कस्तूरी मृग

कस्तूरी मृग का उल्लेख हंसदेव के मृगपक्षीशास्त्र ग्रंथ में आया है‡

गंधर्व: शरभो राम: सृमरो गवय: पर:।
एने मृगा: पंचविधा: कस्तूरी हणिामता:।
न्यंकुतुल्यस्वरूपाश्च तद्गुणादि विभूषिता:॥

गंधर्व ऊप श्ल्ेव् ई (श्ेम्प्ल्े म्प्ब्ेदुेूी)
गंधर्व, शरभ, सृमर व गवा इन पांच किस्मों के मृगों का कस्तूरी मृग कहते हैं। न्यूंकू जैसे उसका रूप, रूप, गुण हैं। वे आगे लिखते हैं‡
उसे सींग नहीं होते। उसकी नाभि लम्बी होती है। कान बड़े होते हैं। उसके पैरों में सदैव सतर्कता झलकती है। पैर विविध रंगी होने के कारण मोहक लगते हैं। गंधर्व पीत वर्ण के होते हैं और अयिक मात्रा में कस्तूरी देते हैं। कुछ ऊंचे होते हैं और बहुत सतर्क होते हैं। हमेशा छांव में विश्राम करते हैं‡ खास कर गर्मी के दिनों में।

संत कबीर ने कस्तूरी मृग के बर्ताव सुंदर वर्णन किया है.

तेरा सांई तुज्झ में बसे, जो पहुपन में बास।
कस्तूरी का हिरन ज्यों फिर‡फिर ढूंढत घास॥

संत कबीर कहते हैं, जैसे फूलों में सुगंध होती है वैसे ही ईश्वर तुझ में ही बसा है। कस्तूरी नामक सुगंधी द्रव्य कस्तूरी मॄग की नाभि के पास होता है। उसे वह नहीं जानता। वह उस सुगंध से मदहोश हो जाता है और उसे पाने के लिए उसके पीछे दोड़ते रहता है।

इस तरह का कस्तूरी मृग हिमालय के ओक व देवदार के वनों में घास चरते रहता है। वह गहरे नसवारी रंग का होता है और उस पर राख के रंग के धब्बे होते हैं। बदन के बाल लम्बे, घने, कड़े और कुछ मुलायम होते हैं। कान बड़े होते हैं और उसके किनारे पीले रंग के होते हैं। उसके पैरों के खुरों का अगला हिस्सा लम्बा होता है। चलते समय उसे पक्का आधार मिले इसलिए प्रकृति ने यह रचना की है। कस्तूरी मृग जंगल में आम जानवरों की तरह नहीं चलता अपितु छलांगें मारते चलता है चाहे वह क्षेत्र पत्थरों का हो या ढलान का।

कस्तूरी मृग को सींग नहीं होते, पर खांग (नुकीले अगले दांत) होते हैं। मादा मृग के खांग छोटे होते हैं। नर कस्तूरी मृग के खांग अधिक लम्बे व खंजर के आकार के होते हैं। मृग की नाभि के पास चमड़ी के नीचे कस्तूरी की थैली होती है। मादा को यह थैली नहीं होती। कस्तूरी मृग का प्रियाराधन का समय आने पर यह थैली भरी होती है। कस्तूरी मृग की पूंछ बड़ी विचित्र होती है। उसके पार्श्वभाग के बालों में वह छिपी होती है।
बल पड़ी पूंछ पर ग्रंथियां होती हैं। उसके स्राव के कारण नर‡ मादा एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं।

भारत में कश्मीर से अरुणाचल तक उत्तरी भाग में ऊंचाई के स्थान वे होते हैं। शैवाली वनस्पतियों, फूल‡पत्तों पर वे जीते हैं। कस्तूरी के लिए इस मृग की निर्मम हत्या की जाती है। उसके प्राकृतिक निवास का ध्वंस हो रहा है। फलस्वरूप उनकी संख्या कम होती जा रही है।
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