कोयले की दलाली में ‘हाथ’ काले

संसद का पिछला सत्र कोयले की तपन में ही स्वाहा हो गया। कोयले की दलाली में बड़े-बड़े नाम सामने आए हैं। सीबीआई ने अभी आधे ही आवंटनों की जांच की है, उनमें भी प्राथमिकी पांच-छह मामलों में ही दायर की है। यह जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी और कई नाम सामने आएंगे। लाभ पाने वाले सब से अधिक लोग कांग्रेस या यूपीए के हो यह स्वाभाविक है; क्योंकि सत्ता उनके हाथ में है। केंद्र सरकार को सिफारिशी चिट्ठी लिखने वाले प्रतिपक्ष के मुख्यमंत्री भी हैं। मतलब यह कि धुआँ दोनों ओर है- कहीं कम, कहीं ज्यादा। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंता की बात है।

एक और चिंता यह है कि हम किसी मुद्दे को अंत तक नही पहुंचाते। राजनीतिक स्वार्थ पूरा हुआ कि थम जाते हैं। नेहरू के जमाने का जीप घोटाला लोगों को शायद ही याद होगा। सेना की जीपें कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल की थीं, ये जीपें पुराने वाहन करार दी गईं। कांग्रेस ने कहा ये जीपें उसने सेना से खरीदी हैं। विपक्ष न के बराबर था। सब गोलमाल चल गया। राजीव गांधी के जमाने में बोफोर्स तोप घोटाला हुआ। बोफोर्स शब्द ही भ्रष्टाचार का पर्यायवाची बन गया था। पिछले 20 साल में मामला रफा-दफा हो गया। मुख्य आरोपी सोनिया गांधी का रिश्तेदार क्वात्रोची छूट गया। यह जमाना सोनिया गांधी का है; क्योंकि मनमोहन सिंह तो महज रबड़ की मुहर माने जाते हैं। राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के बाद स्पेक्ट्रम घोटाला और अब कोयला घोटाला। खेल घोटाले में कलमाड़ी जेल से बाहर आ गए हैं। स्पेक्ट्रम घोटाले में करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी जमानत पर रिहा है। जनता यह मान कर चलती है कि सब घोटालेबाज देर सबेर मुक्त हो ही जाएंगे।

कोयला खान घोटाले ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिए। कैग (महा लेखापरीक्षक) ने यह घोटाला कोई 1.86 लाख करोड़ का कूता है। इसकी पार्श्वभूमि देख लें तो मुद्दा समझ में आ जाएगा। 1973 में सरकार ने कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। 1976 में निजी इस्पात उत्पादकों को कोयला खदान पाने की छूट दे दी गई। 1973 से 2005 के दौरान 41 निजी कंपनियों व 29 सरकारी कंपनियों को कोयला लाइसेंस दे दिया गया। 2004 में सरकार ने तय किया कि और खदानें निजी व सरकारी उद्यमों को आबंटित की जाए। तर्क यह दिया गया कि सरकारी कंपनी कोल इंडिया लि. इतना कोयला नहीं निकाल पाएंगी। कोल इंडिया ने खदानें आबंटित करने का आग्रह किया, तब उसे मोजाम्बिक (दक्षिण आफ्रिका) जाने के लिए कह दिया गया। एक उपकंपनी भी बनाई गई; लेकिन बात कुछ बनी नहीं। 31 मार्च 2011 तक कुल 194 खदानों का आबंटन किया गया, जिसमें 44.44 अरब टन का विशाल कोयला भंडार था। इनमें से 75 खदानें निजी कंपनियों को प्रदान की गईं। कोल इंडिया का कोयला बाजार में ऊंचे भाव में बिकता है, जबकि निजी कंपनियों को खदानों से कोयला निकालने में बहुत कम लागत आती है। इन दोनों दामों में अंतर की गणना करें तो साफ है कि निजी कंपनियों को 1.86 लाख करोड़ का फायदा पहुंचाया गया है। यह बिना किसी भ्रष्टाचार के संभव नहीं है। इसीलिए लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कांग्रेस को ‘मोटा माल’ मिलने की बात की है। महाराष्ट्र की भाषा में कहें तो बड़ा ‘तोड़पानी’ हुआ है। कोयला खदानों के आबंटन के साथ कैग की और दो रिपोर्टें राष्ट्रपति के पास भेजी गई थीं। ये रिपोर्टें विशाल बिजली परियोजनाओं और दिल्ली के अतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बारे में थीं। कैग ने दोनों रिपोर्टों में निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार की छीछालेदार की है। महाबिजली परियोजनाओं के तहत म.प्र. के सासण, गुजरात के मूंदड़ा, आंध्र के कृष्णपट्टनम और झारखंड के तिलैया में ये परियोजनाएं लगनी थीं। सासण और मूंदड़ा के लिए आईसीआरए की निविदा तकनीकी रूप से सही पाई गई, लेकिन उसे अनदेखा कर अर्नस्ट एण्ड यंग को इस आधार पर ऊंचे दामों पर निविदा दे दी गई कि उसे बांग्लादेश में बिजली परियोजना लगाने का अनुभव है। तिलैया परियोजना का काम भी इसी कंपनी को सौंप दिया गया। इन परियोजनाओं के लिए कोयला खदानों के विशेष आबंटन से लेकर अन्य कई सुविधाएं दी गईं। इसी के तहत रिलायंस पावर को अतिरिक्त कोयला खदानों का आबंटन किया गया। म. प्र. के मुख्यमंत्री ने रिलायंस को अतिरिक्त खदान का आबंटन करने की सिफारिश की थी। कैग की गणना है कि इससे रिलायंस को अगले 20 वर्षों में करीब 29 हजार, 33 करोड़ रु. का फायदा पहुंचेगा।

तीसरी रिपोर्ट दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बारे में है। यह मंत्रालय राकांपा के प्रफुल्ल पटेल के पास था। जीएमआर को इसका ठेका दिया गया। निविदा होने के बाद सरकार ने जीएमआर ने हवाई अड्डा विकास शुल्क लगाने की छूट दे दी। दिल्ली एयरपोर्ट अथारिटी को 190 एकड़ जमीन वार्षिक केवल 100 रु. के शुल्क पर व्यापारिक उपयोग के लिए दे दी गई। कैग का कहना है कि इस जमीन की कीमत कोई 24 हजार करोड़ रु. है और उससे 1.6 लाख करोड़ रु. की आय हो सकती है। ये रिपोर्टें कैग ने राष्ट्रपति को पेश की थीं और आश्चर्य यह कि वे पहले ही लोगों तक लीक हो गईं। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने भी ये रिपोर्टें अपनी निवृत्ति के एक दिन पहले ही संसद को भेजीं।

यह जान लेना जरूरी है कि कैग एक संवैधानिक व्यवस्था है। कैग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को पेश करती है। राष्ट्रपति इसे संसद को भेजते हैं। संसद इसे अपनी लोकलेखा समिति को भेजती है। लोकलेखा समिति में सभी दलों के प्रतिनिधि होते हैं, जिस मंत्रालय से संबंधित रिपोर्ट हो उसके सचिव सरकारी पक्ष पेश करते हैं, जबकि कैग के अधिकारी अपना आकलन पेश करते हैं। कैग को केवल नैतिकता के आधार पर आग्रह करने का अधिकार है। अन्य किसी भी तरह से दंडित करने का उसे अधिकार नहीं है। इसलिए कैग एक दंतहीन शेर है। उसकी रिपोर्ट स्वीकार या अस्वीकार करना सरकार पर निर्भर है। लोकलेखा समिति में मुद्दों पर चर्चा होती है, लेकिन वह बंद कमरे में होती है। जनता तक वह चर्चा नहीं आती। यह चर्चा भी संसद की तरह जनता को खुली करने की मांग की जा रही है। लोकलेखा समिति संसद को सिफारिश करती है, लेकिन चूंकि सदन में सत्तारूढ़ दल का बहुमत होता है इसलिए सरकार जो चाहती है वही होता है। पुरानी कई रिपोर्टों के बारे में यही हुआ है। फिलहाल भाजपा के मुरली मनोहर जोशी लोकलेखा समिति के अध्यक्ष हैं।

अब इस मामले में जो राजनीतिक बवाल मचा है उसकी ओर चलते हैं। प्रतिपक्षी दल भाजपा ने इस मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जिम्मेदार ठहराया है, क्योंकि जब ये आबंटन हुए तब उनके पास ही कोयला मंत्रालय था। भाजपा प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग कर रही है और इसे लेकर उसने संसद का चलना मुश्किल कर दिया और होहल्ले में मात्र चार विधेयक ही पारित हो पाए। प्रश्न यह है कि प्रतिपक्ष जनता की आवाज उठाए तो कैसे उठाए? संसद के मंच पर आवाज उठाना क्या गलत है? प्रतिपक्ष के पास घोटाले पर जनता का ध्यान आकर्षित करने का और क्या तरीका है? जो लोग कहते हैं कि संसद चलनी चाहिए तो क्या इसका यह माने है कि सरकार की गड़बड़ियों के लिए उसे कोसना और जांच की मांग करना गलत है? भाजपा यह जानती है कि यदि सरकार का बहुमत है तो उसकी बात जाहिर है कि नहीं मानी जाएगी लेकिन जन-जागरण का उसने जो काम किया उसका कोई मूल्य है या नहीं? भ्रष्टाचार और काले धन की बात को लेकर पिछले दिनों जो आंदोलन हुए उसका हश्र क्या हुआ यह सब जानते हैं। इसलिए जिम्मेदार विपक्षी दल के रूप में मुद्दों को जनता के समक्ष लोकसभा के जरिए रखना उसका कर्तव्य हो जाता है। यह हो सकता है कि 2014 के चुनावों पर ध्यान रख कर उसने मुद्दों को जीवित रखा हो, परंतु इसमें गलत क्या है? यदि सरकार नहीं मानती और मनमानी व गड़बड़ियां जारी रखती हैं, तो उसे जनता की अदालत में ही तो जाना होगा। चुनावों को ध्यान में रख कर ही सभी दल अपनी रणनीतियां बनाते हैं तो इसमें गलत क्या हैं? भाजपा ने मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांगा है तो क्या इससे बहुमत दल के दूसरे प्रधानमंत्री के लिए कोई रोक है? यदि मनमोहन सिंह जाते हैं और दूसरे प्रधान मंत्री आते हैं तो इससे कांग्रेस के लिए भी स्वच्छ छवि का मार्ग प्रशस्त होगा। सीबीआई सरकारी नियंत्रण में होती है ऐसे में निष्पक्ष न्यायिक जांच की मांग करना कैसे गलत हो गया? कांग्रेस इससे क्यों कतराती है? इसका मतलब साफ है कि उनके काम में कहीं कालिख है।

कांग्रेस ने भी सीबीआई जांच शुरू करवा कर भाजपा की काट पेश की है। उसका दावा है कि कैग ने अपनी सीमा से बाहर जाकर अपने निष्कर्ष निकाले हैं। वित्त मंत्री चिदंबरम का कहना है कि जब खदानों से कोयला निकला ही नहीं तो सरकार को नुकसान होने का प्रश्न ही नहीं है। कोयले के अलावा अन्य रिपोर्टों के बारे में भी उसने कैग को खारिज किया है। विडंबना यह है कि एक ओर तो उसने कैग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया है और दूसरी ओर सीबीआई जांच करवाई है। इसी तरह हवाई अड्डे के बारे में भी है। उससे संबंधित रिपोर्ट उसने अस्वीकार कर दी, लेकिन प्रफुल्ल पटेल को मंत्रालय से हटा दिया। इससे मिलने वाले संकेतों को जान लेना चाहिए। कांग्रेस ने एक और शिगूफा छोड़ दिया है। ध्यान बंटाने के लिए उसने सरकारी नौकरियों में एससी/एसटी प्रमोशन का विधेयक पेश कर दिया है, वह जानती है कि सपा, भाजपा और बसपा इसमें उलझ जाएंगी और कोयले से ध्यान हट जाएगा। इन चालों को एनडीए और जनता नहीं समझती, यह मानना भूल होगी।

तीसरा पक्ष वामपंथियों का है। माकपा के सीताराम येचुरी का कहना है कि यह कांग्रेस और भाजपा दोनों का मिला-जुला धारावाहिक है। यदि लोकसभा में बहस होती तो दोनों पक्षों की छीछालेदार हो जाती। इसलिए दोनों ने यह खेल खेला है। वामपंथियों की मुसीबत यह है कि वे कहीं नही हैं। उनकी मजबूरी दोनों की आलोचना करना है। इसलिए इसे बहुत तवज्जो देने की जरूरत नहीं है।

आखिर इसका अंतिम नतीजा क्या होगा, यह प्रश्न कायम है। मध्यावधि चुनावों की तलवार बनी रहेगी। यह समय कांग्रेस के लिए अनुकूल नहीं है, इसलिए वह इस मसले को बहाने बनाकर खींचते रहेगी। भाजपा के लिए भी अगले साल के मध्य तक इस सवाल को जिंदा रखने की मजबूरी है। वामपंथियों के पास देखते रहने के अलावा कोई चारा नहीं है। एक बात अवश्य है कि भ्रष्टाचार का जो मुद्दा कल तक गैर राजनीतिक संगठनों के हाथ में था, वह अब राजनीतिक दलों के हाथ आ गया है और इसमें भाजपा को बड़ी भूमिका निभानी होगी।

नेताओं से जुड़ी कंपनियां

सीबीआई ने जिन कंपनियों पर छापे मारे हैं, वे नेताओं से जुड़ी हैं-

* जेएलडी यवतमाल एनर्जी : कांग्रेस सांसद विजय दर्डा के निकट सहयोगी जयसवाल द्वारा स्थापित कंपनी। इसमें निदेशक थे-विजय दर्डा, महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा और उनके पुत्र देवेंद्र दर्डा, मनोज जयसवाल, आनंद जयसवाल तथा अभिषेक जयसवाल। कंपनी को छत्तीसगढ़ के फतेहपुर में खदान मिली।

* जेएएस इंफ्रास्ट्रक्चर कैपिटल : विजय दर्डा के सहयोगी जयसवाल समूह द्वारा स्थापित। निदेशक थे मनोज जयसवाल, अभिषेक जयसवाल तथा आनंद जयसवाल। कंपनी को झारखंड के मथियागढ़ी में खदान मिली है।

* अमर आयर्न एण्ड स्टील : विजय दर्डा के सहयोगी जयसवाल समूह द्वारा स्थापित। निदेशक थे अरविंद जयसवाल, मनोज जयसवाल, रमेश जयसवाल तथा देवेंद्र दर्डा। कंपनी को महाराष्ट्र के गोट बंदर में खदान मिली है।

इससे स्पष्ट है कि सीबीआई ने जिन पांच कंपनियों पर छापे डाले उनमें से तीन कंपनियों का संबंध दर्डा परिवार से था, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि जयसवाल समूह से काफी पहले उन्होंने नाता तोड़ दिया था।

विनि आयर्न एंड स्टील : झारखंड के मधु कोडा के निकट सहयोगी विजय जोशी द्वारवा खरीदी गई कंपनी। सीबीआई ने वैभव तुलसियान को आरोपी बनाया है। निदेशक हैं संजीव तुलसियान, प्रशांत तुलसियान, निशा तुलसियान, विमल तुलसियान, निर्मला तुलसियान, हेमंत कुमार अग्रवाल तथा नवीन तुलसियान। कंपनी को झारखंड के राजहरा में खदान मिली है।

नवभारत पावर : सन 2010 में रुइया के एस्सार समूह को बेची गई। प्रसाद भाइयों ने इसकी स्थापना की थी। उसे उड़ीसा में खदानें मिली हैं। निदेशक हैं पी. त्रिविक्रम प्रसाद तथा वी एच सी प्रसाद।

* कांग्रेस सांसद नवीन जिंदाल की कंपनी जिंदाल पावर लि. ने सस्ता कोयला पाकर बिजली 6 रु. प्रति यूनिट के महंगे दर से बेची। कंपनी के पास 246 लाख टन के कोयले भंडार की खदानें हैं। हालांकि कंपनी ने इससे इंकार किया है।

* यूपीए-1 में सूचना और प्रसारण मंत्री रहे द्रमुक के एस. जगतरक्षकन ने अपने परिवार की कंपनी को खदानें आबंटित करवाईं। उनकी जे आर पावर जेन प्रा. लि. ने अपनी स्थापना के पांच दिन के भीतर ही पांडिचेरी के सरकार निगम से समझौता-पत्र किया। केंद्र ने निगम को कोयला खदान आबंटित की, जो समझौते के अंतर्गत कंपनी के हाथ में आ गई।

* पिटारे में और बहुत कुछ है। संभव आने वाले दिनों में कुछ सामने आए, कुछ दबा दिया जाए।

आपकी प्रतिक्रिया...