चिर विजय की कामना है, कर्म की आराधना है

 

भारत का मुकुट बने हिमाचल प्रदेश में सत्ता का मुकुट किसके सिर पर चमकेगा, इसका निर्णय प्रदेश की जनता कर चुकी है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव जिन कारकों पर निर्धारित होगा, उनमें मुख्यधारा, राजनीतिक दलों की स्थिति का समावेश है। सत्ताधारी दल की कारगुजारियों का भी चुनाव परिणाम पर असर पड़ेगा।

कोई भी चुनाव किसी भी सरकार व राजनीतिक दलों के काम-काज की कसौटी पर कसने का अवसर होता है। पहली बार भाजपा और कांग्रेस को बहुकोणीय मुकाबले के लिए उतरना पड़ा। 68 सीटों पर हुए चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा जहां दोबारा सत्तासीन होने का दावा कर रही है, वही कांग्रेस सत्ता पाने के हिए ताल ठोंक रही है। इस चुनाव में 68 सीटों में भाजपा कांग्रेस के उम्मीदवारों के बीच सीधा मुकाबला हुआ, बसपा ने इस मुकाबले में 66 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। हिमाचल लोकहित पार्टी ( हिलोपा) ने 36, तृणमूल कांग्रेस ने 25, सपा ने 16, माकपा ने 15, राकांपा ने 12, स्वाभिमान पार्टा ने 12, भाकपा ने 07 और शिवसेना ने 04 उम्मीदवारों को चुनावी जंग में उतारा। 105 निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनावी अखाड़े में अपना भाग्य आजमाने के लिए उतरे हैं।

मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा मिशन-रिपीट का नारा लेकर चल रही है। धूमल जी की सरकार ने विकास, प्रगति और सामाजिक न्याय के नए कीर्तिमान स्थापित कर सुशासन का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है। चुनावी मैदान में कुल 459 प्रत्याशियों में 27 महिलाएं हैं। चुनाव के लिए 7,253 मतदान केंद्र बनाये गये थे। इन चुनावों में लगभग 46 लाख से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जिनमें 22 लाख से अधिक महिला मतदाताओं का समावेश था। महिला मतदाताओं ने इस चुनाव में महंगाई को लेकर खुले तौर पर नाराजगी जताई।

राज्य में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही बताया जा रहा है। मुख्यमंत्री प्रो. प्रेमकुमार धू्मल की अगुवाई में सत्तारूढ भाजपा पंजाब की तरह हिमाचल प्रदेश में नया कीर्तिमान रचने की उम्मीद कर रही है। हिमाचल प्रदेश में 1977 के बाद कोई भी सरकार लगातार दो बार सत्ता में रहने में सफल नहीं हो पाई है। वर्ष 2007 में 41 सीटों पर भाजपा को विजयश्री मिली थी, जबकि कांग्रेस को 23 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। निर्दलीय प्रत्याशियों को तीन सीटों पर जीत प्राप्त हुई थी, जबकि बसपा के पक्ष में सिर्फ एक ही सीट पर आई थी।
भ्रष्टाचार कांग्रेस तथा भाजपा दोनों के लिए एक मुख्य मुद्दा रहा है। कांग्रेस को कोयला, 2-जी और राष्ट्रमंडल खेल जैसे घोटालों की वजह से गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा है। समूचे चुनाव प्रचार मेंं महंगाई का मुद्दा सबसे ज्यादा प्रखरता से उठाया गया। भाजपा नेतृत्व ने घरेलू गैस और डीजल के दामों में वृद्धि को कांग्रेस के खिलाफ सशक्त हथियार के रूप में प्रयोग किया और मतदाताओं को बताया कि ऐसे में उनके घर का खर्च कैसे चलेगा? धूमल सरकार ने कांग्रेस नीत केंद्र सरकार द्वारा सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या घटाये जाने पर एडवांस चूल्हा पेशकर 22.31 लाख महिला मतदाताओं को सुविंधा प्रदान करने का आश्वासन दिया.

मददगार सरकार फिर एक बार

मददगर सरकार फिर एक बार का नारा लगाते हुए धूमल जी तथा अनुराग ठाकुर जी ने पूरे प्रदेश को कमरतोड़ महंगाई से राहत दिलाने के लिए तथा सिलेंडरों की कटौती से होने वाले परेशानी को दूर करने के लिए इंडेक्शन चूल्हे का उपहार देकर जनता को बता दिया है कि भाजपा किस तरह जनता के हितों का ध्यान रखकर सुशासन के ध्येय से चलेगी और हिमाचल को एक आदर्श प्रदेश के रूप में पूरे देश में प्रखर करेगी।

राष्ट्रीय महामंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा जी ने चुनाव प्रचार-प्रसार में गतिशीलता लाकर कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन कर विजय के मार्ग पर प्रशस्त किया। हिमाचल प्रदेश में भाग्य आजमा रहे प्रमुख उम्मीदवारों में मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल, किशन कपूर, राजीव बिंदल, विधानसभा में विपक्ष की नेता विद्या रगेवन्स, कांग्रेस अध्यक्ष वीरभद्र सिंह, विजय सिंह मनकेडिया, कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष कैलाश सिंह ठाकुर, हिलोपा प्रमुख एवं पूर्व सांसद महेश्वर सिंह, वामपंथी नेता राकेश सिंघा और टिकेन्द्र सिंह पवार प्रमुख हैं। सभी के भाग्य का फैसला इवीएम मशीन में कैद हो चुका है। 20 दिसंबर को मतगणना के बाद यह तय हो जाएगा कि मतदाताओं ने किसे स्वीकारा और किसे नकारा है।

सत्ताधारी भाजपा तथा उसके प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ही गुटबंदी के शिकार रहे हैं। दोनों को ही इस चुनाव में विरोधी पार्टी के उम्मीदवार को पराजित करना है। राज्य के पूर्व भाजपा अध्यक्ष महेश्वर सिंह तथा अन्य असंतुष्ट नेताओं द्वारा गठित हिमाचल लोकहित पार्टी (हिलोपा) जो कि भाजपा के समर्थन के आधार कोे चोट पहुंचा सकती है। हिलोपा ने माकपा तथा भाकपा सें हाथ मिलाकर लोक मोर्चा बनाया, जो सीटों की बंटवारे की व्यवस्था के अंतर्गत चुनाव लड़ रहा है। इस सभी परिस्थितियों में प्रदेश की जनता की निगाहें भाजपा पर टिकी हुई है, इसका मुख्य कारण है यू.पी.ए. सरकार से मोहभंग और भाजपा की शानदार उपलब्धियां। शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, पारदर्शी शासन तंत्र जैसे कई विषयों में भाजपा की सरकार प्रदेश में बेहतर कार्य कर रही है।

प्रदेश कार्यालय की अंर्तकलह और वीरभद्र की घेराबंदी कर भाजपा ने सियासी चक्रव्यूह रचते हुए चुनाव प्रचार किया है। भाजपा और कांग्रेस के स्टार प्रचारकों ने हिमाचल के चुनाव प्रचार में दस्तक दी है। भाजपा ने अपने चुनावी प्रचार में मुख्यमंत्री धुमल को तीसरी बार सत्ता दिलाने के हिए यू.पी.ए. सरकार के घोटालों को भिभिन्न रैलियों में गिनाते हुए कांग्रेस पर सियासी प्रहार किए हैं, वहीं धूमल की खामियां बताते हुए कांग्रेस के स्टार प्रचारकों ने जमकर किलेबंदी की है। भाजपा के मिशन रिपीट के लिए वीरभद्र सिंह को सियासत के राजपाट में मुख्य रोड़ा मानते हुए सबसे ताकतवर राजनीतिक दुश्मन की संज्ञा दी है। सी.डी. मामले में वीरभद्र सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप के बावजूद केन्द्रीय नेतृत्व को उन्हें पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर वापस लेना पड़ा, जिनका शोर राज्य में प्रभाव है तथा भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी करने में सक्षम है। कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार की आग में जिस चीज ने ईंधन का काम किया है, वह है, कांग्रेसी शासनकाल के इस्पात मंत्री वीरभद्र सिंह। इसी दौर में एक इस्पात कंपनी ने भ्रष्टाचार किया गया था।

भाजपा के दूसरे बड़े नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री श्री शांता कुमार साफ छवि वाले नेता माने जाते हैं। सबसे अधिक सीटों वाला कागड़ा जिला शांता कुमार का गढ़ है। केंद्रीय नेतृत्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धुमल तथा पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष शांता कुमार के बीच समझैता करवाने में सफल रहा है।

भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में अपने लक्ष्य पूरा किया है। भारतीय जनता पार्टी के शासन काल में सामाजिक समरसता एवं समानता की नींव पर प्रगतिशील स्वावलंबी और समृद्ध हिमाचल, सुशासित एवं शांत हिमाचल आकार लेगा। हिमाचल की जनता ने 77 प्रतिशत वोटिंग करके लोकतंत्र पर अपनी आस्था को दर्शाया है।

कदम निरंतर चलते जिसके, श्रम जिसका अविराग है।
विजय सुनिश्चित होती उसकी, घोषित यह परिणाम है॥

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रदेश प्रभारी श्री कलराज मिश्र तथा राष्ट्रीय मंत्री तथा सहप्रभारी श्याम जाजू जी ने पार्टी के अंदर आपसी मतभेदों को दूरकर एकजुट करने का प्रयास कर संगठन को मजबूत बनाने तथा चुनाव के दौरान सौहाद्रपूर्ण वातावरण बनाने में अहम भूमिका अदा की।
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