यथार्थ का चित्रण करती कहानियों का संग्रह – एक था आदमी

साहित्य में कहानी एक सशक्त विधा के रूप में स्थापित है। हिन्दी में कहानी की एक लम्बी परम्परा रही है। प्राचीन काल में जब लेखन कला लोकप्रिय नहीं थी, तब भी श्रुति परम्परा के रूप में कहानी आख्यान के रूप में कही व सुनी जाती थी। अनेक किस्से-कथायें नानी और दादी से नयी पीढ़ी को ज्ञात होती रही हैं। कहानी लेखन की शुरुआत भी उन्हीं किस्से-कथाओं को लिखकर की गयी।

हिन्दी साहित्य में कहानी को जो प्रतिष्ठा प्राप्त है वह बहुत आसानी से नहीं मिली है। बड़े संघर्ष के उपरान्त कहानी विधा ने साहित्य में अपने लिए जगह बनाई है। ऐसे अनेक विद्वान अब भी हैं जो कथा साहित्य में उपन्यास को तो स्वीकार करते हैं, मगर साहित्य में कहानी उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहाती। कई जानी-मानी संस्थायें भी हैं, जिन्होंने कहानी को कभी गम्भीर साहित्यिक विधा के रूप में स्वीकार नहीं किया। इतना सब होने के बाद भी कहानी साहित्य की केन्द्रीय विधा बनी रही। बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में कहानी ने खूब प्रगति की। मुंशी प्रेमचन्द्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर, जयशंकर प्रसाद, शरदचन्द्र, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी इत्यादि कहानीकारों ने कहानी को आम पाठकों के बीच लोकप्रिय बनाया। उनके बाद भी कहानी का महत्व कम नहीं हुआ। कहानी की पुस्तकों के साथ अनेक पत्रिकाएं निकलती थीं। सभी समाचार पत्रों के रविवारीय संस्करणों में कहानियां छपती थीं। किन्तु समय के साथ सामाजिक जीवन में जो गम्भीर बदलाव आये, उसके परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे कहानी के कथानक से सामान्य जन गायब होने लगे। उनमें पश्चिमी सभ्यता से सराबोर आधुनिक परिवार, रहन-सहन, बोली-भाषा छाने लगी। कहानी के माध्यम से ऐसे समाज का चित्रण किया जाने लगा, जो भारतीय पाठकों के कल्पना लोक में बसता था, किन्तु वहां तक पहुंचना सरल नहीं था। फलत: कहानी के पाठक कहानी से दूर होते गये।

आज कहानी का परिदृश्य फिर बदला है। कहानी के क्षेत्र में युवा साहित्यकार सक्रिय हैं। वे कहानी को खूब समृद्ध कर रहे हैं। उनके साथ ही मार्गदर्शक के रूप में अनुभवी साहित्यकारों की पीढ़ी है, जो परिवार, समाज, देश और मानव मूल्यों को सुरक्षित रखने हेतु कहानियों की रचना लगातार कर रही है। श्री दिनकर जोशी उसी अनुभवी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

दिनकर जोशी का हिन्दी में सद्य: प्रकाशित कहानी संग्रह ‘एक था आदमी’ है। इनमें उनकी गुजराती में प्रकाशित लगभग ढ़ाई सौ कहानियों में से चुनिन्दा इक्कीस कहानियों का चयन किया गया है, जिनका हिन्दी में उत्तम अनुवाद श्री ललित कुमार शाह ने किया है।

दिनकर जोशी भारतीय समाज से सीधे तौर पर जुड़े कहानीकार हैं, इसलिए उनकी कहानियों में समाज के विभिन्न घटकों का चित्रण मिलता है। इन्हें पढ़ते समय पाठक को लगता है कि सारे पात्र और घटना चक्र उसके आस-पास के हैं। इसलिए वह कहानी के साथ एकाकार हो जाता है, उसमें निमग्न हो जाता है। दिनकर जोशी की कहानियों की एक और विशेषता है कि उनमें किसी न किसी ऐसी समस्या का समाधान निहित होता है, जो पाठकों के मन में वर्षों से कुलबुलाता रहता है। अनेक सामाजिक मामलों को उन्होंने बड़े ही सहज तरीके से प्रस्तुत किया है, जिनमें समाज को दिशा मिलती है।

संग्रह की प्रमुख कहानी ‘मछली’ एक ऐसी महिला की कथा है जो पुजारी की बेटी है और अपने समवयस्क बाल मित्र ‘मनका’ की राह निहारते हुए जीवन बिता देती है। मनका शहर में चला गया और वहां पर अपनी गृहस्थी बसा ली, किन्तु मछली अपने पिता की विरासत को अक्षुण्ण रखते हुए पुजारिन बनकर मनका की प्रतीक्षा करती रही। दोनों की भेंट हुई, किन्तु वह क्षणिक भेंट औपचारिक बनकर ही रह गयी। इस कहानी में कहानीकार ने बालमन की भावुकता को आजीवन धारण करके आदर्श सम्बन्ध को निभाने का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है। एक और कहानी ‘नाम परिवर्तन का खेल’ वर्तमान राष्ट्रीय व सामाजिक बहस और चर्चा को समाहित किए हुए है। धन और प्रतिष्ठा की लालच देकर ईसाई मिशनरियां और मुस्लिम संस्थाएं भोले-भाले वनवासियों और दलितों का धर्मान्तरण कराने में जुटी हैं। धर्मान्तरण के कुछ ही दिनों के बाद लोगों को लगने लगता है कि उनके साथ धोखा हुआ है। धर्मान्तरण (और नामान्तरण) के पश्चात भी न उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन आया है और न जातिगत अपमान ही छूटा है।

‘वरदान’ कहानी वर्तमान नव धनाढ्य व आधुनिक भौतिक वादी परिवार का वृतांत है, जो सौ वर्ष की आयु प्राप्त कर चुके घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति का जन्मदिन मनाते हैं। नाती-पोतों से भरे-पूरे परिवार में उनके जन्मदिन को मनाने के लिए जिस तरह से कमेटी बनाने से लेकर कार्यक्रम तय करने की बातें चलती हैं, उससे आधुनिक समाज की छिछोरी सोच का परिचय मिलता है। और अन्तत: बुजुर्ग ने निराश मन से ईश्वर से वरदान मांगा कि अगले जन्म में उसे सौ वर्ष की आयु न मिले।
‘अजीबो-गरीब वारिस’ कहानी में दिनकर जोशी ने धनी व्यक्ति की वारिस की इच्छा के चलते तीन-तीन विवाह करने की कथा बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत की है। पत्नी पर दोष मढ़कर जेंती सेठ ने तीन विवाह किए, किन्तु उन्हें अपने पुसंत्व का आभास नहीं मिला। तीसरी युवा पत्नी ने उनकी असमर्थता को जानकर पूर्व दोनों पत्नियों को भेद बताया और परिवार के वारिस के लिए ‘पाप’ करने का मन बना बना लिया। उसके इस निर्णय को दोनों का मौन समर्थन भी मिला। पुंसत्वहीन जेंती सेठ को वारिस मिला। ऐसी घटनाएं लगभग हर वर्ग, हर समाज में मिलती हैं।

‘कमबख्त’ कहानी एक ऐसे छठी व्यक्ति जटाशंकर तिवाड़ी की है, जिनके बेटे देवदत्त ने शहर में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त की और स्वेच्छा से विवाह कर लिया। यह बात जटाशंकर तिवाड़ी को अपमानजनक लगी। उन्होंने बेटे से जीवन भर सम्पर्क नहीं रखा। कैंसर से पीड़ित होकर मृत्युशय्या पर पड़े होने पर जब देवदत्त उन्हें देखने आये, बेटे से मृत्यु के पश्चात अर्था को कंधा और मुगाग्नि न देने को कहा।

इसी तरह के समाज में घटने वाले कथाबिम्बों को आधार बनाकर दिनकर जोशी ने अपनी कहानियों के पात्रों तथा कथानकों का निर्माण किया है। संग्रह की कहानियां- ‘अंधेरी गुफा’, ‘हजार हाथवाले की कृपा’, ‘अन्दर-बाहर’, ‘चाभीवाला खिलोना’, ‘जादू का खेल’, ‘मेरी गुड़िया’ इत्यादि समाज में व्याप्त अच्छाइयों-बुराइयों, द्वन्द्व, उठापटक, स्नेह-घृणा की बड़ी अच्छी तरह से प्रस्तुत करती हैं। इन कहानियों में दिनकर जोशी की समाज व राष्ट्र के प्रति उदारवादी सुधारक का दृष्टिकोण झलकता है। इसलिए ये कहानियां पाठकों के मन पर गम्भीर छाप छोड़ती हैं।

 

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