महान विभूतियों में डॉ. अम्बेडकर अग्रगण्य

आधुनिक भारतीय समाज में जितनी भी महान विभूतियां हुई हैं, उनमें डॉ. अम्बेडकर अग्रगण्य हैं। उन्होंने दलित समाज के उद्धार के लिए अपनी अलौकिक प्रतिभा और अदम्य पराक्रम का उपयोग किया। सबसे निचले स्तर का जीवन जी रहे और सबसे पिछड़े समाज को ऊपर लाने हेतु उनके भगीरथ प्रयास के कारण ही उनकी प्रसिद्धि जमीन से आसमान तक फैली और अखिल भारतीय जनता को जिन पर अभिमान हो, ऐसे महापुरुष वे बने। उनका पुरुषार्थ पूरे भारत वर्ष में फैला। डॉ. अम्बेडकर को केवल दलितों की अस्मिता के प्रतीक के रूप में ही नहीं देखा जाता, अपितु उनका नाम भारतीय अस्मिता के प्रतीक के रूप में इतिहास में दर्ज होगा।

अम्बेडकर का जन्म जिस समाज में हुआ था, उस समाज को जो तिरस्कार और अपमान कई शताब्दियों तक सहना पड़ा था, वह सब कुछ उन्हें भी सहना पड़ा, उसमें से मार्ग बनाकर समाज को आगे ले जाने के लिए जिस पराक्रम की आवश्यकता थी, वह अम्बेडकर के भीतर थी। उस पराक्रम का तेज उनके व्यक्तित्व पर स्पष्ट दिखायी देता था। उन्हें कई बार विपरीत परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ा किन्तु उससे उनके व्यक्तित्व के तेज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

हिंदू समाज में दलितों का स्वाभिमान लगे, इसके लिए वे सदैव प्रयत्नशील रहे। वे आस्तिक और धर्मनिष्ठ थे, उनके इस गुण का प्रमाण राम मन्दिर में प्रवेश हेतु उनके सत्याग्रह से मिलता है। सामाजिक स्तर पर ऐसा दूसरा सत्याग्रह महाड़ में हुआ। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि उन्होंने यह प्रयास पूरे मनोयोग से किया था, किन्तु अन्तिम समय में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि चार वर्णों के चौखट में सीमित हिंदू समाज में दलितों के प्रति सम्मान भाव उत्पन्न नहीं होगा। इसलिए अन्य कोई मार्ग न देखते हुए अन्त में उन्होंने धर्मान्तरण करने का संकल्प लिया। डॉ. अम्बेडकर ने इस विषय पर खूब गहन चिन्तन किया कि जाति का भेद समाज से मिटाने के लिए समाज को त्यागने के अलावा अन्य कोई मार्ग नहीं है। यह उनका देशभक्ति और राष्ट्रीय भावना के प्रतिकूल निर्णय था। इस पर भी उन्होंने खूब विचार मन्थन किया था।
भारत में बौद्ध, सिख, मुसलमान, ईसाई, यहूदी इत्यादि विश्व के लगभग सभी सम्प्रदायों के लोग एक साथ रहते हैं। किन्तु अम्बेडकर ने इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार नहीं किया। केवल भाषा और संस्कृति के विषय में उनकी भारतीय भावना मानने जैसी नहीं थी। ईसाई धर्म में भी काले एवं गोरे का भेद बना हुआ है। इसलिए उन्होंने ईसाई धर्म को अंगीकार नहीं किया, यद्यपि ईसाई बनने के लिए उन्हें खूब प्रलोभन दिये गए। कुछ समय तक उन्होंने सिख पन्थ में जाने का मन बनाया था, किन्तु उस सम्प्रदाय में गुरुमुखी भाषा एवं लिपि का आग्रह होता है। उन्हें इसमें बड़ी अड़चन महसूस हुई। उनकी अड़चन को देखते हुए सिख पन्थ के धर्मगुरुओं ने ‘गुरुग्रन्थ साहब’ का एक संस्करण देवनागरी लिपि में प्रकाशित किया। किन्तु जब संविधान सभा में अस्पृश्यों को विशेष सहूलियतें देने के प्रश्न पर चर्चा शुरू हुई, तब एक सिख प्रतिनिधि ने उठकर मांग की कि सिख पन्थ के अस्पृश्यों को भी वैसी ही सहूलियतें मिलनी चाहिए। यह सुनकर सरदार पटेल और डॉ. अम्बेडकर चकित रह गये, वहीं से उन्होंने सिख पन्थ अपनाने का विचार त्याग दिया।

अन्त में उन्हें बौद्ध मत ही सर्वोत्तम लगा, क्योंकि यह मत भारत वर्ष में ही जन्मा था। डॉ. अम्बेडकर को हर दृष्टि से बौद्ध मत ही अच्छा लगा। विश्व के सभी पन्थों के संस्थापकों की अपेक्षा गौतम बुद्ध ही एक मात्र ऐसी विभूति हैं जिन्हें सभी सम्प्रदायों के लोग वन्दनीय मानते हैं। इस में धर्म बहुत कम मतभेद हैं। अम्बेडकर ने महात्मा बुद्ध के बौध मत का नव संस्करण प्रस्तुत किया। ‘बुद्ध और उनका धम्म’ नाम के ग्रन्थ के रूप में नयी संहिता की रचना की।

संविधान सभा में उनके व्यापक और मूलगामी प्रतिभा का दर्शन देश के बुद्धिजीवियों को हुआ। संविधान सभा में हरेक बिन्दु पर उन्होंने बुद्धिमत्तापूर्ण व्याख्या की, उनकी प्रतिभा से सभी प्रभावित थे।

अंग्रेजी शासन में लोगों को अपनी अस्मिता विस्मृत हो गयी थी। पिछड़े और उपेक्षित वर्ग में तो अस्मिता का अत्यधिक अभाव था। निचले तबके का व्यक्ति जब तक अपनी मेहरबानी पर रहता है तब तक तो हम खूब उदार बने रहते हैं, किन्तु जिस दिन से वह अपनी अस्मिता की बात करता है, उसी दिन हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। जिनके पास संख्या का बल नहीं, संसाधन का बल नहीं है, किन्तु प्रतिष्ठा और वैभव की आकांक्षा है, वे डॉ. अम्बेडकर में उसे ढू़ंढते हैं। दलित और अस्पृश्यों की अस्मिता प्रगतिगामी है। यह अस्मिता लोकतन्त्र की पोषक है, इसका स्वागत होना चाहिए।
——-

आपकी प्रतिक्रिया...