गैरपारंपरिक ऊर्जाः समय की मांग

रोटी, कपड़ा और मकान ये हर व्यक्ति की मूलभूत जरूरत के रूप में पहचाने जाते हैं, लेकिन विकास के इस युग में रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ ऊर्जा का भी समावेश करना पड़ेगा। वर्तमान दौर के दौड़-भाग तथा प्रतिस्पर्धात्मक युग में ऊर्जा के बगैर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, ये बात अपने आस-पास के वातावरण को देखकर सहज ही समझी जा सकती है। मानव की दिनचर्या पर अगर सूक्ष्मता से ध्यान दिया जाए तो यह बात स्पष्ट होगी कि उसके जीवन में हर पल ऊर्जा की उपयोगिता बढ़ती जा रहा है, ऐसे में यह ऊर्जा वास्तव में क्या है? कुछ लोग ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा ही मानते हैं, पर सच तो यह है कि ऊर्जा विद्युत नहीं है, अपितु वह अलग- अलग रूप में हम अपने जीवन में उपयोग में लाते हैं। आज के तकनीकी युग में ऊर्जा की नितांत आवश्यकता है। ऊर्जा के उपयोग पर देश की प्रगति और विंकास दोनों टिके हुए हैं। भारत विकासशील देश है और वह इन दिनों आर्थिक विकास के संक्रमणात्मक दौर से गुजर रहा है। देश की आर्थिक विकास दर 8 से 9 प्रतिशत के बीच है। किसी भी विकासशील देश का आर्थिक विकास यह उसके ऊर्जा क्षेत्र से प्रत्यक्षतः जुड़ा होता है। आर्थिक विकास दर जितना होगा, उसके डेढ़ गुना ज्यादा ऊर्जा का विकास दर अपेक्षित होता है।

आज भारत के आर्थिक विकास दर में ऊर्जा की कमी सबसे बड़ी बाधा बताई जा रही है। 31 दिसबर, 2011 तक भारत की कुल स्थापित विद्युत क्षमता 1,86,654.62 मेगावॉट थी, इसमें वर्गीकरण करने के बाद औष्णिक विद्युत 1,22,963.98 मेगावॉट, जल विद्युत 38,748.80 मेगावॉट, अणु ऊर्जा 4780मेगावॉट तथा गैर पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोत 20,162 मेगावॉट है, बावजूद इसके आज भी भारत में ऊर्जा की मांग तथा आपूर्ति में 12.8 प्रतिशत की कमी है, इसी तरह देश भर में ऊर्जा की उच्चतम मांग में 16.6 प्रतिशत की कमी देखी जा रही है।

भारत का आर्थिक विकास दर अगर 8 से 9 प्रतिशत के बीच स्थायी रहा, तो विद्युत निर्माण की क्षमता इस वर्ष के अंत तक 2,25,029 मेगावॉट होनी जरुरी है। 31 दिसंबर, 2011 तक महाराष्ट्र की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 24,351 मेगावॉट थी, इसमें से औष्णिक ऊर्जा 17,243 मेगावॉट, जल विद्युत 3,331.84 मेगावॉट, अणु ऊर्जा 690.14 मेगावॉट तथा गैर पारंपरिक ऊर्जा 3299.336 मेगावॉट थी। वर्तमान में निर्मित होने वाली 70प्रतिशत औष्णिक (कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस) तथा 25 प्रतिशत जल विद्युत परियोजनाओं के माध्यम अर्थात पारंपरिक ऊर्जा के स्त्रोत से बनाई जा रही है।
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पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोतों का उपयोग करके विद्युत का निर्माण करने पर उसके माध्यम से विषैले घटकों का निर्माण होता है। इन घटकों में कार्बन डाईऑक्साइट, सल्फर डाईऑक्साइड, कॉर्बन मोनोऑक्साइड के कारण पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो रही है, इस कारण मानव जाति के अस्तित्व का खतरा बढ़ता जा रहा है। इन पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों ( कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस ) के सीमित भंडारण तथा उनके उपयोग में होने वाली संभावित वृद्धि के कारण प्रदूषण मुक्त गैर पारंपरिक ऊर्जा के स्रोतों को उपयोेग में लाकर बिजली उत्पादन करना जरूरी हो गया है। मांग तथा आपूर्ति के बीच की कमी को पूरा करने के लिए बॉयोगैस, बॉयोमॉस, सौर पवन, ऊर्जा, लघु जल जैसे गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से बिजली के निर्माण में अहम भूमिका अदा कर सकते हैं।

महाराष्ट्र देश का सबसे ज्यादा बिजली उत्पादन तथा उपयोग करने वाला राज्य है। यहां की बिजली उत्पादन क्षमता 24,351 मेगावॉट है। राज्य में बिजली की मांग औष्णिक तथा जल-विद्युत प्रकल्पों से निर्मित होने वाली बिजली से पूरी की जाती है, बावजूद इसके राज्य में बिजली का संकट गहराया हुआ है। बिजली संकट पर मात करने के लिए पर्यावरण की दृष्टि से पोषक माने जाने वाले गैर पारंपरिक ऊर्जा के स्रोतोें से बिजली का उत्पादन करना सदैव लाभदायक ही साबित होगा। वर्तमान स्थिति में अगर अन्य ऊर्जा के स्रोतों पर विचार किया गया तो इन गैर पारंपरिक ऊर्जा के स्रोत शाश्वत तथा प्रदूषण मुक्त ऊर्जा के स्रोत कहे जा रहे हैं। गैर पारंपरिक ऊर्जा में पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, बॉयोगैस तथा बॉयोमॉस, समुद्री लहरों तथा भूगर्भीय औष्णिक ऊर्जा का समावेश है। महाराष्ट्र में अलग-अलग गैर पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के माध्यम से कुल 8,873.88 मेगावॉट क्षमता के तीन बिजली उत्पादन परियोजनाएं शुरु करने का लक्ष्य सामने रखा गया था, इनमें से 3,299.336 मेगावॉट क्षमता वाला प्रकल्प उभारा गया है। पवन ऊर्जा के माध्यम से बिजली निर्माण करने के लिए महाराष्ट्र में 40 स्थानों को उपयुक्त माना गया है। पवन ऊर्जा के क्षेत्र में कुल 2309769मेगावॉट क्षमता के प्रकल्प 21 स्थानों पर शुरू किए गए हैं। महाराष्ट्र सरकार की आकर्षक नीति के कारण निजी निवेशकों ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में लगभग 12,700 करोड़ रुपये लगाए हैं, जबकि 16000 करोड़ रुपये का और निवेश करने की तैयारी भी दर्शायी गई है। वर्तमान के बिजली संकट से निजात पाने तथा मांग के अनुरूप बिजली पूर्ति करने के लिए पवन ऊर्जा को भी बढ़ावा दिया जाने लगा है।

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