खादी : वस्त्र और विचार

मनुष्य की जरूरत पूरी करने में खादी सक्षम है। आवश्यकता से अधिक अर्जन करने से आदमी की प्रकृति और प्रवृत्ति बदल जाती है। धीरे-धीरे शोषक बनने की श्रेणी में आ जाता है। जबकि चरखे में तो ईश्वर का वास है। यह गरीब से गरीब आदमी की क्षुधा तृप्त कर सकता है। उसको सम्मान दिला सकता है।

महात्मा गांधी ने खादी सरीखे अस्त्र से सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक पहलुओं को संबल प्रदान किया। इसके माध्यम से भारत के हजारों गांवों तक अपनी पहुंच बनाई। गांव के लोगों में स्वदेशी और आत्मसम्मान का भाव जागृत किया। म. गांधी जी ने खादी को न सिर्फ आजा़दी की वर्दी बना दी बल्कि अंग्रेजों द्वारा नष्ट किए गए आर्थिक तंत्र के लिए विकल्प भी तैयार कर दिया।

भारत आगमन के बाद, म. गांधी के जीवन में चरखे का व्यावहारिक तौर पर प्रवेश 1915 में होता है। परन्तु 1908 में ‘हिन्द स्वराज’ में उन्होंने चरखे को भारत की कंगालियत दूर करने का औजार मान लिया था। म. गांधी का दक्षिण अफ्रीका का अनुभव व विश्व की अर्थव्यवस्था के अध्ययन ने उन्हें इस निष्कर्ष तक पहुंचाया था। आगे उनका इसमें विश्वास और पक्का होता गया। खादी और चरखे के प्रति उनका विश्वास तब और पक्का हुआ जब भारत लौटने के बाद उन्होंने एक वर्ष तक पूरे देश का भ्रमण किया। भारत के सामाजिक आर्थिक ताने-बाने को समझा। तब उन्होंने यह समझ लिया कि खादी से ही भारत के सामाजिक ताने-बाने को एक सूत्र में कसकर बुना जा सकता है। बिखरे हुए समाज को और उसमें व्याप्त बुराईयों को खादी के समाजशास्त्र द्वारा ही दूर किया जा सकता है।

आगे स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व म. गांधी के हाथों में आया। म. गांधी ने सत्य और अहिंसा से राजनीतिक लड़ाई लड़ने का जो निर्णय किया था, उस पर वे आजीवन चलते रहे। इस नैतिक अस्त्र को उन्होंने राजनीति के साथ-साथ सामाजिक कसौटी पर भी कसा। म. गांधी की राजनीतिक लड़ाई सामाजिक लड़ाई से अलग नहीं थी। बिना समाज को मजबूत किये, उनकी कुरीतियों की नष्ट किये, राजनीतिक लड़ाई नहीं जीती जा सकती है। म. गांधी के लिए जितनी महत्वपूर्ण स्वाधीनता थी उतनी ही सामाजिक समरसता। राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त करना है तो सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करना होगा। म. गांधी ने कांग्रेस जैसी संस्था को किसानों, मजदूरों के लिए सुलभ बनाया। खादी वह माध्यम था, जिसने सबको जोड़ने का काम किया। श्रम की प्रतिष्ठा के साथ-साथ स्वावलंबी बनने में भी खादी का विशेष योगदान रहा। खादी से म. गांधी ने उस वर्ग को भी जोड़ा जिस पर हमारा ध्यान नहीं जाता। इसमें ऐसा समाज या वर्ग भी आया जो हमेशा से हाशिये पर रहा। 1920-30 ई. में म. गांधी ने खादी से विधवा महिलाओं को जोड़ा। विधवा महिलाओं की सामाजिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। समाज में उनके लिए कोई जगह नहीं थी। क्योंकि वे परिवार और समाज के आर्थिक जिम्मेदारी में भागीदार नहीं थी। आर्थिक रूप से मजबूत करने और स्वावलंबी बनाने के लिए विधवा महिलाओं को चरखे और खादी से जोड़ दिया। म. गांधी जानते थे कि समाज का हर तबका सबल होगा तभी देश भी सबल बनेगा। महिलाओं के सशक्त बनने पर ही समाज सबल बन सकता है। म. गांधी खादी को लेकर बहुत व्यापक विचार रखते थे। समाज ने जिन महिलाओं को हिकारत की नजर से देखा था, म. गांधी उनको मुख्यधरा में लाने के लिए खादी और चरखे के जरिये उनमें भी आत्मविश्वास पैदा करना चाहते थे-“मैंने राजमहेन्द्र और बारीसाल में पतित महिलाओं को देखा था। एक जवान लड़की ने मुझसे पूछा-‘आपका चरखा हमें क्या दे सकता है?’ उसने कहा-‘जो आदमी हमारे पास आते हैं, उनसे हमें कुछ एक मिनटों के पांच से दस रुपये मिल जाते हैं।’    मैंने उसे बताया कि चरखे से आपको उतना तो नहीं मिल सकता, परन्तु यदि आप लज्जास्पद जीवन छोड़ दें तो मैं आपको कातना और बुनना सिखाने का प्रबंध कर सकता हूं। इससे आपको समुचित जीविका कमाने में सहायता मिल सकती है।” इस प्रकरण में हम देखते हैं कि म. गांधी समाज के सबसे किनारे कर दिये गए वर्ग को भी मुख्यधारा में चरखे और खादी के माध्यम से जोड़ने का काम करते हैं। जिससे वे सम्मान का जीवन यापन कर सकें।

हाथ-से-सूत-बनाते-हुए-गाँधीजी-अपने-अनुयायियों-को-सम्बोधित-करते-हुए

जैसे-जैसे स्वाधीनता आंदोलन की लड़ाई बढ़ी वैसे-वैसे खादी के प्रति विश्वास भी बढ़ा। खादी ने धीरे-धीरे सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया। समय के साथ खादी का कुर्ता, धोती-पायजामा और टोपी ने स्वाधीनता आंदोलन में अपने संघर्ष द्वारा, अपने लिए जगह बना ली थी। लोगों ने जेल जाकर, डंडे खाकर भी अपने परिश्रम द्वारा चरखा चलाकर अपने लिए वस्त्र बनाया। खादी सिर्फ वस्त्र नहीं प्रतिरोधी पोषाक थी। इसमें स्वावलंबन और स्वदेशी की आभा थी। खादी ने विदेशी पोषाक के सामने मजबूती से अपने पैर टिकाये। देश के खोये हुए पौरुष को व खोयी हुई आभा को वापस लाने का काम किया। प्राचीन संस्कृति को पुनर्जीवित किया।

खादी को उसका प्राचीन गौरव दिलाने और पुन:स्थापित करने का काम महात्मा म. गांधी ने किया। धीरे-धीरे खादी स्वदेशी का पर्याय बन गया। लोगों ने इसे स्वीकार किया। अपनी जरूरत के अनुसार कातना और पहनने लायक बुनना। इसके अलावा धन अर्जन का साधन बनता गया। मनुष्य की जरूरत को पूरी करने में खादी सक्षम है।  आवश्यकता से अधिक अर्जन करने से आदमी की प्रकृति और प्रवृत्ति बदल जाती है। धीरे-धीरे शोषक बनने की श्रेणी में आ जाता है। जबकि चरखे में तो ईश्वर का वास है। यह गरीब से गरीब आदमी की क्षुधा तृप्त कर सकता है। उसको सम्मान दिला सकता है। म. गांधी कहते हैं-“मैं जितनी बार चरखे पर सूत निकालता हूं उतनी ही बार भारत के गरीबों का विचार करता हूंं। भूख की पीड़ा से व्याकुल व्यक्ति और पेट भरने के सिवा और कोई इच्छा न रखने वाले मनुष्य के लिए उसका पेट ही ईश्वर है। उसे जो रोटी देता है वही उसका मालिक है। उसके द्वारा वह ईश्वर के भी दर्शन कर सकता है।” म. गांधी का चरखे पर अटल विश्वास था। उन्हें चरखे में ईश्वर का दर्शन होता था। म. गांधी ने श्रम को अध्यात्म से जोड़कर श्रम की प्रतिष्ठा बढ़ाई। बरसों पुराने इस उद्योग को नव-जीवन दिया। म. गांधी ने चरखे को नव-जीवन दिया तो चरखे ने भारत की आम जनता का पेट भरा, वस्त्र दिया, उसके श्रम को महत्व दिया।

भारत की बड़ी आबादी गांवों में बसती है। आज भी उनके लिए खेती ही रोजगार का मुख्य साधन है। खेती से गुजारा करना मुश्किल है। स्वाधीनता आंदोलन के पूर्व समय में गांवों की अपनी कुछ परम्परा थी। जिससे ग्रामीण समाज लगभग सभी द़ृष्टि से आत्मनिर्भर थे। उन परम्पराओं में सबसे महत्वपूर्ण था वस्तुविनिमय प्रणाली। अंग्रेजी अर्थ व्यवस्था ने इस प्रणाली को नष्ट कर दिया। जिससे ग्रामीण लोगों की निर्भरता व्यापार प्रणाली की तरफ बढ़ी। इससे खेतिहर मजदूर और किसानों के सामने एक नया का संकट आ खड़ा हुआ। म. गांधी ने कहा-“मेरा पक्का विश्वास है कि हाथ-कताई और हाथ बुनाई के पुनरूज्जीवन से भारत के आर्थिक और नैतिक पुनरूद्धार में सबसे बड़ी मदद मिलेगी। करोड़ों आदमियों को खेती की आय में वृद्धि करने के लिए कोई सादा उद्योग चाहिए। बरसों पहले व गृह-उद्योग कताई का था, और करोड़ों को भूखों मरने से बचाना हो तो उन्हें इस योग्य बनाना पड़ेगा कि वे अपने घरों में फिर से कताई जारी कर सकें और हर गांव को अपना ही बुनकर फिर से मिल जाये।” सवाल यह था कि गांवों की जिन्दगी में, जीवन की धड़कन और जीवन के लिए उत्साह किस तरह उत्पन्न किया जाए? श्रम विवशता के भाव से किया जाता रहा है। इसमें नैतिकता, सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा देने का काम महात्मा म. गांधी ने किया। शोषण मुक्त समाज के निर्माण का आधार खादी बना। विनोबा कहते हैं-“चरखा एक सिम्बल यानी एक संकेत-चिह्न या प्रतीक है श्रम-निष्ठा का। दुनिया में शोषण किसलिये चलता है? इसीलिए कि कुछ लोग श्रम करते हैं और दूसरे लोग उससे लाभ उठाना चाहते हैं। अगर सब लोग श्रम करें, श्रम-निष्ठा पैदा हो, तो शोषण खत्म हो जाए और उत्पादन भी बढ़े। इसलिए म. गांधीजी ने एक छोटी-सी चीज देश के सामने रखी। आज बेकारी बढ़ रही है इस हालत में यह चीज चले तो घर-घर सूत होगा, कपड़ा बनेगा। लेकिन उस कपड़े का और सूत का उतना महत्व नहीं है जितना श्रम-निष्ठा का महत्व है।”

आज स्वदेशी को लेकर हमारे सामने भ्रम की स्थिति बनी हुई है। हम स्वदेशी का मतलब अपने देश में बनी हुई वस्तु से मानते हैं जबकि स्वदेशी का जो अर्थ म. गांधी बताते थे वह गौर करने लायक है-“स्वदेशी की भावना का अर्थ है हमारी वह भावना जो हमें दूर को छोड़कर अपने समीपवर्ती प्रदेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है। …अर्थ के क्षेत्र में मुझे अपने पड़ोसियों द्वारा बनायी गयी वस्तुओं का ही उपयोग करना चाहिये और उन उद्योगों की कमियां दूर करके उन्हें ज्यादा सम्पूर्ण और सक्षम बनाकर उनकी सेवा करना चाहिए। मुझे लगता है कि यदि स्वदेशी को व्यवहार में उतारा जाये तो मानवता के स्वर्णयुग की अवतारणा की जा सकती है।” म. गांधी स्वदेशी को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं-“आयात किए हुए विदेशी कपड़े अथवा मिल में बने हुए देशी कपड़े में कोई विशेष अंतर नहीं है। मेरी नज़रों में दोनों ही बराबर हैं। क्योंकि दोनों ही दशाओं में पैसे का बहुत बड़ा भाग अमीर एवं बड़े-बड़े मिल मालिकों के पास चला जाता है।” म. गांधी जरूरत से ज्यादा धन अर्जन के खिलाफ थे। उनकी नज़रों में तो मनुष्य को प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए जितनी की आवश्यकता हो। चरखा इस लिहाज से हमारी जरूरत पूरी करने में सक्षम है।

खादी हमारे देश की कलात्मक झांकी है। भारत में अलग-अलग प्रांतों की अपनी अलग कलात्मक पहचान है। स्थानीयता के अनुसार खादी के बुनने की परम्परा में तथा रंगों के प्रयोग में भी अंतर आता जाता है। मैदानी इलाके में बुना गया खादी, पहाड़ी इलाके में बुने गये से भिन्न होगा। आदिवासी इलाकों में जिस तरह के रंगों और सूत का प्रयोग होता है वह आम चलन से थोड़ा भिन्न होगा इसे उदाहरण से और बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। मधुबनी की चित्रकला विश्वविख्यात है। बिहार प्रांत का यह स्थान अपनी चित्रकला की, अलग शैली के लिए पहचाना जाता है। यहां के खादी पर भी इस चित्रकला का प्रभाव देखा जा सकता है। हम देखते हैं कि खादी में  प्रांतों के अनुसार इसके रंग-रोगन बनावट में भी विविधता आती है। विविधता भरे हमारे देश में खादी और विविधता लाती है। दूसरी तरफ इससे कुशल कारिगरों की उपलब्धता भी बनती जाती है। म. गांधी इस बात को समझते थे कि खादी में भारतीय जीवन की परम्परा व कौशल को बचाने की कुबत है। लोग उत्पादक से उपभोक्ता बन गये। गांव की अर्थव्यवस्था नष्ट हो गई। इसे पुन: जीवित करने की आवश्यकता थी।

‘बा’ और म. गांधी के जीवन में खादी का क्या महत्व था एक छोटी-सी घटना के जिक्र से समझ सकते हैं। म. गांधी ने भारत में जहां भी आश्रम की स्थापना की वहां खादी पहनना आश्रम के अनुशासन में सम्मिलित कर दिया। ‘बा’ के लिए खादी बहुत प्रिय था। आमतौर पर ‘बा’ की साड़ी बापू के काते सूत की ही बनती थी। ‘बा’ के स्वर्गवास पर भी बापू के हाथों कते सूत की साड़ी और माला पहनाई गई थी। एक दिन ‘बा’ के पैर की छोटी उंगली से खून निकला। ‘बा’ खादी की पट्टी बांधने जा रही थी। इतने में एक बहन ने महीन कपड़े की पट्टी ला दी और कहा: इस महीन कपड़े से रगड़ नहीं लगेगी और पट्टी अच्छी तरह बंधेगी। इस पर ‘बा’ ने कहा-परन्तु मुझे तो खादी की पट्टी ही चाहिए। वह खुरदरी भी होगी तो मुझे नहीं चुभेगी। ‘बा’ ने फिर खादी की पट्टी ही बांधी। म. गांधी ने व्यक्तिगत तौर पर भी खादी का उदाहरण दुनिया के सामने रखा। म. गांधी जैसा कहते थे वैसा ही उदाहरण दुनिया के सामने रखते थे। वही नैतिक बल का आधार रहा।

म. गांधी के सामने कई बार लोग खादी की शिकायत लेकर पहुंचते। शिकायतें कई तरह की होती थी। आश्रम की महिलाएं कहती खादी की साड़ी बहुत मोटी होती है। धोने के समय बहुत भारी हो जाती है। म.गांधी विनोदवश कहते लाओ मैं धो देता हूं। दूसरी तरफ खादी को लेकर जो लोगों में विश्वास था कि इसे पहनने वाला मनुष्य सात्विक विचार का होगा। कई बार यह उम्मीद धूमिल होने लगती थी। इस बात पर म. गांधी कहते-‘यह मैं जानता हूं कि खादी पहनने वालों में भी दगाबाज, धेखेबाज और व्याभिचारी होते हैं। पर ये दोष खादी न पहनने वालों में भी पाए जाते हैं। ये दोष सामान्य है। जो खादी नहीं पहनते उनमें भी तो धेखेबाज, दगाबाज और व्याभिचारी होते हैं। खादी पहनने वाला दगाबाज या धेखेबाज है पर उसमें इतनी तो अच्छी बात जरूर है कि वह खादी पहनता है।”

खादी में नैतिकता और आध्यात्मिकता की आभा है। श्रम के प्रतिष्ठा का प्रतीक है। इसमें स्वदेश प्रेम और स्वदेशी की भावना निहित है। यह वस्त्र नहीं विचार है और विचार से आगे धर्म है मानवता को स्थापित करने वाला। आज जरूरत है इस बात को समझने-समझाने की। म. गांधी ने जो स्वदेश प्रेम की अलख स्वाधीनता संग्राम में जगाई थी, इसे आज पुन: अपनाने की आवश्यकता है। यह न सिर्फ आर्थिक संबल प्रदान करता है बल्कि सामाजिक गैर बराबरी को मिटाने में सक्षम करने का काम भी करता है।

 

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