सक्षम परंतु उपेक्षित ईशान्य भारत

नामक संस्था के द्वारा उत्तर पूर्व में भारत की एकता को कायम रखनेे के लिये किये प्रयासों के लिये नाबाम अतुम को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। उन्होंने उत्तर-पूर्व के विषय में चिंता दर्शाते हुए निम्न विचार व्यक्त किये।

अगर उत्तर पूर्व से आये किसी नागरिक से पूछा जाये कि आप किस देश से आये हो तो उसे कितना दर्द, कितनी पीडा होगी इसका अंदाजा लगाना कठिण है। इस दर्द और ऐसी अनेक घटनाओं के बीच से गुजरने के बाद भी देश के लिये कुछ करने का संकल्प लेना और उसे पूरा करना कोई आसान काम नहीं है। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सैकडों रजवाडों को एक साथ जोडकर बहुत कम समय में एक सूत्र में बांध दिया था। अगर वे कुछ समय और जीवित रहते तो उत्तर पूर्व कें इन बांधवों को भी भारत के अन्य प्रदेशों से जोड देते और निश्चित ही इन्हे अलग महसूस नहीं होता। सरदार वल्लभ भाई पटेल की मृत्यू ने इतिहास में एक ठहराव उत्पन्न कर दिया और उत्तर पूर्व की यह स्थिती हो गई।

पार्टी के संगठन का कार्य करने के दौरान मुझे उत्तर पूर्व के कई राज्यों में कार्य करने का मौका मिला। मैं उस क्षेत्र से भली भांति परिचित हूं। मुझे हैरानी होती है यह देखकर कि वहां के मोबाइल में चीन और तिब्बत की कनेक्टिविटी मिलती है। यह समस्या केवल उत्तर पूर्व के राज्यों की नहीं है। कई सीमावर्ती प्रदेशों पर रह समस्या है। जब गुजरात के कच्छ के रण में कोई सेना का जवान मोबाइल फोन का इस्तेमाल करता है तो उसे पाकिस्तान की कनेक्टिविटी मिलती है। टी. वी. पर पाकिस्तानी चैनल दिखाई देते हैं। मैने भारत सरकार को कई बार यह सुझाव दिया कि हम अपने सैटेलाइट और अत्याधुनिक तकनीकों की मदद से ऐसे टॉवर बनाये जिससे यह परेशानी दूर हो। पाकिस्तान हमारे यहां नहीं बल्कि हम पाकिस्तान में छा जायें। परंतु मेरे सुझावों पर भारत सरकार ने कोई कार्य नहीं किया।

उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में जाने के लिये पश्चिम बंगाल के सिलीगुडी तक जाना पडता है। यह ऐसी जगह है जो इस राज्यों तक पहुंचने का जरिया है। इतने सालों में कभी यह नहीं सोचा गया कि इसे कुछ आधुनिक सुविधाएं दी जायें। यहां कोई व्यवस्था बढ़ाई जायें। कोई भी देश अपने सीमावर्ती प्रदेशों के प्रति उदासीन नहीं हो सकता। अगर मुंबई दिल्ली, अहमदाबाद में कुछ कमी रह जाती है तो वह कुछ शिकायतों का कारण बनेगी। परंतु अगर सीमावर्ती प्रदेशों में अगर कुछ कमी रह गई तो वह संकट को आव्हान करेगी। अत: सीमावर्ती प्रदेशों को विकसित करने पर जोर दिया जाना चाहिये। उनकी सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिये।

1962 तक यह बात शायद उतनी महत्वपूर्ण न लगी हो। अच्छेपन में, भोलेपन में 1962 तक सब चल गया। परंतु 1962 में जोरदार चांटा पडने के बाद भी हम नहीं सुधरे और उत्तर-पूर्व के लोगों को जनआंदोलन चलाना पडा जिससे सरकार यह समझे कि चीन कुछ कर रहा है। हमारी यह दुर्दशा है कि सरकार को चीन के कारनामे दिखाने के लिये जगाना पड़ रहा है। अगर यह जन आंदोलन नहीं हुआ होता और मीडिया इस बात को सामने न लाया होता तो दिल्ली की सरकार अभी भी ‘सब सलामत’ के चक्कर में रही होती।

अंग्रेजों ने अपने शासन काल में बडी कूटनीति से भारत को कई हिस्सों में बांटने की कोशिश की वे कभी नही चाहते थे कि भारत की जनता को एकता का अहसास हो। सन 1857 की घटना के बाद तो यह प्रयास और भी तेज कर दिये गये। उन्होंने सिखों के मन में खलिस्तान के बीज बोये और उन्हें हिन्दुओं से अलग होने के लिये प्रेरित किया। दक्षिण के लोगो को यह कहकर अलग किया कि आप आर्य नही द्रविड है। उत्तर पूर्व के लोगो से कहा आप मंगोलियन है। अपनी नाक, आंख चेहरा कुछ भी भारतीयों जैसा नहीं है। उन्होंने 250 सालों तक यह जहर भरते शिक्षा-दीक्षा सभी में बिखराव के ही बीज बोये गये। इतने पापों को धोने के लिये हमें भी उतनी ही ताकत से प्रयास करने चाहिये थे परंतु शासन व्यवस्था ऐसी रही कि जिनके पास दिल दिमाग थे उन्हे शासन व्यवस्था के प्रति स्वाभिमान नहीं था। देश की आत्मा की पहचान नहीं थी। उन्हे लगा दिल्ली में तिरंगा फहराने से और वहां के दफ्तर में जगह मिलने से सब ठीक हो गया। इसी खुशफहमी के चलते सारी अनहोनी घटनाये हो रहीं है।

हर वर्ष देश की सुरक्षा की दृष्टि से प्रधानमंत्री के साथ सभी मुख्यमंत्रियों की एक बैठक होती है। मैने इस बैठक में एक प्रस्ताव रखा था। मैं चाहता हूं कि देश की सुरक्षा और एकता की दृष्टि से इस योजना को सभी का समर्थन मिले। योजना के अनुसार मैंने उत्तर-पूर्व के सुरक्षा बल के जवानों को दो वर्ष के लिये गुजरात भेजने का आदेश देने को कहा। उनके वेतन, रहन-सहन, खान-पान सभी की जिम्मेदारी हमारी होगी। उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों से मिलाकर कुछ हजार-पंद्रह सौ लोग होंगे। वे दो वर्ष के लिये यहां आयेंगे और फिर अपने-2 क्षेत्रों में लौट जायेंगे। यह उनके लिये सुनहरा अवसर होगा। उन्हे भारत को भलीभांति जानने का अवसर मिलेगा। वे सुरक्षा बल के जवान है तो वापिस जाकर और अधिक कार्य करेंगे। गुजरात में वे हमारी भाषा सीखेंगे हमारे रहन-सहन से परिचित होंगे। गुजराती लोग घूमने के शौकीन होते है। भारत में कई स्थानों गुजराती मिल जायेंगे। और यही गुजराती लोग जब उत्तर पूर्व में बडी संख्या में आयेंगे तो इन जवानों से मिलकर उन्हे प्रसन्नता होगी। इन दोनों के बीच जो संबंध इस प्रकार स्थापित होगा वह किसी भी योजना से ज्यादा अच्छा होगा। मेरी योजना सभी को पसंद आयी और सभी ने तारीफ भी की परंतु वह योजना तारीफ तक ही सीमित रह गई। वापिस आने के बाद मैंने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखे परंतु अभी तक कुछ भी नहीं हुआ है हालांकि मेरे प्रयत्न जारी हैं। मैं आज भी यह वादा करता हूं कि एक एक साल नहीं आगे भी उत्तर-पूर्व के जवानो को गुजरात का निमंत्रण दूंगा।

आजादी के लिये जो आंदोलन संपूर्ण भारत में चला था उससे उत्तर पूर्व भी अछूता नहीं रहा। वहां भी देश के लिये जेल जानेवाले, शहीद होनेवाले लोग थे। नागालैण्ड के राणिमा गाडिल उन्ही में से एक हैं। परंतु आजादी के बाद उन्हे जिस प्रकार याद किया जाना चाहिये वैसा नहीं हो रहा है। अगर हम भारत भक्ति से जुडी घटनाओं को याद करते हैं और ऐसे लोगों को निरंतर स्मरण करते हैं तो हमारे युवाओं को प्रेरणा मिलती रहेगी। लेकिन किसी ने देश के लिये जान दी है, कोई अंडमान की जेल में रहा है, कोई फांसी के तख्ते पर झूला है आदि बातों को अगर याद किया गया तो एक परिवार का क्या होगा यही सोचकर इतिहास को भुलाया जा रहा है।

कारगिल युद्ध के दौरान मैं भाजपा के पंजाब, हरियाणा, कश्मीर प्रांत का प्रभारी था। कई दिनों तक मैं कश्मीर में रहा और जवानो से मिलता रहा। टाइगर हिल को जीतना कारगिल विजय का केन्द्र बिन्दु था। इसे जीतने के बाद कारगिल विजय पक्की थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि जब यह जिम्मा नागलैंड के जवानों को दिया गया है तो वे अपने टैंट में ही कांप गये थे। उन्हे नागालैंड के जवानों से हमेशा भय रहता था कि वे न जाने क्या करेंगे। नागालैंड के जवानों ने टाइगर हिल पर कब्जा किया और कारगिल विजय निश्चित हो गई। परंतु उनके साहस, शौर्य की सरकार की ओर से की गई उपेक्षा आज भी उनके मन को ठेस पहुंचाती है।

सन 1947 के बाद देश में स्वतंत्र रुप से शासन चल रहा है। परंतु अटल जी की सरकार बनने के बाद पहली बार उत्तर पूर्व के लिये अलग से मंत्रालय बनाया गया। किसी मंत्री को पहली बार यह जिम्मा सौंपा गया कि वह सरकारी धस से उत्तर पूर्व का विकास करे और वहां प्रगति के कार्य करे। अगर अटल जी की सरकार लंबे समय तक चलती तो जो काम सरदार पटेल के निधर के कारण अधूरा रह गया। था वह अटल जी के माध्यम से अवश्य पूरा हो जाता। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह असम से ही चुनाव जीतकर राज्यसभा में आते हैं। उन्होंने इतने सालों बाद 2008 में उत्तर पूर्व के लिये एक ‘विजय डाक्यूमेंट’ बनाया। इतने साल इसे बनाने में लग गये और आज अर्थात 2012 तक इसे केवल पढ़ा ही जा रहा है। न जाने इसका क्रियान्वयन कब होगा।

पूरा भारत देश आज बिजली के संकट से जूझ रहा है। सारे विश्व में ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा जोरों पर है। भारत में एक उत्तर पूर्व ही ऐसा क्षेत्र है जहां पानी का प्रवाह बहुत तेज है। अगर यहां हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट लगाये जाते तो वह अरुणाचल प्रदेश जो सूरज की पहली किरण लेकर भारत को रौशन करता है, बिजली देकर भी संपूर्ण भारत को रौशन करता परंतु दुर्भाग्यवश इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। इस प्रोजेक्ट से उनकी अर्थव्यवस्था में भी सुधार होता। जो पानी उनके लिये नैसर्गिक संपदा बनना चाहिये वही उनके लिये अभिषाप बन रहा है। इतनी बारिश होने के बावजूद भी मार्च-अप्रैल के आते-आते वहां पहाडी पर बसे गावों में पीने के पानी की समस्या होने लगती है। इन सभी के पीछे एक ही कारण है कि उत्तर पूर्व की ओर ने शासन की दृष्टि है न योजना न क्रियान्वयन। नेपाल को देखकर हैरानी होती है कि आज नेपाल हायड्रोपावर प्रोजेक्ट को लेकर बहुत मेहनत कर रहा है और दुनिया के कई देश वहां अपनी पूंजी लगा रहे हैं। नेपाल भारत को बिजली भेज रहा है। इसी रास्ते पर तिब्बत भी आगे बढ रहा है। हमारे पास घर में ही सारे संसाधन मौजूद है। परंतु हम उस ओर ध्यान नहीं दे रहे है। मेरे कहने के बाद कई लोगों को यह बात समझ में आई पंरतु दुर्भाग्यवश शासन को नही आ रही है। ऐसी परिस्थितियों में ही देश विरोधी तत्वों को खुला मैदान मिल जाता है।

श्रीमती इंदिरा गांधी ने उत्तर-पूर्व के चुनाव के दौरान साफ-साफ अपने मेनिफेस्टों में यह बात लिखी थी कि चुनाव जीतने के बाद हम यही बाइबिल के अनुसार अपना शासन चलाएंगे। अगर शासन करनेवाले लोग ही ऐसी बातें करेंगें। तो अलगाववाद को कितना बढ़ावा मिलेगा इसकी कल्पना की जा सकती है।

ऊर्जा के क्षेत्र मे न्यूक्लियर पावर नैसर्गिक और आर्थिक रुप से सबसे उत्तम है यह मानने वाला बहुत बडा वर्ग है। इस न्यूक्लियर पावर की सबसे मूलभूत आवश्यकता है यूरेनियम और यूरेनियम अगर भारत में कहीं है तो वह उत्तर पूर्व में ही है। हमारे प्रधानमंत्री के अर्थमंत्री बनने से पूर्व युरेनियम की खुदाई, उसकी प्रोसेसिंग, और उपयोग के संबंध में सरकारी खर्चे से कुछ न कुछ कार्य अवश्य चलता रहता था। परंतु इनके अर्थमंत्री बनते ही इस योजना को न केवल धन मिलना बंद हो गया अपितु यह योजना ही बंद कर दी गई। और अब जब वे प्रधानमंत्री बन गये है और डालर को मजबूत करने में लगे हैं, इस दिशा में प्रयासरत हैं कि यह काम अमेरिका द्वारा किया जाये। हम भी अपने संसाधनों का उपयोग करके न्यूक्लियर पावर के रुप में दुनिया में अपनी जगह बना सकते हैं आवश्यकता है तो इस ओर ध्यान देने की। अगर इस ओर ध्यान दिया गया तो परिस्थितियों में बदलाव आ सकता है।

उत्तर पूर्व में बहुत घने जंगल हैं यहां कई राज्यों की सीमाएं आकर मिलती है। यहीं पर अलगाववाद पनप रहा है। हथियारों की आवाजाही बढ़ रही है। इतना होने के बाद भी दिल्ली सब सलामत के मूड़ में ही बैठी है। अगर यहां के लोगों के दिलों को जीतना है तो उनकी समस्याएं सुलझानी होंगी। इनमें देशभक्ति कूट-कूटकर भरी है। मणिपुर में सभी जगह कृष्ण-भक्ति का माहौल है। जिस प्रकार गुजरात में हम जय श्री कृष्ण कहते हैं उसी प्रकार मणिपुर में भी कहा जाता है। इस प्रकार की सारी बातें हमें आसानी से जोड सकती है। परंतु वोट बैंक की राजनीति के चलते इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता। केवल पांच सीटे मानकर इस क्षेत्र की उपेक्षा कर दी जाती है। इस क्षेत्र को भारत के अन्य राज्यों से जोडकर रखने के लिये निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।

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