‘माय होम इंडिया’ अपनत्व का एक सेतु

‘माय होम इंडिया’ स्वयंसेवी संस्था है, जिसका संकल्प पूर्वोत्तर भारत और शेष भारत के बीच पारस्परिक भाईचारे और अपनत्व की भावना को और सशक्त बनाना है। संस्था पूर्वांचल के छात्रों की सहायता करती है, चिकित्सा के लिए आए लोगों की मदद करती है, सामाजिक और सांस्कृतिक समन्वय के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती है। राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए पूर्वांचल में काम करने वालों को ‘वन इंडिया अवार्ड’ सम्मानित किया जाता है।

पूर्वांचल या ईशान्य भारत का नाम सुनते ही हमारे मन में विचित्र भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह कौन सा स्थान है? भारत में इसकी स्थिति कहां है? और हम मन ही मन कुछ राज्यों का आकलन करने लगते हैं। अब तक हमें यही पढाया और बताया जाता रहा है, कि भारत का भौगोलिक विस्तार कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से असम तक फैला हुआ है। पूर्वांचल के बारे में अज्ञानता ही पूर्वांचल की समस्याओं का मूल है।

भारत का पूर्वांचल असम, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय तथा अरुणाचल ऐसे सात राज्यों को मिलाकर कहते हैं। पारम्पारिक सम्बंधों के कारण इन्हें सात बहने भी कहते हैं। पूर्वांचल अति प्राचीनकाल से भारत का अटूट अंग है। ऋषि परशुराम द्वारा प्रवाहित ब्रह्मपुत्र, श्रीमद् शंकर देव, माधवदेव, गुरु वसिष्ठ जैसे श्रेष्ठ संतों ने इसे अपनी साधना से अनुप्राणित किया है। लाचित बरफूकन, सती जयमती, कनकलता आदि अनेक वीर संतानों ने इसे अपने रक्त से सिंचित किया है।

पूर्वांचल, धरती पर साक्षात स्वर्ग के समान है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़, चट्टानें, कल-कल अविरल बहती नदियों, झरने, ऊंचे-ऊंचे जल प्रपात, बर्फ से ढंकी पर्वत शृखलायें, घने जंगल, प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है। प्रचूर खनिज संपदा से यह भाग भरा हुआ है। वनस्पति संपदा की भी यहां बहुतायत है। प्राकृतिक सौंदर्य और संपन्नता के साथ ही साथ सामाजिक व्यवस्था में भी यहां की सम्पन्नता का कोई जोड़ नहीं है। पूरे पूर्वांचल में 180 से अधिक जाति जनजातियां हैं। सभी की अपनी-अपनी बोली और अपने-अपने रीति रिवाज हैं, जो एक दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं। सभी के अपने खान‡पान, वेश भूषा और पूजा पद्धतियां हैं। पूर्वांचल में नारी सम्मान सर्वोच्च देखने को मिलता है। यहां आज भी कुछ जिलों में मातृसत्तात्मक व्यवस्था जीवित है।
इतनी प्राकृतिक सुंदरता और सम्पन्नता के बावजूद पूर्वांचल हमेशा से उपेक्षा का शिकार रहा है। देश में जहां हर तरफ विकास हो रहा है, वहीं पूर्वांचल में सुविधायें न के बराबर हैं। प्रारंभ काल से ही यातायात के साधानों के अभाव तथा क्षेत्र की बीहड़ता के कारण यह भाग, भारत के अन्य प्रान्तों से प्राय: कटा सा रहा। पूर्वांचल को शेष भारत से जोड़ने वाले रेलमार्ग का आखिरी स्टेशन असम का गुवाहाटी स्टेशन है। शेष 6 राज्यों में रेल लाइन तक नहीं है। राज्यों को एक दूसरे से केवल सड़क मार्ग ही जोड़ता है, लेकिन भौगोलिक दुर्गमता और सरकारी उपेक्षा के कारण सड़क मार्ग भी रेंग कर चलता है। यातायात की सुगमता यहां एक स्वप्न मात्र है।

अविकास, उपेक्षा और सरकारी अव्यवस्था ने पूरे पूर्वांचल को समस्याग्रस्त बना रखा है। 96% अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरा पूर्वांचल कूटनीतिक दृष्टि से पड़ोसी देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है। आतंकवाद, अलगाववाद, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी, धर्मांतरण, अपहरण, बांग्लादेशी घुसपैठ, चीन से सीमाओं को खतरा जैसे तमाम कृत्यों से समूचा पूर्वांचल अशांत बना हुआ है। शिक्षा, चिकित्सा, पोषण, नौकरी जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित यहां का युवा वर्ग आंतकवादी गुटों के आसान टारगेट हैं। देेश की युवा शक्ति को भ्रमित कर देश-विरोधी ताकतें देश को तोड़ने का प्रयत्न लगातार कर रही हैं।

पूर्वांचल और शेष भारत को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास श्री सुनील देवधर ने ‘माय होम इंडिया’ के माध्यम से किया है। ‘‘महाराष्ट्र हो या अरुणाचल, अपनी माटी अपना घर’’ इन शब्दों को सही मायने में जीने वाले श्री सुनील देवधर ने पूर्वांचल भारत में 11 वर्षों तक संघ के प्रचारक के रूप में काम किया।

उन्होंने पूर्वांचल भारत के कई जिलों में संघ के सेवा काम और संगठन को खड़ा करने का काम किया। आतंक के साये में जी रहे इस क्षेत्र में अपनी जान की परवाह न करते हुए वे निर्भीक रूप से 11 वर्षो तक पूर्वांचल में रह कर राष्ट्र की अखंडता को अक्षुण्ण रखने का प्रयत्न करते रहे। सन् 2002 में उन्होंने अपने व्यक्तिगत कारणों से प्रचारक न रहने का निश्चय किया। प्रचारक न रहते हुए भी सुनीलजी पूर्वांचल के प्रति पहले जितने ही सजग रहे। सुनील जी ने पूर्वांचल की मूल समस्या को दूर करने के लिए समस्या की जड़ पर प्रहार करने का संकल्प लिया और पूर्वांचल की समस्या को शेष भारत में जन-मन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया। सुनील जी जहां-जहां भी भाषणों या वक्तव्यों के लिए जाते थे, वहां अपने ओजपूर्ण भाषण से पूर्वांचल की चिंगारी श्रोता के मन तक सुलगा आते थे। उनका मानना है कि पूर्वांचल की समस्या तब तक समाप्त नहीं होगी जब तक शेष भारत पूर्वांचल के प्रति संवेदनशील नहीं होगा। अभी तक यही प्रयास चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा।

पूर्वांचल की अन्य समस्याएं भी हैं जो केवल जनजागरण से सुलझने वाली नहीं थीं, इसलिए सन् 2005 में सुनील जी ने अपने स्वप्न को यथार्थ रूप देते हुए भारत मेरा घर इस भावना को अन्य आयामों तक पहुंचाया जा सके इसलिए ‘माय होम इंडिया’ इस नाम से एक एनजीओ की स्थापना की, जिसका संकल्प पूर्वोत्तर भारत और शेष भारत के बीच पारस्परिक भाईचारे और बंधुत्व की भावना को और सशक्त बनाना है।

माय होम इंडिया मुंबई, पुणे, बेंगलूरु और दिल्ली जैसे महानगरों के साथ-साथ देश के अन्य शहरों में भी काम कर रही है। ‘माय होम इंडिया’ का मुख्य काम पूर्वांचल से आये लोगों को देश के अन्य भागों में अपनापन देना और वैसा ही अपनापन शेष भारत के लोगों को पूर्वांचल में मिले।

संपूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का काम ‘माय होम इंडिया’ अपने विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से कर रही है। हेल्पलाइन के माध्यम से ‘माय होम इंडिया’ पूर्वांचल से आये छात्रों को उचित मार्गदर्शन करती है, साथ भाषायी और स्थानीय समस्याओं को भी दूर करती है। नौकरी या व्यवसाय के लिए आये लोगों को हर संभव सहयोग प्रदान करती है। चिकित्सकीय सहायता के लिए आये लोगों का उचित प्रबंध भी करती है। ‘माय होम इंडिया’ ने हेल्पलाइन के माध्यम से अब तक 500 लोगों को लाभान्वित किया है।

सामाजिक और सांस्कृतिक समन्वय को ध्यान में रखते हुए गणेशोत्सव, गुढीपाडवा, नवरात्री, दिवाली और होली जैसे त्योहारों में पूर्वांचल के छात्रों को स्थानीय परिवारों में समाहित कर ‘माय होम इंडिया’ सांस्कृतिक तानेबाने को मजबूत करने का काम करती है।
खेल अपनत्व और एकता को मजबूत बनाता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रति वर्ष फुटबाल प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, जिसमें पूर्वांचल के प्रत्येक राज्य से एक टीम और एक स्थानीय टीम फुटबाल का मैच खेलती है। इसका उद्देश्य आपसी विश्वास को और मजबूत बनाना है।

शेष भारत के लोगों को पूर्वांचल के प्रति आकर्षित करने के उद्देश्य से वर्षभर पूर्वांचल के लिए पर्यटन का आयोजन किया जाता है। उद्देश्य पूर्वांचल की सुंदरता का करीब से अनुभव करना और मुख्य बिंदु वहां स्थानीय परिवार में रह कर अपनत्व की भावना को और मजबूत बनाना है।

‘पूर्वांचल एक झलक’ के माध्यम सें पूर्वांचल की संस्कृति और कला से देश के अन्य भागों तक अवगत कराया जाता है। इसी प्रयत्न के तहत मुंबई में सुंदर कार्यक्रम का आयोजन भी हो चुका है।

गत दो वर्षों से मुंबई में ‘वन इंडिया अवार्ड’ का आयोजन किया जाता है। जिसका उद्देश्य राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए पूर्वांचल में काम करने वालों को सम्मानित करना है। इस वर्ष यह पुरस्कार श्री मधुकर लिमये जी को श्री लालकृष्ण आडवाणी जी के हाथों दिया गया।

पूर्वांचल से काम दिलाने के बहाने मुंबई में जबरदस्ती वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करने लिए लायी गई लडकी को ‘माय होम इंडिया’ के माध्यम से मुक्त करवाया गया। सामाजिक न्याय के लिए भी ‘माय होम इंडिया’ हमेशा अग्रसर रहती है।

जन जागरण सेवा और सहयोग के माध्यम मे ‘माय होम इंडिया’ पूर्वांचल से शेष भारत आये कई लोगों को भारत अपना घर होने का अहसास करा चुकी है। अपनत्व और बंधुत्व की भावना आज देश के दोनों भागों में‡ पूर्वोत्तर और शेष भारत में‡ माय होम इंडिया के माध्यम से देखने को मिलती है। यही कारण है कि आज पूर्वोंचल में ‘माय होम इंडिया’ एक विश्वास का नाम बन गया है, वहीं शेष भारत में कार्यकर्ता स्वयंसेवाभावी मन से आगे बढ़कर ‘माय होम इंडिया’ की मदद करते हैं। ईश्वरीय कार्य हमेशा शुरू किसी एक से होता है, लेकिन लोग स्वयं जुड़ते जाते हैं। ऐसा ही ईश्वरीय कार्य ‘माय होम इंडिया’ है। सुनील जी का दिव्य स्वप्न यथार्थ रूप में ‘माय होम इंडिया’ के माध्यम से साकार होने लगा है। पूर्वोत्तर भारत और शेष भारत के बीच विश्वास और सामंजस्य का पुल मजबूत होने लगा है। राष्ट्र की अखंडता और एकता को अक्षुण्ण रखने का यह प्रयत्न यूं ही अविरत चलता रहेगा। वंदे भारत मातरम्!

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