भटके बच्चों की सेवा का यज्ञ

बच्चा… हर मां का प्यार और पापा का गुरुर होता है। बच्चा… जो माता पिता की दुनिया बदल देता है। बच्चा… जिसका जन्म होते ही उसके मांता ‡पिता अपनी खुद की जिंदगी की अपेक्षा सिर्फ उसके लिए जीते हैं। उसे अपनी जान से भी ज्यादा संभालते हैं। उसे पाल पोसकर बड़ा करते हैं। बच्चे की एक छींक भी उन्हें अस्वस्थ कर देती है। अपने बच्चे को खुश रखने के लिए वे क्या कुछ नहीं करते? उसकी हर ख्वाहिश पूरी करते हैं। बच्चे की एक मुस्कान उनके सुकून का कारण बन जाती है। यह रिश्ता एक ऐसा रिश्ता होता है जो उसके गर्भावस्था से ही शुरू होता है।

लेकिन माता‡पिता का प्यार और साथ मिलना नसीब की बात होती है। कुछ बच्चों को जन्म से ही यह नसीब नहीं होता, तो कुछ बच्चे उसकी कीमत नहीं करते।

देशभर में सैंकडों बच्चे हर रोज अपने मां का आंचल छोडकर किसी कारणवश घर से भाग जाते हैं। किसी को मा‡बाप का डांटना अच्छा नहीं लगता, किसी को लगता है कि उसके मां‡बाप उससे प्यार नहीं करते, किसी को मुंबई नामक जादुई नगरी देखनी होती है, किसी को शाहरुख, आमिर या फिर सचिन तेंडुलकर से मिलना होता है। कारण कोई भी हो, गलती चाहें किसी की भी हो, तात्कालिक मोह या क्रोध की वजह से वह अपने मा‡बाप को छोड़, बडें शहरों में खास कर मुंबई में आ जाते हैं।

बच्चा भागकर नजदीक के स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर बड़े शहर में आ तो जाता है, लेकिन वापस नहीं जा पाता। उसे वापसी का रस्ता पता नहीं होता…या फिर वापस जाने का मौका ही नहीं मिलता। वह खो जाता है, अनजान शहर में, बन जाता है उसी शहर की गुमनामियों का एक हिस्सा। वह वहीं प्लाटफार्म पर रहता है, पेट की आग बुझाने के लिए भीक मांगता है, कचरा-भंगार उठाता है, चोरी करता है, और पता नहीं क्या कुछ करता है! यही से शुरुआत होती है संघर्ष की, जिन्दा रहने के लिए संघर्ष… पेट भरने के लिए संघर्ष! अपना बचपन दांव पर लगाकर जिंदगी की बाजी जितने का प्रयत्न किया जाता है।

गलत काम करनेवाले, ऐसे ही बच्चों के ताक में रहते हैं। फिर यह बच्चा इनका शिकार बन जाता है। उससे चोरी करवाई जाते हैं, गलत कामों में उसका इस्तेमाल किया जाता है, और कभी कभी वह उनकी शारीरिक भूख मिटाने का एक जरिया बन जाता है।
उस बच्चे के पास आवाज होती है, पर उसे सुननेवाले कान वहां मौजूद नहीं होते। अपने आसपास हम ऐसे कई बच्चों को हर रोज देखते हैं। पर उनका दर्द हमारी आंखों तक, और उसके परे हमारे दिल तक नहीं पहुंचता। उनके गंदेपन से हमें सिर्फ घृणा आती है। इस घृणा से उन्हें आनेवाले बुरे अनुभवों को भुलाने के प्रयास में बच्चा नशे को अपने गले लगाता है और उसी की आगोश में खो जाता है।

इन बच्चों का दर्द एक इंसान की आंखों से उतरकर दिल तक पहुंचा और उन्होंने इन बच्चों के लिए काम करने की ठान ली, उनका नाम है श्री विजय जाधव। उन्होंने 2006 साल से इन बच्चों के लिए काम करना शुरू किया। इसके लिए समतोल फाउंडेशन नाम की संस्था स्थापित की। तब से लेकर आज तक यह संस्था इन बच्चों के लिए काम करती है। आज तक इस संस्था ने लगभग 1500 से भी ज्यादा बच्चों को उनके मां ‡बाप से वापस मिलवाया है। इस संस्था के कार्यकर्ता प्लाटफॉर्म- प्लाटफॉर्म जाकर ऐसे भागे हुए बच्चों को ढूंढते हैं, उनसे प्रेमपूर्वक बात कर उनका विश्वास जीत लेते हैं और उन्हें संस्था के आश्रय में लाते हैं।

इन बच्चों के लिए 45 दिन का मनपरिवर्तन शिविर आयोजित किया जाता है। इसमें बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ को सुधारने पर बल दिया जाता है। पेटभर खाना, भरपूर खेलना, अनौपचारिक शिक्षा और बहुत‡सा प्यार…यह इस शिविर की खासियत होती है। इसी शिविर के दौरान बच्चों से उनके घर का पता पूछा जाता है। बहुत बार तो बच्चे अपने घर का पता भी ठीक तरीके से बता नहीं पाते। फिर उन्हीं की निशानदेही पर खोज कर उनका घर और मां‡बाप का पता लगाया जाता है। पूरी जांच पड़ताल के बाद बच्चे को उनके हवाले किया जाता है।

लेकिन कुछ बच्चें ऐसे भी होते हैं, जिनके घर का ठिकाना नहीं मिलता। यदि घर मिल भी गया तो मां‡बाप इस दुनिया में नहीं होते। कभी‡कभी मां‡बाप बच्चों का स्वीकार नहीं करते, तो कभी बच्चा उनके पास वापस जाना नहीं चाहता। ऐसी परिस्थितियों में उन्हें अलग‡अलग वसतिगृहों में रखकर नजदिकी स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा जाता है। पर 14-15 साल के बच्चे न तो स्कूल जाने की मानसिकता में होते हैं, न वे इतने पढ़े लिखे होते हैं कि अपने पैरो पर खड़ा हो सके।

इन बच्चों का क्या करें? इनका भविष्य सुरक्षित कैसे करें? यह एक बड़ी समस्या समतोल संस्था के सामने थी। समतोल की इस समस्या का गंभीता को ध्यान में रखते हुए सेवा सहयोग फाउंडेशन ने समतोल को पूरी तरह से सहयोग करने का फैसला किया। हिन्दुस्थान में बाल, महिला,स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि भिन्न‡भिन्न विषयों और क्षेत्रों में काम करनेवाली संस्थाएं बड़े पैमाने पर पाई जाती है। इस नि:स्वार्थ भाव से आतंरिक ऊर्जा से प्रेरित होकर काम करनेवाले सेवाव्रतियों का कार्य लोगों तक पहुंचाना और संस्था की आवश्यकता के अनुसार स्वयंसेवक, धन तथा संसाधन उपलब्ध करवाने का काम सेवा सहयोग फाउंडेशन करता है। मानो, सेवा सहयोग एक पुल है, जो सेवा कार्य और सेवा कार्य के प्रति आदर, आस्था रखनेवाले इंसानों को जोड़ने का काम करता है।

संस्था द्वारा किये गए चिंतन के बाद इस समस्या का यह हल निकाला गया कि एक ऐसे वसतिगृह का निर्माण किया जाए, जो उनका अपना घर भी हो और पाठशाला भी। जहां वह हक से रह सके और प्रशिक्षण वर्ग द्वारा खुद के पैरों पर खड़ा भी हो सके। बच्चों के उज्ज्वल और सक्षम भविष्य के लिए यज्ञ तो करावाना ही था। फिर समिधा की खोज की शुरुआत हुई। संस्था के कार्यकर्ता समाज के विभिन्न स्तर के लोगों को मिलने लगे और प्रोजेक्ट समतोल के बारे में बताने लगे।

इसी अभियान द्वारा एक दिन मुलाकात हुई एक ऐसे इंसान से जो यशस्वी, जानेमाने व्यावसायिक होने के साथ‡साथ समाज के प्रति अपना दायित्व माननेवाले और सेवा कार्य के प्रति आदर-आस्था रखनेवाले सच्चे भारतीय भी हैं। उनका नाम था श्री रामप्रकाश पोद्दार। मुंबई स्थित श्री रामप्रकाशजी ने अपनी व्यस्तता के बावजूद संस्था के कार्यकर्ताओं से खुले मन से बातचीत की। प्रोजेक्ट समतोल के बारे में पूरी जानकारी ली। प्रोजेक्ट समतोल के रूपरेखा पर चर्चा की। वसतिगृह कैसा होना चाहिए? किन‡किन प्रकार के प्रशिक्षण वर्ग होने चाहिए? इस पर महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। इस समस्या की व्यापकता का अंदाजा उन्हें था। इस तरीके के वसतिगृह की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पल भर की भी देरी न करते हुए बदलापुर की 1500 वर्गफुट की अपनी जमीन इस वसतिगृह के निर्माण के लिए देने का फैसला किया। इस जमीन की आज बाजार में कीमत लगभग डेढ़ करोड़ से भी ज्यादा होगी। इसके बावजूद भी उन्होंने वह जमीन इस सेवा कार्य को दान कर इस यज्ञ में पहली समिधा अर्पण की। सही मायने में श्री राम प्रकाशजी जैसे लोग इस समाज की सम्पदा है।

प्रोजेक्ट समतोल के लिए जमीन मिल गई। अब अगला लक्ष है वसतिगृह… नहीं नहीं… बच्चों के घर और ज्ञानमंदिर के निर्माण का। इसके लिए लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपयों की आवश्यकता है। आप भी इच्छित समिधा अर्पण कर इस सेवाकार्यरूपी यज्ञ का एक भाग बन सकते हैं।

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