संघ स्थापना दिवस: राष्ट्र जागरण के अग्रिम मोर्चे पर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ

वर्तमान राजनीतिक परिवर्तन के फलस्वरूप हमारा भारत नए भारत के गौरवशाली स्वरूप की ओर बढ़ रहा है। गत 1200 वर्षों की परतंत्रता के काल खंड में भारत और भारतीयता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले करोड़ों भारतीयों का जीवनोद्देश्य साकार रूप में ले रहा है। भारत आज पुनः भारतवर्ष अखंड भारत बनाने के मार्ग पर तेज गति से आगे बढ़ रहा है। भारत की सर्वांग स्वतंत्रता, सर्वांग सुरक्षा और सर्वांग विकास के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। वास्तव में यही कार्य संघ सन 1925 से बिना रुके और बिना झुके कर रहा है।

विजयादशमी संघ का स्थापना दिवस है। अपने स्थापना काल से लेकर आज तक 94 वर्षों के निरंतर और अथक प्रयत्नों के फलस्वरूप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय जागरण का एक मौन परंतु सशक्त आंदोलन बन चुका है। प्रखर राष्ट्रवाद की भावना से ओत प्रोत डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा 1925 में विजयादशमी के दिन स्थापित संघ के स्वयंसेवक आज भारत के कोने कोने में देश प्रेम, समाज-सेवा, हिंदू जागरण और राष्ट्रीय चेतना की अलख जगा रहे हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले विशाल हिंदू समाज, प्रत्येक पंथ जाति और वर्ग के अनुयायियों को एक विजयशालिनी शक्ति के रूप में खड़ा करने में संघ ने सफलता प्राप्त की है।

इस शक्तिशाली हिंदू संगठन की नींव रखने से पहले इसके संस्थापक डॉ हेडगेवार ने भारत के प्राचीन गौरवशाली इतिहास, संस्कृति, महान ग्रंथों देश के परम वैभव और पतन के कारणों और तत्कालीन दयनीय स्थिति का गहरा अध्ययन किया था। इसी अध्ययन, मनन और अनुभव का संगम है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ कार्य में व्यक्ति पूजा अथवा गुरुढम का कोई स्थान नहीं है। संघ ने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के प्रतीक भगवा ध्वज को अपना गुरु और प्रेरणा स्रोत स्वीकार किया है। समाज के जागरण के माध्यम से अपनी राष्ट्र को परम वैभव थाली बनाना संघ का उद्देश्य है।


 


भारतीय पराक्रम ने ली अंगड़ाई
संघ की स्थापना से पहले भी राष्ट्र-जागरण के अनेकों प्रयास हुए हैं। आचार्य चाणक्य के अथक प्रयासों के फलस्वरूप विदेशी एवं विधर्मी शक्तियां परास्त हुई और सम्राट चंद्रगुप्त के काल में अखंड भारत अपने वास्तविक स्वरुप में प्रकट हुआ। दक्षिण में स्वामी विद्यारण्य द्वारा किए गए राष्ट्र-जागरण के महान कार्य के परिणाम स्वरूप विजयनगर का एक वैभवशाली हिंदू साम्राज्य अस्तित्व में आया था।


राजस्थान के महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप ने मुगलों के नापाक इरादों को कभी भी पूरा होने नहीं दिया और राष्ट्रीय स्वाभिमान की लौ जलाए रखें। इसी तरह समर्थ गुरु रामदास जैसे संतों के प्रयत्नों से छत्रपति शिवाजी का उदय हुआ और हिंदवी स्वराज्य से राष्ट्रीय जागरण के संघर्ष की शुरुआत हो सकी। श्री गुरु गोविंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना और योद्धा सिखों द्वारा बलिदानों की अटूट श्रृंखला खड़ी कर, विदेशी हमलावरों के हाथों हिंदू धर्म और राष्ट्र की अस्मिता को बचाने के अनेक श्रेष्ठ कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हुए। राष्ट्रीय संघ सेवक संघ ने राष्ट्र जागरण के इसी संघर्ष और गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया है।

ऊपर दिए गए संदर्भ में एक अति महत्वपूर्ण बिंदु पर विचार करना चाहिए। पूर्व में राष्ट्र जागरण के सभी प्रयासों में एक सूत्रबद्धता का अभाव सदैव बना रहा, परतंत्रता के कारणों की गहराई में जाएं बिना परतंत्रता को मिटाने के प्रयास होते रहे। विदेशी आक्रांता क्यों सफल हुए? राष्ट्र क्यों खंडित होता चला गया? देश क्यों बांटा गया? बुद्धि, बल, ज्ञान और विज्ञान सब कुछ होते हुए भी जगतगुरु भारत परतंत्रता की जंजीरों में क्यों जकड़ा गया। संघ ने इन सभी प्रश्नों के उत्तर समस्त भारतीयों के समक्ष रखे हैं।


भारत की पहचान है हिदुत्व
संघ ने ऐतिहासिक सच्चाई को संसार के सामने दृढ़ता पूर्वक रखा है कि भारत सनातन काल से चला आ रहा विश्व का एकमात्र हिंदू राष्ट्र है। हिंदुत्व भारत की राष्ट्रीयता है, भारत का वैभव और पतन हिंदुओं के वैभव और पतन के साथ जुड़ा हुआ है। जब हिंदू समाज संगठित और शक्तिशाली था तो शक और हूण जैसे हमलावरों को भी परास्त करके उन्हें भारतीय जीवन प्रणाली में समरस कर लिया गया। परंतु जब हिंदुओं में आपसी फूट घर कर गई तब संगठन की प्रतिकार की भावना लुप्त हुई और सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की लौ क्षीण हुई तो भारत तुर्कों, अफ़गानों, पठानों और मुगलों जैसी बर्बर जातियों के हाथों पराजित होता चला गया।

इसी एकमेव कारण से अंग्रेज भी भारत को अपने ईसाई शिकंजी मे जकड़ने में सफल हो गये हालांकि परतंत्रता के इस लंबे कालखंड में हमारे हिंदू समाज ने कभी भी परतंत्रता को स्वीकार नहीं किया। किसी ना किसी रूप में हिंदू समाज संघर्ष करता रहा परंतु राष्ट्रीय स्तर पर संगठित प्रतिकार का अभाव बना रहा। अंग्रेजों के कालखंड में यद्यपि महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में भारतीय समाज ने राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए। किंतु राष्ट्रीयता के वास्तविक स्वरूप हिंदुत्व का आधार ना होने से इस स्वतंत्रता संग्राम की परिणीति भारत के विभाजन के रूप में हुई।

अतः यह स्वीकार करने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिंदुत्व को अपने राष्ट्र जागरण के कार्य का आधार बनाकर समस्त भारतीय समाज को राष्ट्रीय दिशा प्रदान की है। वर्तमान में नए भारत की ओर बढ़ रहे कदमों का धरातल भी यही है।


पहले राष्ट्र बाद में संगठन।
राष्ट्र के जागरण में वही संस्था अथवा नेतृत्व सफल हो सकता है जिसके पास कार्यकर्ताओं के निर्माण की अस्थाई व्यवस्था हो। संघ के पूर्व के काल में राष्ट्रीय जागरण के प्रायः सभी प्रयासों में निरंतर चलने वाली कार्य पद्धति का अभाव बना रहा। संघ की कार्य पद्धति (नित्य शाखा) में यह विशेषता है कि इसमें शिशु, बाल, तरुण और वृद्ध स्वयंसेवक बनते रहते हैं यही वजह है कि संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार के शरीर छोड़ने के बाद भी संगठन निरंतर आगे बढ़ता चला गया। संघ की कार्यप्रणाली व्यक्ति, परिवार, आश्रम एवं जाति केंद्रित न होकर राष्ट्र केंद्रित है।

संघ का कार्य सीधे राष्ट्रीय जागरण से जुड़ा हुआ है इसलिए संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया और अपने संगठन के नाम को आगे ना रखते हुए स्वयंसेवकों ने प्रत्येक सत्याग्रह, आंदोलन और संघर्ष में भाग लिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी संघ ने अपने विस्तृत एवं विशाल संगठन की आदर्श परंपराओं का पालन करते हुए गोवा स्वतंत्रता आंदोलन, गौ रक्षा आंदोलन एवं श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन को बल प्रदान किया। यह सभी कार्य राष्ट्रीय जागरण के कारण ही सफल हो सके। विदेशी आक्रमण के समय समाज का मनोबल बनाए रखने, सैनिकों को प्रत्येक प्रकार की सहायता देने और सरकार को पीठ थपथपा ने में भी स्वयं सेवकों ने अग्रणी भूमिका निभाई है।


संघ का चतुष्कोण स्वरूप
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा किए जा रहे राष्ट्रीय जागरण के राष्ट्रव्यापी स्वरूप को समझने के लिए इसके चतुष्कोण स्वरूप को गहराई से समझना भी आवश्यक है। संघ कार्य का प्रथम स्वरूप है प्रत्यक्ष शाखा का कार्य, शाखा एक ऐसा शक्तिपुंज है जहां से राष्ट्रप्रेम की विद्युत तरंग उठकर समाज के प्रत्येक क्षेत्र को जगमगाती हैं। संघ शाखाओं व संघ के विभिन्न कार्यक्रमों में गाए जाने वाले एकात्मकता स्रोत, एकता मत्र और गीतों में भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द और राष्ट्र के आध्यात्मिक परंपराओं के दर्शन होते हैं। राष्ट्रीय महापुरुषों का स्मरण करते हुए संघ के स्वयंसेवक भारत माता की वंदना करते हैं। शाखा में शरीर कार्यक्रमों की रचना इस तरह की जाती है जिससे शारीरिक बल के साथ अपने समाज और देश के लिए जूझने की मानसिकता भी तैयार होती है।

संघ द्वारा विकसित इस शाखा पद्धती ने राष्ट्र जागरण के कार्य के साथ न केवल विशाल हिंदू समाज को संगठित किया है बल्कि उनके ऊपर होने वाले विधर्मी आघातों का सामना करने के लिए उसे शक्ति संपन्न भी बनाया है। संघ कार्य का दूसरा स्वरूप है संघ द्वारा संचालित अथवा मार्गदर्शी क्षेत्र किसान मजदूर, वनवासी, गिरीवासी, विद्यार्थी, शिक्षा, चिकित्सा और कला इत्यादि क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवक उन्हें छोटे-बड़े अनेक संगठन तैयार किए हैं। यह सभी संगठन अपने अपने क्षेत्र की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार राष्ट्र जागरण का कार्य कर रहे हैं।

संघ का कार्य का तीसरा स्वरूप है स्वयंसेवकों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर किए जा रहे राष्ट्रीय जागरण के कार्य, इस श्रेणी में विद्यालय, समाचार पत्र, औषधालय, मंदिरों की व्यवस्था और विविध प्रकार के सांस्कृतिक व सेवा के प्रकल्प आते हैं। स्वयंसेवकों द्वारा किए जा रहे इन सभी कार्यों के पीछे राष्ट्रीय एकता, सेवा एवं हिंदुत्व की प्रेरणा है।

संघ कार्य अर्थात राष्ट्रीय जागरण का चौथा स्वरूप बहुत ही विशाल एवं महत्वपूर्ण है। इसमें वे सभी अभियान, आंदोलन, सम्मेलन, अध्यात्मिक संस्थान और धार्मिक संगठन आते हैं। जो संघ के ही कार्य हिंदू संगठन और संघ की ही उद्देश्य परम वैभवशाली राष्ट्र के लिए सक्रिय हैं। संघ का इन सभी संगठनों को पूरा सहयोग रहता है। संघ के स्वयंसेवक अपने और संगठन के नाम से ऊपर उठकर एक देशभक्त नागरिक के नाते ना सिर्फ इन संगठनों में एक सक्रिय भूमिका निभाते हैं अपितु संगठन तंत्र के सूत्रो को भी सम्मलित और संचालित करते हैं।


तपस्या का परिणाम
संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी 94 वर्षों की सतत तपस्या के बल पर भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अर्थात हिंदुत्व के जागरण का एक ऐसा शशक आधार तैयार कर दिया है जिसमें से राष्ट्र जागरण के अनेक अंकुर प्रस्फुटित होते जा रहे हैं। संघ ने संपूर्ण भारतीय समाज को एक नई दिशा प्रदान की है जिसने राष्ट्रीय जीवन की इस दशा को बदल डाला है जिसके कारण भारत निरंतर 1200 वर्षों तक विदेशियों के हाथों पराजित होता रहा। सर्वांग अजय शक्ति को प्राप्त कर रहा है भारत वास्तव में अजय भारत बन रहा है।

संघ ने राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्याप्त दुविधा और हीन भावना की स्थिति को बदलकर एक शक्तिशाली समाज के गठन का मौन आंदोलन छेड़ा हुआ है। राष्ट्रीय शक्तियों को बल मिल रहा है जबकि अंतर्राष्ट्रीय तत्व अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं। आज भारत वासियों का विश्वास बना है कि अपने राष्ट्र की सर्वांग स्वतंत्रता, सर्वांग सुरक्षा और सर्वांग विकास के कार्य में जुड़े हुए संघ के स्वयंसेवक बहुत शीघ्र अपने लक्ष्य को प्राप्त करेंगे और भारत माता फिर से विश्व गुरु के सिंहासन पर शोभायमान होंगे।

This Post Has One Comment

  1. Anonymous

    पठनीय एवं संग्रहणीय

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