नई उंचाईयों को छुएगा भिवंडी वस्त्रोद्योग

1950-1995 तक का समय भिवंडी के वस्त्र उद्योग के लिए समृद्धि का काल था। उस समय भिवंडी को ’मैनचेस्टर’ के रूप में जाना जाता था। निश्चित ही ’मेक इन इंडिया’ तथा ’आत्मनिर्भर भारत’ योजनाओं के कारण निकट भविष्य में भिवंडी वस्त्र उद्योग फिर नई ऊचाइयां छूएगा।

भिवंडी का इतिहास लगभग 1000वर्ष पुराना है। भिवंडी शुरू से ही एक व्यापारिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध रहा है। किसी समय भिवंडी एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था जहां 20 टन के जहाज आकर लगते थे। इस बंदरगाह से बड़ी मात्रा में आयात-निर्यात किया जाता था। 1807 में भिवंडी का व्यापार 30-35 लाख रुपयों तक पहुंच गया था।

भिवंडी प्रारंभ से ही सागौन की लकड़ियों, चावल, घांस, सुखाई हुई मछलियों, बैलगाड़ी के पहियों आदि के लिए प्रसिद्ध था। 1917 में दादासाहेब दांडेकर ने यहां G. G. Dandekar machine works नामक कंपनी शुरू की जो धान कूटने के यंत्र बनाती थी। इसी से यह शहर औद्योगिक शहर के रूप में विख्यात हो गया। हालांकि भिवंडी शहर की आत्मा यहां का वस्त्र निर्माण उद्योग है।

यूं तो भिवंडी में वस्त्र व्यवसाय 18 वीं सदी से ही अस्तित्व में है। यहां बनने वाले सूती कपड़ों, धोती, महाराष्ट्रीयन तरीके से पहनी जाने वाली नौ गज की साड़ी की मांग भारतीय राजघरानों में भी थी। बिजली आने से पूर्व हथकरघों पर काम होता था। 1927 में दादा साहेब दांडेकर ने स्थानीय तौर पर विद्यु्त-उत्पादन शुरू किया लेकिन 3 फेज विद्युत प्रदाय का कार्य 1930 में ही संभव हो सका। उस समय बिजली बहुत सस्ती होती थी। नियमित विद्युत प्रदाय की सुविधा के कारण भिवंडी के वस्त्र उद्योग में क्रांति आ गई थी। 1935 में भिवंडी में बिजली पर आधारित पहला हथकरघा (पावर लूम) शुरू हुआ और धीरे-धीरे इसने बिना बिजली के चलने वाले हथकरघों की जगह ले ली।

पावर लूम के कारण भिवंडी में वस्त्र उत्पादन बढ़ गया। ऐसे में कम कर्मचारियों को काम पर रखकर उत्पादन बढ़ने के कारण, उत्पादन में खर्च घटना स्वाभाविक ही था। सूरत एवं मालेगांव की तुलना में,  मुंबई जैसे बड़े मार्केट से निकटता के कारण भिवंडी में एक संगठित वस्त्र उद्योग कार्यरत हुआ और उसकी समृद्धि दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी।

भिवंडी में मुंबई के वस्त्र उद्योग के पूरक के तौर पर कपड़ों पर प्रक्रिया करना आसान हो गया।1950 में भिवंडी में ‘साइजिंग’ अर्थात धागे पर कलफ चढ़ाने की शुरुआत हुई। रंगीन कपड़ों की मांग बढ़ने पर भिवंडी में कपड़ा रंगने अथवा रंगीन धागे के प्रयोग के लिए ’यार्न डाइंग’ की शुरुआत हुई। इस तरह भिवंडी में कपड़ों पर विभिन्न तरह की प्रक्रिया करने की शुरुआत हुई।

1960-70 के दशक में भिवंडी का मलमल और सिल्क बहुत प्रसिद्ध हो गया। महिलाओं में भिवंडी की सिल्क साड़ी का बड़ा क्रेज था। आगे चलकर 80 के दशक में मजदूरों की हड़ताल के कारण मुंबई की कपड़ा मिलें बंद पड़ने लगीं। तब भिवंडी में बड़े पैमाने पर शूटिंग-शर्टिंग का उत्पादन शुरु हुआ। 1950-1995 तक का समय भिवंडी के वस्त्र उद्योग के लिए समृद्धि का काल था। उस समय भिवंडी को ’मैनचेस्टर’ के रूप में जाना जाता था, परंतु 1995 के बाद इस व्यवसाय की प्रतिष्ठा धीरे-धीरे कम होने लगी।

बढ़िया सड़कें और यातायात के साधनों के उपलब्ध होने तथा राज्य सरकारों द्वारा प्रयास करने के कारण सूरत एवं दक्षिण भारत के कुछ स्थानों के मार्केट अधिक विकसित हो गए। शुरू से ही मुंबई के मार्केट पर आश्रित होने के कारण भिवंडी का मार्केट विकसित नहीं हो पाया। भिवंडी वस्त्र उद्योग दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण अपर्याप्त विद्युत प्रदाय तथा विद्युत प्रदाय के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर फैला भ्रष्टाचार था।

सभी क्षेत्रों में कुशल कारीगरों की कमी होने के कारण नई तकनीकें अपनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। आज भिवंडी वस्त्रोद्योग में पुराने ढंग के स्थान पर रापियर, वाटर जेट, एयर जेट वाले तथा कम मजदूरों की आवश्यकता वाले लूम की मांग बढ़ गई। इसकी लागत भी बहुत अधिक है। किसी समय मजदूरों पर आधारित यह व्यवसाय अब पूंजी पर आधारित हो गया है।

वर्तमान में भिवंडी में 7 लाख पावर लूम हैं, जिनके कारण लाखों लोगों को रोजगार मिल रहा है। विद्युत प्रदाय के क्षेत्र में टोरांट कंपनी के आने से अपर्याप्त विद्युत आपूर्ति का संकट तथा इस क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की समस्या पूरी तरह से खत्म हो गई है। टैक्सटाइल पार्क के माध्यम से अपग्रेडेशन स्कीम के द्वारा, बड़े पैमाने पर नई तकनीकों का प्रयोग शुरू हो चुका है। भिवंडी वस्त्रोद्योग को केंद्र सरकार की नई टेक्सटाइल पॉलिसी, उद्योग हितैषी नीतियों आदि से निश्चित ही लाभ मिलेगा।

कोरोना के कारण सभी उद्योग संकट की छाया में हैं। इसके बावजूद चाहे ’मेक इन इंडिया’ हो या ’आत्मनिर्भर भारत’ यह तो तय है कि इन नीतियों तथा योजनाओं के कारण निकट भविष्य में भिवंडी वस्त्र उद्योग फिर नई ऊचाइयां छूएगा।

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