पद्मनाभस्वामी मंदिर फैसले के दूरगामी परिणाम

केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का स्वामित्व पूर्ववर्ती शाही परिवार को सौंपने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। इससे विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा हिन्दू मंदिरों और उनके मठों पर नियंत्रण को जो साजिश हो रही थी, उस पर अंकुश लगेगा।

केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के स्वामित्त्व और प्रबंधन को लेकर 9 वर्षों से चली आ रही कानूनी लड़ाई को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय से समाप्त कर दिया। उच्चतम न्यायालय का मानना है कि इस ऐतिहासिक मंदिर के रखरखाव और वित्तीय व्यवस्था की जिम्मेदारी केरल स्थित त्रावणकोर के शाही परिवार के अंतिम शासक के बाद भी परिवार के अधीन ही निहित है।

सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने मंदिरों पर राज्य सरकारों के स्वामित्त्व को एक सिरे से खारिज कर दिया है। इस निर्णय से अब हिन्दू समाज में राज्य सरकारों द्वारा मंदिरों के रखऱखाव और प्रशासनिक कब्जा करने के विरुद्ध जनजागृति का अभियान ही चल पड़ा है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर के बारे में दिए गए अहम फैसले ने यह भी साबित कर दिया कि 1971 में 26वें संविधान संशोधन के द्वारा राजाओं के अधिकार को कम कर उनके प्रिवी पर्स (राजभत्ता) को समाप्त करने के बाद से ही शाही परिवार द्वारा संरक्षित मंदिरों की संपत्तियों पर राज्य सरकार अपने अधीन कर लेती थी। इसी संविधान संशोधन को आधार मानकर केरल सरकार ने पद्मनाभ मंदिर के स्वामित्त्व को राज्य के अधीन कर लिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने 2011 के केरल उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया, जिसने केरल सरकार को मंदिर के प्रबंधन और संपत्ति को नियंत्रित करने के लिए एक ट्रस्ट स्थापित करने का निर्देश दिया था।

केरल उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि पूर्ववर्ती राजघरानों के उत्तराधिकारी भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 (22) में ’शासक’ की परिभाषा में संशोधन के बाद श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के नियंत्रण में होने का दावा नहीं कर सकते थे।
‘शासक’ की परिभाषा को छब्बीसवें (संवैधानिक) संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा संशोधित किया गया था, जिसने प्रिवी पर्स को समाप्त कर दिया था।

वास्तव में, केरल उच्च न्यायालय ने 2011 में, राज्य को मंदिर को संभालने और एक संग्रहालय में मंदिर के खजाने का पता लगाने का निर्देश दिया था।

उच्चतम न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया और कहा कि, प्रथागत कानून के अनुसार, शाही परिवार के सदस्यों के पास अंतिम शासक की मृत्यु के बाद भी अधिकार है। इन अधिकारों का अर्थ है देवता के वित्तीय मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार। उच्चतम न्यायालय ने माना कि, शासित अधिकारों के लिए शासक की परिभाषा लागू होगी और उत्तराधिकारी को हस्तांतरित होगी।

सर्वोच्च न्यायालय की न्या. ललित और न्या. इंदु मल्होत्रा की खंडपीठ ने 218 पन्नों के फैसले में, एक दशक से अधिक समय के विवाद को खत्म कर दिया कि क्या मंदिर और इसकी काफी संपत्ति केरल सरकार को त्रावणकोर के शासक श्रीचैरा थिरुनल बलराम वर्मा की जुलाई 1991 में मृत्यु के बाद देनी चाहिए या नहीं। फैसला शाही परिवार के पक्ष में गया।

केरल के पद्मनाभस्वामी के इस निर्णय से यह साबित हो गया है कि राज्य सरकारें अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने से नहीं चूकती हैं। मंदिरों में होने वाली चढ़ौत्री का उपयोग मंदिरों के पुनर्निर्माण, वहां के पुजारियों और अन्य कर्मचारियों के कल्याण कामों में उपयोग नहीं करती हैं परंतु वे इन धनराशियों को अन्य पंथों के विकास के लिेए खर्च करती हैं।

वर्ष 2011 में पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रांगण में स्थित छह में से पांच खजानों को खोलने के बाद करोड़ों रुपए मूल्य की सोना और हीरे जड़ित वस्तुएं मिली थीं, जिससे विवाद बढ़ गया था। इन खजानों का पता चलने के बाद सरकार की याचिका पर उच्च न्यायालय ने शाही परिवार के स्वामित्त्व के अधिकार को समाप्त कर दिया था। उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध शाही परिवार ने मामले की अपील 2011 में सर्वोच्च न्यायालय में की। 9 वर्षों तक चली इस कानूनी लड़ाई में शाही परिवार को स्वामित्त्व का अधिकार वापस मिला।

भारत की सेकुलर सरकारों ने हमेशा ही हिन्दुओं के मंदिरों और मठों पर ही कब्जा करने के लिए अनेक कानूनी प्रावधानों को बनाया और उनकी सम्पत्तियों पर अपना आधिपत्य जमा लिया।

केरल के इस प्रसिद्ध मंदिर के सम्बंध में निर्णय बेशक ही एक शाही परिवार के स्वामित्व को लेकर किया गया हो परंतु यह सच है कि देश के विभिन्न राज्यों में सरकारों द्वारा जिस तरह से हिन्दू मंदिरों और उनके मठों पर नियंत्रण करने का जो षड्यंत्र शुरू किया गया उसके विरुद्ध जन जागृति आरंभ हो गई है। सोशल मीडिया में चर्चा के कारण अब मंदिर के स्वामित्त्व के अधिकार का मामला केवल स्वामित्त्व तक ही सीमित नहीं रह गया है वरन् यह एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने में सफल हो गया है।

मामला क्या है?

कानूनी प्रश्न यह था कि त्रावणकोर के अंतिम शासक, चितिरा तिरुनल बलराम वर्मा के छोटे भाई, उत्तराम तिरुनल मार्तंड वर्मा 1991 में शासक की मृत्यु के बाद त्रावणकोर के शासक होने का दावा कर सकते थे। अदालत ने इस दावे की जांच की त्रावणकोर-कोचीन हिंदू धार्मिक संस्थानों अधिनियम, 1950 के अनुसार प्राचीन श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर के स्वामित्व, नियंत्रण और प्रबंधन का दावा करने के लिए उस शब्द के सीमित अर्थ के भीतर स्वीकार किया।

1991 से पहले पद्मनाभस्वामी मंदिर का स्वामित्व, नियंत्रण और प्रबंधन किसके पास था?
सभी मंदिर जो त्रावणकोर और कोचीन की पूर्ववर्ती रियासतों के नियंत्रण और प्रबंधन के अधीन थे, वे 1947 से पहले त्रावणकोर और कोचीन देवस्वम बोर्डों के नियंत्रण में थे। हालांकि, रियासतों और सरकार के बीच हस्ताक्षरित समझौते के अनुसार 1949 से, पद्मनाभस्वामी मंदिर का प्रशासन त्रावणकोर के शासक के अधीन था। 1956 में केरल राज्य का गठन किया गया था, लेकिन मंदिर का प्रबंधन राजाओं द्वारा किया जाता रहा, जिसे केरल सरकार ने पलट दिया था।
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