प्रेम की ‘यश’ गाथा

यश चोपड़ा अर्थात हिंदी फिल्म जगत की वैभवशाली और अष्टपहलू यात्रा के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व।
1958 में प्रदर्शित ‘धूल का फूल’ से लेकर ‘जब तक है जान’ (2012) तक यश चोपडा द्वारा 22 फिल्मों का निर्देशन किया गया। इस संख्या को नजरअंदाज करके उनके कार्यों का मूल्यांकन करना अधिक श्रेयसकर होगा।

‘प्रेम का बादशाह’ के रूप में यश चोपडा की एक अलग प्रतिमा तैयार होने लगी। 21 अक्टूबर, 2012 को जब उनका निधन हुआ तो सभी को इनकी कमी महसूस होने लगी।

‘प्रेम’ हिंदी फिल्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है। अपने देश में पौराणिक फिल्मों से लेकर अपराध क्षेत्र तक सभी प्रकार की फिल्मों का निर्माण होता है। इस बहुरंगी बहुढंगी फिल्मों को देखने वाले दर्शकों की संख्या अच्छी खासी है। ऐसी फिल्मों में भी प्रेम को एक बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है। हर फिल्म में प्रेम को अलग-अलग तरीके से प्रदर्शित करना यश चोपड़ा की विशेषता रही है। यश चोपड़ा का ‘दाग’, ‘कभी-कभी’, ‘सिलसिला’, ‘फासले’, ‘चांदनी’, ‘लम्हे’, ‘दिल तो पागल है’, ‘वीर-जारा’ तथा ‘जब तक है जान’ ये सभी फिल्में प्रेम पर आधारित हैं। इन फिल्मों में से एक फासले में उन्होंने 13 से 19 वर्ष के युवक-युवती की प्रेमगाथा को फिल्मी पर्दे पर उतारा है। इस फिल्म में यश चोपड़ा ने रोहन कपूर तथा फराह नामक नए चेहरे को मौका दिया है। हालांकि यश चोपड़ा को फासले के निर्देशन में बहुत ज्यादा वाहवाही नहीं मिल पाई, जबकि ‘लम्हे’ अगले दौर की फिल्म रही। लम्हे, चांदनी जैसी फिल्मों के माध्यम से यश चोपड़ा ने एक ऐसा दर्शक वर्ग बनाया कि उनकी हर नई फिल्म की दर्शकों को प्रतीक्षा रहती थी। चांदनी की प्रेमकथा के प्रति दर्शकों का रुझान यही बताता है कि निर्देशन में पूरी ताकत लगाना यश जी की आदत थी। प्रेम एक अलग ही अनुभूति होती है, इस बात को यश चोपड़ा ने बहुत ही कुशलता से परदे पर उतारा। यश जी ने ‘चांदनी’ में प्रेम के इंद्रधनुष को ऐसे परदे पर उतारा कि दर्शको को वाह-वाह कहना ही पड़ा।

लम्हे, चांदनी की तरह ही सिलसिला फिल्म यश चोपड़ा की सफल फिल्मों में से एक रही। हालांकि इस फिल्म का ट्रैक लम्हे, चांदनी के मुकाबले अलग था। पर इस फिल्म में अमिताभ बच्चन-रेखा की जोड़ी दर्शकों को प्रेम की सही अभिव्यक्ति का परिचय करा दिया। इस फिल्म में अमिताभ-रेखा के प्रेम के बीच तीसरे के आने से बदले हालातों को इतनी कुशलता से फिल्माया गया है कि दर्शकों को कहना ही पड़ा कि यश चोपड़ा का निर्देशन कौशल कितना उम्दा है। यश चोपड़ा की प्रेमकथा का यह सिलसिला तो अमिताभ, शबाना आजमी तथा परवीन बाबी पर फिल्माया जाने वाले था, इसके लिए यश चोपड़ा ने तैयारी भी पूरी कर ली थी, पर एक दिन यश चोपड़ा को न जाने क्या सूझा और वे कश्मीर रवाना हो गये, वहां अमिताभ बच्चन, टीनू आनंद निर्देशित ‘कालिया’ फिल्म की शूटिंग चल रही थी। वहीं यश चोपड़ा ने अमिताभ बच्चन से मुलाकात की और उनसे सिलसिला फिल्म के लिए जया तथा रेखा को एक साथ लाने की गुजारिश की (खुद के काम पर विश्वास रखने वाला निर्माता ही इस तरह का संवाद स्थापित कर सकता है।) अमिताभ बच्चन ने यश चोपड़ा की अपील पर गौर करते हुए उनसे पूछा, ‘‘क्या आपकी इस बारे में जया-रेखा से चर्चा हुई है?’’ यश जी ने कहा, ‘‘अभी इस बारे में सिर्फ आपसे ही पूछा है।’’ अमिताभ से चर्चा के बाद यश चोपड़ा मुंबई वापस आए और उन्होंने अगले सप्ताह जया व रेखा से मुलाकात की आरै दोनों अभिनेत्रियों को फिल्म में काम करने के लिए तैयार किया। ‘सिलसिला’ के लिए अमिताभ, जया, रेखा को एक साथ परदे पर उतारने की बात मीड़िया के लिए किसी बड़ी घटना से कम नही थी। यह फिल्म अमिताब बच्चन तथा रेखा के बीच के सच्चे प्रेम का दस्तावेज ही साबित हुई। वास्तव में अमिताभ-रेखा के बीच का प्रेम-प्रकरण इसी फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा आधार बना। इन प्रेम आधारित फिल्मों के बाद यश चोपड़ा अपनी दो विशेषताओं की ओर बढ़े- पहली यह कि उन्होंने स्विजरलैंड के गुलाब के फूलों के बगीचे को हिन्दी फिल्म के परदे पर उतारा, यही उनके प्रेम दृश्यों की विशेषता बन गई। दूसरी विशेषता सुंदर शिकान की साड़ी पहनी हुई अभिनेत्री पर कई दृश्य फिल्माए, पर इन सबके बीच यश जी ने प्रेम की गहराई को बनाए रखा। अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण यश चोपड़ा युवा दिलों की धडकन बने रहे और वे आजीवन आज की पीढ़ी के निर्देशक के रूप में पहचाने गए। प्रेम व्यक्ति को सदा युवा रखता है, तथा उसकी नवनिर्मिति प्रेरणा को जागृत रखती है। ‘घूल का फूल’ में यश चोपड़ा ने सामाजिक समता का संदेश दिया, तो दूसरी ओर ‘इत्तफाक’ में एक अलग प्रवृत्ति की कहानी परदे पर उतारी। राजेश खन्ना के काल की बेहतरीन भूमिका वाली फिल्में भी यादगार कही जा सकती है। ‘दीवार’ के समय पटकथा-संवाद लेखक सलीम-जावेद के साथ मुलाकात हुई। दो अलग प्रवृत्ति वाले भाइयों के संघर्ष में मां की व्यथा का चित्रण किया गया है। अमिताभ बच्चन द्वारा साकार की गई विजय की भूमिका बहुत पसंद की गई।

हिंदी सिनेमा के इतिहास में सर्वोत्तम तीन पटकथाओं में ‘परिवार’ का भी समावेश है। (फिल्म प्रदर्शन की तिथि 25 जनवरी, 1975) विशेष रूप से हिंदी फिल्म में सर्वोत्तम भावनात्मक किरदारों के संदर्भ में भी यश चोपड़ा किसी से पीछे नही रहे। ‘दीवार’ फिल्म के मेरे पास मां है। जैसा संवाद भी कम मायने नहीं रखते। यह संवाद इतने वर्षों बाद भी उतना ही प्रभावी लगता है। यश चोपड़ा के मशाल के वैलेट पियर के रास्ते पर मध्यरात्रि को अपनी बीमार पत्नी (वहिदा रहमान) को किसी वाहन की लिफ्ट देने के लिए उसके पति की पुकार अत्यंत दर्दनाक थी। अचानक एक प्रसंग उसके सामने खड़ा हो जाता है। प्रेम पर आधारित यश चोपड़ा की फिल्में दर्शकों के बीच क्यों चर्चा का विषय बनी, यह तो वे ही बता सकते हैं, पर प्रेम के मामले में उनकी फिल्में मील का पत्थर ही साबित हुईं। त्रिशूल, काला पत्थर, परंपरा जैसी फिल्मों ने यश चोपड़ा के फिल्म निर्माण की विविधता को ही रेखांकित किया।

यश चोपड़ा ने अपने बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा के बैनर से बाहर निकलकरके खुद की फिल्म निर्माण कंपनी ‘यश राज फिल्मस’ की स्थापना की। फिल्मकार वी. शांताराम तथा वितरक गुलशन राय की सहायता लेकर यश चोपड़ा ने यश राज फिल्म के लिए कार्यालय खोला। वी. शांताराम के राज कमल कला मंदिर स्टूडियो में यश राज फिल्म का कार्यालय खुलते ही यश चोपड़ा को फिल्मों को चाहने वालों की संख्या भी बढ़ती चली गई।

‘दाग’ से यश चोपड़ा ने फिल्म निर्माण की नई पारी शुरू की गुलशन राय ने अपनी माडर्न मुवीज से ‘दाग’ फिल्म प्रदर्शित की (मुंबई में उनका मुख्य सिनेमागृह मिनर्वा था) यश चोपड़ा ने गुलशन राय के त्रिमूर्ति फिल्म निर्माण संस्था के लिए जोशीला, दीवार तथा त्रिशूल फिल्मे बनाई। ‘दाग’ तथा उनके बाद यश चोपड़ा की कई फिल्मों का मुहूर्त भी वी. शांताराम के हाथों ही हुआ। इतना ही नहीं यश चोपडा की कई फिल्मों की शूटिंग भी राज कमल स्टूडियो में ही हुई। परंपरा की शूटिंग के दौरान यश चोपडा के साथ लंबी बातचीत का जो अवसर मुझे मिला, वह मेरे लिए यादगार बन गया।

यश चोपड़ा ने निर्माता व वितरक दोनों भूमिकाओं की सफलता पूर्वक निभाया। उनके पुत्र आदित्य द्वारा निर्देशित के दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे, आज भी मराठा मंदिर छवि गृह में दिखायी जा रहीं है। यह फिल्म 900 सप्ताह की ओर बढ़ रही है। यश चोपड़ा ने ‘चक दे इंडिया’, ‘धूम’, ‘हम तुम’ जैसी फिल्मों का निर्माण करते समय युवा फिल्मकारों को भी मौका दिया। इसी दौरान ओशिवरा में यश चोपड़ा ने यश राज स्टूडियो की भव्य व अत्याधुनिक इमारत भी खड़ी की। 80 वर्ष की आयु तक सक्रिय रहना यही बताता है कि यश चोपड़ा कार्य को कितना महत्त्व देते हैं। सदैव कुछ नया करने की लालसा ने ही उन्हें एक अलग चेहरा बना दिया था। यश चोपडा आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी फिल्में जब तक हैं, तब तक वे सबी फिल्मी दर्शकों के दिलों में जीवित ही रहेंगे।

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