बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार

दूसरे महायुद्ध के बाद स्वतन्त्र हुए नये देशों ने जाति, धर्म, वंश, रंग और लिंग जैसे कृत्रिम मुद्दों से ऊपर उठकर अपने देश के नागरिकों के बहुआयामी विकास को प्राथमिकता देने की प्रतिबद्धता को स्वीकार किया, पर दुख की बात यह है कि ये सभी नये देश अपने देश के नागरिकों को विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा करने के दायित्व को सम्भालने में पूरी तरह से असफल रहे हैं। इस बारे में पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान जैसे इस्लामिक देशों की नकारात्मक भूमिका के सन्दर्भ में लगातार चर्चाएं भी होती रही हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे मुस्लिम शासित देशों में हिंदुओं की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। इन देशों में हिंदुओं का सम्मानपूर्वक जीने का मूलभूत अधिकार छीनकर वहां के मुसलमानों ने पूरी दुनिया को जैसे अंगूठा ही दिखा दिया है और भारत जैसे हिंदू राष्ट्र की ओर से किसी भी तरह का नैतिक समर्थन न मिलने से खिन्न होकर यहां का हिंदू समाज या तो नारकीय जीवन जी रहा है, अथवा दूसरे देशों में पलायन कर रहा है।

वर्तमान में बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामियों के विरोध में एक बड़े प्रवाह के आने का निष्कर्ष विश्व के समाचार-पत्रों तथा चैनलों ने निकाला है, पर यह निष्कर्ष अर्धसत्य है। पिछले कुछ सप्ताह में बांग्लादेश में धर्मांध तथा निधर्मी शक्ति के बीच जारी जंग का रूपांतरण देशव्यापी हिंसा में हुआ है और इस संघर्ष का सबसे भयानक असर बांग्लादेश के हिंदुओं पर पड़ा है। सन 1971 के युद्ध के बाद बांग्लादेश के निर्माण के समय बंगाली लोगों पर जो भयानक अत्याचार हुए, उसके दोषियों को फांसी पर लटकाने की मांग के लिए आन्दोलन शुरू हुआ। जमात-ए-इस्लाम जैसे धर्मांधों की राजनीति पर रोष व्यक्त करने वाला वर्ग है। इस आन्दोलन में सहभागी अनेक लोगों का जन्म ही सन 1971 के बाद का है। उस समय हुए रक्तरंजित नरसंहार के वे प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं। तब भी आज की नयी पीढ़ी खुद को राष्ट्रीय सरोकारों से जोड़कर आधुनिक लोकतन्त्र के स्वरूप में बांग्लादेश का नवोदय करना चाहती है, तो बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लाम जैसी कट्टरवादी पार्टी बांग्लादेश के आधुनिक लोकतन्त्र के विचार को ही जड़ से खत्म करने का प्रयास कर रही है। बांग्लादेश में इस तरह की दो पृथक-पृथक विचारधाराओं में संघर्ष चल रहा है।

बांग्लादेश में आज की संघर्षमय स्थिति का विचार करते समय उस देश का इतिहास समझ लेना जरूरी है।
धर्म के नाम पर पाकिस्तान का निर्माण करते समय पूर्वी पाकिस्तान तथा पश्चिमी पाकिस्तान शामिल हुए थे। पूर्वी पाकिस्तान अर्थात आज का बांग्लादेश। पूर्वी पाकिस्तान ने मुस्लिम राष्ट्रों में शामिल होने का निर्णय लिया था, तो भी वे अपनी बांग्ला संस्कृति और बांग्ला भाषा से किसी भी कीमत पर दूर होने के लिए तैयार नहीं थे, ऐसे वक्त में मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान के पूर्व भाग में भी उर्दू ही राष्ट्रभाषा होगी, ऐसी घोषणा की और आगे बताया कि जो उर्दू भाषा का विरोध करते हैं, वे इस्लाम के शत्रु हैं। बैरिस्टर जिन्ना की इस घोषणा के बाद पूर्व पाकिस्तान में निराशा की लहर ही दौड़ पड़ी । बंगाली लोग अपने साथ धोेखाधड़ी होने के कारण उग्र हो उठे। उर्दू भाषा लादने के विरोध में पूर्वी पाकिस्तान में आन्दोलन तथा प्रखर विरोध प्रदर्शन होने लगे। बंगाली विरुद्ध उर्दू के बीच का संघर्ष काफी तेजी से शुरू हुआ। पाकिस्तान के शासनकर्ता पूर्वी पाकिस्तान से हर स्तर पर भेदभाव करने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि पूर्वी पाकिस्तान का पूरा हिस्सा विकास से वंचित रहने लगा। देश की सत्ता पर पश्चिमी पाकिस्तान के नेता पहले से ही कुण्डली मारकर बैठे हुए थे। इन नेताओं ने कभी भी पूर्वी पाकिस्तान के नेताओं को सत्ता में टिके ही नहीं रहने दिया। इनमें से ही शेख मुजीवर रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश का स्वतन्त्रता आन्दोलन प्रखरता के साथ शुरू हुआ। इसके बाद बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी का गठन किया गया। भारत ने इस बारे में हस्तक्षेप किया तथा भारत-पाक का युद्ध हुआ। सन 1971 में हुए इस युद्ध में भारतीय सेना के जवानों के करतब ने पाक सेना के चारों खाने चित्त कर दिये और पाकिस्तान के दो हिस्से होकर बांग्लादेश अस्तित्व में आया।

पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान के अलग होने पर इस्लामी सत्ता कमजोर होगी, ऐसा मानने वाले कट्टर इस्लामी गुट को बांग्लादेश का आजाद होना स्वीकार नहीं था। इस बांग्लादेशी कट्टरपंथी संगठन का नेतृत्व जमात-ए-इस्लाम नामक कट्टर धार्मिक संगठन ने किया। इस जमात-ए-इस्लाम संगठन के नेताओं ने खुले तौर पर पाकिस्तान की मदद की। इस हिंसक घटना की तुलना हिटलर द्वारा किये गए अत्याचारों से ही की जा सकती है। बांग्लादेश सरकार तथा अन्तरराष्ट्रीय संगठनों के मतानुसार पांच लाख लोगों की जान इस संघर्ष में गयी। साधारण तौर पर इतने ही लोगों का पलायन भी हुआ है। इस संघर्ष में भारत पर रोष व्यक्त वाले पाकिस्तानी समर्थकों ने बांग्लादेश में रहने वाले बंगाली हिंदुओं से साथ ज्यादातर हिंदुओं को भी अपना निशाना बनाया था। बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के समय पाकिस्तान की मदद करने वाले जमात-ए-इस्लाम के कट्टरपंथी नेता राजनीतिक कारणों से खुद को रक्षात्मक भूमिका में रखने में सफल हुए थे, लेकिन 2008 में हुए चुनाव में शेख हसीना की अवामी लीग ने सन 1971 के युद्ध अपराधियों को सत्ता में आने पर शासन करने का आश्वासन दे दिया और सत्ता में आने पर सभी कट्टरपंथियों की आपराधिक गतिविधियों की जड़ तक पहुंचने का अभियान बेगम शेख हसीना ने शुरू किया। यहीं से संघर्ष ने उग्र रूप धारण कर लिया। आधा दर्जन जमात-ए-इस्लाम के नेताओं को जेल भेजा गया। उन्हें फांसी तथा आजीवन कारावास की सजा सुनायी गई। यह मुहिम इस्लाम विरोधी है, ऐसी आवाज भी उठायी गई और जमात-ए-इस्लाम के समर्थक रास्ते पर उतर आये, उन्हें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया ने कंधे से कंधा मिलाकर सहायता प्रदान की। बेगम खालिदा जिया विरोधी पक्ष नेता हैं। इस साल के अन्त तक बांग्लादेश में चुनाव होने वाले हैं और कट्टरवादी लोगों के सहयोग से, उनकी भावनाएं भड़का कर बेगम खालिदा जिया फिर सत्ता में आने का सपना देख रही हैं। उन्हें मालूम है कि बांग्लादेश के आगामी चुनाव पाकिस्तान समर्थक कट्टरपंथियों की भावनाएं भड़काकर ही जीता जा सकता है, इसलिए भारत विरोधी गुट के नेता एक भी ऐसा मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते। बांग्लादेश में व्याप्त असंतोष वहां के कट्टरपंथी व नवजागृति वाला वर्ग इन्हीं में से था। वास्तविक रूप में हिंदू के विरोध में किसी भी आन्दोलन का मुद्दा न होते हुए भी हिंदुओं पर अत्याचार क्यों हो रहे हैं?, हिंदू बिना किसी कारण के मारे जा रहे हैं। 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को मदद करने वाले जमात-ए-इस्लाम के युद्ध के कैदियों के खिलाफ मामले दर्ज किये गए हैं, इन मामलों पर फैसला तुरन्त सुनाया जाये तथा उन्हें फांसी की सजा हो, इसलिए वहां आन्दोलन किये जा रहे थे। जमात-ए- इस्लाम के नेताओं पर नरसंसहार का आरोप साबित कर न्यायालय ने फांसी की सजा देने का फैसला सुनाया। इसी समय से बांग्लादेश में राजनीतिक हिंसा का जो ताण्डव हुआ, उसमें हिंदू व्यक्ति, उनके घर, उनके धार्मिक स्थलों पर हमले किये गए। इन सभी आन्दोलनों के प्रतीक के रूप में हिंदुओं पर हमला करने का पैटर्न ही बना लिया गया। चित्तगांव, रंगपुर, सिल्हट, चौपनवागंज, बेगमगंज, सुंदरगंज, ठाकुरगांव, लक्ष्मीपुर, ढाका तथा अन्य स्थानों पर हिंदुओं की बस्तियों पर हमले किये जाने लगे। हिंदू व्यापारियों की दुकानें लूटी गयीं। हिंदुओं की हत्या की गयी। हिंदू लोगों पर सिर्फ शरीर पर बचे कपड़ों के साथ ही घरबार छोड़ने की स्थिति आ गयी है।

अगले साल होने वाले आम चुनाव में सत्ता प्राप्त करने के लिए किसी भी स्तर पर जाने की बेगम खालिदा जिया की नेशनलिस्ट पार्टी ने तैयारी कर रखी है। बांग्लादेश को अस्तित्व में लाने के लिए भारत ने जो किया, उससे अवगत बेगम शेख हसीना के सत्ता पर रहने के कारण परिस्थिति भारत के लिए थोड़ी बहुत अनुकूल है, पर दो बेगमों के सत्ता संघर्ष के बीच भविष्य में बांग्लादेश की आगे की विकास में अस्थिरता आने की आशंका बनी हुई है। बांग्लादेश की स्थिरता भारत के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। अपना पड़ोसी देश लोकतन्त्र तथा धर्मनिरपेक्ष हो, भारत की ओर से ऐसी अपेक्षा करना उचित ही है, फिर भी वहां की परिस्थितियों का अन्दाजा लगाकर भारत बांग्लादेश के पूरे घटनाक्रम पर मौन है, ऐसा होने के बावजूद भारत के खिलाफ विरोध का स्वर बुलन्द कर वहां के हिंदुओं पर हमले करने का कुचक्र जारी ही है। इतिहास साक्षी है कि मुस्लिमों का विरोध केवल राजनीति स्वरूप में ही नहीं होता है, अपितु हिंदू विरोध अत्यन्त गहराई से किया जाता है। जिन-जिन बातों पर हिंदुओं की श्रद्धा है, उन सभी मामलों में मुस्लिमों के मन में कट्टर द्वेष है। हिंदुओं के जो गौरव के विषय हैं, उसे नष्ट करने में उन्हें आनन्द आता है। धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक सभी मामलों में इस्लाम का हिंदुओं की जीवन पद्धति का कड़ा विरोध था और अभी भी है। हिंदू द्वेष की यह भावना उनके रोम-रोम में भरी हुई है। इस विंरोध में भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी ऐसा भेद नहीं है, इस कारण बांग्लादेश के आन्दोलन से प्राप्त हुआ इस मौके का उपयोग हिंदुओं के विरोध में कट्टर मुस्लिम संगठनों ने बहुत सोच-समझ कर किया है। भारत की अन्तरराष्ट्रीय छवि, अन्तरराष्ट्रीय सम्मान बढ़ा है, इस गलत भावना में हम लोग हैं। यह अन्तरराष्ट्रीय छवि बनाये रखने के लिए पड़ोसी देशों से अपने संबंध अच्छे होना बहुत जरूरी है। यह भ्रम भारत सरकार के मतिष्क में है। दूसरी ओर बांग्लादेश तथा पाकिस्तान जैसे इस्लामी मनोवृत्ति वाले देश भारतीय सैनिकों की हत्या करने जैसी करतूत करके हिंदू राष्ट्र का अपमान करने का एक भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते। आज भी जो हिंदू पाकिस्तान-बांग्लादेश में हैं, उनका समूल नाश करने की कार्रवाई निरन्तर जारी है।
बांग्लादेश के हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार ये इस बात के ताजा उदाहरण हैं। जिन समस्याओं के कारण अपनी प्रतिष्ठा खतरे में पड़ी है, समस्याओं का निपटारा करने के बजाय भारत सिर्फ अपनी अन्तरराष्ट्रीय छवि बरकरार रखने के लिए प्रयत्नशील है। हिंदुओं जैसा दुर्भाग्यशाली समाज विंश्व में दूसरा कोई और नहीं है। हिंदुस्तान के अग्रणी राजनीतिज्ञ अपने धर्म के पुरुषार्थ को खत्म करने के लिए ही कटिबद्ध हैं। खुद के स्वार्थ के लिए देश तथा धर्म संबंधी गलत तथा अप्राकृतिक नीति को अंगीकार करने के कारण आज हिंदू समाज तथा भारत को भी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

आज के आधुनिक युग में जब मानव मूल्यों के जतन तथा मानवाधिकार के मुद्दों पर राष्ट्रीय सीमा रेखा का बन्धन नहीं रहा है। मानवतावादी बोर वेल में गिरे हुए बच्चों को बचाने के लिए दूरदर्शन चैनलों पर लगातार सीधा प्रसारण किया जाता है। पूरे विश्व के सामने यह मुद्दा उपस्थित किया जाता है, लेकिन इस्लामी देशों में हिंदू धर्मियों पर होने वाले अत्याचारों का उल्लेख तक नहीं किया जाता। सीमा रेखा के पार हिंदू लोगों का जीवन असुरक्षित है। न तो संपत्ति और न ही हिंदुओं की पत्नियां और बच्चे सुरक्षित हैं। उनकी संपत्ति की लूट मची हुई है। पत्नियों और बेटियों का अपहरण कर बलात्कार किये जा रहे हैं। धर्म परिवर्तन करने के लिए हिंदुओं को बाध्य किया जा रहा है। हिंदू युवतियों का विवाह जबरन स्थानीय मुसलमान युवकों से किया जा रहा है। पाकिस्तान अथवा बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू लोगों की यह विडम्बना, उनकी यातना भारत का राजनीतिक मुद्दा कभी भी नहीं बने क्योंकि ये मुद्दे भारतीय नेताओं को चुनाव में जीत नहीं दिलवाते। विडम्बना तो यह है कि भारत के अधिकांश हिंदुओं को भी पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं की समस्या, समस्या ही नजर नहीं आती।

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