शिव-समर्थ योग प्रदाता पुस्तक

‘राष्ट्रगुरु समर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी महाराज’
मराठी के जाने माने लेखक, वक्ता, आध्यात्मिक चिंतक श्री सुनीलजी चिंचोलकर की बहुचर्चित एवं सम्मानित पुस्तक ‘चिंता करितो विश्वाची’ का हिंदी अनुवाद जबलपुर के समर्थ भक्त श्री सुरेश तोपखानेवाले ने किया है, जो कि हिंदी भाषियों के लिए अनुपम उपहार है। उक्त हिंदी अनुवाद की विशेषता उसकी भाषायी सहजता, सरलता एवं सरसता कही जा सकती है; और विषय वस्तु के प्रमाणित आलेख के रूप में उसकी उत्कृष्टता निर्देशित की जा सकती है।

‘‘राष्ट्रगुरु समर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी महाराज’’ शीर्षक पढ़ने से ही कथा के प्रति उत्सुकता जागृत हो जाती है। इन दोनों महापुरुषों की परस्पर पूरक एवं परस्पर प्रभावी गाथा के रूप में विचारणीय तथा उत्प्रेरक सिद्ध होती जाती है। धर्म राजनीति एवं कूटनीति के अदभुत मेल ने जिस तरह प्रथम स्वराज्य शिल्प को साकार कर हिंदवी अस्मिता का शंखनाद किया, यह समूचा इतिहास उस विजयश्री का अपूर्व हुंकार है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

तेरह अध्यायों में विभाजित यह चरित्र-पट जहां हमें समर्थ रामदास के बहुआयामी आध्यात्मिक, साहित्यिक एवं राजनैतिक उत्थान से परिचित कराता है, वहीं छत्रपति शिवाजी के अद्वितीय साहसिक कार्य के पार्श्व उद्भाटक के रूप में उनके योगदान का प्रमाणित दर्शन भी कराता है। दोनों महापुरुषों का संबंध गुरु-शिष्य के रूप में कैसा फला-फूला एवं साकार हुआ, इसका लेखक ने जो प्रमाण सहित विवेचन किया है वह निश्चित ही सराहनीय है। स्वामी रामकृष्ण और विवेकानंद के जीवन-प्रसंगों को लेखक ने संदर्भित कर जिस तरह से अपने कथन को सुस्पष्ट किया है, वह भी प्रसंगोचित कहा जा सकता है।

समर्थ योगदान का अभिलेख- समर्थ गुरू रामदास के जन्म से लेकर अंत तक का अभिलेख हमें तत्कालीन मुगलों के बर्बर अत्याचार-अनाचार की राष्ट्रीय दुर्दशा से परिचित कराता है, वहीं उसके प्रतिरोध के लिये समर्थ गुरू रामदास द्वारा किये गये प्रयासों की रूपरेखा भी प्रस्तुत करता है। प्रभु रामचंद्र एवं सीतामाता के साक्षात दर्शन उनके कृपा चिन्ह की प्राप्ति तथा रामदूत महाबली हनुमान का आत्मभाव मिलना, समर्थ का गायत्री पुरश्चरण करना तथा सूर्य शक्ति से तेजस्विता प्राप्त करना आदि प्रसंग उनके आध्यात्मिक शक्ति के परिचायक हुए हैं। समर्थ के स्वाध्याय काल में शिवाजी महाराज के पिता श्री शहाजी महाराज से भेंट तथा उत्तरार्ध में उन्हीं की जागीर में महाबलेश्वर-चाफल-सज्जनगड में कार्यक्षेत्र विकसित करना एक विशेष योजना का हिस्सा था; यह लेखक का संकेत निश्चित ही विचारणीय है। समर्थ-शिवाजी के परोक्ष-अपरोक्ष अपूर्व सहयोग का वह महान क्षेत्र फलक है।

सिख धर्मगुरु से प्रभावी भेंट- इस ऐतिहासिक गाथा का उल्लेख विशेष यह है कि समर्थ गुरू रामदास की सिख गुरुओं से भेंट तथा महापुरुषों में हुआ सत्संग। स्वाध्याय एवं तपसाधना के पश्चात भारत-भ्रमण पर निकले समर्थ की काश्मीर में सिख-गुरु श्री हरगोविंदजी से हुई भेंट तथा चर्चा, स्वर्ण मंदिर में बिताया गया समय आदि समूची हकीकत अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है, जिससे समर्थ के शक्ति जागरण कार्य का स्त्रोत ज्ञात होता है। मुगल मंदिर तोडते रहे, वहीं समर्थ महाबली श्री हनुमानजी की मंदिरों की स्थापना करके भारत भर जाल बिछा कर शक्ति का अलख जगाते रहे। समर्थ का मंदिर-मठ एवं महंत निर्माण कार्य छत्रपति शिवाजी महाराज के लिए कितना उपयोगी सिद्ध हुआ, यह विस्तार से पुस्तक में प्रमाणों सहित बताया गया है।

महिलाओं को मठाधिपति (महंत) बनाना- समर्थ के जीवन कार्य का एक क्रांतिकारी पहलू पुस्तक में दर्ज किया गया, जो कि स्त्री शक्ति को सम्मान एवं महत्व प्रदान करता है। समर्थ ने अपने शिष्यों में से चुने हुए लोगों को मठपति अर्थात् महंत बनाया, उसमें उल्लेखनीय महिलाओं के भी नाम और काम है। उस समय की सामाजिक स्थिति एवं रीति-रिवाज ऐसे थे, जिसमें स्त्री को गौण स्थान एवं उपेक्षणीय व्यवहार प्राप्त था। विधवाओं की स्थिति तो और भी भयानक थी। समर्थ ने योग्यता मापकर विधवाओं को भी महंत, मठप्रमुख बनाकर नया आदर्श स्थापित किया। अर्थात् यह सब समर्थ संतत्व के कारण ही संभव हुआ, पर फिर भी उल्लेखनीय कार्य रहा। समाज के सभी वर्गों का सहयोग एवं योगदान राष्ट्रकार्य में एवं धर्मकार्य में बराबरी से आवश्यक है, यह वास्तविकता ही समर्थ ने सिद्ध कर दिखाई। इसीलिये समर्थ को राष्ट्रगुरु कहना उचित ही है।

अलौकिक शिव-समर्थ योग- छत्रपति शिवाजी महाराज एवं समर्थ रामदास स्वामी का संयोग एक अलौकिक योग है जो कि निरंतर सचेतन एवं प्रेरणादायी है। इस योग को नकारना या विभाजित मानना एक बड़ी भूल होगी। पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर यदि हम महापुरुषों को तौलेंते हैं वह खुद को एवं समाज को बौना बना देता है; यह महाराष्ट्र का वर्तमान दिखा रहा है। शिव समर्थ योग राष्ट्रीय अस्मिता का हुंकार है और रहेगा भी। स्वतंत्रता संग्राम के समय तिलक-गोखले-गांधी-विनोबा-डा. हेडगेवार आदि ने समर्थ के जीवन कार्य और ग्रंथों से संगठन कौशल, चरित्र-निर्माण एवं अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा ली थी। ‘‘शिवाजी महाराज की जय’’ आज भी अपूर्व चेतना, वीरश्री का संचार करता है, तो ‘‘जय जय रघुवीर समर्थ’’ घोष आज भी आत्मिक शक्ति और आनंद का भावोद्गार सिद्ध होता है। इसका यथार्थ अनुभव कराती यह पुस्तक निश्चित ही सराहनीय है।

इस पुस्तक की रोचकता एवं रंजकता का एक पक्ष इसमें बताई गई समर्थ एवं शिवाजी के विषय की अनेक कथाएं। इनका अपना एक विशेष महत्व है, ये नीति कथायें तो हैं ही, पर प्रेरणादायी भी है, जिनका अपने आप में अनन्य महत्व है।
मराठी में पांच संस्करण एवं अनेक पुरस्कार पाने वाली ‘चिंता करितो विश्वाची’ पुस्तक के हिंदी अनुवाद को पुणे के मोरया प्रकाशन के श्री दिलीप महाजन ने अपने रजत-जयंती वर्ष में प्रकाशित किया है। हिंदी पाठक भी इस पुस्तक का मराठी जैसा ही स्वागत करेंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।

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