नायिकाओं का नायक

देव आनंद ने 1946 से 1969 तक अपनी चॉकलेटी हीरो की इमेज के साथ उस समय की लगभग सभी मशहूर अभिनेत्रियों के साथ फिल्मी सफर तय किया। यह सफर 1946 की प्रभात फिल्म्स की जी. एल. संतोषी द्वारा निर्देशित ‘हम एक हैं’ में कमला कोटनीस से शुरू होकर 1969 की शंकर मुखर्जी द्वारा निर्देशित रूपकला पिक्चर्स की ‘महल’ में आशा पारेख तक चला। इस दौरान उन्होंने बांबे टॉकीज की 1948 में ‘जिद्दी’, 1948 में ‘नमूना’ में कामिनी कौशल, 1950 में ‘हिंदुस्तान हमारा है’ में नलिनी जयवंत और दुर्गा खोटे के साथ, 1951 में फाली मिस्त्री द्वारा निर्देशित जी. पी. सिप्पी की फिल्म ‘सजा’ में निम्मी के साथ, 1952 में ही फनी मजूमदार द्वारा निर्देशित ‘तमाशा’ और 1954 में ‘बादबान’ में ट्रेजेडी क्वीन मीनाकुमारी के साथ, 1953 में ‘पतिता’ मे उषाकिरण के साथ, 1953 में ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा निर्देशित ‘राही’ और 1955 में फिल्मीस्तान की सुबोध मुखर्जी द्वारा निर्देशित ‘मुनीमजी’ में फिर से नलिनी जयवंत के साथ, 1955 में जेमिनी पिक्चर्स की ‘इंसानियत’ में बीना रॉय और शोभना समर्थ के साथ, 1955 में ही चेतन आनंद द्वारा निर्देशित होम प्रोडक्शन कंपनी नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले बनी ‘फन्टूश’ में लीला चिटणीस के साथ, 1961 में बनी ‘हम दोनों’ में डबल रोल में नंदा और साधना के साथ, 1961 में ही बनी नासिर हुसैन की फिल्म ‘जब प्यार किसी से होता है’ में आशा पारेख के साथ, 1962 में बनी ‘माया’ में माला सिन्हा के साथ 1962 में ही बनी हृषिकेष मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘असली नकली’ में साधना के साथ, 1964 में चेतन आनंद के निर्देशन में बनी ‘किनारे-किनारे’ में फिर से मीना कुमारी के साथ, 1965 में बनी ‘तीन देवियाँ’ में उन्होंने तीन नायिकाओं सिमी, नंदा और कल्पना के साथ एकमात्र नायक की भूमिका की। 1966 में शंकर मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘प्यार मुहब्बत’ में सायराबानो के साथ, 1968 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ज्वेलथीफ’ में वैजयंतीमाला और तनूजा के साथ, 1969 में ‘दुनिया’ में वैजयंतीमाला के साथ, 1968 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कहीं और चल’ और 1969 में ‘महल’ में फिर से आशा पारेख के साथ बतौर नायक अभिनय किया। इनमें से कई फिल्में हिट रहीं।

इसी दरम्यान उनकी कई अन्य फिल्में और नायिकाओं के साथ उनकी जोड़ी सुपरहिट रही। सुरैया के साथ उन्होंने सात फिल्में की। 1948 में ‘विद्या’, 1949 में ‘शायर’, ‘जीत’, 1950 में चेतन आनंद द्वारा निर्देशित ‘अफसर’, 1950 में ‘मीली’, 1951 में ‘दो सितारे’। इसी दौरान उन्हें इस खूबसूरत अदाकारा और गायिका से इश्क हो गया और वे शूटिंग के पश्चात सुरैया के घर के सामने घंटों खड़े रहा करते थे जो कि सुरैया की नानी को बिलकुल पसंद नहीं था। ‘जीत’ की शूटिंग के दौरान फिल्म के सेट पर ही देवआनंद ने सुरैया के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और हीरे की अंगूठी भेंट स्वरूप दी। लेकिन सुरैया की नानी ने यह अंगूठी फेंक दी। कामिनी कौशल और दुर्गा खोटे ने उन्हें मिलाने की कई कोशिशें कीं। लेकिन सुरैया का मुस्लिम होना उनके विवाह के आड़े आ गया। इस तरह यह प्यार शादी की मंजिल तक नहीं पहुंच पाया। बाद में सुरैया ने एक साक्षात्कार में देव आनंद को डरपोक बताया क्योंकि उन्होंने उस समय घर से भागकर शादी करने और वसई में जाकर रहने से सुरैया को इनकार कर दिया था। सुरैया आजीवन अविवाहित रहीं। सुरैया के पसंदीदा हॉलिवूड स्टार ग्रेगरी पेक की नकल देव आनंद ने अपनी फिल्मों में की।

उसके बाद, कल्पना कार्तिक ने देवआनंद के साथ बतौर सहअभिनेत्री 1951 में ‘बाजी’, 1952 में चेतन आनंद द्वारा निर्देशित ‘आँधियां’ में अभिनय किया। 1953 में ‘हम सफर’ 1954 में चेतन आनंद द्वारा निर्देशित ‘टैक्सी ड्रायवर’, 1954 में ‘हाऊस नं. 44’, 1957 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित ‘नौ दो ग्यारह’ में कल्पना कार्तिक ने देव आनंद के साथ मुख्य अभिनेत्री की भूमिका निभायी। 1954 में ‘टैक्सी ड्रायवर’ के सुपरहिट होने के बाद देव आनंद ने वास्तविक जीवन में भी कल्पना कार्तिक से विवाह कर लिया और उसके बाद कल्पना कार्तिक ने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया।

संजीदा और चुलबुले अंदाजवाले रोल, दोनों में समान रूप से अदा के जलवे बिखेरनेवाली अभिनय सम्राज्ञी गीता बाली के साथ देव आनंद ने 1951 में गुरुदत्त निर्देशित ‘बाजी’, 1952 में ‘जाल’, ‘जलजला’, 1954 में ‘फेरी’, 1955 में ‘फरार’, 1955 में ही राज खोसला द्वारा निर्देशित ‘मिलाप’, 1956 में एच.एस. खैत द्वारा निर्देशित ‘पॉकेटमार’ में नायक का अभिनय किया। जिनमें से क्राइम थ्रीलर ‘बाजी’ सुपर हिट रही और इसी फिल्म से देव आनंद स्टार बने। नरगिस के साथ देव आनंद 1950 में ‘खेल’ और ‘बिरहा की रात’ में नायक बने। अपने जानदार अभिनय के लिए सबसे ज्यादा पुरस्कार जीतनेवाली अभिनेत्री नूतन के साथ उन्होंने 1957 में फिल्मीस्तान की सुबोध मुखर्जी द्वारा निर्देशित ‘पेइंग गेस्ट’, शंकर मुखर्जी द्वारा निर्देशित ‘बारिश’, 1960 में ‘मंजिल’ और ‘सरहद’ में नायक का किरदार निभाया। 1963 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित ‘तेरे घर के सामने’ में उनकी नायक की भूमिका को भी खूब पसंद किया गया। हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री की सबसे खूबसूरत मानी जानेवाली अभिनेत्री मधुबाला के साथ उन्होंने बतौर नायक 1950 में ‘मधुबाला’, ‘निराला’, 1951 में ‘आराम’, ‘नादान’, 1953 में ‘अरमान’, 1958 में राज खोसला द्वारा निर्देशित ‘काला पानी’, 1960 में शक्ति सामंत द्वारा निर्देशित ‘जाली नोट’ और 1964 में ‘शराबी’ में अभिनय किया। जिनमें से ‘काला पानी’ और ‘जाली नोट’ हिट रहीं। वहीदा रहमान के साथ देव आनंद की जोड़ी सबसे ज्यादा हिट रही, फिल्मी परदे पर दोनों पर एक साथ फिल्माए गए दृश्य और गाने दोनों ही, लोगों का दिल जीत लेते थे। 1956 में राज खोसला द्वारा निर्देशित ‘सी. आई. डी.’, 1958 में ‘सोलवां साल’, 1959 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित ‘काला बाजार’, 1962 में शंकर मुखर्जी द्वारा निर्देशित ‘बात एक रात की’, एस. एस. खैल द्वारा निर्देशित ‘रूप की रानी चौरों का राजा’, 1965 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित ‘गाइड’ और 1970 में ‘प्रेम पुजारी’ में से ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ और ‘प्रेम पुजारी’ छोड़ दी जाए तो बाकी सभी फिल्में सुपर हिट रहीं। इनमें देव आनंद और वहीदा रहमान की जोड़ी को लोगों ने खूब पसंद किया।

देव आनंद और वहीदा रहमान की पहली रंगीन फिल्म ‘गाइड’ में निभाए गए किरदार राजू गाइड और रोजी के बेजोड़ और सहज अभिनय की वजह से यह फिल्म फिल्मी इतिहास में अमर हो गयी।

1970 में ही देव आनंद की एक और सुपरहिट फिल्म आई ‘जॉनी मेरा नाम’ जिसमें उनकी नायिका थी ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी। देवआनंद ने सबसे ज्यादा फिल्में हेमा मालिनी के साथ ही कीं। 1971 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित ‘तेरे मेरे सपने’, 1973 में ‘छुपा रुस्तम’, राज खोसला द्वारा निर्देशित ‘शरीफ बदमाश’, यश चोपड़ा की ‘जोशीला’, 1974 में मोहन कुमार की ‘अमीर गरीब’, 1976 में चेतन आनंद की ‘जानेमन’, 1989 में देव आनंद द्वारा निर्देशित ‘सच्चे का बोलबाला’, 2001 में ‘सैंसर’ में हेमा मालिनी के साथ नायक का किरदार निभाया।

1971 में ‘तेरे मेरे सपने’ में मुमताज के साथ नायक बने। 1972 में ‘ये गुलिस्तां हमारा’ में शर्मिला टैगोर के साथ, 1972 में देव आनंद द्वारा निर्देशित ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में मुमताज फिर उनकी हिरोइन बनीं। देव आनंद ने इसी फिल्म से ग्लैमरस गर्ल जीनत अमान को फिल्मों में ब्रेक दिया। बाद में 1974 में, जीनत अमान के साथ स्वयं के निर्देशन में ‘इश्क इश्क इश्क’, ‘हीरा पन्ना’, बी. आर. इशारा द्वारा निर्देशित ‘प्रेमशास्त्र’, 1975 में प्रमोद चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित ‘वारंट’, 1977 में ‘कलाबाज’, ‘डार्लिंग डार्लिंग’ में नायक बने। जीनत अमान के साथ अपने एकतरफा प्यार को उन्होंने कभी नहीं छुपाया। लेकिन ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की शूटिंग के दौरान राजकपूर से जीनत अमान की बढ़ती नजदीकियां देखकर वे स्वयं ही पीछे हट गये।

इस समय तक देव आनंद की समकालीन अभिनेत्रियों को मुख्य हिरोइन के रोल मिलने बंद हो गये थे और चरित्र अभिनेत्री के रोल करने लगी थीं। जैसे कामिनी कौशल, लीला चिटणीस, दुर्गा खोटे, वहीदा रहमान आदि। कई ने फिल्मी दुनिया ही छोड़ दी। लेकिन देव आनंद अपनी धुन के पक्के थे। अपने नए, ताजे और चिकने चेहरे के साथ एक खास स्टाइल और मैस्मैरिज्म के साथ हीरो का किरदार निभाते जा रहे थे। अब उन पर लगा चॉकलेटी हीरो का लेबल हटकर एक नया लेबल लग चुका था और वह था सदाबहार देव आनंद का लेबल।

1978 में ‘देस परदेस’ में स्वयं के निर्देशन में उन्होंने टीना मुनीम को ब्रेक दिया और इस तरह टीना मुनीम के पहले हीरो देव आनंद बने। 1980 में टीना मुनीम के साथ उन्होंने ‘मनपसंद और ‘लूटमार’ में नायक का किरदार निभाया।

1982 में ‘स्वामी दादा’ में देव आनंद ने एक विदेशी बाला क्रिस्टीन ओ नील को मौका दिया।

1986 में ‘हम नौजवान’ में बतौर नायिका तब्बू को ब्रेक दिया।

देव आनंद की खूबसूरती और ताजगी का यह आलम था कि 1986 की उनकी फिल्में देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि यही वह अभिनेता है जिसने 1946 में भी बतौर हीरो अभिनय किया है।

इसके अलावा उन्होंने अन्य अभिनेत्रियों जैसे रमोला, रेहाना, प्रिया राजवंश, रेखा, राखी, स्मिता पाटील, रति अग्निहोत्री, माधवी, सोनम, अनू अग्रवाल, ममता कुलकर्णी, शिल्पा शिरोडकर, अमिता, वांगिया, सबीना के साथ लीड रोल किया। बॉलिवुड फिल्मों के इतिहास में सिर्फ देव आनंद ही ऐसे हीरो रहे जिन्होंने अधिसंख्य हिरोइनों के साथ मुख्य हीरो का किरदार निभाया।

65 वर्ष के अपने फिल्मी जीवन में नायिकओं की कई पीढ़ियां आईं और चली गयीं लेकिन देव आनंद नायक का रोल लगातार निभाते रहे।
जीवन की सुंदरता को असीमित ऊर्जा और आनंद के साथ जीने की सबसे निराली स्टाइल का एकमात्र उदाहरण ‘देव आनंद’ जीवन के आखिरी क्षण तक ‘सदाबहार देव आनंद’ ही साबित हुए।

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