जल शुध्दिकरण ‘सी टेक’ से

केवल पानी का संरक्षण ही नहीं बल्कि उसका पुन: उपयोग करना ही पानी की समस्या का हल हो सकता है। एसएफसी एनवायरमेंटल टेक्नालाजी प्रा. लि. कम्पनी विगत् पांच-छ: वर्षों से ण्-ऊाम्प् (सी-टेक) जैसी अत्याधुनिक तकनीक की मदद से इसी उद्देश्य को लेकर कार्य कर रही है। इस तकनीक और कम्पनी को मिल रही लोकप्रियता पर कम्पनी के निदेशक संदीप आसोलकर के साथ ‘हिंदी विवेक’ की बातचीत के महत्वपूर्ण अंश।

एसएफसीयू एनवायरमेंटल टेक्नालाजी प्रा. लि. कम्पनी दूषित जल शुद्धिकरण में कितने वर्षों से कार्यरत है?

एसएफसीयू मूलत ऑस्ट्रियन कम्पनी है, जो इस क्षेत्र में सन् 1917 से कार्यरत है। भारत में इसका कार्य वर्ष 2005 से शुरू है। दूषित जल शुद्धिकरण में लगी हुई सभी कम्पनियों, ठेकेदारों, सरकारी और निजी संस्थाओं को हमारी कम्पनी आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराती है। 2008 में भारतीय कंपनी एइण् एनवायरमेंटल टेक्नोलाजी प्रा. लि. ने 70% शेयर लेकर वह कंपनी खरीद ला। उसके पश्चात संपूर्ण एइण् ग्रुप पर भारत की मालकी है।

आपने दूषित जल प्रबंधन को अपना कार्यक्षेत्र क्यों चुना?

सिविल इंजीनियरिंग में मैंने पर्यावरण को पसंदीदा विषय के रूप में चुना था। एसएफसी की स्थापना करने से पूर्व मैंने पन्द्रह-बीस वर्ष तक दूषित जल प्रबंधन के क्षेत्र में नौकरी की थी।

अत्याधुनिक सी-टेक (ण्-ऊाम्प्) तकनीक से दूषित जल के शुध्दिकरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया है। इस तकनीक के विषय में कुछ बताएं।
अब तक जिस परम्परागत तरीके से दूषित जल का प्रबंधन किया जाता था उससे पानी का पूरा शुद्धिकरण नहीं होता था। इससे यह जरूरी हो गया कि एक ऐसी तकनीक होनी चाहिए जिससे दूषित जल पूर्णत: शुद्ध हो सके। ऐसी तकनीक भारत में नहीं थी। इसे हमारी कम्पनी ने आस्ट्रिया से लाया। इस तकनीक का प्रथम लक्ष्य दूषित जल को प्रदूषण शून्य करना होता है। पर्यावरण की दृष्टि से ऐसा करना सुरक्षित होता है। इस तकनीक से शुद्ध किया हुआ जल इतना स्वच्छ और अच्छा होता है कि उसका दोबारा उपयोग किया जा सकता है। ऐसा करके हम पानी की कमी की समस्या दूर कर सकते हैं। साफ-सफाई के काम में कुल उपयोगी जल का 50-60 प्रतिशत जल खर्च होता है। मुंबई महानगर में 30 प्रतिशत पानी की कटौती की जा रही है। यदि हम शुद्ध किए हुए दूषित जल का उपयोग करने लगें तो पानी की कटौती करने का प्रश्न ही नहीं उठेगा, बल्कि अतिरिक्त जल उपलब्ध होगा।

परम्परागत तकनीक और सी-टेक में अन्तर क्या है?

सी‡टेक तकनीक से दूषित जल शुद्ध करके शुद्ध जल की आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है। यह प्रक्रिया बहुत सस्ती होती है। इसके लिए जगह और बिजली दोनों कम लगते हैं। यह तकनीक पूर्णत कम्प्यूटरीकृत है। इसे चलाने के लिए मानवशक्ति भी कम लगता है। जल की गुणवत्ता बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड (ँध्) के आधार पर तय की जाती है। जल के प्रदूषक घटकों की प्रक्रिया के तहत सूक्ष्म जीवों को आक्सीजन की आवश्यकता अधिक लगती है। प्रदूषक घटक जितने अधिक होते हैं आक्सीजन की आवश्यकता अधिक होती है। अर्थात बीओडी अधिक होती है। बीओडी अधिक होने का अर्थ है जल अधिक प्रदूषित है। पारम्परिक पद्धति से शुद्ध किए गए दूषित जल में 30 मिलीग्राम बीओडी तक कम होता था, जबकि इस तकनीक से शुद्ध किए गए जल में यह मात्रा 5 मिलीग्राम तक कम होती है।

प्रत्येक तकनीक में लगातार कुछ न कुछ विकासात्मक परिवर्तन होता रहता है। सी-टेक तकनीक में पिछले वर्षों में क्या कोई बदलाव हुआ है?

इसमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव भारत की परिस्थिति के अनुकूल होना है। इसका ‘वल्डवाईड पेटेंट’ कम्पनी के पास है। इसमें मूल तकनीक यथावत रखते हुए अधिक ‘कम्पैक्ट’ किया गया, अधिक ‘कॉस्ट इफेक्टिव’ किया गया, इसकी कार्यक्षमता बढ़ी है। पहले पूरी प्रक्रिया चार घण्टे में पूरी होती थी, फिर तीन घण्टे में और अब ढ़ाई घण्टे में पूरी होती है। नयी पद्धति में कम जगह, कम समय तथा कम खर्च लगता है। संक्षेप में कहा जाए तो एसएफसी का तात्पर्य है सिंपल, फ्लेक्सिबल और कास्ट इफेक्टिव टेक्नालॉजी।

बड़े शहरों में दूषित जल प्रबंधन का प्रश्न अहम है। बड़े पैमाने पर यह तकनीक कितनी उपयोगी है?

यह तकनीक विशाल प्रकल्पों के लिए अत्यंत उपयुक्त तथा अनुकूल है। प्रकल्प का आकार जितना वृहद् होता है, यह तकनीक उतनी ही सस्ती पड़ती है। इसके काफी बड़े-बड़े प्लांट हैं। सबसे बड़ा प्लांट 400 एमएलडी का मलेशिया में है। भारत में हम सब से बड़ा प्लांट लगा रहे हैं, जो ढाई सौ एमएलडी का है। एक ही जगह बड़ा प्लांट लगाना आर्थिक दृष्टि से युक्तिसंगत नहीं होता। प्लांट लगाने में प्लांट का खर्च केवल 15 प्रतिशत होता है। शेष 85 से 90 प्रतिशत पाइपलाइन बिछाने में लग जाता है। सिडको ने भी 5 प्लांट लगाए हैं, जिनकी क्षमता 30 से 85 एमएलडी की है। सिडको और नवी मुंबई महानगर पालिका ने हर नोड पर अलग‡अलग प्लांट लगाए हैं। इस विकेन्द्रीकरण के लेकर 100 एमएलडी की होती है।

क्या मुंबई महानगरपालिका प्रशासन ने इस तकनीक को अपनाया है?

दो वर्ष पहले से हमारी बात चल रही है। अभी इस सन्दर्भ में निर्णय नहीं हुआ है। यद्यपि उनकी इच्छा है। वस्तुत: सभी उपलब्ध विकल्पों में यह सबसे उपयुक्त विकल्प है।

वाशी, नेरूल, ऐरोली, खारघर के प्रकल्पों की स्थिति कैसी है?

ये सभी प्रकल्प भलीभांति चल रहे हैं। उन्हें आईआईटी का प्रमाणपत्र भी प्राप्त हुआ है। जल के पुन: उपयोग के लिए उसने निविदा आमंत्रित की है। दुनिया में यह प्रकल्प एक आदर्श माना जाता है। अनेक देशों के लोग यह प्रकल्प देखने आते हैं। अमेरिका ने इसे अपने यहां स्थापित करने का आग्रह किया है। नवी मुंबई, वाशी, नेरूल, ऐरोली प्लांट को प्रधानमंत्री का पुरस्कार मिला है। नेरूल के प्लांट को महाराष्ट्र सरकार का ‘वसुंधरा पुरस्कार’ मिला है। पूरे देश में लगभग 100 प्लांट लगे हैं। देश के सभी राज्यों ने इस तकनीक को स्वीकार किया है।

शुरुआत में इस तकनीक को गोवा में अच्छा समर्थन मिला था। अन्य राज्यों में स्थिति कैसी है?

गोवा में पहला प्लांट स्थापित किया गया। उसके उपरांत तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर इत्यादि बारह राज्यों ने सी-टेक तकनीक को अपनाया है। महाराष्ट्र के पंढरपुर, शिर्डी, औरंगाबाद, शिऊर, वेंगुर्ला, पनवेल, पुणे, पिंपरी, चिंचवड इत्यादि स्थानों पर प्लांट हैं। अकोला तथा सोलापुर में भी प्लांट शुरू किए गए हैं। वस्तुत यह केवल दूषित जल शुद्धिकरण प्लांट ही नहीं, अपितु जल का स्रोत है। यह जल इतना शुद्ध होता है कि थोड़ी सी प्रक्रिया के द्वारा ही यह पीने योग्य हो सकता है। फिर भी विभिन्न उद्योग धंधों, रेलवे, वानिकीकरण, निर्माण कार्य, गैरेज कार्य में ही यदि इसका उपयोग किया जाये तो बहुत बड़ी मात्रा में शुद्ध जल बचाया जा सकता है। इस तकनीक से बिजली का निर्माण भी किया जा सकता है।

आपके प्रकल्प को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इन पुरस्कारों से आप कैसा अनुभव करते हैं?

प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया पुरस्कार सर्वोच्च सम्मान है। हम जो कार्य कर रहे हैं, वह लोगों के फायदे के लिए है। लोगों तक इसका लाभ पहुंचना चाहिए। पर्यावरण की रक्षा भी हमारा ध्येय है। इस पुरस्कार से हमें सरकारी मान्यता प्राप्त हुई। अन्य पुरस्कार हमारे कार्य को गौरव प्रदान करनेवाले हैं। नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इन्स्टीट्यूट (नीरी), आईआईटी के लोग आकर इस कार्य को देखते हैं। आईआईटी ने तो प्रमाणपत्र दिया है कि इस जल का पुन: उपयोग किया जा सकता है।

कम्पनी की भविष्य की क्या योजना है?

सी-टेक का विदेशों में कार्य शुरू हो गया है। इस समय आठ देशों में काम लिया है। यह अत्याधुनिक तकनीकी ज्ञान आगामी वर्षों में भारत से अमेरिका और जापान जैसे उन्नत तकनीक वाले देशों में जाएगा।

दूषित जल शुद्धिकरण के अलावा पर्यावरण संरक्षण के लिए किसी अन्य कार्य को आरंभ करने का क्या आपने मन बनाया है?

पर्यावरण का क्षेत्र बहुत बड़ा है। इस क्षेत्र में काम करते समय ध्यान में आया कि घनकचरा हमारे शहरों की बड़ी समस्या है। घनकचरे का निपटान अभी परम्परागत तरीके से हो रहा है। इसके बजाय कम जगह, कम लागत और आर्थिक आय देने वाला ‘ओरेक्स’ नामक एक संयंत्र हमने विकसित किया है। यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा। आने वाले दिनों में उसकी सफलता आप देख पाएंगे।
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