श्री गजानन महाराज सेवा संस्थान अध्यात्म और सेवा का अद्भुत संगम

श्री संत गजानन महाराज के उपदेश के दो प्रमुख सूत्र हैं‡ भक्ति और सेवा। इसे ही वे ईश्वर सेवा कहते थे। महाराज की कृपा से यही कार्य संस्थान अविरत कर रहा है। एक छोटा सा पौधा अब विशाल वृक्ष बन गया है। दीनदुखियों की सेवा के लिए चिकित्सा से लेकर शिक्षा व सामाजिक क्षेत्र में कोई 42 सेवा प्रकल्प सुचारू रूप से चल रहे हैं। किसी एक संस्था की छत्रछाया में इतने अधिक प्रकल्पों के सफल संचालन का यह अद्भुत उदाहरण है। निस्पृह सेवा की इससे बेहतर मिसाल अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगी। संस्थान के वर्तमान अध्यक्ष व व्यवस्थापक श्री शिवशंकरभाऊ पाटील के समर्पित और अथक प्रयासों का यह फल है। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश‡

श्री गजानन महाराज की समाधि को एक शतक पूरा हो चुका है। एक छोटा‡सा पौधा अब विशाल वृक्ष बन चुका है। श्री गजानन महाराज सेवा संस्थान मानव कल्याण के 42 से अधिक प्रकल्प चला रहा है। इस कार्य की प्रेरणा आपको कैसे मिली?
यह सब महाराज की कृपा का परिणाम है। किसानी करते‡करते मैं महाराज की सेवा में आ गया। घर में खेती थी, जिसे उस समय मुनीम लोग ही सम्हालते थे। मालिक का काम केवल पूछताछ करना था। इसलिए मेरे लिए काम कुछ नहीं था। पहले दिन मैट्रिक की परीक्षा दी, दूसरे दिन शादी हुई। मैंने पिता से कहा, ‘अब मैं क्या करूं?’ पिता ने कहा, ‘मंदिर में फरसी लगाने का काम चल रहा है। वहां जाकर सेवा करो।’ इस तरह तीसरे दिन ही महाराज की सेवा में लग गया। मेरे पिता के एक दोस्त थे गफूरभाई। उन्होंने कहा, ‘बेटा एक खयाल रखना। सेवा निस्पृह भाव से होनी चाहिए। नेकी कर, दरिया में डाल और भूल जा। सेवा करते समय दुनिया से अपेक्षा रखोगे तो निराशा ही पल्ले पड़ेगी।’ इसे ध्यान में रखकर महाराज की सेवा में जुट गया। शुरुआत में बहुत सेवा नहीं होती थी। एकादशी हो या उत्सव हो तभी दो‡तीन हजार भक्त आया करते थे। पंद्रह साल तक इसी तरह काम करता रहा।

आप ट्रस्ट के अध्यक्ष और व्यवस्थापक इन दोनों पदों तक कैसे पहुंचे?

श्री पुरणमलजी मुरारका के निधन के बाद मुझे ट्रस्ट का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। संस्था में ट्रस्ट का अध्यक्ष यह दुय्यम पद है। व्यवस्थापक का पद पहले क्रमांक का है। उन्हें सभी अधिकार हैं। अध्यक्ष को केवल बैठक तक के अधिकार हैं। बैठक की चर्चा की रिपोर्ट व्यवस्थापक को देनी होती है। उसी अनुसार काम होता है। मैं पहले अध्यक्ष हुआ, बाद में व्यवस्थापक श्री पुरुषोत्तम पाटील का देहावसान हो गया। इस रिक्त पद को स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं था। तब मुझे अध्यक्ष और व्यवस्थापक दोनों पद सम्हालने के लिए कहा गया।

भक्ति और सेवा के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए आपने विभिन्न उपक्रम कायम किए। शैक्षणिक, सामाजिक, स्वास्थ्य आदि विषयों को आपने अध्यात्म से जोड़ दिया। यह शृंखला आपने किस तरह विकसित की?

आरंभ में ऐसा कुछ नहीं था। तत्कालीन व्यवस्थापक ने एक आयुर्वेदिक व होम्योपैथी दवाखाना आरंभ किया था। दस पैसे में दवाएं दी जाती थीं। बाद में एलोपैथी शुरू की गई। कारण यह था कि हमारे व्यवस्थापक की आंखों में मोतियाबिंदु हो गया था और उन्हें नाशिक जाकर शल्यक्रिया करवानी पड़ी थी। वहां से आने पर उन्होंने नेत्र शिविर के आयोजन का सुझाव दिया। पहले शिविर में 127 लोगों पर शल्यक्रिया की गई। फिर एलोपैथी दवाखाना/ओपीडी शुरू की गई। संस्थान का ध्येयवाक्य है, ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ और उसके अनुरूप सेवा शुरू की गई।

शुरू में वारकरी सम्प्रदाय के कीर्तन होते नहीं थे। इसलिए पूर्व व्यवस्थापक ने वारकरी शिक्षा संस्था शुरू की। वै. मामासाहेब दांडेकर ने संस्था की नींव रखी। इस संस्था के कुछ विद्यार्थी इस समय संस्था के सेवक के रूप में कार्यरत हैं, जबकि कुछ अन्य अच्छे कीर्तनकार हो गए हैं और कुछ महामंडलेश्वर तक बने हैं।

महाराज की 1910 में समाधि के बाद जो मुख्य नियम बनाए गए उनमें एक यह था कि महाराज के चरणों में पैसे का भंडार न होने दें। फिर इस पैसे का क्या करें? लोगों की बैठक हुईं और महाराष्ट्र के कानून के अंतर्गत एक ट्रस्ट की स्थापना की गई। जैसे जैसे आय बढ़ती गई वैसे वैसे योजनाएं बनती गईं। उनमें आध्यात्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक इत्यादि बातें शामिल की गईं। यह भी दृष्टि रही कि जितना हम कर सकते हैं उतना ही करें और यदि अन्य कोई ईमानदारी, सद्भावना के साथ सेवा कर रहा हो तो उन्हें सहायता करें जैसे कि गोसेवा आदि। गोरक्षण करने वाली संस्थाओं को हम पशुचारा उपलब्ध कराते हैं। जब चारा भेजना संभव नहीं होता तब उसकी खरीदी के लिए जितनी रकम लगती है वह हम देते हैं।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में संस्थान ने किस प्रकार प्रवेश किया?

1982 में शंकरराव चव्हाण यहां आए थे। उन्होंने बताया कि शेगांव में इंजीनियरिंग कॉलेज आरंभ करने की केंद्र सरकार की योजना है। प्रस्ताव भी साथ लाये थे। लेकिन सरकारी विलम्ब में मामला पड़ा रहा। इसके बाद सुधा फैक्ट्री का गोदाम किराए पर लेकर संस्थान ने वहां इंजीनियरिंग कॉलेज की शुरुआत की। श्री गजानन महाराज संस्थान से पृथक श्री गजानन शिक्षण संस्था की स्थापना की गई। प्रथम वर्ष में कॉलेज ने काफी प्रगति की। कॉलेज का एक छात्र उमेश कौल विश्वविद्यालय में प्रथम आया।

महाराज की कृपा से प्राध्यापक वर्ग भी समर्पित मिला है। हम प्राध्यापकों से नियुक्ति के समय दो प्रश्न पूछते हैं‡ आप किसे गुरु मानते हैं? यदि आप नियुक्त हुए तो आप ट्यूशन नहीं कर सकेंगे, क्या यह मंजूर है? हमारा विश्वास है कि जिसने गुरु बनाया होगा वह विश्वासपात्र रहेगा और यदि वह सेवा में आया तो उसका उद्देश्य पैसा नहीं है, यह गृहित होता है।

आरंभ में छात्रों और कर्मचारियों की निवास व्यवस्था की। बाद में शेड्स खड़े कर उपकरण स्थापित किए। अभी 90 एकड़ भूमि पर यह महाविद्यालय स्थापित है। यहां की शिक्षा प्रणाली, नैतिक मूल्यों का अधिपत्य एवं अनुशासन देखकर बाहर से आने वाले तज्ञ इस ग्रामीण महाविद्यालय की तुलना बनारस विद्यापीठ से करते हैं। मैनेजमेंट का कोटा भी हम मेरिट सूची के अनुसार भरते हैं। संस्था के किसी भी पदाधिकारियों या कर्मचारियों के बच्चों के लिए भी यही नियम है। मेरिट के अनुसार चयन होने पर फी देने की क्षमता न हो तो उनकी फी संस्था नियमों के अनुसार अदा करती है।

शिक्षा के क्षेत्र में इंजीनियरिंग कॉलेज के अलावा अंग्रेजी माध्यम की स्कूल, मतिमंद विद्यालय, आदिवासी शिक्षण संस्था व वारकरी शिक्षण संस्था के माध्यम से सेवा सुचारू रूप से चल रही है। आदिवासी आश्रम शाला महाराष्ट्र में व्दितीय स्थान पर थी। वह शासन का सहयोग न मिलने से इस सेवा से हम वंचित रहे।

वैद्यकीय क्षेत्र में कार्य और उसका विस्तार किस तरह है?

दवाखानों में रोज करीब 2 हजार रुग्णों की जांच होती है। तीन रुग्णवाहिकाएं हैं। इनमें से एक ग्रामीण भाग में जाती है। दूसरी आदिवासी इलाके में जाती है। तीसरी त्र्यंबकेश्वर के आदिवासी भागों में जाती है।

डॉ. विक्रम पंडित ने आधुनिक अस्पताल आरंभ करने का सुझाव दिया। उन्हें हमने हमारे सेवा कार्यों के बारे में बताया। यह भी बताया कि हमारे मानसेवियों, स्वयंसेवियों के परिवारों पर चिकित्सा या शल्यक्रिया का खर्च बिल पेश करने पर संस्थान के फंड से सहायता की जाती है। डॉ. पंडित ने कहा कि यहीं न रुकते हुए यह योजना सम्पूर्ण बुलढाणा जिले में लागू करें। हमने धन की दिक्कत की बात की तो उन्होंने पूछा कितना धन लगेगा। हमने सर्वेक्षण कर 700 करोड़ रु का अनुमान लगाया। दो माह बाद उन्होंने यह रकम देने की पेशकश की। हमने विचार किया जिम्मेदारी बढ़ेगी सो इतने पैसे नहीं चाहिए, केवल 70 करोड़ रु. मिले तो भी चलेगा। हमने उन्हें यह भी बताया कि यदि योजना ठीक से नहीं चला पाए तो यह रकम लौटाई जाएगी।

इस योजना के लिए सब से पहले हमने गरीब किसानों जिनके पास कार्ड तक नहीं ऐसे लोगों का सर्वे किया। यह पूरा होने पर हमने जिले के 11 लाख देहातियों को सिर्फ ऑपरेशन के लिए दत्तक लिया। उनकी सहायता के लिए उसी गांव के 2 सज्जन और 2 मानसेवी नियुक्त किए गए। फार्म भरना, सच्चाई के साथ सभी जानकारी देना, कितनी राशि मंजूर करना यह काम वे करते हैं। यहां यहां बिल आने पर सॅप सिस्टिम का सॉफटवेयर बनाया गया है। उसीमें यह डाटा सभी निकल आने के बाद वह रुग्ण को आने‡जाने का खर्च दे उसीकी जांच होती है। सही होने पर तुरंत मंजूर राशि का ड्राफट दिया जाता है। सभी व्दारा समर्पित भाव से यह सेवा योजना चल रही है। संस्था की ओर से दो नियम हैं। झूठा बिल न दे और दिया तो उसे रद्द कर उसका नाम हमेशा के लिए हटा दिया जाता है और गांव में यदि ऐसे तीन प्रकरण हुए तो वह गांव योजना से हटा दिया जाता है।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने जनहित में जो कानून बनाए थे उसीमें प्रथम नियम यह था कि कानून पेचीदा न हो और उस पर कड़ाई से अमल हो। आज यह कहीं दिखाई नहीं देता।

आनंद सागर में अध्यात्म और मनोरंजन का संगम है। यह योजना कैसे सूझी और अमल कैसे हुआ?

गांव में पानी का संकट था। लोगों का आरोप था कि मेरा भतीजा नगराध्यक्ष होने से सारा पानी संस्थान को ही मिलता है। यह बात मन में कचोट गई। इसलिए गांव और संस्थान दोनों को पानी मिले इसलिए विचार होने लगा। मेरे एक मित्र श्री गट्टाणी ने तालाब के निर्माण की योजना का सुझाव दिया। महाराज की कृपा से विवेकानंद शिला का दृश्य मन के सामने उभरा। सीढ़ियां, शिवलिंग, ध्यान केंद्र और विवेकानंद प्रतिमा का चित्र कागज पर उतरा। मेरे एक परिचित ख्वाजाभाई ने लैण्डस्केपिंग के लिए विश्वास मडव का नाम सुझाया। हमने उन्हें बताया कि पानी की समस्या हल होनी चाहिए, लेकिन धर्म और संस्कृति की विरासत का रक्षण होना चाहिए। इसलिए देश के 18 राज्यों के संतों की प्रतिमाएं स्थापित की जानी चाहिए। योजना के प्रथम पर चरण पर 87 करोड़ रु. का खर्च बताया गया था और योजना 15 वर्षों में पूरी होनी थी। इतनी लम्बी अवधि में खर्च भी बढ़कर सवा सौ करोड़ हो जाता। वह पूरी लगन से काम में लग गया और महाराज की कृपा और स्वार्थरहित सेवा होने से 15 वर्ष का काम 3 वर्ष व 20 करोड़ रु. में ही पूरा हो गया। काम पूरा होने पर मडव और उनके साथियों ने पैसा नहीं लिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने जो कुुछ दिया उससे कई गुना उन्हें मिल गया है।

भक्त निवास की सुचारू व्यवस्था है। इस व्यवस्था का नियोजन किस प्रकार होता है?

यहां दर्शन के लिए आने वाले शहरी और ग्रामीण भक्तों की रहने‡ठहरने की व्यवस्था हो इसलिए सभी तरह के 4000 कमरे बनाए गए हैं। यह सभी भक्तों की सहयोग राशि से बनाए गए हैं॥ पैसा कमाना यह उद्देश्य नहीं है। सिर्फ खर्च निकले इतनी ही राशि दान में ली जाती है।

ग्रामीण भक्त नियमानुसार यहां ठहर सकता है। उसे भोजन, पानी और रहने की सेवा दी जाती है। अच्छी से अच्छी सेवा भी अन्य जगह की तुलना में 10 गुना कम में सेवाभाव से दी जाती है।

संस्थान में भोजन व महाप्रसाद की व्यवस्था है। हजारों लोग यहां आते हैं। उनकी व्यवस्था का नियोजन किस प्रकार होता है?
महाराज का शेगांव में जो प्रथम दर्शन हुआ वह पत्तल पर बचे अन्न को खाते हुए। इसलिए अन्नदान को यहां प्राथमिकता है। महाराज की मौजूदगी से ही यह सेवा निरंतर चल रही है। आज संस्थान में लगभग 18 स्थानों पर करीब 75 हजार लोगों के लिए रोजाना रसोई बनानी होती है। इसमें 20 हजार लोगों को नि:शुल्क महाप्रसाद दिया जाता है। 15 से 30 रु. के बीच भरपेट भोजन दिया जाता है। यह हमारा व्यवसाय नहीं है। भक्तों के पैसे से ही यह चल रहा है।

आपके पास प्रबंधन की कोई उपाधि नहीं है, फिर भी संस्थान में श्रेष्ठ दर्जे का प्रबंधन आपने स्थापित किया है। यह कैसे संभव हुआ?

हम सभी सेवाभाव एवं कर्तव्यनिष्ठा से सेवा देते रहते हैं। यहां पैसे का दुय्यम स्थान है। इस कार्य में हृदय का भावना से संबंध है और बुध्दि का व्यवहार से। हम श्रध्दा, भक्ति और सेवा को ही इस क्षेत्र की धनसम्पदा मानते हैं।

इतना विशाल कार्य आपके नेतृत्व में खड़ा हुआ है। क्या कभी अहंकार की भावना आई? और यदि ऐसा हो तो आपने क्या किया?

संस्थान में फरसी लगाने से मेरा सेवा कार्य शुरू हुआ। उस समय गंगोत्री वाले बाबा हमारे यहां थे। एक दिन भोजन लेकर मैं उनके पास नहीं पहुंच सका। दूसरे दिन मैं वहां पहुंचा तो उन्होंने कल न आने की बात की। मैंने कहा, कल काम में था इसलिए नहीं आ सका। उन्होंने कहा, इससे क्या होगा? मैंने कहा, यश कीर्ति मिलेगी। इसके बाद उन्होंने मेरे नाम से लेकर पुरखों के नाम तक पूछे। मैं सात पीढ़ियों के बाद नहीं बता सका। बाबा ने कहा, जब तुम्हें तुम्हारे पुरखे ही याद नहीं तो तुम्हारा नाम कौन याद रखेगा? उस दिन से यश कीर्ति का झूठा गुबारा हमेशा के लिए उतर गया। अब अपने नाम की चिंता कभी नहीं होती, चिंता होती है केवल महाराज के नाम का ध्वज फहराता रहे यही अभिलाषा होती है।

सेवाधारी की संकल्पना किस तरह आई? उसकी रचना किस तरह की है?

सेवा कार्य बढ़ने से काम में दिक्कत आ रही थी। इसका हल सेवाधारी संकल्पना के रूप में सामने आया। जो गांव सेवा देना चाहता है उस गांव के 25 सेवाधारी और उनमें से ही एक प्रमुख नियुक्त कर सेवा दी जाती है। सेवाधारी की व्याख्या है‡ सेवाधारी, बिनपगारी और पूरी जिम्मेदारी। यह आस्था के कारण हो रहा है। आज 6500 सेवाधारी सेवा में हैं। 3000 सेवाधारी प्रतीक्षा सूची में हैं।

संस्थान में आज कितने सेवाधारी हैं? वे किस तरह की सेवाएं देते हैं?

संस्थान की सभी शाखाओं में लगभग दो हजार स्थायी सेवाधारी हैं। 6500 सेवाधारी हैं और 3000 प्रतीक्षा सूची में हैं। इसका मतलब यह कि उन्हें अभी प्रतीक्षा करनी है। सेवाधारी का मतलब है पैसे का संबंध नहीं है। कई गांव इसके लिए तैयार हो गए हैं। उनकी कार्यपध्दति, शारीरिक मेहनत, उनकी क्षमता देखकर समूह बनाए गए हैं। 20 गांव तो केवल रोटियां बनाने वाले हैं। उन्हें दूसरा कोई काम नहीं दिया जाता। आठ घंटे में डेढ़ सौ क्विंटल की रोटियां बनाते हैं। रोटियां बनाने वाले अलग, बांटने वाले अलग, सब्जियां काटने वाले अलग, साफसफाई वाले अलग, दर्शन कतार वाले अलग, महाप्रसाद वाले अलग इस तरह गांव के गांव नियुक्त किए गए हैं। सेवा करने वालों में सुशिक्षित व अमीर लोग भी हैं। सभी सेवाभाव से सेवा दे रहे हैं।

भविष्य में आपकी क्या योजनाएं हैं?

जो चल रहा है, वही ठीक ढंग से चले यह हमारी इच्छा है। वर्तमान स्थिति देख सेवा भाव से सेवा करना कठिन है। किसी संस्था के लिए एक उपक्रम चलाना मुश्किल होता है, वहां हम 42 उपक्रम सफलता से चला रहे हैं। एकसाथ 42 उपक्रम चलाने वाली संस्था आपको अन्यत्र नहीं मिलेगी। शुरू में संस्था 500 लोगों को महाप्रसाद देने की व्यवस्था करती थी, वहां अब 75 हजार लोगों की व्यवस्था हो रही है। आरंभ 40 कमरे थे, अब 4,000 हो गए हैं। नई योजनाएं जरूरी है वह करनी होगी।
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