महाराष्ट्र का मैनचेस्टर इचलकरंजी

देश में आर्थिक क्षेत्र में जीएसटी सबसे बड़ा परिवर्तन था, जहां पूरे हिंदुस्तान में इसका विरोध हुआ पर इचलकरंजी वस्त्र व्यवसाइयों ने पहले दिन से जीएसटी में काम शुरू कर दिया। हर सरकारी योजना को समझना उनका फायदा लेना इचलकरंजी का स्वभाव है और इसके पीछे कारण है कि यहां सम्पूर्ण व्यवसाय बैंक से ही होता है।

महाराष्ट्र के कपड़ा उद्योग में  इचलकरंजी का महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए इचलकरंजी को महाराष्ट्र का मेनचेस्टर भी कहा जाता है।

वैसे तो इचलकरंजी शहर का उल्लेख 17 वीं शताब्दी में भी है। पर इचलकरंजी ने अपने विकास की उडान 18 वीं शताब्दी के अंत में श्रीमंत नारायणराव बाबासाहेब घोरपडे के युग में भरी इसलिये  नारायणराव बाबासाहेब घोरपडे को इचलकरंजी का भाग्य विधाता भी कहा जाता है।

श्रीमंत नारायणराव ने उस समय स्नातक तक पढाई इंग्लैंड से की थी। इसलिए उनका दृष्टीकोण भी अन्य राजाओं से अलग था। अपनी जागीर के लोगों का रहन सहन सुधरना चाहिए,  इचलकरंजी के लोगों के जीवन में सुख समृद्धि आनी चाहिए, इस विचार से उन्होंने अनेक ठोस कदम उठाए। अत: श्रीमंत नारायनराव बाबासाहेब घोरपडे को इचलकरंजी का भाग्य विधाता कहा जाता है।

1903 में यहां लगभग 300 पिटलूम हेंडलूम थे, जिन पर गलीचे व मोटा कपड़ा बनता था। यह घाटे का धंधा था। मुंबई में एक प्रदर्शनी में उन्होंने पावरलूम देखा। इचलकरंजी के तरुण व्यवसाई  विट्ठलराव दातार को जहागीरदार नारायणराव घोरपडे ने मदद की। इस मदद के कारण शेफील्ड कम्पनी (इंग्लेंड) से पहला पावरलूम इचलकरंजी में आया और व्यंकटेश रंगतन्तु मिल के नाम से कारखाना शुरू हुआ।

सन 1940 तक इचलकरंजी में 1400 पावरलूम थे, जिनकी संख्या 1,50,000 तक गई और आज 70,000 ही शेष हैं।

पावरलूम व्यवसाय टिका तो ही इचलकरंजी टिकेगी। लोगों की आर्थिक समस्या हल होनी चाहिए इसके लिय इचलकरंजी अर्बन बैंक की स्थापना की।

शुरुवात में लूम इंजिन से चलाये जाते थे, जिनमें सिर्फ दिन में ही काम होता था। जब यह पता लगा की सांगली और कोल्हापुर में बिजली सप्लाई शुरू होने वाली है, तो इचलकरंजी में श्रीमंत नारायनराव घोरपडे ने अपने सहकारी विश्वस्तों से चर्चा कर शेठ मांगीलाल जी डाल्या को इस कार्य की जिम्मेदारी दी और 9 लोगों की भागीदारी से कम्पनी की स्थापना कर 1936 में इचलकरंजी में कम्पनी की विद्युत सप्लाय शुरू हुई। इचलकरंजी पावरलूम उद्योग को खड़ा करने में कोष्ठी समाज का बड़ा हाथ है।

श्रीमंत नारायनराव के शहर में उद्योग बढे इस स्वप्न को पूरा करने में स्व.विट्ठलराव दातार, स्व. बलवंतराव मराठे, स्व. रामजीवन डाल्या, स्व.मांगीलाल हरसुख डाल्या, स्व. ज्ञानदेव सांगले, स्व. आबासाहेब खेबुडकर, स्व. शेठ फूलचंद शाह इत्यादि का विशेष सहयोग रहा। इचलकरंजी वो शहर है, जहां मालिकों ने अपने अधीनस्थ कामगारों को भी अपने बराबर का मालिक बनाया। जिसमें सहकार की बड़ी  भूमिका थी। हर कुशल कामगार आगे जा कर सफल उद्योजक बना।

हमें इचलकरंजी पावरलूम विकास की यात्रा समझने के लिए इसे 1904 से 1940 तक 1941 से 1962 तथा 1963-1982 तीन अलग-अलग कालखंडो में जाना होगा।

1904 से 1940 तक यहां रंगीन साड़ी तैयार होती थी जिसे उपरोक्त लोग बनाते थे और उसे कमिशन बेसिस पर बेचते थे, जो सिमित स्वरूप में ही था।

1942 से 1962 के दरम्यान फूलचंद शाह, मांगीलाल हरसुख डाल्या, श्रीकिशन सितारम सारडा, श्रीकिशन रामजीवन डाल्या, श्रीवल्लभ पुनावाला, दगडूलाल जी मर्दा, लक्ष्मी नारायण सारडा इत्यादि व्यापार पेढ़ियों के माध्यम से इचलकरंजी की रंगीन साड़ी देश के कोने-कोने तक पहुंची और इन पेढ़ियों पर काम करनवाले अधिकांश मजदूर आगे जाकर सफल उद्योजक बने। इन्ही पेढ़ियों में से दगडूलाल जी मर्दा का अरविन्द ग्रुप आज भी ‘फायबर टू फैशन: वेल्यु एडिशन’ कपड़ा व्यवसाय में अपना परचम  फहरा रहा है।

1960 के बाद व्यवसाय में नये-नये लोगों का आगमन शुरू हुआ।

उद्योग को आधार देने व कच्चे माल की उपलब्धता हेतु एशिया महाद्वीप की पहली सहकारी सूत मिल डेक्कन मिल की स्थापना हुई।

पूर्व में 1920 में बनी अर्बन को ओप क्रेडिट सोसायटी के बाद इसी काल में जनता सहकारी बैंक की स्थापना हुई।

1962 से 1982 का कालखंड इचलकरंजी में सहकार का स्वर्णिम काल था। इस समय के सभी नेताओं ने राजनीती को अलग रख  ‘कोपरेटिव फॉर कोमन मेन’ का लक्ष्य रखा तथा अनेक सहकारी संस्थाओं की स्थापना की। जिनके माध्यम से इचलकरंजी वस्त्र व्यवसाय ने नये आयाम बनाए।

हर 12 से 15 साल बाद इस वस्त्र व्यवसाय में मंदी आती रही पर यहां के उद्योग ने हर बार मंदी के काल को अवसर में बदला और काम का तरीका बदला।

कपड़े में आधुनिकता लाने के लिए कल्लप्पा आवाड़े दादा ने 1981 में दत्ताजीराव कदम टेक्सटाइल इन्सिटयूट की स्थापना की। जिससे तैयार पीढ़ी ने 21वें दशक में इचलकरंजी में उन्नत तकनीकी का मार्ग दिखाया और सम्पूर्ण देश में इचलकरंजी टेक्सटाइल का नाम रोशन किया।

इचलकरंजी शहर स्वाभिमानी व मेहनतकश लोगों का शहर है।

1962 के बाद भरपूर राजस्थानी समाज का यहां व्यवसाय निमित्त आगमन हुआ और सभी लोग यहां दूध में शक्कर की तरह घुल गये।

राजस्थानी समाज के लोग अपने साथ ईमानदारी और परिश्रम और व्यवसायिक बुद्धि लेकर आए और इन्ही गुणों की बदौलत इस व्यवसाय को नए-नए आयाम प्रदान करने में अपना योगदान दिया।

वस्त्र व्यवसाय बढ़ने के साथ ही मजदूरी पर बीम का चलन शुरू हुआ जिसमे राजस्थानी समाज जॉब पर कपड़ा बनवाने लगा और व्यवसाय में अलग अलग तरह की क्वालिटी बनना शुरू हुई।

इचलकरंजी में बने कपड़े को सम्पूर्ण देश में पहचान दिलाने में राजस्थानी पेढ़ियों के सहयोग को नजरंदाज नहीं किया जा सकता जिन्होंने यहां की धोती को सम्पूर्ण विश्व में पहुंचाया।

इचलकरंजी पावरलूम व्यवसाय को मुंबई मिलों की हड़ताल ने एक उडान भरने का सुनहरा मौका दिया और 1982 से 1998 का सबसे स्वर्णिम काल इस व्यवसाय का रहा जिसमें हर तबके का आर्थिक विकास हुआ।

2000 से 2004 का दौर भयंकर मंदी का दौर था और इस काल में फिर इचलकरंजी ने करवट बदली। शहर में उन्नत आधुनिक लूम अर्थात शटल लेस एयरजेट लूम आने शुरू हुए साथ ही साथ नई तकनीकी की साईंजिंगे भी आनी शुरू हो गईं।

आज यहां करीब 60 उन्नत तकनीक की व 140 साधारण साईंजिंगो के माध्यम से करीब 8 लाख किलो की सूत प्रतिदिन साईंजिंग होती है।

आज इचलकरंजी में लूम निम्न प्रकार है।

इस तरह करीब 1 करोड़ मीटर कपड़ा रोज बनता है, जिसमें से 30लाख मीटर कपड़ा प्रतिदिन यहां 50 प्रोसेस के माध्यम से प्रोसेसिंग होता है। हर बार व्यावसायिक संकट के बाद इचलकरंजी ने परिवर्तन की राह पकड़ी आज ऑटो लूम एयरजेट लूम के साथ-साथ गारमेंट उद्योग भी यहां बड़े पैमाने पर शुरू हुआ।

 

लूम संख्या प्रतिदिन उत्पादन          कुल उत्पादन
  सादे पावरलूम                

  ऑटो लूम         

एयरजेट/रेपेयर लूम 

70000 

3000

10000

80 मीटर  

125मीटर  

400 मीटर 

5600000 मीटर

375000 मीटर

4000000 मीटर

देश में आर्थिक क्षेत्र में जीएसटी सबसे बड़ा परिवर्तन था, जहां पूरे हिंदुस्तान में इसका विरोध हुआ पर इचलकरंजी वस्त्र व्यवसाइयों ने पहले दिन से जीएसटी में काम शुरू कर दिया। हर सरकारी योजना को समझाना उनका फायदा लेना इचलकरंजी का स्वभाव है और इसके पीछे कारण है कि यहां सम्पूर्ण व्यवसाय बैंक से ही होता है। कोरोना ने सम्पूर्ण देश में अर्थचक्र रोक दिया इचलकरंजी पर भी इसका परिणाम हुआ पर हर बार की तरह फिर मार्ग निकला और आज मेडिकल क्षेत्र में लगने वाले कपड़े की सप्लाय बड़े स्वरूप में यह से होने लगी वस्त्र उद्योग कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला उद्योग है॥ आज ऑटो और सादे लूम में प्रतिस्पर्धा हो रही है जो कि गंभीर विषय है।  पावरलूम पर निर्यताभिमुख कपड़ा बनाने की एक मर्यादा है। जो आज तक घरेलू मांग को पूरा करता रहा है। वही ऑटोलूम 100% निर्यात योग्य कपड़ा बना सकता है। अत: टेक्निकल अपग्रेडेशन स्कीम में फायदा लेने वालों पर निर्यात हेतु शर्ते रखी जाएंं।

* पावरलूम व्यवसाय जिन्दा रहना जरूरी है। इस हेतु सरकार हेंडलूम की तरह यहां भी आर्थिक सहायता दे।

* सहायता हेतु यहां (DGFT) की विंडो खोली जाये और हर छोटे बड़े उत्पादक को निर्यात हेतु मार्गदर्शन मिले।

* MSME द्वारा घोषित नीतियों का फायदा ज्यादा से ज्यादा कैसे मिले इस और सरकार विशेष ध्यान दें। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि कहीं ये नीतियां अफसरशाही में ना अटक जाएं।

* पावरलूम उद्योग में आत्म निर्भर भारत का सपना साकार करना है, रोजगार को बचाना है, तो चीन के बांग्लादेश मार्ग से आने वाले कपड़े पर प्रतिबंध लगाना होगा।

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