श्री श्वेतांबर जैन तेरापंथी धर्मसंघ का महत्त्वपूर्ण सामाजिक प्रकल्प अहिंसात्मक रोजगार प्रशिक्षण केंद्र

श्वेतांबर जैन तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें आचार्य गुरूदेव श्री महाप्रज्ञ जी ने अहिंसा के व्यापक प्रतिष्ठापन, व्यावहारिक दैनंदिन जीवन में अहिंसा के सहज अमल और प्रचार-प्रसार के लिए पहले से चले आ रहे तमाम तौर-तरीकों और पारंपारिक सिध्दांतों तथा उपायों के साथ ही कुछ ऐसे बिलकुल नये उपाय भी ढूंढ निकाले, जो अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए। इनमें प्रमुख एक उपाय है- ‘अहिंसा की स्थापना के लिए, अहिंसा के निवारण के लिए हिंसा के कारणों की खोज।’

हिंसा के सूक्ष्म से सूक्ष्म, नहीं दिखाई देनेवाले, न समझ में आनेवाले कारणों की गहन खोज के लिए आचार्य श्री महाप्रज्ञ 81 वर्ष की उम्र में सारे देश की पैदल यात्रा में निकल पड़े। 5 दिसंबर, 2001 में राजस्थान के सुजानगढ़ से शुरू हुई आचार्य श्री महाप्रज्ञ की वह यात्रा ‘अहिंसा यात्रा’ के नाम से विश्वप्रसिध्द हुई। सैकड़ों साधुसाध्वियों के श्वेत-शुभ्र कारवां के साथ भारत के प्रमुख प्रांतों का जायजा लेते हुए गुरुदेव श्री महाप्रज्ञ ने अहिंसा यात्रा के तहत कुल 9313 किलों मीटर की दूरी पैदल तय की। धूप, शीत, वर्षा की परवाह न करते हुए सात वर्षों तक चलते रहे। महानगरों- नगरों, कस्बों-गांवों के लाखों लोगों प्रत्यक्ष वार्तालाप, विचार-विमर्श करते रहे। न्यूट्रॉन बमों से लैस इस सरापा हिंसक युग में हिंसा के कारणों की खोज? प्रतिस्पर्धा, शक्ति, वर्चस्व, अहंकार, बाजार, स्वार्थ- हिंसा के साक्षात नग्न कारण! लेकिन आचार्य महाप्रज्ञ के समान महान दार्शनिक, चिंतक, महात्मा को तो और और गहरे जाना था। देशों, प्रेसीडेन्टों, पेट्रोल-डीजल, हथियारों की होड़ में सब उथले कारण तो दुनिया जहान को दीख रहे थे- आम अवाम, साधारण जनता की अशांति, गरीब-गुरबों में पैठ जमाते असंतोष, क्रोध और हिसा गुरूदेव को तो इसके तक तक पहुंचना था। गगनचुंबी अट्टालिकाओं से बरसती हिंसा किस तरह झुग्गी-झोपडियों को झुलसा रही है, यह तो सबको दिखाई पड़ता है, लेकिन अंधेरी घुप्प गलियों में एक-दूसरी में धंसी टूटी-फूटी झोपड़ियों के भूखें-नंगे नौनिहालों के सीनों में क्यों हिंसा की आग धधक रही है, गुरूदेव को तो इस ज्वलंत प्रश्न का उत्तर पाना था और अंतत: उनकी महान प्रज्ञा ने यह उत्तर पा भी लिया।

गरीबी, हां, यह उत्तर था बेकारी, बेरोजगारी, भूख अभाव! भूख से परेशान बच्चे और युवा पैसे-दो पैसे के भ्रामक प्रलोभन में हिंसा के चंगुल में फंस जाते हैं। खूनी माफिया और क्रूर आतंकवाद के बहलावे में आ जाते हैं। चोरी, लूट-खसेाट से लेकर बम और बंदूक तक जा पहुंचते है।

करूणासागर आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने एक नया ही सूत्र ढूंढ निकाला- बेरोजगाराी, बेकारी से निकला रास्ता हिंसा के बीहड़ तक जा पहुंचता है। रोजगार से लगा व्यक्ति धीरज नहीं खोता। पेट में यदि आधी भी रोटी हो, तो आदमी संतोष कर लेता है। हिंसा के बड़ेबड़े कारणों की व्याख्या करके उनका निराकरण सुलझानेवाले महात्मा महाप्रज्ञ ने हिंसा की एक यह बुनियादी

वजह ढूंढ निकाली- बेरोजगारी! और अपने स्तर पर इसके निराकरण का व्यवहारिक उपाय भी निकाला। गरीबों को नौकरी के लिए दर-दर भटकने के लिए न छोड़कर उन्हे ऐसे छोटे-मोटे हाथ के काम सिखाये जायें, जो वे घर बैठे कर सकें और कम ही सही, लेकिन कुछ उपार्जन कर सकेें। आचार्य श्री ने सारे भारत में ऐसे केंद्रों की स्थापना की, जहां पूर्णत: निशुल्क हाथ के काम सिखायें जाते है, ऐसे रोजगारपरक काम, जो पूरी तरह से अहिंसात्मक हों। सिलाई-कढ़ाई, मेहंदी, बुक-बाइंडिंग, लिफाफे बनाना, ग्रीटिंग कार्डस, रुमाल बनाना, फाइले बनाना और इन सबके साथ अहिंसक जीवन शैली का प्रशिक्षण, नैतिक मूल्यों की शिक्षा। आज ‘अहिंसात्मक रोजगार प्रशिक्षण केंद्र’ नाम से भारत भर में ढ़ाई सौ से ज्यादा ऐसे केंद्र हजारों युवकों-युवतियों को पूर्णत: नि:शुल्क नियमित स्वरोजगार का व्यवहारिक प्रशिक्षण दे रहे हैं। दिनोदिन इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। इन्ही में से एक केंद्र है मुंबई से सटे ठाणे जिले के डोंबिवली शहर का ‘अहिंसात्मक रोजगार प्रशिक्षण केंद्र’, जिसे अपने उत्तम सेवाकार्यों के लिए वर्ष 2009 के श्रेष्ठतम केंद्र के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इस केंद्र के निदेशक हैं कवि-पत्रकार श्री आलोक भट्टाचार्य, जो आचार्य श्री महाप्रज्ञ के एक प्रमुख समाजसेवी आयाम को कार्यान्वित करनेवाली संस्था ‘अहिंसा समवाय मंच’ के मुंबई संयोजक भी हैं। इस केंद्र से अब तक लगभग साढ़े चार सौ से अधिक अत्यंत अभावग्रस्त युवतियां हाथ के काम सीखकर स्वरोजगार के योग्य बनी हैं। कइयों को अच्छी नौकरियां मिली हैं। घोर गरीबी से परेशान एक युवती जो थक-हार कर आत्माहत्या करने जा रही थी, इस केंद्र में आकर उसने अपना खोया आत्मविश्वास पुन: पाया और आज वह न सिर्फ खुद अच्छा उपार्जन करती है, बल्कि कुछ और भी युवतियों को उसने अपने पास रोजगार दे रखा र्हैे। इस युवती को पिछले दिनोें ‘धर्िीं शक्ति फाउंडेशन’ की ओर से सम्मानित भी किया गया है। पिछले वर्ष से इस केंद्र में मांटेसरी टीचर्स ट्रेनिंग का कोर्स भी प्रारंभ किया गया है। इस वर्ष 26 युवतियां इस कोर्स में बैंठी हैं। पिछले वर्ष यहां से यह कोर्स पास कर चुकीं दो युवतियों को स्थायी नौकरियां मिली हैं।

आचार्य श्री महाप्रज्ञ प्रणीत यह केंद्र अब आचार्य श्री महाश्रमण के आशीर्वाद से उल्लेखनीय विकास कर रहा है। अब इस केंद्र का नया नाम है- ‘कल्याणमित्रा श्रीमती मधु सुनील कच्छारा स्मृति अहिंसात्मक रोजगार प्रशिक्षण केंद्र।’ मधु कच्छारा आचार्य श्री महाश्रमण की एक अत्यंत श्रध्दानिष्ठ, सेवाभावी कर्मठ कुशल अत्यंत प्रतिभासपन्न श्राविका थी, जो गुरूदेव श्री महाप्रज्ञ के समस्त् कार्यक्रमों के साथ ही डोबिंवली के उक्त केंद्र से भी पहले ही से जुड़ी थी। उन्ही की स्मृतियों को अक्षुण्ण रखने के लिए इस केंद्र के नाम के साथ उनका नाम जोडा गया। उनके इस प्रिय केंद्र के लिए उनके पति श्री सुनील कच्छारा ने एक स्थायी सदन की व्यवस्था कर दी है।

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