राजनीति की सफाई

न्यायपालिका की सक्रियता एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। पिछले माह सर्वोच्च न्यायालय के तीन महत्वपूर्ण निर्णय आए हैं। पहला निर्णय है, अपराधी तत्वों को राजनीति से दूर रखना; दूसरा निर्णय है, मतदाताओं को लालच के रूप में वस्तु आदि मुुफ्त बांटने पर पाबंदी और तीसरा निर्णय है, अवधि खत्म होने पर एक माह में सरकारी निवास छोड़ने का जनप्रतिनिधियों को आदेश और ऐसा न करने पर उनके खिलाफ विशेषाधिकार भंग की कार्रवाई। ये तीनों आदेश राजनीति की स्वच्छता का अभियान माने जा रहे हैं।

जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की इस पर सतर्क प्रतिक्रियाएं हैं। कारण स्पष्ट है, वे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का विरोध करने की जुर्रत नहीं कर सकते। लिहाजा, इसकी अपने अनुकूल व्याख्याएं कर मीन मेख निकाल सकते हैं या भागने के रास्ते खोजे जा सकते हैं। कानून की भाषा बहुत जटिल होती है, एक-एक शब्द को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया जा सकता है और किसी मामूली तकनीकी मुद्दे पर फैसले पलट भी जाते हैं। न्यायपालिका लोकतंत्र की प्रहरी है, लेकिन इस प्रहरी को रोकने का अंतिम अस्त्र संसद के पास ही होता है। शाह बानो मामला लोग अभी नहीं भूले होंगे। शाह बानो तलाक के बाद अपने पति से मुआवजा पाने के लिए सारी उम्र लड़ती रही। सर्वोच्च न्यायालय तक यह मामला पहुंचा। फैसला उसके पक्ष में आया, लेकिन तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने संसद में एक संशोधन विधेयक लाकर इस फैसले को ही उलट दिया। विधेयक में यह संशोधन किया गया था कि ऐसे मामलों में फैसला मुस्लिम व्यक्ति कानून अर्थात शरीयत के अनुसार ही होगा; आम नागरिक कानून के अनुसार नहीं। राजीव गांधी के पास प्रचंड बहुमत था और इसके चलते न्यायालय के फैसले का प्रभाव ही खत्म हो गया।

इसी तरह का संकट अब अपराधियों को विधायिकाओं से दूर रखने के फैसले पर मंडरा रहा है। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (3) में प्रावधान है कि दो वर्ष से अधिक की जेल की सजा होने पर व्यक्ति सांसद या विधायक रहने के लिए छह वर्ष तक अपात्र हो जाता है। लेकिन इसी धारा की अगली धारा 8 (4) में उसे अभय दिया गया है। इसके अनुसार ऐसा व्यक्ति फैसला आने के तीन माह तक अपात्र नहीं माना जाएगा और इस दौरान वह यदि अपील करता है तो उसका सांसद या विधायक पद अपील पर निर्णय आने तक बरकरार रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा को असंवैधानिक करार दिया है। इस तरह अब जेल में रहकर चुनाव लड़ना भी अवैध होगा। यह तर्क जायज लगता है कि यदि अपराधी जेल की सजा भुगत रहा है तो वह मतदाता नहीं रह सकता और मतदाता नहीं है तो चुनाव कैसे लड़ सकता है? राजनीतिक दलों की शिकायत है कि इसका व्यापक रूप से दुरुपयोग हो सकता है और अपने विरोधियों को मात देने के लिए उनके खिलाफ झूठे मुकदमे भी दायर हो सकते हैं। सरकार इस निर्णय पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के पक्ष में है। विभिन्न राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श करने की भी सरकार की योजना है। यह सही है कि इसका दुरुपयोग हो सकता है। लेकिन, इस निर्णय की मूल भावना को चोट पहुंचाए बिना इसमें यथोचित संशोधन की संभावना बनी है। इसी तरह मतदाताओं को मुफ्त चीजें देने का इन दिनों चलन सा हो गया है। बच्चों को साइकिलें व लैपटॉप देना, सा़िडयां बांटना, अनाज सस्ते में देने की घोषणा करना इत्यादि। न्यायालय इसे मतदाताओं को प्रलोभन मानता है, लेकिन राजनीतिक दल इसे अपना संकल्प मानते हैं। इस संबंध में उपायों पर सभी दलों में एकमत होना संभव नहीं दिखता, फिर भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले प्रत्यक्ष में निष्प्रभ न हो इसे देखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।

जिन अपराधों के सिलसिले में यह फैसला है उसे धारा 8 में परिभाषित किया गया है। इसमें ये अपराध शामिल हैं- भ़डकाऊ भाषण, साम्प्रदायिक विद्वेष, अस्पृश्यता व भेदाभेद, आबकारी व मादक पदार्थ कानून के अंतर्गत अपराध, चुनाव में मतपेटियां भगा ले जाना, राष्ट्रध्वज का अपमान, सति कानून, मिलावट कानून के अंतर्गत अपराध, भ्रष्टाचार प्रतिबंधक कानून के अंतर्गत अपराध आदि। जाहिर है, इस निर्णय के परिणामस्वरूप अपराधियों के राजनीति पर हावी होने पर बड़े पैमाने पर अंकुश लगेगा। बाहुबलियों पर अवश्य अंकुश लगेगा, लेकिन धनबलियों का क्या होगा? इसका जवाब तो केवल मतदाताओं की निर्मलता पर ही निर्भर है और इसे संवर्धित करना हम सबका कर्तव्य है। लोकतंत्र को सफल बनाने की यह नैतिक शर्त है।

फैसला सुनाना न्यायपालिका का काम है, लेकिन उस पर अमल करना कार्यपालिका का काम है। कार्यपालिका के सक्षम राजनीतिक गुत्थी है, क्योंकि 1600 से अधिक जनप्रतिनिधि ऐसे हैं जिन पर विभिन्न मामले चल रहे हैं। सब से बेहतर उपाय यह है कि राजनीतिक दल इसी आधार पर अपनी संहिता बनाएं और टिकट बांटते समय इस पर कड़ाई से चलें। डण्डे से ही हांके जाने की अपेक्षा आत्मानुशासन ही इसका बेहतर विकल्प दिखाई देता है।
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