एक अध्यापक का सेवा समर्पण

भिवंडी से 30‡40 किलोमीटर दूर है मोहंडूल नामक गांव। वहां के आदिवासी पाडा (बस्ती) से सन 2000 में मेरा सम्बंध आया। इस सम्बंध का जरिया था मेरा एक अध्यापक मित्र। उसका नाम है शरद ठाणगे। मुंबई के मालाड की एक स्कूल में शरद और मैं साथ‡साथ काम करते थे। वह भिवंडी के आनगांव में रहता था। वहां से वह रोज मालाड की स्कूल में आया करता था। उसके पूर्व कोई 16 साल तक मैं उस स्कूल में अध्यापक था। शरद केवल चार वर्ष ही उस स्कूल में था। लेकिन वह छात्रों का प्रिय अध्यापक था। क्योंकि वह जान उंडेलकर पढ़ाया करता था। वह संघ का स्वयंसेवक था। उसमें और मुझ में उम्र का अंतर था। फिर भी हमारी दोस्ती समवयस्कों जैसी थी।

वह जब मालाड की स्कूल में था तभी उसने जिला परिषद की स्कूल में अध्यापकी के लिए आवेदन किया था। संयोग से उसे वह अवसर भी मिला। वह भिवंडी से 21 किमी दूर मोहंडूल की आदिवासी बस्ती की स्कूल में तैनात हुआ। उस समय मोहंडूल में बहुत कम बस्ती थी। रास्ता पथरीला, ऊंचा‡नीचा, मोड़भरा और जगह‡जगह अन्य सड़कों से जुड़ने वाला था। भटकने की पूरी संभावना अधिक होती थी क्योंकि रास्ता जंगल से गुजरता था। सड़क के दोनों ओर लोगों का नामोनिशान नहीं था। कहीं अचानक ईंटभट्टा दिखाई देता और उसके आसपास आठ‡दस घास की छाजनवाली झोपड़ियां दिखाई देतीं। कुछ लोग, बच्चे काम करते दिखाई देते। सामने दूर तक ऊंची‡ऊंची पहाड़ियां दिखाई देतीं। सड़क के दोनों ओर सागवान और टेसू के पेड़। बारिश में उन पर पत्ते खूब खिलते थे। उन दिनों रास्ते पर अंधियारे का राज हुआ करता था। ग्रीष्म में ये पेड़ पतझरे हो जाते थे। विविध पक्षियों की तरह जंगली पशु भी हुआ करते थे। रास्ते से अकेले गुजरते समय यूंही डर लगता था।

शरद आनगाव में अपने माता‡पिता व भाई‡बहनों के साथ रहा करता था। वैसे यह गांव भी छोटासा ही था, लेकिन वहां पढ़े‡लिखे लोग हुआ करते थे। वहां से 27‡28 साल का यह युवक अपनी बाइक पर 21 किमी का निर्मनुष्य रास्ता पार कर स्कूल में आया करता था। चार कक्षाओं को पढ़ाने वाला वह अकेला अध्यापक था। मुझे उसका कौतुक लगता था, क्योंकि युवक पैसे कमाने के लिए अक्सर शहरों की ओर मुख करते हैं। कठिन रास्तों पर चलने से वे कतराते हैं। लेकिन शरद आदिवासी बच्चों को पढ़ाने के इरादे से निष्ठा के साथ इतनी दूर आता था। सामाजिक कार्य और समाज सेवा नापने की चीज नहीं होती। इसी तरह वह अपने काम का क्षेत्र छोड़कर अन्यत्र करना चाहिए यह भी जरूरी नहीं है। वास्तव में अपने जीवनयापन का कार्य निष्ठा से करना भी सामाजिक कार्य है। इस तरह निष्ठा होनी चाहिए कि अपने जीवनयापन का कार्य करते समय हम अन्य की या समाज की कोई हानि न करें, अपने‡अपने व्यवसाय की नैतिकता की चौखट को सम्हालते हुए अपनी कृति को अधिक शास्त्रशुध्द बनाते रहने का प्रयास करते रहे। शरद का बर्ताव इसी तरह का था।

किसी अध्यापक का कर्तव्य यह है कि वह अपना प्राथमिक कार्य अर्थात संबंधित विषय की आधुनिक जानकारी प्राप्त करें और वह ज्ञान छात्रों तक पहुंचाए। संक्षेप में पढ़ते रहे, चयन करते रहे और अपने में समाते रहे, बोते रहे, जिसमें अंकुर आए उसका पोषण करते रहे और यही बात छात्रों पर चस्पां करें। यही और इसी तरह का काम शरद ठाणगे उस बस्ती की स्कूल में करता रहा। किसी भी चीज को पढ़ाते समय उसके मूल में जाने की उसकी प्रवृत्ति थी। जब वह स्कूल में नियुक्त हुआ तब पहली से चौथी तक कुल 25 छात्र थे। बस्ती में दस‡पंद्रह घर थे। घर के लोगों को जीवननिर्वाह के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध नहीं थे। लेाग घर के आसपास थोड़ी सब्जियां लगाकर अथवा जंगल की लकड़ी आदि बेचकर जीवनयापन करते थे। उनसे और उनके बच्चों से संवाद स्थापित करने के लिए शरद ने विविध और नए उपक्रम आरंभ किए। उसमें प्रमुख था जो उपलब्ध है उससे स्वास्थ्य के लिए साफसफाई किस तरह रखी जाए, किस तरह बात करें, शिक्षा का महत्व आदि। मेरा मोबाइल से सम्पर्क रहा करता इसलिए मुझे उसके उपक्रमों के बारे में जानकारी मिलती रहती।

मैंने उसके उपक्रम और स्कूल देखने की इच्छा प्रकट की। एक दिन अवसर आया और हम दोनों मोहंडूल के रास्ते पर निकल पड़े। एक जगह गाड़ी खड़ी कर उसने पहाड़ी पर दूर संकेत किया और कहा कि उसकी स्कूल वहां है। रास्ता ठीक न होने से वहां तक पैदल ही जाना होगा। दसेक मिनट चल कर हम वहां पहुंच गए। बच्चे स्कूल की साफसफाई कर रहे थे। स्कूल परिसर में पौधे लगाए गए थे। उनके तनों के पास वर्तुल बनाकर पानी छोड़ा गया था। स्कूल का आंगन एकदम साफ था। बच्चें गरीब परिवार के होने का आभास हो रहा था, लेकिन उनके फटे वस्त्रों में भी सफाई झलक रही थी। उनके पास बैग की अपेक्षा फटी, पैबंद लगी थैलियां थीं। उनमें उनकी किताबें, एकाध कॉपी, स्लेट, पेंसिल आदि मामूली सामग्री थी। फिर भी उनके चेहरों पर स्कूल के बारें में, शिक्षा के बारे में आस्था साफ झलक रही थी। यह देखकर मन विदग्ध हो रहा था। मनुष्य के अस्तित्व को भंवर में डालने वाला और चुनौती देने वाला विरोधाभास, निरर्थकता व मूल्य संघर्ष की सापेक्षता के वास्तविक संदर्भ समझ में आए तभी संवेदनशील मन को जीने का प्रयोजन ध्यान में आता है। इसलिए अपने तईं कुछ करने का निर्णय किया।

सर्व शिक्षा अभियान सरकार चलाती है। सरकार के पास पर्याप्त कोष भी उपलब्ध होता है लेकिन वह स्कूल तक ठीक से पहुंचता ही नहीं यह वास्तविकता है। अध्यापकों के लिए सर्व शिक्षा अभियान एक तरह से सजा ही होती है। सरकार की ओर से छात्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षासामग्री न दी जाने से शिक्षक कई बातें छात्रों को समझा नहीं सकता। स्कूल यदि इस तरह की बस्ती पर हो तो अनेक बातों का वहां अभाव ही होता है। सब से पहले मैंने शरद को जरूरी शिक्षासामग्री उपलब्ध कराईं। उनमें विविध नक्शे, चित्र बनाने व रंग भरने के लिए सामग्री, विविध मुहावरें लिखीं झण्डियां, अक्षर पूर्ण करने का खेल आदि शामिल था। उद्देश्य यह था कि इससे छात्रों की आंतरिक क्षमता का विकास करने में अध्यापक को सहायता मिले और छात्रों का उनकी आंतरिक शक्ति के प्रति विश्वास जागृत हो। शिक्षा का अर्थ जानकारी अंदर ढकेलने की प्रक्रिया नहीं है, वह आंतरिक क्षमता का विकास करने की प्रक्रिया है।

शरद प्रकृति प्रेमी होने से इन वनवासी छात्रों की मानसिकता जानता था। अपने छात्रों का स्वाभाविक और प्रभावी विकास कैसे हो इस पर वह सतत विचार करता रहता था। मन एक प्रभावी साधन है और उसका जब आसपास के पर्यावरण से सम्बंध आता है तब प्रवाही कल्पनाएं आती हैं इस पर उसका विश्वास था। वह प्रथम कृति, उससे अनुभव व अनुभव से विद्याप्राप्ति करवाने के लिए अधिकाधिक प्रयास करता था। छात्रों को उसने कई अंग्रेजी गीत अभिनय के साथ सिखाए। वह देखकर या सुनकर व्यक्ति चकित होता था। उसके ये प्रयास कौतुक करने लायक थे।

एक छात्र को आंखों से कम दिखाई देता था। उसके माता‡पिता नहीं थे। वह अपनी मामा‡मामी के पास रहता था। शरद उस लड़के को अपने खर्च से नेत्र चिकित्सक के पास ले गया। उसकी आंखों की जांच करवाई। उसे चश्मा दिलवाया। कई बार वह अभिभावकों का भी अच्छा प्रबोधन करता था। वह बताया करता था कि बालकों का विकास करवाने में जो सहायता करें वही सही परिवार है। वह भी उनकी आदिवासी बोली में समझाता था। बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए भी बहुत प्रयास किया करता था। बाद में वह संख्या 80 तक बढ़ गई। यह सब करते समय स्कूल के दस्तावेजी काम भी वह किया करता था। मोहंडूल बस्ती पर अनाज‡पानी‡वस्त्र से लेकर रास्ते, बिजली जैसी आधुनिक सुविधाओं के अभाव के बावजूद शरद पूरी निष्ठा से अपना कार्य किया करता था। स्कूल के छात्रों के लिए खिचड़ी बनाने के लिए मिलने वाला चावल निकृष्ट दर्जे का होता था। वह उसकी भरपाई करने के लिए घर से प्याज‡आलू लाया करता था। यह सब मैंने स्वयं देखा तब अन्य सामग्री के साथ मैंने बच्चों को सालभर चलने वाली बैग, अच्छी कवरवाली कॉपियां, पेंसिलें, रबड, रंगीत चाकस्टिक, ड्राइंगबुक, खिचड़ी पौष्टिक बनाने के लिए हल्दी, जीरा आदि भी देता था। लगभग 2006 तक मैं ये चीजें देता रहा। बाद में एक गुजराती धर्मादा संस्था आगे आई और बच्चों के लिए जरूरी चीजें दी जाने लगी। शरद के कारण स्कूल तक पहुंचने वाला रास्ता बना। जिला परिषद में पैसे अदा कर मैंने अपने दोस्त के जरिए वहां नलकूप खुदवाया। यह सब शरद के कारण मैं कर सका।

शरद जैसे शिक्षक ग्रामीण इलाकों में हो तो वनवासी विद्यार्थी शिक्षा से वंचित नहीं रहेंगे और व्यक्ति के विकास के साथ समाज का भी विकास होगा।

आपकी प्रतिक्रिया...