंग दिखाया और दुश्मन का कैंप और गोला बारूद का भंडार ध्वस्त किया। करीब 100 पाकिस्तानी मारे गए और 50 से ज़्यादा बंकर और अन्य भंडार नेस्तनाबूत हुए। 24 जून को दुश्मन की एक बटालियन का मुख्यालय जो टाइगर हिल पर था उसे पेव्ह वे से बर्बाद किया गया। लेजर बम के उपयोग से दुश्मन को भारी नुकसान हुआ था। 4 जुलाई 1999 को लगभग 11 घंटों की लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया था। एक बहुत बड़ी जीत दर्ज हुई जिसमें भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी मोर्चो की तबाही समय रहते कर दी थी।

बर्फीले इलाके में मौसम की मार
इस लड़ाई का मुख्य बिंदु रहा था हमारे अपने मोर्चों को सर्द मौसम में खाली करना और कम ऊंचाई पर सैनिकों को स्थानांतरित करना – जिसका पूरा पूरा फायदा पाकिस्तानी सेना ने लिया था। बर्फीले इलाके में मोर्चाबंदी में सैनिक गोलियों से नहीं मारे जाते बल्कि मौसम की मार से हादसे ज्यादा होते हैं, जिसके लिए विशेष किस्म के कपड़े, रहने के लिए टेंट और गर्मी प्रदान करने के लिए उपकरण लगते हैं। ऊंचाई में तापमान शून्य से नीचे होता है। सूरज के दर्शन कई दिनों तक नहीं होते हैं। ऐसे में केरोसिन से चलने वाले स्टोव और बुखारी ही माहौल को गर्मी प्रदान करते हैं।

सैनिकों के मानसिक संतुलन के बिगड़ने में मौसम एक अहम भूमिका अदा करता है – सैनिकों की चिकित्सा का अचूक ध्यान रखना पड़ता है और ऑक्सिजन की कमी से जूझते शरीर को वातावरण से दो दो हाथ करने पड़ते हैं। ना सिर्फ सैनिकों की चिकित्सा का खयाल रखना होता है लेकिन अनुसंधान में जुटे हमारे वैज्ञानिक भी सैनिकों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के लिए अनवरत कार्य करते रहते हैं। लंबे समय तक ऑक्सीजन मास्क की जरूरत के चलते सियाचिन जैसी ऊंचाई से नीचे आने वाले सैनिकों में सुनने की कमी और आंखों की रोशनी में कमी पाई जाती रही है और कुछ को अपनी याददाश्त खोने की भी शिकायत रहती है। खुले में मौजूद अपनी राइफल को नंगे हाथों से छूने पर भी उंगलियों में बहुत जल्द फ्रॉस्ट बाइट होने के आसार हो जाते हैं। हाथमोजे अहम है और उनको पहनकर हथियार और उपकरण चलाना भी उतना ही मुश्किल है। पहाड़ों की ऊंचाई पर हेलिकॉप्टर की मदद से फल, सब्जी, राशन और ईंधन लाया जाता है, 20,000 फुट की ऊंचाई पर डिब्बाबंद खाना ही एक विकल्प है – रेडी टू ईट मील ही पेट की आग बुझाता है। नहाने और कपड़े धोने की गुंजाइश कम हो जाती है, इस्तेमाल के लिए 14 जोड़ी मोजे तीन महीने की पोस्टिंग में सैनिक को दिए जाते रहे हैं!

बर्फीले तूफान की मार भी सैनिक झेलने को मजबूर हो जाते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि मनुष्य की अपार शक्ति की असली पहचान और उसकी खींचतान की सीमा दिन पर दिन बढ़ाई जा रही है – क्या हम अपने आप से जीत रहे हैं?

युद्ध की कीमत : एक आकलन
किसी भी जंग की राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय कीमत बहुत अहम होती है और कई वर्षों तक इसका प्रभाव देश पर रहता है। लेकिन युद्ध की असली कीमत देश की अर्थ व्यवस्था पर सीधे सीधे नजर आती है। हालांकि युद्ध में इस्तेमाल होने वाला गोला बारूद पहले ही बनाया गया और भंडारण कर रखा हुआ है इसलिए यह कीमत पहले ही चुकता हुई है यह संपूर्ण सच नहीं, क्योंकि जितनी कीमत में युद्ध के अस्त्र शस्त्र बनाए थे उस कीमत में अब दोबारा बनाने में ज़्यादा व्यय होगा यह भी उतना ही सच है। किसी भी युद्ध की सीधी सीधी कीमत देश की सरकार पर ज़्यादा असर डालती है। इसके बाद प्रांतीय सरकार पर जब बमबारी से हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए दोबारा खर्च किया जाता है। बड़े स्वरूप में देश के आर्थिक विकास पर प्रभाव देखने को मिलता है।

कारगिल युद्ध के वीरता पदक

अदम्य साहस, असाधारण वीरता के लिए परमवीर चक्र :

कैप्टन विक्रम बत्रा (मरणोपरांत), 13 जैक राइफल्स
लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे (मरणोपरांत), 1/11 गोरखा राइफल्स
राइफलमैन संजय कुमार, 13 जैक राइफल्स
ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंग यादव, 18 ग्रेनडियर्स

महावीर चक्र

मेजर विवेक गुप्ता, 2 राजपूताना राइफल्स, (मरणोपरांत)
मेजर राजेश सिंग अधिकारी, 18 ग्रेनडियर्स, (मरणोपरांत)
मेजर पद्मपनी आचार्य, 2 राजपूताना राइफल्स, (मरणोपरांत)
कैप्टन एन केंगुरुस, 2 राजपूताना राइफल्स, (मरणोपरांत)
कैप्टन अनुज नय्यर, 17 जाट रेजिमेंट, (मरणोपरांत)
लेफ्टिनेंट केशिंग सी नोंगरूम, 12 जैक लाइट इन्फेंट्री
मेजर सोनम वांगचुक, लद्दाख स्काउट्स
लेफ्टिनेंट बलवंत सिंग, 18 ग्रेनडियर्स
नायक दिगेंद्र कुमार, 2 राजपूताना राइफल्स

अद्वितिय कार्य हेतु सेना प्रमुख का यूनिट प्रशंसा पत्र:

8 सिख, 13 जैक राइफल्स, 1 बिहार, 17 जाट, लद्दाख स्काउट्स, 18 गढ़वाल राइफल्स, 2 नागा, 1/11 गोरखा राइफल्स, 18 ग्रेनेडियर्स, 141 फील्ड रेजीमेंट, 12 जैक लाइट इंफेंट्री, 663 रेकी एंड ओब्जर्वेशन स्क्वाड्रन, 2 राजपूताना राइफल्स,197 फील्ड रेजीमेंट, 666 रेकी एंड ओब्जर्वेशन स्क्वाड्रन, 108 मीडियम रेजीमेंट।
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रक्षा मंत्रालय का खर्च वर्ष 1998 – 99 में 39,897 करोड़ रुपये था जबकि जंग के बाद के वित्तीय वर्ष में यह 18 फीसदी बढ़ा और 47,071 करोड़ पर पहुंच गया था। युद्ध का असर इसके बाद के साल में भी नज़र आया जब रक्षा मंत्रालय का आवंटन फिर बढ़कर 16 फीसदी ज़्यादा हुआ और तीसरे साल में यह 54,461 करोड़ पर आकर रुका था। इसका मतलब लगभग 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी इन तीन सालों में। यह पूरा व्यय सिर्फ कारगिल के खाते में नहीं किया गया होगा, क्योंकि हर वर्ष के लिए नई योजना के अनुसार तीनों सेनाओं के लिए अपनी जरूरत के मुताबिक खर्च करना जरूरी होता है। यदि हम इतिहास के पन्ने देखें तो 1962 – 63, भारत की विकास दर 2 प्रतिशत रही और जब पाकिस्तान के साथ के युद्ध में 1965 के बाद हमारी आर्थिक विकास दर शून्य से नीचे 3.7 प्रतिशत थी जबकि 1971 की जंग के बाद हमने मात्र 0.9 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की। इस सब से उबरने में देश को कई साल और लग गए थे। एक अनुमान से लगभग 15 करोड़ रुपये प्रति दिन का खर्च कारगिल के युद्ध के दौरान हुआ है। कारगिल युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास में 3 मई 1999 से शुरू हुआ यह दर्ज किया गया और कुल 2 महीने, 3 सप्ताह और 2 दिन तक चला।

इस धरती के नीचे जांबाज शेर सो रहे हैं…
इस लड़ाई में हमारी सेना ने भी एक कीमत अदा की थी – हमारे 527 जांबांज इस जंग में शहीद हुए थे। कैप्टन विक्रम बत्रा, 13 जे एंड के रायफ़ल्स, लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे, 1/11 गोरखा रायफल्स (दोनों ही मरणोपरांत), राइफलमैन संजय कुमार, 13 जे एंड के रायफल्स और ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव, 18 ग्रेनेडियर्स को देश के सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया था। इसके अलावा 9 महावीर चक्र और 53 वीर चक्र अन्य वीरता पुरस्कारों में दिए गए थे। उनकी हिम्मत और शौर्य की गाथा अब अमर हो गई है।

देश की सीमा पर जुटे सैनिकों के हाथों में एक विशाल देश की बागडोर है, हमें अपनी तैयारी हमेशा ऐसी रखनी होगी कि कारगिल जैसा दुस्साहस पाकिस्तान दोबारा ना कर सके। इन वीरों की असंख्य गाथाओं से ही प्रेरित होकर आज का युवा वर्ग सेना में अपनी सेवा देने को तत्पर रहता है। हमारे वीर सेनानियों को नमन – इन्ही सैनिकों की बदौलत हम अपने अपने घरों में सुरक्षित हैं। एक कृतज्ञ राष्ट्र के लिए वाकई में यह विजय दिवस है!

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