स्वातंत्र्योत्तर काल का फैशन

भारतीय पोशाक अपने पारंपरिक तरीके और धरोहर से जुड़ाव के लिए जाने जाते है। पारंपरिक भारतीय डिज़ाइन अधिकतर प्रकृति से जुडे होते हैं। भारतीय पोशाक आरामदायक होने के साथ ही देखने में सुंदर और राजसी होते है। ट्रेडिशनल से वेस्टर्न, सलवार कुर्ती और साड़ी से जीन्स तक, भारतीय परिधान इतने सालो में लाखों परिवर्तनों से गुजरा है। कपड़ों को बनाने और सजाने की कला का उल्लेख भारत के पौराणिक इतिहास में भी है और यही ज्ञान भारतीय परिधान को सबसे अलग बनाता है। भारत की जरदोजी, चिकनकारी, मिरर वर्क और पश्मीना कारीगरी ने विदेशों में भी अपनी विशेष पहचान बनाई है। इसके अलावा भारत की खास बुनी साड़ी या जैसे कांजीवरम, पोचंपल्ली, जामदनी, पैठणी, बनारसी, बांधनी, संबलपुरी, इकट आदि भी दुनियाभर में मशहूर हैं।

भारत की वस्त्र परंपरा उतनी ही पुरानी है, जितनी कि मानव सभ्यता। इस लिहाज से देखा जाये, तो भारतीय फैशन भी उतना ही पुराना है। कारण, फैशन का मूल अर्थ किसी कालविशेष में अपनायी जानेवाली आदतों से है। फिर चाहे वह रहन-सहन का ढंग हो या फिर पहनने-ओढ़ने का तरीका। फैशन भारत की समृद्ध संस्कृति, इतिहास और विभिन्न क्षेत्रों की लोक परंपरा में इस कदर रचा-बसा है कि उसे एक-दूसरे से अलग करके देखना बेहद मुश्किल है। फिर भी सुविधा के लिहाज से स्वातंत्र्योतर काल के फैशन को निम्नांकित श्रेणियों के तहत बेहतर रूप में समझा जा सकता है।

1950 के दशक का फैशन

भारतीय फैशन हमेशा से ही अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, शिष्टता और रंगों के लिए जाना जाता रहा है। भारत की आजादी से लेकर अब तक भारतीय वस्त्र परंपरा एवं उद्योग में काफी बदलाव आया है। 40 के दशक में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो चुका था। उसके दो साल बाद हमारा देश भारत भी आजाद हो चुका था। आंदोलन के दिनों में भारतीय परिधानों पर अंग्रेजी ़फैशन का काफी प्रभाव हुआ। बावजूद इसके स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभावस्वरूप स्वदेश निर्मित खादी परिधानों का फैशन अपने चरम पर था। ज्यादातर पुरुष अब भी खादी का सफेद कुर्ता और धोती पहनना पसंद करते थे और महिलाएं छह गज लंबी साड़ी। हां, क्षेत्रविशेष के अनुसार उन साड़ियों को पहनने का तरीका जरूर भिन्न था। साड़ियों के साथ ब्लाउज और पेटीकोट पहनने का चलन आ गया।

इसी दशक में हिंदी सिनेमा का प्रादुर्भाव होने से फैशन परिदृश्य में एक बहुत बड़ी क्रांति का आगाज हुआ। 60 के दशक में जहां भारी चंकी ज्वेलरी और कढाई की हुई साड़ियों का प्रचलन देखने को मिला, वहीं 70 के दशक में चमकीले-चटख रंगों, पोल्का डॉट्स, बेल बॉटम और बड़े आकार वाले सनग्लासेज की डिमांड रही। इस दौर में फिल्मों की नायिकाएं पहली बार पफ बांह वाली ब्लाऊज पहने नजर आयीं। कुछ फिल्मों में नायिकाएं सलवार-कमीज और दुपट्टे में भी दिखीं, लेकिन आम चलन में यह पहनावा उस समय तक ज्यादा पॉपुलर नहीं हुआ था। शाही परिवारों की महिलाओं, जैसे जयपुर राजघराने की राजकुमारी गायत्री देवी ने उस दौर में साधारण सिल्क और शिफॉन साड़ी के साथ हल्के लेकिन बेशकीमती ज्वेलरी पहनने के कारण काफी प्रसिद्धि पायी थी। वहीं अभिनेता दिलीप कुमार के शर्ट की बांह पर कफलिंक वाले डिजाइन ने भी आमलोगों का ध्यान आकर्षित किया था। 1950 में आर्ट कॉलेजों और स्कूलों की स्थापना हुई, जो ़फैशन डिजाइनिंग का केंद्र बनी। बैलून स्कर्ट्स का प्रचलन बढ़ा। भारतीय महिलाओं का अंदाज़ बोल्ड हुआ किन्तु वो अपनी परंपराओं से जुड़ी रहीं। नेकलाइन को बॉर्डर और विभिन्न कढ़ाई से सजाया जाने लगा।

1960 के दशक का फैशन

60 के दशक में भारतीय फैशन जगत में काफी बदलाव आए। जहां एक ओर कमीज की लंबाई छोटी हुई वहीं साधना की टाईट सलवार कुर्ती ़फैशन की एक नई पहचान बन गई। हिंदी सिने जगत के प्रभावस्वरूप उस दशक की मुमताज स्टाइल साड़ी महिलाओं के बीच खूब पॉपुलर हुई। आज भी रेट्रो लुक के लिए यह युवतियों की पहली पसंद है। पुरुषों के बीच बंदगला या नेहरू जैकेट फॉर्मल फैशन का जरूरी हिस्सा था, जबकि आम दिनों में टर्टल नेक और बेल बॉटम पैंट्स का फैशन था। इसी दशक में शर्मिला टैगोर की फिल्म ‘एन इवनिंग इन पेरिस’ रिलीज हुई थी, जिसने स्विमसूट के प्रचलन की शुरुआत की। सस्ते रेडिमेड कपड़ों की मार्केटिंग बढ़ गई। मिक्सड फैब्रिक जैसे नायलॉन, पॉलिएस्टर आदि डिजाइनर्स की प्राथमिकता बन गए। भारतीय साड़ियां अधिक मॉडर्न बन गई।

1970 के दशक का फैशन

70 के दशक में पुरुष और महिलाएं दोनों ही ़फैशन में नए नए प्रयोग करने लगे। क्रॉप टॉप्स, पैंट सूट्स, मैक्सी,स्कर्ट्स, पोल्का डॉट्स और फिश नेट स्टॉकिंग्स तो फैशन का हिस्सा बन गये। इस दशक में ‘आयरन लेडी‘ के नाम से मशहूर भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा पहने जानी वाली खाड़ी साड़ियां काफी मशहूर हुई। टीवी के साथ ही ़फैशन के मायने बदल गए।

पुरुषों में राउंड नेक कुर्ता और सफारी सूट का फैशन बढ़ने लगा। इस दशक के अंत तक जीन्स डेलीवेयर का हिस्सा बन गया। एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन ने बाजार में लेदर जैकेट्स और ट्राउज़र्स का ट्रेंड सेट किया। सलवार सूट/चूड़ीदार कुर्ती भारतीय महिलाओं के फैशन का अहम हिस्सा बन गए। भड़कीले रंगों की प्रिंटेड शिफॉन साड़ी, स्लीवलेस ब्लाउज और भारी जेवरात आम महिलाओं की पहली पसंद थे।

1980 के दशक का फैशन

इस दशक में टेलिविजन की शुरुआत होने से भारतीय जनमानस का परिचय फैशन के एक स्वरूप से हुआ। इस दौर में महिलाएं बड़ी संख्या में घर की चारदीवारी से बाहर निकाल कर ‘प्रोफेशनल फ्रंट’ से जुड़ीं। इस समय तक सलवार-चूड़ीदार भारतीय महिलाओं के राष्ट्रीय परिधान बन चुके थे। प्रिंटेड साड़ियों के साथ ब्लाऊज का चलन अब भी आम था। शोल्डर पैड्स, मंहगे आभूषण, चकमक रंग और फैशनेबल एसेसरीज इस दशक की पहचान हैं।

पुरुषों के बीच रंगीन टीशर्ट और डेनिम जैकेट्स का चलन काफी पॉपुलर हुआ। इसी दशक में डिस्को फैशन की शुरुआत हुई, जिसके प्रभाववश झिलमिल पैटर्न वाले चमकीले कॉस्ट्यूम, डेनिम और लेदर बाइकर जैकेट्स चलन में आये। महिलाओं में मल्टी कलर वाली शिफॉन साड़ियों की डिमांड बढ़ी। यह दशक भारत में फैशन स्कूलों के विस्तार के लिए भी जाना जाता है।

1990 के दशक का फैशन

90 का दशक बदलाव का दशक माना जाता है। इस दशक में पॉप एल्बम का ़फैशन युवाओं के सिर चढ़ कर बोल रहा था। विदेशी कंपनियों के आगमन से भारतीयों को नए डिजाइन और पैटर्न से भी रूबरू होने का अवसर मिला। मनीष मल्होत्रा, सब्यसाची मुखर्जी, ऋतु बेरी आदि डिजाइनर ने भी नए और पुराने अंदाज को मिलाकर डिजाइन बनाना शुरू किया। लड़कों के लिए बैगी स्टाइल पैंट्स पहली पसंद बनी। महिलाओं एवं लड़कियों में डीप कट ब्लाउज़ के साथ ग्लैमरस साड़ियों के उपयोग का चलन बढ़ा। युवाओं के बीच एथनिक कुर्ती और लो वेस्ट जीन्स की डिमांड थी। वहीं पुरुषों में जीन्स और कार्गो पैंट्स लोकप्रिय हुए।

चाहे प्लाजो पैंट्स हो या फिर ऑफ शोल्डर ब्लाउज, हैंडलूम साड़ी हो या पोल्का डॉट्स, इस दौर में पुराने जमाने का फैशन नए तरीके से मार्केट में लाया जाने लगा।

इस दशक में डेली शॉप ओपेरा, इंटरनेट और अन्य मीडिया माध्यमों का प्रादुर्भाव होने से भारतीय फैशन का वैश्वीकृत स्वरूप सामने आया। वन पीस ड्रेसेज, स्पोर्टस वेयर, हॉल्टर टॉप और फ्लोलर गाउन 90 के दशक की पहचान बने। इस दशक में फुलस्लीव सलवार-कमीज, फ्लोरल प्रिंटेड ड्रेसेज, लॉन्ग स्कर्ट, डेनिम, शेड्स और डंगरी भी काफी पॉपुलर हुए। इस दशक में ग्लोबल इंडिया की अवधारणा तेजी से लोकप्रिय हुई, जिसकी वजह से भारतीय फैशन इंडस्ट्री ने थोड़े बोल्ड और स्टाइलिश कॉन्सेप्ट को अपनाना शुरू किया। युवाओं ने भी इसे हाथों-हाथ लिया। इस समय तक शर्ट और ट्राउजर या फिर टीशर्ट और जींस भारतीय पुरुषों का सबसे पसंदीदा परिधान बन चुके थे। इंटरनेट मार्केटिंग के जमाने में हर तबके को ़फैशन एक्सपेरिमेंट करने और फैशन को अपनाने का अधिकार मिला।

21वीं सदी का फैशन

21वी सदी की शुरुआत ने भारतीय फैशन उद्योग की एक स्थिर और स्पष्ट तस्वीर पेश की। नई सदी की शुरुआत के साथ ही पुराने फैशन का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया। इस समय तक महिलाएं तुलनात्मक रूप से अधिक स्वावलंबी और स्वतंत्र विचारों वाली हो गयी थीं। लेटेस्ट फैशन ट्रेंड और स्टाइल में सक्रिय भागीदारी निभाने के साथ ही पारंपरिक एवं भारी-भरकम परिधानों की तुलना में वे अपने पहनावे में भी अधिक बोल्ड और आरामदायक परिधानों को वरीयता देने लगीं, जैसे कि- शॉर्ट्स, कैप्री, जैकेट, शर्ट और पैंट आदि। इस दौर में इंडो-वेस्टर्न फ्यूजन ड्रेसेज के रूप में एक विशिष्ट भारतीय शैली का भी विकास हुआ। इसके तहत पारंपरिक सलवार-कमीज को आरामदायक व इजी टू हैंडल डेनिम के साथ कंबाइन किया गया, जिसे हर वर्ग की युवतियों तथा महिलाओं के द्वारा बेहद पसंद किया गया।  इस सदी के फैशन की एक सबसे अच्छी बात यह है कि अब फैशन इंडस्ट्री केवल ट्रेंड और स्टाइल को ही नहीं, बल्कि यूजर्स के कंफर्ट को ध्यान में रखते हुए एपरैल्स डिजाइन किये जा रहे हैं, जिसकी वजह से फैशन इंडस्ट्री एक बूमिंग इंडस्ट्री के रूप में उभर रहा है।

वर्तमान में भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा टेक्सटाइल और गारमेंट निर्यातक है। एक अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2021 तक हमारा टेक्सटाइल उद्योग करीब 141 बिलियन डॉलर का हो जायेगा। वर्तमान समय में, भारतीय बाजार में महिलाओं के लिए उपलब्ध कपड़ों की वेरायटी और क्वालिटी के आधार पर इसे बखूबी समझा जा सकता है। केवल बड़े बाजारों, मॉल या शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में ही नहीं, बल्कि मध्यम या निम्न स्तर की छोटी-मोटी दुकानों आदि में भी कपड़ों की जिस तरह से मार्केटिंग हो रही है, उससे इसके व्यापक स्वरूप का अंदाजा लगता है। आने वाले समय में भारत का वस्त्र उद्योग दुनिया में सबसे आगे हो सकता है।

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