राज्य में खुले पवन ऊर्जा केंद्र के 40केंद्र

महाराष्ट्र में महा ऊर्जा के सहयोग से पवन ऊर्जा प्रौद्योगिकी केंद्र चेन्नई ( सी- वेट) के सहयोग से वायु परिमापन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। पवन ऊर्जा केंद्र की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम के तहत महाराष्ट्र के 158 स्थानों पर वायु परिमापन के व्यापक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस अभियान के तहत किए गए अध्ययन से यह खुलासा हुआ कि राज्य में 40 ऐसे स्थल हैं, जहां पवन ऊर्जा निर्माण केंद्र बड़ी सहजता से शुरू किए गए हैंं। इन 40 स्थानों में औसत ऊर्जा धनता 200 वैट की चौ. मी. से अधिक होने की जानकारी मिली थी। विगत वर्ष 31 मार्च से महाराष्ट्र में 181 स्थानों पर वायु की गति को मापना शुरू किया गया था। पवन ऊर्जा प्रकल्प का सफलतापूर्वक विकास हो, इसके लिए सबसे पहले वायु के बारे में अध्ययन करना जरूरी होता है, इसी बात को ध्यान में रखते हुए वायु परिमापन कार्यक्रम संचालित किया गया। इस कार्यक्रम को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए जमीन की उपलब्धता, सुयोग्य नियोजन, आर्थिक पक्ष, समय का संयोजन, उचित स्थान का चयन करना बहुत जरूरी है। इस कार्य में प्रशिक्षित लोगों की मदद लेना भी आवश्यक है। इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य राज्य में अधिक से अधिक पवन ऊर्जा केंद्रों बनाने को बढ़ावा देना, इसके साथ ही इस अभियान से यह भी पता लगाया जाएगा कि पवन ऊर्जा प्रकल्प को इस क्षेत्र में कितनी सफलता मिल पाएगी? कार्यक्रम के मूल उद्देश्य यही है कि अधिक से अधिक स्थानों पर पवन ऊर्जा की संभावनाओं की तलाश की जाए। राज्य में पवन ऊर्जा की क्षमता कितनी है, अगर यह जान लिया गया, तो इस क्षेत्र में आशातीत सफलता मिल सकती है।

शहरी, औद्योगिक कचरे से बिजली का निर्माण

दिनों- दिन बढ़ते शहरीकरण के कारण उद्योगों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। शहरी तथा औद्योगिक क्षेत्रों के कचरे से बिजली बनाने की संभावना पर यदि विचार किया जाए तो इनके माध्यम से बिजली का निर्माण करना मुश्किल नहीं है। शहरी तथा औद्योगिक क्षेत्रों में एकत्र कचरे को ठिकाने लगाने के लिए उचित तकनीक का उपयोग करके बिजली का निर्माण किया जा सकता है। कचरे तथा गंदे पानी को अगर उपयोग में लाया गया तो मांग के अनुरूप बिजली का निर्माण किया जा सकता है। कचरे से बिजली के निर्माण के लिए बॉयोमिसिलाइजेशन,कैम्बशन, खाद निर्माण तथा गैसिफिकेशन इस तकनीक को प्रयोग में लाया जाता है। वर्तमान में जो तकनीक उपलब्ध है, उसका उपयोग करके कचरे से बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर कचरे से लगभग 2700मेगावॉट बिजली का निर्माण किया जाना संभव प्रतीत होता है। ऊर्जा मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र में कचरे से 250 मेगावॉट तथा शहरी तथा औद्योगिक कचरे से 37 मेगावॉट बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। आर्थिक तथा तकनीकी पक्षों का आधार, सरकार की नीति के अनुरूप निजी निवेशकों ने ऐसे प्रकल्पों को शुरु करने की तैयारी दर्शाई, जिसके
परिणामस्वरूप महाराष्ट्र में औद्योगिक क्षेत्रों से निकले कचरे तथा गंदे

पानी पर आधारित मार्च, 2011 तक 10.85 मेगावॉट क्षमता के प्रकल्प कार्यान्वित हुए। पिंपरी-चिंचवड महानगरपालिका तथा नांदेड- वाघाला में भी कचरे से बिजली निर्माण का प्रस्ताव भी रखा जा चुका है। वर्ष 2011 के अंत तक महाराष्ट्र में कुल 339 स्थानों पर वायु परिमापन केंद्रों को उभारा गया था। इस कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संचालित किए जाने के कारण 31 मार्च, 2011तक राज्य में 230.76 मेगावॉट क्षमता के पवन ऊर्जा प्रकल्पों को स्थापित किया गया। 2010-11 इस वित्त वर्ष में महा ऊर्जा के माध्यम से 12 अन्य स्थानों पर पवन ऊर्जा प्रकल्प स्थापित किए गए।

पवन ऊर्जा प्रकल्प के लाभ

-प्रदूषण मुक्त ऊर्जा का निर्माण
– ईंधन की बचत
– कम समय में कार्यान्वित होती है
-पहाड़ी तथा अविकसित क्षेत्रों का विकास
– स्थानीय लोगों को रोजगार के सुअवसर
– उपयोग में लाए जाने वाले स्थान के पास भारनियमन में कमी
-स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा
– ऊर्जा का निर्माण पूर्णतः निजी निवेश के माध्यम से

प्रकल्प के प्रोत्साहन के लिए प्रयत्न

– 2000 मेगावाट क्षमता के पवन ऊर्जा प्रकल्प के लिए नीति की घोषणा
– वायु के अध्ययन के लिए 339 वायु परिमापन केंद्रों की स्थापना
– महाराष्ट्र विद्युत नियामक आयोग के आदेश के आधार पर विंड जोन निश्चित करने के लिए कार्रंवाई
– जमीन लेने में पारदर्शिता के साथ- साथ किसी को मध्यस्थ न बनाने
– प्रति मेगावॉट पर 15000 रुपए तक ग्राम पंचायत कर नीति अपनाने
– प्रकल्प विकासकों के समक्ष आने वाले परेशानी हल करने के लिए उचित समन्वय
– पवन ऊर्जा प्रकल्प के रास्ते की मरम्मत के लिए सचिव स्तर की समिति की स्थापना
– मूलभूत सुविधाओं पर सहमति बनने के बाद लाइसेंसधारी कंपनियों से बिजली खरीदी संबंधी करार करने का प्रस्ताव
—–

निर्माण केंद्रों की जानकारी

देश की कुल बिजली निर्माण प्रकल्पों में से पवन ऊर्जा निर्मित क्षेत्र का योगदान मार्च, 2011 तक 14,157 मेगावॉट था। पवन ऊर्जा से पूरे विश्व में बिजली का निर्माण किया जा रहा है। गत वर्ष मार्च माह तक विश्व में पवन ऊर्जा क्षमता 1,90,730 मेगावॉट थी। इस क्षेत्र में भारत का विश्व में पांचवां स्थान था। इस मामले में अमेरिका 40,216 मेगावॉट के साथ पहले, चीन 38,280 मेगावॉट के साथ दूसरे, जर्मनी 27,126 मेगावॉट के साथ तीसरे तथा स्पेन 20,674 मेगावॉट के साथ चौथे स्थान पर है।

भारत में पवन ऊर्जा उद्योग निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है। पवन ऊर्जा विकास कार्यक्रम देश के दुर्गम तथा पहाड़ी क्षेत्रों में ही चलाया जाता है। पवन ऊर्जा प्रकल्पों के कारण वहां के लोगों को रोजगार मिल रहा है, इस कारण उनके जीवन स्तर में सुधार आ रहा है।

लघु जल विद्युत निर्माण प्रकल्प

ग्रामीण क्षेत्रों में वार्षिक तथा अल्प जल भंडारण की स्थिति बनी रहने के कारण यह एक अति महत्वपूर्ण ऊर्जा क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है। इस ऊर्जा स्रोत के माध्यम से बिजली का निर्माण करने के लिए ऊंचाई पर संग्रहित किए गए जल को पाईप के माध्यम से बड़ी तेजी से पॉवर हाऊस के टरबाइन में छोड़ा जाता है। इस पानी के दबाव के कारण टरबाइन को घुमाकर उसके माध्यम से बिजली का निर्माण किया जाता है। महा ऊर्जा ने नंदूरबार जिले के दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों में विशेष कृति कार्यक्रमों के अंतर्गत मौजेअसली में लघु जल विद्युत प्रकल्प स्थापित किया गया है। राज्य के आदिवासी जिलों में निजी प्रकल्पों के अंतर्गत लघु जल-विद्युत प्रकल्पों को विकसित करने की दृष्टि से कालु, काकरपाती, गुहेरी, बुब्रा नदी, भोर गिरी, कोयले के लघु जल-विद्युत प्रकल्प की प्राथमिक रिपोर्ट तैयार की गई है।

कृषि अवशेषों से बिजली का निर्माण

कृषि अवशेषों को जलाकर उसकी मदद से उच्च दबाव की वाष्प तैयार की जाती है। यह वाष्प टरबाईन पर छोड़ी जाती है। वाष्प के ऊच्च दबाव के कारण बिजली का उत्पादन किया जाता है, इसमें प्रयोग में लाई जाने वाली वाष्प भी संभवतः विभिन्न प्रकार के ईंधनों पर काम करने वाली होती हैं, ऐसे प्रकल्पों से बनने वाली वाष्प पूर्णतः रूप से बिजली निर्माण कार्य में ही प्रयुक्त होती है। सामाजिक, आर्थिक तथा पर्यावरण के फायदे को ध्यान में रखते हुए कृषि अवशेषों पर आधारित बिजली निर्माण को अच्छा खासा महत्व मिला हुआ है। राज्य विद्युत नियामक आयोग ने कृषि अवशेषों पर स्वत्रंत रूप से बिजली बिक्री दर निधार्रित किया है। महाराष्ट्र में 155 मेगावॉट क्षमता वाले 15 प्रकल्प प्रकल्प मार्च, 2011 से अस्तित्व में आए थे, इसके अलावा कुछ अन्य प्रकल्प भी शीघ्र ही क्रियान्वित किए जाएंगे।

सहायक बिजली निर्माण प्रकल्प (बैगस को- जनरेशन)

देश के चीनी कारखानों से निकलने वाली गन्ने के चुकारे से बिजली का निर्माण किया जाता है। गन्ने के चुकारे से बिजली बनाने के लिए सबसे पहले चुकारे की आर्द्रता कम की जाती है, उसके बाद उसका ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस ईंधन को गर्म करने के बाद वाष्पीकरण की सहायता से उच्च दबाव की वाष्प पैदा की जाती है। इस वाष्प का विनियोग कुछ मात्रा में चीनी उत्पादन तथा कुछ मात्रा में बिजली उत्पादन में किया जाता है। इसी कारण ऐसे प्रकल्पों को सह बिजली निर्माण प्रकल्प नाम दिया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर चीनी कारखानों में सहायक बिजली निर्माण की क्षमता 5000 मेगावॉट है, जबकि महाराष्ट्र में यह 1250 मेगावॉट है। पारंपरिक पद्धति से चीनी कारखानों में 21-32 दाब वाले वॉयलर का प्रयोग किया जाता है। चीनी कारखानों का अध्ययन करने पर 66-87 दाब के बॉयलर का उपयोग किए जाने की जानकारी मिली। बताया गया कि इसके प्रयोग से ज्यादा लाभ मिला। महाराष्ट्र में गन्ने के चुकारे से सहायक बिजली निर्माण की मार्च 2011 के अंत तक 576.50 मेगावॉट क्षमता वाले नीति के अनुरुप उपलब्ध कराई। शुद्ध विकास प्रणाली औद्योगिकीकरण के कारण पृथ्वी के वातावरण में कॉर्बन डाईऑक्साइड के साथ- साथ मिथेन, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन, नाईट्रस ऑक्साइड, सल्फर हेक्जाफ्लोराइड जैसी गैसों का प्रमाण बढ़ रहा है। इस कारण आने वाले पांच दशकों में पृथ्वी का तापमान 2 से 10 अंश के बीच बढ़ने के प्रबल आसार हैं। ग्रीन हाऊस गैसेस के नाम से संबोधित की जाने वाली इस गैसों का प्रमाण कम किया जाए।

सौर विद्युत ऊर्जा उत्पादन
सौर फोटोवोल्टाईक आधारित

– क्रिस्टलाइन सिलिकॉन तकनीक
– थिन फिल्म तकनीक
सौर औष्णिक आधारित
– पैराबालिक ट्रफ तकनीक
– सौर टॉवर तकनीक
– पैराबॉलिक डिश तकनीक

सौर ऊर्जा प्रकल्प – तकनीक तथा उद्देश्य

देश में सौर ऊर्जा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, इसके लिए सौर ऊर्जा के माध्यम से भारी पैमाने पर बिजली का निर्माण करके पांरपरिक ईंधन में बचत तथा वैश्वविक तापमान बढ़ाने के लिए जिम्मेदार कार्बनडाईऑक्साइड का उर्त्सजन कम करने की कोशिश होनी चाहिए। इस बात को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन की जनवरी, 2010 में घोषणा की, इसके तहत 2020 तक 20,000 मेगावॉट शुद्ध विकास प्रणाली
औद्योगिकीकरण के कारण पृथ्वी के वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड के साथ-साथ मिथेन, हाईड्रोफ्लोरोकार्बन, नाईट्स ऑक्साईड्सस, सल्फर हेक्जाफ्लोराईड जैसी गैसों की मात्रा बढ़ रहा है। इस कारण आने वाले पांच दशकों मे पृथ्वी का तापमान 2 से 10 अंश के बीच बढ़ने के आसार हैं। विकसित देशों ने ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जित होने के प्रमाण 1990 की तुलना में कम से कम 5.2 प्रतिशत 2012 तक कम करने के लिए 1997 में संयुक्त राष्ट्र संघ के परिषद में क्वोटो करार किया गया। इस करार के आधार पर विकसित देशों ने ग्रीन हाऊस गैस का उत्सर्जन प्राप्त करने के लिए विकासशील देशों में पर्यावरण की दृष्टि से अच्छे प्रकल्पों से निर्मित होने वाले कार्बन श्रेयांक को खरीदना होगा। महा ऊर्जा के मौजे चालकेवाडी जिला सातारा में खुद का 3.75 मेगावॉट का पवन ऊर्जा पथदर्शी प्रकल्प का यू एन एफ सी सी सी के पास पंजीयन किया गया है। इस प्रकल्प को 2005- 2006 में 7417 तथा 2006- 2007 में 5657 कार्बन श्रेयांक प्राप्त हुआ। सार्वजनिक क्षेत्र में कार्बन श्रेयांक दिलवाने वाला यह देश का पहला प्रकल्प है।
————

आपकी प्रतिक्रिया...