निर्भय जीवन

मनुष्य को सबसे अधिक भय होता है अपनी मृत्यु का। श्रीकान्त धारप ने तो मृत्यु पर भी विजय पायी थी। वे कैन्सर जैसी असाध्य बीमारी से ग्रस्त हुए। उन्हें जब इसका पता चला, तब उन्होंने अटल रूप में होने वाले उस पूर्ण विराम का बड़ी ही शान्ति से स्वागत किया। जीवन का बिस्तर बांधकर वे अपनी अन्तिम यात्रा पर चल पड़े। जाने इतनी ऊंची मानसिकता श्रीकान्त धारप की कैसे हुई होगी?
मैंने फोन उठाया, उस ओर से अण्णा देसाई बात कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘रमेशजी! श्रीकांत धारप बीमार हैं और अस्पताल में हैं।’’
मैंने पूछा, ‘‘कौन से अस्पताल में?’’

उन्होंने बताया, ‘‘कुर्ला में, अपने किसी रिश्तेदार के अस्पताल में हैं।’’
मैंने कहा, ‘‘मैं अब आंध्र में प्रवास कर रहा हूं, 13 अप्रैल को मुंबई लौटूंगा, तब जाकर उनसे मिलूंगा।’
13 अप्रैल को मैं घर लौट आया। तरुण भारत देखा और श्रीकांत धारप के देहावसान का समाचार पढ़ा। सारा दिन बेचैन रहा। अब उस प्रसन्न, हंसमुख व्यक्ति के दर्शन कभी हो न पाएंगे, इसका खेद हुआ। ‘‘रमेश, कुछ जानकारी जरूरी थी।’’ इन शब्दों से आरम्भ होने वाला उनका कभी‡कभार आने वाला फोन भी अब न होगा। बैठकों में मुलाकात होने पर ‘‘रमेश, कैसे‡क्या चल रहा है? स्वास्थ्य ठीक है न?’’ ऐसे बड़े अपनेपन से पूछताछ करने वाले शब्दों को भी अब पूर्ण विराम लग गया था।

श्रीकान्त धारप और मैं पहली बार ठाणे कारागृह में मिले थे। इन्दिरा गांधी की मेहरबानी से मैं मिसाबंदी बना था। श्रीकान्त धारप मुझसे पहले ही कारागृह में दाखिल हुए थे। आपात स्थिति के विरोध में गठित ‘‘अखिल भारतीय संघर्ष समिति’’ के कार्यवाह रविंद्र वर्मा के साथ मैं पकड़ा गया था। उस दिन दत्तोपंत ठेंगडी, माधवराव मुले के भी पकड़े जाने की सम्भावना थी, लेकिन सौभाग्य से वे पुलिस की पकड़ में आ न पाये।

श्रीकान्त धारप ने मुझसे पहला ही सवाल किया, ‘‘क्या दत्तोपंत सुरक्षित हैं?’’
मैंने कहा, ‘‘हां, आप सुरक्षित हैं। पुलिस आप तक पहुंच न पायी होगी, ऐसा मुझे लगता है।’’
दत्तोपंत ठेंगडी की चिन्ता करना श्रीकान्त धारप के जीवन का मानो एक अभिन्न अंग बना हुआ था। बांद्रा का उनका निवास स्थान, आम तौर पर श्रद्धेय दत्तोपंत का घर था। दत्तोपंत जब कभी मुंबई में होते, उनका निवास श्रीकान्त धारप के घर होता था और उस निवास के दौरान वह सारा घर ही दत्तोपंतमय बन जाता था।

दत्तोपंत ठेंगडी ऐसे लोगों की श्रेणी में गिने जाते थे, जिनसे न लोग हरगिज ऊबते थे और जो न खुद दूसरों से कभी ऊबते थेे। उनसे मिलने वाले कार्यकर्ताओं का सबरे से ही तांता लगा रहता था। मुंबई के मजदूर संघ के विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी, महाराष्ट्र से मजदूर संघ के कार्यकर्ता, समाज के मान्यवर आदि की भीड़ दत्तोपंतजी को हमेशा घेरे रहती।

दत्तोपंत ठेंगडी को चाय बहुत प्रिय थी। आने जाने वाले हर एक का चाय पिलाकर स्वागत होता था। श्रीकान्त धारप की धर्मपत्नी विद्याताई सारा दिन इसी काम में लगी रहती थीं। बाहर वाला कोई भी सोचे कि यह दंपति सारा दिन कितने कष्ट उठाते हैं, फिर भी धारप दंपति के लिए ये ‘कष्ट’ तो थे ही नहीं, वह था आनन्द जो उनकी हाव‡भाव से अनायास प्रकट हुआ करता था। उनकी धारणा हुआ करती थी कि यह तो हमने स्वीकार किये हुए संघ कार्य का ही एक स्वाभाविक अंग है।

आपात काल समाप्त हुआ। तब तक अर्थात लगभग चौदह महीने हम दोनों कारागृह में ही थे। रवींद्र वर्मा के कमरे की बगल में ही उनका कमरा था। रवींद्र वर्मा वैसे संघ कार्य से कहीं अनभिज्ञ ही थे। संघ स्वयंसेवकों के बड़े जमघट में वे अकेले ही ‘कांग्रेसी’ थे। उस समय वे ‘संगठन कांग्रेस’ के महासचिव थे। कारागृह मेंउनकी सही देखभाल करने का काम श्रीकान्त धारप ने ही निभाया। अपनी घर-गृहस्थी है, परिवार में दो छोटी कन्याएं हैं, आर्थिक प्राप्ति के साधन ठप्प हुए हैं, घर की हालत कैसी होगी आदि कितनी ही चिन्ताओं से वे ग्रस्त थे, फिर भी उन्होंने अपनी चिंताएं कभी व्यक्त नहीं की। रवींद्र वर्मा की देखभाल करने के दौरान, इन चिन्ताओं को कभी बीच में खड़े होने नहीं दिया। संघ के बाहर के एक खास व्यक्तित्व को संघ के साथ जोड़ने के उनके काम को ऐतिहासिक ही मानना होगा।

कारागृह की दिनचर्या का भी उन्होंने बड़ी निष्ठा से पालन किया। प्रात:स्मरण, चर्चा सत्र, सायं शाखा आदि से कभी दूर न रहे। रवींद्र वर्मा को बड़ी आस्था से प्रतिदिन शाखा में साथ ले आते। शाम को रिंग या बालीबॉल खेलना उनका सबसे प्यारा हुआ करता था। इस खेल में श्रीकान्त धारप बड़े आनन्द से‡शौक से सम्मिलित होते थे। खासकर बालीबॉल खेलते समय सभी खिलाड़ियों में जिस उत्साह‡उल्लास का संचार हुआ करता, उसका बखान करना कठिन है। नासिक के दादा वडनगरे तो उत्साह का और हास्य का मानो प्रयोग ही थे। ठाणे कारागृह वैसे कुछ छोटा ही है। इस खेल की आवाज, हास्य समूचे कारागृह में गूंजता रहता था। खेलने वाले सभी खिलाड़ी मिसामन्दी हैं, कारागृह से रिहा कब होंगे, यह किसी को कुछ मालूम नहीं था, होनी‡अनहोनी की तलवार सिर पर लटक रही थी, इसकी तनिक सी चिन्ता किसी के भी चेहरे पर दिखायी न देती। श्रीकान्त धारप अपने क्रियाकलापों द्वारा मानो यही व्यक्त किया करते थे कि कारागृह के बाहर का जीवन एक ‘कर्तव्य यज्ञ’ है और कारागृह के अन्दर का जीवन भी एक ‘कर्तव्य यज्ञ’ ही है।

आपात काल यथावकाश समाप्त हुआ। हम सभी रिहा होकर बाहर आ गये। श्रीकान्त धारप फिर से मजदूर संघ के कार्य में मग्न हो गये। मैं संघ कार्य में जुट गया। हम दोनों के कार्य क्षेत्र भिन्न होते हुए भी ‘संघ स्वयंसेवसक’ होने का समान सूत्र काफी मजबूत बना रहा। इस समान सूत्र की मजबूती के फलस्वरूप ही श्रीकान्त धारप मेरे विवाह समारोह में सम्मिलित होने औरंगाबाद आये। विवाह का दिनांक था 30 अप्रैल। कड़ी धूप तथा झुलसाती गरमी में विवाह होने वाला था। सन 1979 में मुंबई से औरंगाबाद का सफर आरामदेह नहीं था। मुंबई से मनमाड पहुंचकर दूसरी गाड़ी से मीटर गेज रेलवे से औरंगाबाद पहुंचना था। मुझसे लगाव होने के कारण उन्होंने यह सफर भी तय किया।

मुंबई के फोर्ट इलाके में मजदूर संघ का कार्यालय था। वहीं ‘उद्योग‡कृषि‡विकास मण्डल’ का कार्यालय स्थानांतरित हुआ और उसका उत्तरदायित्व मुझे सौंपा गया। मजदूर संघ के मजदूरों के वकील के रूप में श्रीकान्त धारप वहीं बैठा करते थे। न्यायालय के काम से मुक्त होकर लगभग पंच बजे वे कार्यालय में आते थे। अपने अपने कानूनी मामले‡शिकायतें लेकर मजदूर संघ के सदस्य‡कार्यकर्ता, यूनियन के पदाधिकारी इत्यादि सभी कार्यालय में आते थे। वकीलों के पेशे को लेकर आमतौर पर कुछ खास अच्छा कहीं लिखा नहीं जाता। वादी‡प्रतिवादी आपस में जूझते रहे, तो ही वकालत‡व्यवसाय बना रहे, लेकिन श्रीकान्त धारप तो मजदूरों के न्याय, हक,अधिकारों के पक्ष में जूझने वाले वकील रहे। वे कहीं भी,किसी को भी आपस में झगड़ा करने के लिए उकसाने वाले पेशेवर वकील न थे। मजदूर संगठन का वकील और वह भी ‘भारतीय मजदूर संघ’ जैसे मजदूर संगठन का वकील होना बेकार का झंझट मोल लेने जैसा ही था। श्रीकान्त धारप ने जीवनभर वकालत की, किन्तु उसमें से उन्होंने बेहद पैसा कमाया नहीं। अपने लिए एक सीमा उन्होंने स्वयं बना रखी थी। उन्होंने उस लक्ष्मण रेखा का कभी उल्लंघन किया नहीं।

श्रीकान्त धारप महान थे, लेकिन उनकी महानता का बोलबाला नहीं हुआ। इसी में उनकी सच्ची महानता निहित थी। जब वे कार्यालय में होते तो बड़ी सहजता से कहा करते थेे, ‘‘रमेश, चलो तो, चाय-वाय हो जाये। कुछ भूख भी लग रही है, हल्का सा नाश्ता करें।’ वे एक आत्मविलोपी कार्यकर्ता थे। दत्तोपंत ठेंगडी के साथ उनके बड़ै स्नेह भरे सम्बन्ध थे, परन्तु उन्होंने उसका कभी अनुचित लाभ नहीं उठाया। संघ की बैठक में वे ठीक समय पर उपस्थित हुआ करते थे। बैठक की पूरी अवधि में वे उसमें सहभागी होते थे। बड़ी शान्ति से अपने आसन पर बैठा करते। समन्वय समिति की बैठक का सूत्र संचालन करने वाला कार्यकर्ता कई बार उनसे आयु में‡अनुभवों में छोटा होता था, फिर भी एक स्वयंसेवक की भूमिका धारण कर श्रीकान्त धारप बैठक में सहभागी होते थे। अपने स्वयंसेवक होने के कारण कभी समझौता किया ही नहीं, तभी तो वे आत्मविलोपी जीवन जिये।

जिनके प्रदीर्घ सहवास का लाभ हुआ, ऐसा कोई न कोई कार्यकर्ता अब हमेशा‡हमेशा के लिए बिदा हो गया है। फलस्वरूप अब जीवन में एक गहरी‡सी रिक्तता निर्माण हो गयी है। श्रीकान्त धारप ने निर्भय जीवन जिया। स्वामी विवेकानंद बार‡बार कहा करते थे, ‘‘तुम जब आना ही चाहते हो, तो आओ। तुम्हारा स्वागत है। मैं तैयार जो हूं।’’ ऐसी मानसिकता में ही वे बिदा हुए।

यह मानसिकता कुछ असाधारण सी है। बिस्तर बांधकर वे जैसे कारागृह में आये, वैसे ही जीवन के बिस्तर को बांध कर वे अपनी अन्तिम यात्रा पर चल पड़े । ऐसी मानसिकता के हेतु योगी को निरन्तर तपस्या करनी होती है, ध्यान धारणा करना आवश्यक होता है, यम-नियम का पालन करना जरूरी होता है। इनमें से कुछ भी न करते, ऐसी मानसिकता श्रीकान्त धारप ने कैसे धारण की होगी? क्या अपने भी जीवन में ऐसी अनुभूति पायी जा सकेगी? ऐसा प्रश्न अनजाने ही मेरे समक्ष आ खड़ा हुआ।

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