बैंक-सहकारिता के पुरोधा ‘भालचन्द्र भांगे’

आज दुनिया में जहां लोग एक छोटा-सा काम करके भी नाम पाने की इच्छा रखते हैं, वहीं अपने कामों का कही भी प्रचार किये बिना कामों को निरंतर आगे बढ़ाने वाले लोग विरले ही होते हैं। भालचंद्र श्रीनिवास भांगे ऐसे ही विरले लोगों में से एक हैं। राजाभाऊ के नाम से संघ में प्रसिद्ध भांगे जी इस वर्ष अपनी आयु के 75 वर्ष पूर्ण कर चुके हैं। 16 अक्टूबर, 1937 भारतीय कालगणना के अनुसार विजयादशमी को भांगे जी का जन्म नागपुर में हुआ। नीलसिटी हाईस्कूल, जिसका नाम बाद में दादा साहेब धनवटे नगर विद्यालय हो गया, से भांगे जी ने अपनी विद्यालयीन पढ़ाई पूरी की। विशेष बात यह कि संघ के संस्थापक प. पू. हेडगेवार जी ने भी इसी विद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। यह विद्यालय राष्ट्रीय विचारों के प्रभावों वाला था। भांगे जी के बडे भाई नारायण भांगे, जिन्हें सब बाल के नाम से जानते थे, खो-खो के खिलाडी थे और नियमित स्वयंसेवक थे। भांगे जी को शाखा से जोड़ने का श्रेय उन्हीं को जाता है। नागपुर की चौक शाखा, जिसकी स्थापना प. पू. बालासाहब देवरस ने की थी, भांगे जी उसी शाखा के स्वयंसेवक थे। शाला के बाद बेंझाने महाविद्यालय से भांगे जी ने कला संकाय में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। भांगे जी के पिता ब्रिटिश शासन में सरकारी नौकरी करते थे। गांधीजी की हत्या के प्रभाव के कारण उन्होंने घर में सभी को संघ से दूर रहने का निर्देश दिया था। परंतु भाई के सहयोग के कारण भांगे जी शाखा के नियमित स्वयंसेवक बने रहे। संघ का कार्य चलता रहे इस उद्देश्य से भाई ने पिताजी से भांगे जी की नौकरी की बात की और वे तैयार हो गये। चंद्रपुर जिले के नवरगांव के विद्यालय में उन्होंने शिक्षक की नौकरी की। भारत विद्यालय नामक इस विद्यालय में दो वर्ष तक कार्यरत रहे। इसके साथ ही संघ कार्य भी चलता रहा। विद्यालय की नौकरी के दौरान ही भांगे जी ने एम. ए. करने का निश्चय किया और वे नवरंगाव से नागपुर वापस आ गये। एम. ए. की परीक्षा के दौरान ही उन्हें रेल्वे में नौकरी का बुलावा आया और एम. ए. की पढ़ाई अधूरी छोडकर ही उन्होंने रेलवे की नौकरी शुरू कर दी। रेल्वे के यार्ड में वे क्लर्क का काम करते थे। ट्रेनों के आने जाने का रिकार्ड रखते थे। हालांकि यह कार्य भांगे जी को कुछ खास पसंद नहीं था, परंतु उन्होंने मन लगाकर काम किया। उनके बडे भाई को इस बात का पता चलते ही उन्होंने विदर्भ अर्बन को-आप. बैंक के अधिकारी से भेंट करवायी। उन्हें तुरंत यह नई नौकरी शुरू करनी थी, परंतु रेल्वे ने उन्हें छ: महीने तक नहीं छोडा। अंत में उन्होंने एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की और उनकी सहायता से उन्हें रेल्वे छोड़ने में आसानी हुई।

सन् 1965 में भांगे जी महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक से जुड़े और 31 वर्ष तक उन्होंने इस बैंक को अपनी सेवायें प्रदान की। सन् 1995 में 58 वर्ष की आयु में वे प्रथम श्रेणी आफिसर के रूप में निवृत्त हुए। इस बैंक से जुडने के बाद से सहकार क्षेत्र और मुख्यत: सहकार क्षेत्र में बैंकिंग में उन्होंने प्रवीणता हासिल कर ली। महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक एक प्रकार से बैंकों का जाल थी। गांवों में किसानों की सुविधा के लिये प्रायमरी एग्रिकल्चर को. आप. सोसायटी चलाई जाती है। प्रत्येक जिले के सभी गावों की सोसायटी को मिलाकर एक जिला बैंक बनाई जाती है और सभी जिला बैंकों को मिलाकर बनने वाली एक अपेक्स बैंक महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक होती है। भांगे जी ने प्रोफेशनल कोर कंपीटेन्स सलाहकार के रूप में भी कई वर्षों तक कार्य किया। काम के सिलसिले में उनके तबादले और प्रवास होते रहे, जिसके कारण उन्हें पूरे महाराष्ट्र को जानने, समझने का अवसर मिला। मुख्यत: नासिक, पेण, रत्नागिरि और सिंधुदुर्ग विभागों की।

इंस्पेक्शन करने के लिये भी वे सबसे दूर की प्राइमरी बैंक का चुनाव करते थे। लोगों को आश्चर्य होता था कि महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक का कोई अधिकारी गांव में आया है। धीरे-धीरे उन्होंने बैंको के आडिट को अपनी प्रवीणता का विषय बना लिया। इन सारे अनुभवों के साथ वे सहकार क्षेत्र में कार्यरत रहे।

भाइन्दर में वे भाइन्दर सेवा-सहकारी सोसायटी से जुड़े, जो कि लोगों को दैनंदिन उपयोग के सामान मुहैया करवाती थी। वे तीन वर्ष तक सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत रहे और हानि में चल रही इस सोसायटी ने उनके परिश्रम के बल पर लाभ अर्जित करना शुरू कर दिया। ठाणे की एक मात्र सोसायटी जो संघ के अधीन थी, उसे भी भांगे जी ने चलाया।

अपने सहकारियों के साथ भांगे जी के संबंध बहुत अच्छे थे। कृष्णराव म्हात्रे उनके सहकारियों में से ही एक थे। वे पक्के कांग्रेसी और भांगे जी स्वयंसेवक, परंतु उन्होंने कई वर्षों तक साथ-साथ काम किया। अब म्हात्रे 90 वर्षों के हैं और भांगे जी गणपति के समय उनसे मिलने गये थे।
भांगे जी ने कई सोसायइटियों में अपनी सेवायें प्रदान की। उन्हें नई उपलब्धियां दिलाई और उन्नति के कई सोपान चढ़ाये। गौरव की बात यह है कि इनमें से बहुत सी सोसायटी के रजत जयंती महोत्सव में वे स्वयं उपस्थित रहे और कार्यक्रम का आयोजन तथा देखरेख की।
अपनी नौकरी के साथ-साथ उन्होंने अन्य कई सहकारी बैंकों के साथ भी काम किया। अपनी सेवानिवृत्ति के पूर्व से लेकर बाद तक 11 वर्षों ेतक वे वसई जनता सहकारी बैंक के साथ जुड़े रहे। कुछ वर्षों तक उन्होंने मानद कार्यकारी संचालक के रूप में कार्य किया और कुछ वर्ष संचालक मंडल में सलाहकार रहे। आफिस से निकलकर वे अपने खर्चे से वसई जाते थे। और रात में 11 बजे घर वापस आते थे। भांगे जी निम्न स्तर के लोगों से भी प्रेम, मैत्री और सौहार्द्र के अनौपचारिक संबंध बनाये। इस बैंक के रजत जयंती महोत्सव के भी वे आयोजक रहे इस समय की एक घटना को वे अपने अभिमान का विषय बताते हैं कि भोइसर में शाखा खोलने के उपलक्ष्य में रक्तदान शिविर का आयोजन किया था। शिविर के दौरान 100 बोतल रक्त प्राप्त करने का लक्ष्य था, परंतु 150 बोतल एकत्र हुआ।वे 5 वर्ष तक जनसेवा सहकारी बैंक बोरिवली लिमिटेड में संचालक और 3-4 वर्ष उपाध्यक्ष रहे। इस बैंक के रजत जयंती महोत्सव में भी वे उपस्थित थे। 5 वर्ष तक वे सहकार भारती, मुंबई के संगठनमंत्री रहे और अधिवेशनों के लिये भोपाल, बंगलुरु, दिल्ली और मुंबई में प्रवास किया। वे ग्राहक संघ दहिसर के स्थानीय संयोजक रहे। 25-30 सालों से वे लोगों से मांगपत्र भरवाकर और चेक लेकर सामान अपने घर लाते हैें, और 5 तारीख के पहले मांगपत्र के अनुसार लोगों को सामान देते हैें।

वे सहकार भारती के बैंकिंग प्रकोष्ठ में समन्वयक रहे। भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा अर्बन को-आपरेटिव से रेटिंग प्राप्त करने के विषय में उन्हें महारत हासिल है। उन्होंने कई स्थानीय सहकार भारतियों की स्थापना भी की है।

संघ को भी इन्होंने विभिन्न प्रकल्पों के लिये विज्ञापन और दान दिलवाये हैं। भाइंदर में इन्होंने कई वर्षों तक मंडल कार्यवाह के रूप में कार्य किया। 25 वर्ष से अधिक समय तक बोरिवली के संघचालक रहे।

भांगे जी एक वक्ता की अपेक्षा कार्यकर्ता के रूप में अधिक लोकप्रिय हैं। संघ की कार्यपद्धति का वे जीता जागता उदाहरण हैं। वे ऐसे संघचालक हैं जो स्वयंसेवक के घर जाकर मिलते हैं। असल में यही संघ की आत्मा है। संघ की शाखा और उत्सवों में वे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कार्यरत रहते हैं। छोटी से छोटी बैठक में भी जाते हैं। उन्होंने अन्य कई मंडलों जैसे ब्राम्हण सेवा संघ, श्री राम सेवा मंडल, अक्षर ज्ञानदीप मंडल का भी काम किया।

विवेकानंद शिला स्मारक के निर्माण के समय उन्होंने पत्रक लेकर भाईंदर से उत्तन भाग के एक-एक घर से संपर्क किया।
भांगे जी के परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती शुभा भांगे, बेटा नीरज, बहू श्रीमती चिन्मयी भांगे और दो बेटियां संगीता और मधुरा हैं। यह संपूर्ण परिवार भी संघ और उसके अन्य प्रकल्पों से जुड़ा है।

भांगे जी कहते हैं, ‘‘जब मैं अपने जीवन का आंकलन करता हूं, तो मैं संतुष्टि का अनुभव करता हूं कि मैंने एक अच्छा जीवन व्यतीत किया, जिसमें लोगों का सहयोग कर सका और उनका सहयोग प्राप्त भी कर सका।’’

उनकी इसी भावना के कारण लोग उन्हें सदैव मिलने के लिये इच्छुक रहते हैं और वे भी समय निकालकर सभी से मिलने की कोशिश करते हैं।

आपकी प्रतिक्रिया...