हमारा पुरुषार्थ जागेगा

हमारे प्राचीन समाज की एकता का आधार पहचानकर, हमारा ‘स्व’ पहचानकर उसके प्रकाश में हमारी नीतियों का विचार किया, तो हम हमारे इस संभ्रम के, आत्मविस्मृति के घेरे से बाहर निकल सकेंगे। हमारा ‘स्व’ यदि जग गया और हम स्वाभिमान से भर गए तो हमारा पुरुषार्थ जागेगा और उसके बल पर हम फिर एक बार हमारा पुरुषार्थ और पराक्रम से युक्त, संपन्न, समाधानी और आनंदपूर्ण समाज जीवन निर्माण कर सकेंगे।

अंग्रेजो की गुलामी से स्वतंत्र होने के लिए भारत में 1857 से सतत चल रहे सभी प्रकार के प्रयासों के परिणामस्वरुप 15 अगस्त,1947  को भारत स्वतंत्र हुआ यह सर्वविदित है परन्तु गहराई से सोचेंगे तो ध्यान आता है कि 15 अगस्त, 1947 के दिन हमें स्वराज्य तो प्राप्त हुआ, पर सही मायने में हम स्वतंत्र नहीं हुए। एक गीत में कवि कहते हैं-

उगा सूर्य कैसा कहो मुक्ति का यह, उजाला करोड़ों घरों में न पहुँचा।

खुला पिंजरा है मगर रक्त अब भी, थके पंछियों के परों में न पहुँचा॥

‘स्व’राज्य में भी तंत्र तो पुराना ही चल रहा था इसलिए हमें सही मायने में ‘स्व’तंत्र होना है, तो सबसे पहले इस ‘स्व’ को जानना, समझना और राष्ट्र जीवन में प्रस्थापित कर प्रतिष्ठित करना होगा। इस की शुरुआत शिक्षा से करनी होगी। आधुनिक भारत की नींव जिस शिक्षा पर आधारित है, उस शिक्षा के आशय (content) और उद्देश्य में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। हमारी आज की शिक्षा केवल पेट भरने के लिए, आजीविका हेतु अर्थार्जन से जुड़ी है। उदरनिर्वाह के लिए अर्थार्जन आवश्यक है ही और अधिक आरामदायी जीवन जीने के लिए अधिक अर्थार्जन की इच्छा रखना, उसके लिए प्रयास करना भी ठीक है; लेकिन अर्थार्जन जीवन का साधन है, वह अच्छा हो यह ठीक है, किंतु जीवन का साध्य क्या है? उसका पता ही नहीं। एक स्थान से दूसरी ओर जाने के लिए साधन के रूप में वाहन आवश्यक है, वह अधिकाधिक आरामदायी होने की इच्छा होने में भी कुछ अनुचित नहीं लेकिन वह वाहन लेकर जाना कहां है?, यही पता न हो तो उस वाहन का क्या उपयोग? लेकिन आज तो जीवन का साधन ही साध्य बनता जा रहा है और सर्वत्र केवल साध्यहीन भागदौड़ चल रही है। अधिक शिक्षा, उच्च शिक्षा का संबंध केवल कमाई (अर्थार्जन) से जुड़ने के कारण सब गुड़बुड़ हुई है। अधिक शिक्षित व्यक्ति अधिक भौतिकवादी, उपभोगवादी और आत्मकेन्द्रित, स्वार्थी बन रहा है। शिक्षा के बारे में विचार करने के लिए स्वतंत्र भारत में जितने आयोग नियुक्त किए गए, उन सब ने नैतिक शिक्षा के अभाव की ओर अंगुलीनिर्देश कर इस दृष्टि से कुछ उपाय सुझाए है। शिक्षा संबंधित कोठारी आयोग ने भी सुझाया है कि, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए विद्यार्थियों को धर्म की शिक्षा दी जानी चाहिए। धार्मिक शिक्षा का अर्थ ही नैतिक शिक्षा है किंतु सेक्युलॅरिज्म के नाम पर धार्मिक और नैतिक बातों का त्याग कर देने के कारण हम ‘जैसे थे’ की स्थिति में ही है। स्वतंत्र भारत की शिक्षा व्यवस्था का विचार करते समय हमारा देश, उसकी प्राचीन विरासत, जीवन-दृष्टि, उसके अनुसार संस्कारों की योजना का विचार न करने के कारण उधेड़-बुन की जटिल स्थिति निर्माण हुई है। आधुनिकता के नाम पर पश्चिमीकरण का चल रहा प्रयास, उनसे उधार लिये जीवन के तत्त्वज्ञान का पुरस्कार करने के कारण नैतिकता का उच्चाटन होकर भौतिकवाद, आत्मकेन्द्रित वृत्ति और समाज की समस्याओं के बारे में अनास्था इस क्षेत्र की पवित्रता को खराब कर रही है। शिक्षा का मूल उद्देश्य ही हम गवां बैठे है। अब नई शिक्षा नीति से कुछ नई आशा जागृत हुई है।

भारत की 70% से अधिक जनता गांव में बसती है। भारत की विकास यात्रा कृषि आधारित और ग्राम केंद्रित, विकेंद्रित होने के स्थान पर शहर केंद्रित होने से, गांव का युवा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की खोज में शहर में आने लगा। गांव ख़ाली होते गए और शहरों में जनसंख्या  बेतहाशा बढ़ती चली गई। शहरों का विकास मतलब भारत का विकास, ऐसा समीकरण बनने के कारण शहर केन्द्रित विकास का प्रारूप और जहां सच्चा भारत बसा है वे देहात उपेक्षित, ऐसा आज का चित्र है। वास्तव में जहां सच्ची संपत्ति मतलब अन्न निर्माण किया जाता है, वे देहात उजड़ रहें हैं और कागजी संपत्ति निर्माण करने वालों का महत्त्व बढ़ रहा है। मराठी कवि मंगेश पाडगावकर कहते हैं –

‘पिकवी कुणी न काही विकतात मात्र सारे,

 वाहून भार ह्यांचा शरमून जाय माती’

(कोई उगाता नहीं है, पर बेचने तो सब बैठे हैं। ऐसे लोगों का भार ढोकर यह धरती शर्मसार हो रही है)

देहात में रहने में प्रतिष्ठा, संपन्नता, शिक्षा, आरोग्य, व्यापार, शुद्ध पानी और सुचारू यातायात होगी, ऐसा चित्र सामने रखकर भारत के विकास की योजना तैयार हुई होती, तो भारत, भारत बना रहता। छ: लाख देहातों में बसा भारत, भारत का बलस्थान था। देहात स्वयंपूर्ण थे, इसलिए अनेक विदेशी शासक आने के बाद भी भारत फिर उठ खड़ा हुआ, राष्ट्रीय अस्मिता कायम रही। अब भारत में इंडिया बढ़ रहा है, पनप रहा है, भारत उजड़ रहा है, गरीब हो रहा है। यह अभारतीय विकास की जो उल्टी गंगा बह रही है, उसकी दिशा बदलने की आवश्यकता है।

दिशा बदलनी है तो पहले दृष्टी बदलनी होगी। जिस की शुरुआत होगी श्रम प्रतिष्ठा और धन प्रतिष्ठा का भारतीय मूल्यों के आधार पर विचार करने से। अभी श्रम प्रतिष्ठा के स्थान पर धन प्रतिष्ठा का बढ़ना यह मूल्य स्थापित होता दिखता है। धन किसी भी प्रकार से कमाया जाए धनवान को ही प्रतिष्ठा मिलने लगी। भारत की सामाजिक व्यवस्था पहले ऐसी नहीं थी। समाज जीवन में श्रेष्ठता की हमारी कल्पनाएं भी बदल गई है। चरित्र और प्रतिष्ठा का संबंध नहीं रहा, धनवान होना मतलब प्रतिष्ठित और चरित्रवान ऐसी कल्पना बनी रही। धनवानों ने धन किसी भी मार्ग से जमा किया हो, फिर भी वे प्रतिष्ठित माने जाने लगे। जीवनमूल्यों का निकष ही कमजोर हो गया। विख्यात विचारक डॉ. एस. के. चक्रवर्ती के मतानुसार किसी का जीवनस्तर (Standard of living) ऊँचा है, ऐसा जब हम कहते हैं, तब सामान्यत: वह कितना महंगा जीवन जीता है, ऐसा ही अर्थ अभिप्रेत होता है। वास्तव में ऐसे लोगों का प्रति व्यक्ति नैसर्गिक स्रोतों का प्रयोग बहुत अधिक होता है। इसलिए ऐसे लोगों के लिए उनका जीवन स्तर (standard of living) ऊँचा है, ऐसे कहने के स्थान पर उनके नैसर्गिक स्रोतों के व्यय का स्तर (standard of consumption) ऊँचा है, ऐसा कहना चाहिए और व्यक्ति के जीवन का दर्जा (स्तर) उसका जीवन कैसे मूल्याधिष्ठित है (based on values) इस पर निश्चित होना चाहिए।

अमृतलाल वेगड नामक नर्मदा परिक्रमा के साधक, उत्तम चित्रकार और लेखक है। वे बहुत छोटे थे तब चित्रकला सीखने के लिए शांतिनिकेतन में विख्यात चित्रकार श्री नंदलाल बोस के पास गये। अनेक वर्ष अध्ययन करने के बाद अध्ययन पूर्ण कर, वापस लौटते समय उन्होंने गुरू नंदलाल बोस के आशीर्वाद लेने के लिए उनके पाँव छूए तब नंदलाल बोस ने अपने शिष्य को क्या आशीर्वाद दिया होगा? उन्होंने कहा, “बेटा, तेरा जीवन सफल न हो.” उन्होंने आगे कहा, “दुनिया में सफल होने वाले बहुत है, उनकी कमी नहीं, रोज उनके नाम समाचार पत्रों में छपते रहते हैं, तू अपना जीवन सार्थक कर।” जीवन सार्थक करने का मर्म बताते हुए अमृतलाल वेगड कहते है कि, मैं समाज से जितना लेता हूं  उससे अधिक समाज को वापिस लौटाने का, देने का प्रयास करना यही जीवन सार्थक करने का मर्म है। विवेकानंद केन्द्र की प्रार्थना में एक श्लोक है –

जीवने यावदादानम् स्यात् प्रदानम् ततो्ऽधिकम।

इत्येषा प्रार्थनाऽस्माकम् भगवन् परिपूर्यताम॥

अर्थ : जीवन में समाज की ओर से मुझे जितना मिला उससे अधिक मैं समाज को दूंगा, हे भगवन् हमारी यह प्रार्थना तू पूर्ण कर।

हमारे यहां जो अधिक त्याग करता है वह श्रेष्ठ, ऐसी धारणा थी। ‘त्येन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ यह सूत्र जीवन का आधार होने के कारण त्यागाधारित जीवन का गौरव, यह मूल्य समाज में प्रतिष्ठित था, यह हमारा स्व है।

हम कई बार दोहरी निष्ठा के शिकार होते है, ऐसे मूल्य माननेवालों को हम व्यक्तिगत जीवन में महत्त्व देते है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उपभोगवादी और अमीरों का ही बोलबाला दिखता है, इस उपेक्षित स्व को प्रतिष्ठित करना होगा। राजसत्ता केंद्रित नहीं, समाज आधारित व्यवस्थाएं भारत की परम्परा और विशेषता रही है। हमारे समाज में अधिकांश व्यवस्था राजसत्ता केन्द्रित बनने के कारण राजनीतिक क्षेत्र के व्यक्तियों का प्रभाव समाज में बढ़ रहा है। सत्ताधारियों ने भी हम ही सब करेंगे, सत्ता ही सब करेगी ऐसा आभास निर्माण करने का प्रयास किया। इस कारण समाज की राजसत्ता पर निर्भरता बढ़ गई। विनोबा भावे कहते थे कि, समाज जितना राजसत्ता पर निर्भर होता है, उतना ही वह अकर्मण्य और दुर्बल बनता है। हमारे यहां हजारों वर्षों से राजसत्ता का महत्त्व मान्य करने के बाद भी उसका वर्चस्व समाज में सीमित था। इसी कारण समाज का सर्वस्व कभी भी राजसत्ता के अधीन नहीं था। समाज ने राजसत्ता से परे अपनी स्वतंत्र व्यवस्थाएं निर्माण की थी लेकिन अब स्थिति बदल गई है। कल्याणकारी राज्य (Welfare state) यह भारतीय परंपरा नहीं है, ऐसा कवि रवीन्द्रनाथ टागोर कहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, अन्न, न्याय आदि के पूर्ति की समाज की स्वतंत्र व्यवस्था थी। भारतीय समाज स्वयंपूर्ण एवं स्वयंसिद्ध था, स्वावलंबी था इसलिए रवीन्द्रनाथ टागोर कहते है कि, वह समाज जो अपनी आवश्यकताओं के  लिए राजसत्ता पर कम से कम अवलम्बित है वह ‘स्वदेशी’ समाज है। वे आगे कहते हैं कि भारत को राजनायकों की अपेक्षा समाजनायकों की अधिक आवश्यकता है। राजसत्ता केन्द्रित समाज रचना के समान ही सत्ता का केन्द्रीकरण भी अयोग्य ही है। सत्ता विकेन्द्रित न रहकर एककेन्द्री रही तो भ्रष्टाचार और अत्याचार (coercion) की संभावना बढ़ती है। पहले देहातों के निर्णय देहातों में ही होते थे। अब यह निर्णय दिल्ली या मुंबई में होने के परिणाम हम भुगत ही रहे है। मेरे एक परिचित ने महाराष्ट्र में नागपुर के पास अपने गांव में ही बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए इसलिए विद्यालय चलाने का निर्णय लिया। अनुमति के लिए उसे कई बार मुंबई के चक्कर लगाने पड़े, फिर भी अनुमति मिली नहीं। गांव की प्राथमिक आवश्यकताओं के लिए गांव स्वावलंबी क्यों न हो? पहले गांव स्वावलंबी थे, इस कारण गांव में एकता थी, खुशहाली थी, शांति थी, गांव सशक्त थे। आज सारी सत्ता, शक्ति, ऊर्जा और पैसा (वित्त) देश और राज्यों की राजधानी में जमा हुआ है। यह व्यवस्था बदलकर अधिकारों का अधिकाधिक विकेन्द्रीकरण करनेवाली, लेकिन देश की एकता अबाधित रखने वाली नई व्यवस्था लाने का विचार करना चाहिए, भारत का स्व गांव में बसता है।

भारत का आत्मा ही आध्यात्मिक होने के कारण हमारे यहां जीवन यह एक यज्ञ था; एक उत्सव था। आज उसका बाजारीकरण हो चला है और इस बाजारीकरण ने समाज के जीवनमूल्य ही बदल डाले है। भौतिकतावाद और उपभोग पर आधारित विकास की संकल्पना के झाँसे में आकर हमने यह बाजारीकरण की प्रतिष्ठा मान्य की है। पहले श्रेष्ठ जीवनपद्धति और संस्कृति से युक्त एक देश के रूप में भारत की ओर दुनिया आकर्षित होती थी। आज एक बड़े बाजार के रूप में भारत का आकर्षण बढ़ रहा है। इस देश के नागरिक ‘ग्राहक’ है, उन्हें क्या चाहिए, क्या नहीं? यह सब बाजार तय कर रहा है। पहले आवश्यकता को ध्यान में रखकर वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था। मांग के अनुसार पूर्ति का प्रयास रहता था। अब लोगों की आवश्यकताएं उत्पादक तय करते है और इसके लिए विज्ञापनों के माध्यम से आवश्यकता निर्माण की जाती है। ‘युवर प्राईड ऍण्ड नेबर्स एन्वी’ जैसे विज्ञापनों से हमारे मूलभूत संस्कार मिटाए जा रहे है। पैसा और पैसा, यहीं एकमात्र उद्देश्य शेष रहा है। क्रय-शक्ति बढ़ाने के लिए कर्ज दिया जाता है। मांग बढ़नी चाहिए इसलिए विज्ञापनबाजी बढ़ रही है। इस सब के लिए होने वाला अधिक व्यय ग्राहकों से वसूल कर लाभ भी कमाया जा रहा है। उपभोग की वासना जगाकर उपभोग के लिए पैसा और पैसे के लिए पागलों के समान भागना। इसमें हम हमारी आत्मा, आनंद, समाधान, सुख सब खो रहें हैं।

भारतीय संस्कृति उपभोगवादी नहीं अध्यात्मवादी है। यहां का चिंतन है कि, हर एक में देवत्व है और यह देवत्व प्रकट कर मुक्ति का आनंद लेना यही मानवजीवन का उद्दिष्ट है। इसके लिए हमारें यहां भक्तियोग, ध्यानयोग, कर्मयोग और ज्ञानयोग में से किसी एक या अनेक अथवा सब का उपयोग कर मुक्त होना चाहिए, ऐसा दिशादर्शन है। आधुनिक बाजारीकरण में फालतू आवश्यकताएं निर्माण कर स्पर्धा, असूया, लोभ, आसक्ति का आधार लेकर उत्पादनों की अवास्तव मांग निर्माण की जा रही है। इस कारण शांति मरिचिका के समान दूर भाग रही है इसलिए बाजारीकरण की इस अभारतीय व्यवस्था के स्थान पर हमारे शाश्वत जीवनमूल्यों को संजोने वाली आधुनिक, लेकिन हमारी व्यवस्था स्थापन करनी चाहिए।

यह कार्य दुष्कर लगता हो, लेकिन वह असंभव तो निश्चित ही नहीं है किंतु इसके लिए हमें हमारा ‘स्व’ जगाना होगा। हम स्वतंत्र, स्वराज्य, स्वाभिमान जैसे शब्दों का सरेआम प्रयोग करते है लेकिन इसमें ‘स्व’ मतलब हम, राष्ट्र के रूप में कौन है?, प्राचीन समाज के रूप में हमारी क्या पहचान है? पहले इसका समर्पक उत्तर खोजना आवश्यक है।

यही बात श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर स्वदेशी समाज में कहते हैं – हम वास्तव में जो हैं वही बनें। ज्ञानपूर्वक, सरल और सचल भाव से, संपूर्ण रूप से हम अपने-आपको प्राप्त करें।

दुनिया के हर राष्ट्र को वे कौन है?, उनकी अस्मिता, पहचान, उनका मूल, उनके पूर्वज कौन है? इसकी स्पष्ट कल्पना है। दुर्भाग्यवश भारत में उस बारे में एकवाक्यता नहीं, संभ्रम है। यह संभ्रम दूर कर हमारे प्राचीन समाज की एकता का आधार पहचानकर, हमारा ‘स्व’ पहचानकर उसके प्रकाश में हमारी नीतियों का विचार किया, तो हम हमारे इस संभ्रम के, आत्मविस्मृति के घेरे से बाहर निकल सकेंगे। हमारा ‘स्व’ यदि जग गया और हम स्वाभिमान से भर गए तो हमारा पुरुषार्थ जागेगा और उसके बल पर हम फिर एक बार हमारा पुरुषार्थ और पराक्रम से युक्त, संपन्न, समाधानी और आनंदपूर्ण समाज जीवन हम निर्माण कर सकेंगे। जीवन जीने का और मनुष्य जन्म सार्थक करने का हमारा यह स्वयंसिद्ध आदर्श दुनिया के सामने प्रस्तुत कर संघर्ष, स्पर्धा, असूया से ग्रस्त मानव जाति को चिरशांति, समन्वय और संवाद का मार्ग दिखानेवाला दीपस्तंभ भी हम बन सकेंगे।

स्वामी विवेकानंद ने भारत के लिए यहीं स्वप्न देखा था और यहीं आदर्श निर्माण करने का आह्वान भारतमाता के सपूतों को किया था। वयं अमृतस्य पुत्रा: कहकर उन्होंने भारतीय समाज का सिंहत्व जगाने का आवाहन किया था। यह ‘स्व’ जागरण का पुरुषार्थ हम सब मिलकर प्रकट करें। इस स्व जागरण के प्रयास समाज के स्तर पर अनेक संगठनों के माध्यम से चल रहे है। उसका थोड़ा अहसास अब होने लगा है।

1987 में राम-जानकी रथ यात्रा चल रही थी तब संघ के एक कार्यक्रम में तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस से एक कार्यकर्ता ने पूछा कि – गौ हत्या प्रतिबंध का आंदोलन, कश्मीर के 370 में सुधार आदि विषय, मांग कर के हमने छोड़ दिये ऐसा लगता है। कुछ होते नहीं दिख रहा है। क्या इस राम मंदिर के विषय में भी वैसा ही होगा? तब श्री बालासाहब जी का उत्तर था – हम इस निमित्त राष्ट्रीय जागरण करते हैं। यह जागरण सतत किसी ना किसी निमित्त से करते रहना चाहिए। आज हिंदू समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर बहुत नीचा है। इसी कारण ये सारी समस्याएं भी हैं। जिस दिन सम्पूर्ण समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर (general level of national consciousness) पर्याप्त उन्नत होगा तब हो सकता है इन सभी विषयों के समाधान एक साथ भी हो जाएं।

Malcolm Gladwell की पुस्तक Tipping Point- How  little things can make a big difference में Tipping Point की व्याख्या वे यूँ करते हैं- Tipping point is the point at which a series of small changes or incidents becomes significant enough to cause a larger, more important  change. आज श्री बालासाहब जी के शब्दों का स्मरण करते लगता है कि उस भाव को व्यक्त करते समय क्या उनका संकेत Tipping Point  की ओर था?

संघ के ज्येष्ठ प्रचारक और श्रेष्ठ चिंतक श्री दत्तोपंत ठेंगडी एक बात हमेशा कहते थे कि- समाज में कुछ लोगों का राष्ट्रीय दृष्टि से जागृत और खूब सक्रीय होना शाश्वत परिवर्तन नहीं लाता है। जब सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर थोड़ा भी ऊँचा उठता है तब बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं। इसलिए समय-समय पर कुछ मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय जागरण के प्रयास सतत करते रहने से धीरे-धीरे सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर ऊँचा उठेगा। उन सब के cumulative परिणाम के नाते राष्ट्रहित के अनेक छोटे-बड़े महत्व के और आवश्यक कार्य सहज होते जाएंगे। इस कारण राष्ट्रीय चेतना समृद्ध करने की दृष्टि से कुछ लोगों को सतत राष्ट्र जागरण के कार्य में ही लगे रहना आवश्यक और महत्वपूर्ण है।

लगता है, श्री बालासाहब देवरस जी और श्री ठेंगडीजी द्वारा वर्णित वह टिपिंग पोईंट निकट आ रहा है, श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर का वह स्वदेशी समाज सक्रीय हो रहा है। राष्ट्र जीवन के अनेक क्षेत्रों में, अनेक वर्षों से प्रलंबित राष्ट्र हित के मूलभूत परिवर्तन एक के बाद एक हो रहे हैं। देश की रक्षा नीति और विदेश नीति में मूलभूत परिवर्तन विश्व अनुभव कर रहा है। विकेंद्रित और कृषि आधारित अर्थ नीति के आधार पर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का संकल्प प्रकट हो रहा है। भारत की जड़ों से जुड़ कर विश्व के आकाश को आग़ोश में लेने के लिए ऊँची उड़ान भरने वाले पंख देने वाली नई शिक्षा नीति की घोषणा हुई है। समाज के स्वयं के उद्यम और innovations को प्रोत्साहन मिलने का वातावरण बन रहा है। यह सारा एक साथ होता नज़र आ रहा है। यह परिवर्तन भारत में 2014 से हुए केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ जोड़कर देखना स्वाभाविक है। परंतु 16 मई, 2014 के दिन चुनाव के परिणामों की घोषणा होने के बाद 18 मई, रविवार के संडे गार्डीयन के महत्वपूर्ण सम्पादकीय में एक मूलभूत और गहरी बात कही गई है। वह है-  It should be obvious that the underlying changes in the Indian society have brought us Mr. Modi and not the other way round। राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर ऊँचा उठने की प्रक्रिया के परिणाम स्वरुप सभी प्रकार के इष्ट परिवर्तन होना शुरू हुआ है और सत्ता परिवर्तन भी इसका भाग है।

अपना ईश्वर प्रदत्त दायित्व निभाने के लिए भारत वर्ष अपनी चिर पुरातन नित्य नूतन चिरंजीवी शक्ति के साथ खड़ा हो रहा है।(संघ के एक ज्येष्ठ प्रचारक ने एक वाक्य में संघ का पूर्ण वर्णन किया था – RSS is the evolution of the life mission of this Hindu nation.)  अब तक रुके हुए या रोके गए सभी आवश्यक कार्य होना शुरू हो गए हैं। सम्पूर्ण समाज को सभान, सजग रहकर सक्रीय होना होगा।

5 अगस्त, 2020 को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण कार्य के शुभारम्भ के अवसर पर सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत के उद्बोधन में उल्लेखित यह वही आत्मभान है, जिससे आवश्यक आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता अवश्यम्भावी है। एक संघ गीत में कहा है,-

अरुणोदय हो चुका वीर अब कर्मक्षेत्र में जुट जाएँ।

अपने खून-पसीने द्वारा नवयुग धरती पर लाएं॥

 

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