खतरे में हैं हमारी भाषाएं।

अपनी पारिवारिक-सामाजिक-व्यावसायिक व्यस्तताओं के बीच से एक-दो पल का वक्त निकालिए और जरा थमकर अपने आस-पास के माहौल पर गौर फरमाइए, तो चकित होते हुए आप पाइएगा कि आपके आस-पास का सारा माहौल ही बदल गया है। नज़र घुमाते हुए आप सोचेंगे, तो पता चलेगा कि इस परिवर्तन की कोई एक सरसरी-सी हल्की खबर तो शायद आपको थी, लेकिन सब कुछ इस कदर बदल गया है, इसका सही एहसास आप को नहीं था। इस एहसास के बाद से अब तक आप सिर्फ चकित थे कि देखते ही देखते सब कुछ बदल गया और आपको खबर तक नहीं। अब आप आहत होंगे यह जानकर कि आपके एकदम आस-पास के सब कुछ के इस बदल जाने में आपकी कोई भूमिका नहीं। आप और भी ज्यादा आहत होंगे यह जानकर कि आप की क्या, इस परिवर्तन में आप के सरपंच की, आपके विधायक की, या आपके सांसद की भी कोई भूमिका नहीं। अब तक आप सिर्फ चकित और आहत ही थे, अब बारी आपके शर्मिदा होने की है, जब आप पायेंगे कि आपके मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री, यहां तक कि आपके राष्ट्रपति की भी इस बदलाव में कोई भूमिका नहीं।

सोचिये ज़रा उस परिवर्तन की ताकत को, जिसमें से होकर आपको और आपके देश को मजबूरन गुजरना पड़ रहा है और उस पर आपका और आपके देश का कोई वश नहीं।

दोस्तो, यह चमकता-दमकता परिवर्तन दरअसल परिवर्तन नहीं, एक गहरी साज़िश है। यह ठाठ-ठमक विकास या उन्नति नहीं, यह आपको, यानी मनुष्य को बाजार का माल बना देने का दुष्चक्र है। माना कि आप अमीर नहीं थे, गरीब ही थे, काम भर चलाने लायक सस्ती चीजें ही खरीदते थे आप बाजार से, लेकिन ग्राहक होने की गरिमा तो आपके पास थी, मोल-भाव करने का अधिकार तो आपके पास था, खरीदने न खरीदने का फैसला लेने का हक भी आपके पास था। लेकिन अब आप अपने अनजाने ही इस गरिमा और अधिकार से वंचित कर दिए गए हैं। अब आप ग्राहक तो नहीं ही रह गये, मनुष्य भी नहीं रह गये। सिर्फ उपभोक्ता रह गये हैं, ऐसा बेबस उपभोक्ता, जो अपनी जरूरत और पसंद की चीजें नहीं खरीद सकता, उसकी जरूरतों और पसंदों का ठेका भी अब उसी महाजन ने ले लिया है, जो अब तक सिर्फ एक सप्लायर था। उपभोक्ता के तौर पर अब आप मात्र एक माल बनकर रह गये हैं, एक चीज, आपको पता नहीं कि खरीददार के तौर पर आप बिक गये हैं।

आप चारों और देख रहे हैं और पा रहे हैं कि अलग-अलग दूकानें अब नहीं रहीं। अनाज मंडी अलग, कपड़ा बाजार अलग अब नही रहा। छोटे होटल, छोटे रेस्टॉरेंट अब नहीं रहे। आपका प्रिय वह सिनेमाघर जहां आपके माता-पिता ने सहगल, अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर को देखा था, जहां आपने शम्मी कपूर, धर्मेंद्र और राजेश खन्ना को देखा था, वह अमन टॉकीज अब नहीं रही। इन सब की जगह अब आपके समूचे व्यक्तित्व को बौना कर देने वाला विराट राक्षसी मॉल बन गया है, लकदक, परम आभिजात्य के गर्व से चूर, आपको डराता-सहमाता-संकोच में डालता मॉल। चंदू हलवाई, घसीटाराम पंजाबी जाने कहां बिला गये। जाने कहां गया नत्थू, उसकी जलेबी जाने कहां गयी! आपके सामने है मैकडोनाल्ड, डॉमिनोज, पिज्जाहट… मल्टीप्लेक्स… आपको इस सब का पता नहीं था।

अपनी एक छोटी सी यूनिट का मालिक आपका जो पड़ोसी मित्र छोटा ही सही, कारखानेदार, उद्योगपति, मैन्यूफैक्चरर बना हुआ था, आज वह किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का डीलर मात्र बनकर रह गया है। आपको तो इस बात का भी पता नहीं कि सिर्फ दूकानें, सिनेमाघर, होटल या छोटे उद्योग ही नहीं बदलें, आपका बेटा भी बदल गया है। राजस्थानी, सिंधी, पंजाबी, बंगाली, तेलुगु, तमिल जो भी आपकी और आपकी पत्नी की भाषा हो, आपका बेटा अपनी वह मातृभाषा नहीं बोलता, जानता तक नहीं। अक्षर भी नहीं पहचानता। शुरू-शुरू में जब मां को वह मम्मी और बापू को पापा या डैडी बोलता था, तब आपको अच्छा लगता था कि बेटा अंग्रेजी सीख रहा है! लेकिन मम्मी कब मॉम हो गई, डैडी कब डैड, आप को पता नहीं चला। आज हालत यह है कि वह अपनी मातृभाषा तो जानता ही नहीं, उल्टे मातृभाषा को वह छोटी नजर से देखकर सिर्फ उसकी उपेक्षा ही नहीं करता, अपमान भी करता है। बदले में जो अंग्रेजी वह बोलता है, वह गलत-सलत भ्रष्ट अंग्रेजी है। शेक्सपियर, शेली, वर्ड्सवर्थ की खूबसूरत शानदार अंग्रेजी उसे ठीक वैसी ही नहीं आती, जैसी उसे हिंदी, मराठी, सिंधी, बंगाली नहीं आती। वह अमेरिकन इंग्लिश बोलता है, जिस इंग्लिश से खुद इंग्लिश आज डरी हुई है, तमाम यूरोपीय भाषाएं डरी हुई हैं। फ्रेंच, जर्मन, डच भी डरी हुई हैं। उसी तरह से डरी हुई हैं, जिस तरह से कोई भी भारतीय भाषा-हिंदी से लेकर मिजो तक डरी हुई हैं। यह डर अकारण भी नहीं। पिछले दिनों यूनेस्को ने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की, जिसमें इस बात की आशंका जाहिर की गई कि अगले सिर्फ 50-60 वर्षो में ही दुनिया भर की कुल 7,000 भाषाओं में से 2,500 भाषाएं खत्म हो जाएंगी, जबकि 4,734 भाषाएं तीसरे दर्जे की हो जायेंगी। ‘इथोनोलॉग’ के मुताबिक वैश्वीकरण के दौर में अब तक 242 भाषाओं की मृत्यु हो चुकी हैं, वैसे भी विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और भू-प्राकृतिक कारणों से पिछले दो सौ वर्षो में दुनिया भर की 516 भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं।
विश्व के भाषाविद्, समाजशास्त्री और अर्थशास्त्री मानते हैं कि यदि युद्धस्तर पर शत-प्रतिशत सतर्कता नहीं बरती गयी, तो भारत की हिंदी, बंगाली और मराठी जैसी भाषाएं भी खत्म हो सकती हैं, क्योंकि भूमंडलीकरण के ठेकेदारों को भारत की इन तीनों बड़ी सशक्त और समृद्ध भाषाओं की आंतरिक शक्ति से डर लगता है। डरना वाजिब भी है, क्योंकि जिस तरह विक्टोरियन अंग्रेजी को अमेरिकन अंग्रेजी ने मात दे दी, उसी तरह अमेरिकन अंग्रेजी को भी भारत की हिंदी और चीन की मैंडरिन से कड़ी टक्कर मिल रही है। भारत में 450 ऐसी भाषाएं हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या 10,000 से भी कम है। विश्व में ऐसी 199 भाषाएं हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या 10 से भी कम है।

हमें भूमंडलीकरण के आकाओं की इस साजिश को समझना होगा। आखिर क्या कारण है कि विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा हिंदी को विश्वभर के 193 देशों के बहुमत का समर्थन हासिल होने के बावजूद आज तक संयुक्त राष्ट्रसंघ (यूएनओ) की आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल नहीं करवाया जा सका, जबकि पिछले 36 वर्षों में यह प्रस्ताव आठ बार पारित हो चुका है।

दोस्तो, हजारों भाषाओं वाले इस भूमंडल में भूमंडलीकरण की एक ही भाषा है, और वह भाषा है सिर्फ और सिर्फ अमेरिकन इंग्लिश। उसे दूसरी किसी भाषा की जरूरत नहीं। इसीलिए फिक्र भी नहीं। हां, फिक्र तो है- अपने अलावा दुनिया की अन्य तमाम भाषाओं को जड़ से मिटा देने की। इस फिक्र को भूमंडलीकरण ने साज़िश में बदला, और माफ कीजिये, साजिश उसकी कामयाब हो रही है।

अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का फलते-फूलते जाना, भाषाई माध्यम के स्कूलों का दिनोंदिन दरिद्र से दरिद्रतर होते जाना, सारे प्रशासकीय काम-काज सिर्फ अंग्रेजी में ही होना, शहरी युवाओं का अंग्रेजी बोलना, अंग्रेजी बोलने में गर्व अनुभव करना, गांवों में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की संख्या में लगातार वृद्धि, हैरी पॉटर की भारत में रिकॉर्ड बिक्री, ये सब अंकल सैम की साजिश की सफलता के जीते-जागते प्रमाण हैं। हमें एक भाषा के तौर पर अंग्रेजी से कोई शिकवा नहीं, अंग्रेजी अच्छी भाषा है, लेकिन आज वह भारत ही नहीं, विश्वभर की भाषाओं की हत्या का प्रमुख हथियार बनी हुई है। भूमंडलीकरण की एक और एकमात्र भाषा है अंग्रेजी।

दरअसल भूमंडलीकरण का सिद्धांत है ‘सिर्फ एक’, और यह ‘सिर्फ एक’ है ‘सिर्फ मैं’। दरअसल भूमंडीलकरण बाजारवाद का वह क्रूर सिद्धांत है, जिसमें कड़ाई से माना और अमल किया जाता है कि जिन चीजों में मुनाफा नहीं, उसकी जरूरत नहीं। यहां किसी भी चीज का महत्व उसकी ऐतिहासिकता, जातीयता, राष्ट्रीयता, सभ्यता या सांस्कृतिकता या कलात्मकता से नहीं आंका जाता, यहां हर चीज का महत्व बाजार में उसकी उपयोगिता और मुनाफेदार कीमत से आंका जाता है। भाषा को भी भूमंडलीकरण का ठेकेदार मनुष्य की आंतरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति, संप्रेषण, पारस्परिक संबंध, साहित्य, शिक्षा, ज्ञान और संस्कृति की वाहक और कारक के तौर पर नहीं देखता। भाषा को वह अपने खास दुश्मन के तौर पर देखता है, क्योंकि भाषा मनुष्य को उसके इतिहास से उसकी स्मृतियों के साथ जोड़े रखने के साथ ही उसे एक विशिष्ट जातीय, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक पहचान देती है। उसे अतीत से लेकर वर्तमान के बीच से होते हुए भविष्य तक की उस एक दीर्घ परंपरा से जोड़ती है, जो परंपरा आदमी में साहस और विश्वास का संचार करती है। अस्मिता का बोध देती है। स्वाभिमान की ताकत देती है।

लेकिन भूमंडलीकरण का ठेकेदार अपने तमाम ग्राहकों को उसी तरह एक समान देखना चाहता है, जिस तरह सिपाही या छात्र अपनी यूनिफॉर्म की वजह से एक समान दिखते हैं। बात वही है, हम जो सिखायेंगे, वही सीखो। हम जो पढ़ायेंगे, वही पढ़ो। आज़ाद सोच को यहां कोई मौका नहीं। स्वतंत्र विचार की यहां छूट नहीं। भूमंडलीकरण को दुनिया की अलग-अलग जातियों, पहनावों, खान-पान, तौर-तरीकों से सख्त चिढ़ है, उसे कोई विशिष्टता नहीं चाहिये, क्योंकि वह खुद विशिष्ट है। उसे धोती-कुर्ता, पाजामा, सदरी, पगड़ी-साड़ी-सलवार नहीं चाहिये। चाहिये तो सिर्फ पैंट-शर्ट, कोट, बूट। उसे बिरियानी, दही-भात, इडली-दोसा, परांठे-पुरी, छोले-भटूरे नहीं चाहिये, पिज्जा चाहिये, बर्गर चाहिये, क्योंकि उसके पास यही है और सारी दुनिया में उसे यही बेचना है।

इडली-दोसा, श्रीखंड, दही-भात की तरह उसे हिंदी-मलयालम वगैरह भी नहीं चाहिये, इसीलिए वह बड़े सुनियोजित तरीके से तीसरी दुनिया के देशों की सांस्कृतिक विविधता की हत्या कर रहा है। विश्वग्राम की यही हकीकत है। सारी दुनिया एक गांव और अंकल सैम उसके प्रधान। ढेरों प्रमाण आपके आस-पास बिखरे पड़े हैं। फिल्मों को ही लें। सर्वभारतीय हिंदी फिल्मों की बात तो छोड़ ही दें, प्रांतीय-क्षेत्रीय फिल्मों के गीतों की धुनों से भी भारतीयता गायब है। शास्त्रीयता छोड़ें। शास्त्रीयता के दिन गये। वैसे भी हम जैसे लोगों ने शास्त्रीयता की कभी वैसी फिक्र नहीं की। लेकिन लोक? लोक की हमने बहुत फिक्र कीं गीतों में आज वह लोक कहां? बल्कि बाउल, बिहू, बिरहा, तमाशा में रॉक और जॉज़ की हलकी छौंक से प्रारंभ करके आप सबको धीरे-धीरे तैयार करते हुए आपके मधुर और विशिष्ट भारतीय लोकसंगीत को अजीब ग्लोबल शोर-शराबे में बदल दिया गया। हाल की कुछ फिल्मों में कुछ गीत सूफी शैली के आये, लेकिन उनमें फ्यूज़न था। यानी छौंक। हमने फिल्मों में अपने पारंपारिक भजनों को पाव भारतीय पौन पाश्चात्य धुनों के अजीब मिश्रण में सुन-सुनकर अपने को ऐसे बिगाड़ लिया कि सूफियाना धुनों में जॉज़-रॉक के ‘सॉफ्ट’ फ्यूज़न को भी हम आसानी से स्वीकार कर ले रहे हैं। भाषा, कला, संगीत, पहनावा, खानपान आदि के साथ भूमंडलीकरण हमारे लोक में और धर्म में भी अपने नाखून गड़ा रहा है। धर्म, सभ्यता, संस्कृति, कला, संगीत सभी कुछ चूंकि भाषा के माध्यम से रूप पाते हैं, इसलिए यह तय है कि भूमंडलीकरण की इस आंधी की सबसे पहली और सबसे बड़ी शिकार हमारी भाषाएं हो रही हैं। दरअसल खतरे में हैं हमारी भाषाएं। हिंदी, बांग्ला, तमिल, तेलुगु जैसी बहुत बड़ी संख्या में बोली जाने वाली भाषाएं भी और कोंकणी, तुलु, मिजो जैसी छोटे क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाएं भी। हिंदी की तो उसने ऐसी दुर्गति की है कि पूछें मत। शेष भारतीय भाषाओं में उसने हिंदी के खिलाफ दुर्भावना भर दी। अन्य भारतीय भाषाओं पर हिंदी की धौंस जमायी और हिंदी पर अपनी धौंस जमाकर उसे बगल में दबा लिया। बड़ी ही क्रूर चलाकी से नारा लगवा दिया ‘हिंदी का साम्राज्यवाद।’ आज बांग्ला या तमिल से ज्यादा हिंदी से डरने लगी हैं क्षेत्रीय भाषाएं।

इस तरह भारतीय भाषाओं को गृह-कलह में फंसाकर, सबकी प्यारी और परम लोकतांत्रिक विनयी हिंदी पर साम्राज्यवादी शोषक होने का आरोप लगाकर भूमंडलीकरण का ठेकेदार अपनी दूकान की भाषा अमेरिकन इंग्लिश के खूनी पंजों में तमाम भारतीय भाषाओं को फंसा रही है। दूसरी तरफ उसके दलाल हमें बरगलाते हैं कि देखो, हमने तुम्हारी हिंदी को गले लगा लिया है। हिंदी को हम रोमन लिपि में लिख रहे हैं। हिंदी को हम ग्लोबल बना रहे हैं। तुरंत मैं नागरी लिपि के भविष्य के बारे में चिंतित हो जाता हूं। आखिर पहले उंगली, फिर पहुंचा पकड़ने की ही तो यह चालाकी है। भाषा को वह क्रूर बना दे रहे हैं। भाषा को जलनकुट्टी और छली बना दे रहे हैं। यह छल खुले आम हैं। हमारे प्रधानमंत्री और हमारे राष्ट्रपति की ठीक नाक के नीचे। ठंडा का मतलब आज छांछ या लस्सी नहीं, कोकाकोला है। हम मान ले रहे हैं।

यह छल हर स्तर पर है, वे आपके सामने आंकड़े दे देंगे कि देखिये, हिंदी किताबों की बिक्री बढ़ी है। विज्ञापन अब हिंदी में लिखे जाते हैं। ये सब वे बतायेंगे, लेकिन यह नहीं बतायेंगे कि अगर हिंदी पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है, तो हिंदी के प्रकाशन व्यवसाय में अब विदेशी बहुराष्ट्रीय प्रकाशक लोग आ रहे हैं, मुनाफा वे कमायेंगे। अखबार बढ़े हैं, बिक्री बढ़ी है, तो हिंदी अखबारों के प्रकाशन क्षेत्र में अब विदेशी बहुराष्ट्रीय मीडिया के धन्नासेठ पैसा लगा रहे हैं। आज सिर्फ पैसा लगा रहे हैं, कल मालिकाना भी खरीद लेंगे।

आज हिंदी की जो हालत इस भूमंडलीकरण ने की है, उसके कुछ दर्दनाक उदाहरण मैं यहां पेश कर रहा हूं। हिंदी का सबसे बड़ा दैनिक अखबार होने का दावा करनेवाले एक पुराने, प्रतिष्ठित, राष्ट्रीय अखबार की भाषा पिछले दो-तीन वर्षों से किस कदर घायल की जा रही है, जरा देखें :-

पहले पृष्ठ का तीसरा शीर्षक है- ‘गुलाबी ग्रोथ ने जगाई होप।’ एक शीर्षक है- ‘रिसेशन ने करवाएं ऐसे डिसीजन।’ अब इस हिंदी अखबार की खबरों की भाषा देखें- ‘सर्वे के अनुसार सर्विसेस और इंडस्ट्रियल सेक्टरों में ग्रोथरेट परसेंटेज दहाई के आंकड़े से ज्यादा है।’

– मॅन्यूफॅक्चरिंग और एफएमसीजी में काम कर रहीं कंपनियां कंज्यूमर्स के लिए…
– सेंट्रल स्कीमों को हटाने, अपनी पॉपुलर इमेज को बरकरार रखने के लिए…
– इलेक्शन रिजल्ट्स आने के बाद के फैक्ट्स…
– बहुत ही गोल्डन चान्स लेकर आया है…
– संतान के बिहेवियर और कैरियर के लिए…
– परमानेंट प्रॉपर्टीज के कागजों को अपटुडेट करें, इंप्रेस करें…

यह तो हुई भारत के राष्ट्रीय हिंदी अखबार की खबरों की भाषा। कुछ स्तंभ ऐसे होते हैं, जिनमें पाठकों को थोड़ी शुद्ध भाषा की आशा होती है, जैसे ‘राशि-भविष्य।’ इस अखबार के राशि-भविष्य स्तंभ की भाषा पर गौर फरमायें :
– लवर को इंप्रेस करने में सक्सेस मिलेगी।

– आपकी फोर्स जुट सकती है, ताकि परफेक्ट रिजल्ट आये।
– किसी डिस्टंट रिलेशन से तार जोड़ने के लिए परफेक्ट दिन है।
– यंगस्टर्स से आर्ग्युमेंट न करें।

भूमंडलीकरणवाले हिंदी को रोमन लिपि में लिख रहे हैं। हमारे कुछ हिंदी अखबार अंग्रेजी को नागरी लिपि में लिख रहे हैं। यानी लिपि और भाषा दोनों खतरे में। यह अखबार रविवार नहीं लिखता, संडे लिखता है। यह अखबार अपने देश का नाम कभी भूलकर भी भारत नहीं लिखता, हमेशा लिखता है- ‘इंडिया!’ वैसे ही तकनीकी-वैज्ञानिक विकास के स्वागत में, यह स्वागत होना ही चाहिये, हम ने अपनी भाषा, संस्कृति, कला के साथ बड़े-बड़े समझौते कर लिए है। एसएमएस की भाषा मोबाइल फोन और इंटरनेट तक सीमित रहती, तो ठीक था, यह शॉर्टकट भाषा व्यावहारिक बोलचाल में भी जगह बना रही है और लिखने-पढ़ने में भी। एसएमएस भाषा का आदी आपका जो बी. कॉम. या बी.एससी. या एमबीए बेटा अपनी मातृभाषा नहीं बोलता, नहीं जानता, बल्कि मातृभाषा, राष्ट्रभाषा से लगभग नफरत करता है, इन्हें पिछड़ी भाषाएं मानता है, जानता तक नहीं कि वह स्वयं कितना बड़ा पिछड़ा और अज्ञानी है। आपके उस बेटे से पूछिये राष्ट्रगीत के रचयिता कौन हैं, वह नहीं जानता, बहुत जानकार होगा तो जवाब देगा- ‘सम टैगोर…’, पूछिये ‘वंदेमातरम’ का रचनाकार कौन है, नहीं जानता। पूछिये, इंदिरा गांधी के पिता कौन थे, जवाब देगा, महात्मा गांधी। पूछिये राजेंद्रप्रसाद कौन थे, जवाब मिलेगा लालूप्रसाद के बाप। यह मेरी कल्पना नहीं, मुंबई में किये गये एक सर्वेक्षण के परिणाम हैं, ऐसे में भूमंडलीकरण का भारतीय भाषाओं पर जो प्रभाव पड़ रहा है, वह कितना खतरनाक है, यह समझा जा सकता है।

एक दूसरे संकट का आभास देकर अपना वक्तव्य समेटना चाहता हूं। भाषा पर वैसे भी मैं बहुत पहले ही से सोचता रहा हूं। 1990 में प्रकाशित मेरी पहली कविता-पुस्तक का नाम ही है- ‘भाषा नहीं है बैसाखी।’ उसकी पहली कविता के साथ अपना वक्तव्य समाप्त इसलिए करता हूं कि भूमंडलीकरण के भारतीय भाषाओं पर पड़ रहे दुष्प्रभावों से पार पाने के लिए हमें करना क्या है, इसका संकेत इस कविता में है। कविता का शीर्षक है- ‘पूर्वाभ्यास।’

भाषा के जबड़ों को वे बंदरों के खून सींच रहे हैं
यह पूर्वाभ्यास है-
वे चाहते हैं कि भाषा आदमी का खून पीने लगे।
बंदर बेचनेवाले दलालों की तिजोरियां भर चुकीं हैं
सिक्के खनखनानेवाली उनकी उंगलियां सोने से मढ़ चुकी हैं
अपनी बारी की प्रतीक्षा में हैं आदमी बेचने वाले-
भाषा की मंडी में!

हालांकि उनके पास
असंभव को संभव करनेवाले मंत्र हैं,
अतल और असीम तक फैले हुए तंत्र है
लानेवाले दलाल हैं
बिकनेवाले माल हैं
फिर भी
मुझे भाषा पर पूरा विश्वास है
क्योंकि उसका अपना एक ठोस चरित्रगत इतिहास है।

भाषा
बंदर के खून का गूंगापन जरूर जान पायेगी
और
आदमी के खून तक आने से पहले
आदमी के खून को खूब पहचान जायेगी!

सुनो, अपने आदमी होने की पहचान को बरकरार रखो
आदमी होने की हर शर्त को पूरी करो
वरना
बंदरों की तरह उनके हाथों में निचुड़कर
भाषा के जबड़ों में टपको, और मरो!

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