हरी सब्ज़ी तोरई रोगनाशक भी

 तोरई की गणना प्रमुख हरी सब्ज़ियों में की जाती है। यह वर्षा ऋतु के उत्तराद्ध में विशेष रूप से उपलब्ध होती है। इसकी दो जातियां होती हैं- मीठी और कड़वी, मीठी तोरई का प्रयोग सब्ज़ी के लिए किया जाता है जबकि औषधि के लिए कड़वी तोरई को काम में लिया जाता है। प्रस्तुत है तोरई के औषधीय गुणों की जानकारी।

तोरई लता जाति की वनस्पति है। इसकी लता नेनुआ के सदृश्य होती है। अंतर केवल थोड़ा-सा फूल, फल और बीज में होता है। यह भारत में प्राय: सर्वत्र पाई जाती है। दक्षिण एवं पूर्व भारत में इसकी तरकारी विशेष लोकप्रिय है। यह बरसात के शुरू में बोई जाती है। और डेढ़-दो महीने में इसके फल सब्जी के लिए तैयार हो जाते हैं। इसके फूल हल्के पीले रंग के होते हैं। इसमे तीन पुंकेशर होते हैं। फल 6 से 10 इंच लंबे होते हैं। फल के ऊपर उठी हुई अनुलंब रेखाएं होती हैं। इसके बीज चपटे, किनारों पर कुछ उठे हुए काले रंग के होते हैं।

तोरई की दो जातियां होती हैं- कड़वी और मीठी। मीठी तोरई की धारियों की संख्या 10 और कड़वी तोरई की धारियों की संख्या 9 होती हैं। कड़वी तोरई जंगलों में स्वयं पैदा होती है। लेकिन मीठी तोरई के बीज बोए जाते हैं। जहां तक इसके उपयोग की बात है तो मीठी तोरई की सब्जी बनाई जाती है। लेकिन औषधीय प्रयोग के लिए कड़वी तोरई का ही प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद के ग्रंथों में मीठी और कड़वी का भेद बताने के लिए ‘मधुर’ एवं ‘तिक्त’ वाचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। यहां पर ‘तिक्त’ तोरई के औषधीय गुणों पर प्रकाश डाला गया है।

तोरई में इंद्रायण के समान एक तिक्त तत्व पाया जाता है और इसके बीजों में स्थिर तेल होता है।

उपयोगी अंग- फल, पत्र, मूल और बीज.
सेवन मात्रा- स्वरस 10 से 20 मि.ली.तक.
विशिष्ट योग- तोरई के 60 कल्प चरक संहिता (कल्प 6) में बतलाए गए हैं। जिनका विविध रोगो में प्रयोग अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।
नाम तथा गुण-धर्म
तोरई को संस्कृत में कोशातकी, मृदंगफल, जालिनी, पीतपुष्प कहते हैं, जबकि हिंदी मेें यह इसी नाम (तोरई) से प्रसिद्ध है। अन्य प्रमुख भाषाओं में इसके नाम निम्न प्रकार से है-बं.-झिंगा; म.-शिरोला; गु.-घिसोड़ा, त-पिरकनकाई; ते- बिरकामा; क- हिरेकयी; मल- पिचेगा; पं-तोरी और अंग्रेजी में रिब्ड लफा (गं्ं थ्ल्र्िंर्िं) कहते हैं। इसका लैटिन नाम लफा एकुटैंगुला है।

तोरई गुण में लघु, रूक्ष तथा, तीक्ष्ण होती है। यह रस में तिक्त तथा विपाक में कटु है। इसके गुणों के बारे में आयुर्वेद में कहा गया है-

राजकोशातकी शीता मधुरा कफवातकृत्।
पित्ततघ्नी दीपनीश्वासज्वरकासकृमिप्रणुत्॥

यह शीतल, मधुर तथा कफ-वात वर्द्धक है। तोरई के सेवन से बढ़े हुए पित्त का शमन होता है तथा पाचक अग्नि तीव्र होती है जिससे आहार का पाचन सुगमता से होता है। यह श्वास, खांसी, ज्वर तथा कृमियों को नष्ट करती है। यह कफपित्त का शोधन करती है। तोरई रक्तशोधक, शोथहर, कफनि:सारक एवं विषघ्न है। इसका प्रयोग उदर विकार, गुल्म तथा प्लीहावृद्धि में भी किया जाता है।

तोरई का साग पित्तनाशक होता है। लेकिन इसका अधिक सेवन करने से वात दोष की वृद्धि होती है। इसलिए तोरई के साग में वात गुण कम करने के लिए काली मिर्च और नींबू का रस डालकर सेवन करना चाहिए। इसके साग का सेवन करने से कब्ज रोग दूर होता है। मीठी तोरई का साग अति लघु, हृदय के लिए लाभदायक तथा रक्तपित्त, कुष्ठ, प्रमेह एवं अरुचि को दूर करने वाला होता है।

कड़वी तोरई विशेष गुणकारी

औषधीय गुणों की दृष्टि से कड़वी तोरई विशेष गुणकारी होती है। इसीलिए औषधि के लिए इसी तोरई का प्रयोग किया जाता है। कड़वी तोरई वमन-विरेचन कराने वाली, अत्यंत तिक्त, तीक्ष्ण, उष्ण वीर्य तथा कुष्ठ, पांडुरोग, प्लीहा, शोथ, गुल्म, विष आदि में प्रशस्त है। अर्थात् उनका नाश करने वाली है। तोरई के बीजों का तेल कटु, कटुविपाक, तीक्ष्ण, लघु, उष्णवीर्य, सारक तथा वायु, कफ, कृमि, प्रमेह तथा सिर के रोगों को दूर करने वाला है।
जंगली तोरई के बीजों के मगज की क्रिया ‘इपिकाकुआना’ जैसी होती है। सड़ने वाले व्रणों (घाव) को धोने के लिए इसका शीतकषाय बहुत लाभदायक होता है। इससे व्रण की शुद्धि होती है और वह शीघ्र ही ठीक हो जाता है। आधाशीशी (अधकपाली), सिरदर्द और पीलिया में तोरई के फल का शीतकषाय का नस्य लेने (सूंघने) से सिरोविरेचन होता है जिससे पीलिया रोग दूर हो जाता है। जलोदर रोग में तोरई का मद्यासव (टिंचर) हितकारक है। शुरू में बड़ी मात्रा दें। फिर दस्त और मूत्र का प्रमाण देखकर मात्रा घटानी-बढ़ानी चाहिए।

तोरई का औषधीय प्रयोग

तोरई को कई रोगों में घरेलू औषधीय के रूप में प्रयोग किया जाता है। कुछ रोगों में इसकी प्रयोग-विधि निम्न प्रकार है-

पीलिया- पीलिया रोग में तोरई का रस 10 से 30 मि.ली. लेकर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर दिन में तीन बार पीने से कुछ ही दिनों में रोग दूर हो जाता है। तोरई के फल का शीतकषाय का नस्य लेने से भी लाभ होता है।

बवासीर- बवासीर में तोरई के पत्ते पीसकर उसका लेप मस्सों पर लगाने से लाभ होता है। इससे रक्तस्राव बंद होता है। और मस्से सूखने लगते हैं। यह प्रयोग सुबह – शाम दोनों वक्त करना चाहिए।

पाचन क्रिया- पाचन क्रिया बिगड़ गई हो, भूख न लगती हो अथवा कब्ज हो तो तोरई उबालकर उसमें थोड़ा-सा नमक मिलाकर सेवन करना हितकर है।

रोहा– तोरई के पत्तों का रस निकालकर बारीक कपड़े से तीन बार छान लें। फिर इस रस को एक-दो बूंद की मात्रा में आंख में डालें। इससे रोहा रोग ठीक हो जाता है। यह प्रयोग दिन में 2-3 बार करें।

पथरी- पथरी रोग में भी तोरई हितकर है। इस रोग में तोरई के बेल की जड़ को गाय के दूध में अथवा ठंडे पानी में घिसकर प्रतिदिन सुबह कुछ दिनों तक पीने से पथरी नष्ट हो जाती है।

चकत्ते– तोरई की बेल के मूल को गाय के मक्खन में या एरंड के तेल में घिस कर दिन में 2-3 बार लगाने से गर्मी (पित्त) के कारण बगल या जांघ के मोड़ में पड़ने वाले चकत्ते ठीक हो जाते हैं।

दमा- यदि दमा का रोगी दमा के दौरे या खांसी से परेशान हो तो उसे तोरई का उपयोग करना हितकर है। ऐसे व्यक्ति को सुबह-शाम तोरई का रस 10-20 मि.ली. मिश्री मिलाकर पीना चाहिए। लेकिन जिन्हें कफ अधिक होता हो, उन्हें यह प्रयोग नहीं करना चाहिए।

गिल्टी– तोरई के मूल को ठंडे पानी में घिसकर गिल्टी पर लगाने से अथवा तोरई को उबालकर और उसे पीसकर लगाने से गिल्टी की गांठ ठीक हो जाती है।

सावधानी– तोरई मूलत: कफकारक और वातल है। वर्षा ऋतु में इसका अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। यह पचने में गरिष्ठ है। इसलिए इसके साग में लहसुन और तेल का अधिक मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।

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