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विश्व- मंच पर हिंदी

विश्व- मंच पर हिंदी

by डॉ.दामोदर खडसे
in संस्था परिचय, सामाजिक, सितम्बर २०१३
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विदेशों में लगभग 154 देशों के विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ायी जाती है। इनमें आप्रवासी भारतीयों के अलावा स्थानीय छात्र भी हिंदी का अध्ययन करते हैं। एक समय था जब हिंदी का अध्ययन साहित्य‡संस्कृति और एक भाषा के रूप में प्रमुखता से किया जाता था। पर आज हिंदी एक व्यावसायिक‡व्यावहारिक भाषा के रूप में भी अपनायी जा रही है। साहित्य के माध्यम से अपनी संस्कृति, मान्यताओं और भावनात्मक धरोहरों को अक्षुण्ण रखने का प्रयास किया जाता है, वहीं रोजी‡रोटी के लिए प्रयोजन मूलक हिंदी को अपनाया जा रहा है। विदेशों में हिंदी, सांस्कृतिक‡दूत का काम भी करती है। कई विदेशी विद्वान हिंदी की विशिष्टता की ओर आकर्षित हुए और उन्होंने इस भाषा पर अपना प्रभुत्व सिद्ध किया। उन्होंने हिंदी में रचनाएं कीं, साथ ही हिंदी से अपनी भाषा में और अपनी भाषा से हिंदी में अनुवाद किये। इस तरह हिंदी ज्ञान‡विज्ञान और साहित्य‡संस्कृति के आदान‡प्रदान का माध्यम बन गयी।

विदेशों में हिंदी की स्थिति को तीन वर्गों में देखा जा सकता है। पहले वर्ग में वे लोग आते हैं जो जीविकोपार्जन के लिए पीढ़ियों पहले भारत से विदेश आ बसे। हिंदी को अपनी अस्मिता के साथ उन्होंने जोड़े रखा। इन देशों में मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना आदि देशों को शामिल किया जा सकता है। मॉरीशस के अभिमन्यु अनत पचास से अधिक हिंदी पुस्तकों के लेखक हैं। वे हिंदी के प्रमुख लेखकों में माने जाते हैं। हिंदी भाषा में वे मॉरीशस के जन‡जीवन को शब्दबद्ध कर रहे हैं। इनके अलावा कृष्ण बिहारी मिश्र, रामदेव धुरंधर आदि प्रमुख उपन्यासकार हैं। साथ ही, सोमदत्त बखोरी, हेमराज सुंदर, राजवंती अजोधिया आदि के नाम भी उल्लेखनीय हैं। मॉरीशस में ‘आर्योदय’, ‘आक्रोश’ और ‘इंद्रधनुष’ नामक हिंदी पत्रिकाएं नियमित प्रकाशित होती हैं। फीजी में पं. कमला प्रसाद मिश्र, पं. काशीराम कुमुद, बाबू कुंवर सिंह, गुरु दयाल शर्मा के नाम सुपरिचित हैं। सूरीनाम में अमर सिंह रमण, जीत नारायण, सूर्य प्रसाद वीरे प्रमुख नाम हैं। इन देशों में हिंदी भाषी भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या इतनी अधिक है कि वे वहां की राजनीति, प्रशासन और सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण अंग हैं। वे हिंदी के लिए बहुत योगदान दे रहे हैं। सम्भवत: यही कारण होगा कि दूसरा और चौथा विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस में और पांचवां त्रिनिदाद में आयोजित किया गया। विश्व समुदाय के सामने हिंदी की व्यापक स्वीकृति के लिए ये प्रभावी प्रयास रहे हैं।

दूसरे वर्ग में, भारत के पड़ोसी देश हैं, जहां अनायास ही हिंदी, भाषा के रूप में विद्यमान है। इन देशों में नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, पाकिस्तान, चीन आदि देशों का समावेश हो सकता है।

तीसरे वर्ग में ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, बेल्जियम, चेकोस्लावाकिया, रूस, जापान आदि देशों को रखा जा सकता है। इन देशों में भारतीयों की संख्या काफी बढ़ रही है। व्यापार‡रोजगार आदि क्षेत्रों में भारतीय आप्रवासियों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। साथ ही, इन देशों के हिंदी के विद्वान काफी उल्लेखनीय योगदान कर रहे हैं।

हिंदी के अध्ययन की सुविधा वर्तमान में, भारत से बाहर विश्व में कई विश्वविद्यालयों में उपलब्ध है। एक सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका में 113 विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हिंदी अध्ययन के केन्द्र हैं, जिनमें से 13 तो शोध स्तर के हैं। हाल ही में, अमेरिका की पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी ने एम.बी.ए. के छात्रों को हिंदी का दो वर्षीय कोर्स अनिवार्य कर दिया है, ताकि अमेरिका को हिंदुस्तान में व्यापार बढ़ाने में भाषा सम्बन्धी कठिनाइयां न हों।

हिंदी में कई विदेशी भाषाओं के शब्द इस तरह रच‡बस गये हैं कि उन्हें हिंदी से अलग करना अब लगभग असम्भव‡सा हो गया है। अंग्रेजी से आये कैनरा, फुटबॉल, डायरी या पश्ती से आये अचार, नकल या पठान जैसे शब्द हों या कि अरबी भाषा से आये तारीख, वकील, आदमी, शराब, अमीर जैसे शब्द हों, इन शब्दों ने अब हिंदी में मौलिक पहचान बना ली है। जिस तरह विभिन्न भाषाओं से शब्द हिंदी में आये और शब्द‡सम्पदा बढ़ती चली गयी, इसी तरह विदेशी विद्वानों ने हिंदी के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। साहित्य, संस्कृति और भाषा का अन्यान्य सम्बन्ध होता है। कई विदेशी साहित्यकारों ने हिंदी को अपनी अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया।
हिंदी भाषा और साहित्य के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाले फादर कामिल बुल्के का योगदान अमर रहेगा। इनके द्वारा तैयार किया गया अंग्रेजी‡हिंदी शब्दकोष सर्वाधिक ख्याति प्राप्त सन्दर्भ ग्रन्थ है। अंग्रेजी शब्दों के सटीक हिंदी पर्यायी शब्दों के लिए यह श्रेष्ठ प्रमाणिक ग्रन्थ माना जाता है। राम कथा पर उनकी अनुसंधानात्मक पुस्तक ‘रामकथा‡उत्पत्ति और विकास’ लोकप्रिय है।

डॉ. रूपर्ट स्नेल इंग्लैण्ड में रहकर हिंदी सेवा में जुटे हैं। भारत भवन की खुली रंगशाला में उनसे मुलाकात हुई। शक्लो-सूरत से अंग्रेज, पर कुर्ता‡पाजामा और भारतीय चप्पल में वे भारत आये सैलानी लगते। हिंदी में जैसे ही बोलना शुरू करते हैं, स्पष्ट और सटीक हिंदी उच्चारण, हिंदी साहित्य में गहरी पैठ और हिंदी भाषा का व्यापक ज्ञान अनायास ही उनके कंठ से उमड़ पड़ता है। रूपर्ट स्नेल ने सत्रहवें वर्ष में भारतीय शास्त्रीय संगीत सुना और हिंदी के माध्यम से आनन्द हासिल करने का निश्चय किया। 1974 में विशेष प्रवीणता के साथ हिंदी में बी.ए. किया और 1984 में हिंदी में पी.एच.डी. हासिल की। पहले हिंदी के व्याख्याता हुए और बाद में लंदन विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ ओरिएंटल एण्ड अफ्रिकन स्टडीज’ में हिंदी के रीडर और विभागाध्यक्ष बने।

अंग्रेजों को भारत में हिंदी सिखाने के लिए 1782 में गिलक्रिस्ट की नियुक्ति की गयी थी। कलकत्ता (कोलकाता) में सेंट विलियम फोर्ड कॉलेज की स्थापना होने पर डॉ. गिलक्रिस्ट को हिंदुस्तानी विभाग का प्रथम प्रोफेसर नियुक्त किया गया। उन्होंने ‘हिंदी मैन्युअल’ और ‘हिंदी स्टोरी टेलर’ नामक पाठ्य पुस्तकों की रचना की। डॉ. मोनियर विलियम ने 1890 में ‘हिंदुस्तानी प्राइमर’ और ‘प्रैक्टिकल हिंदुस्तानी ग्रमर’ का 1892 में रचना की। फेडरिक साइमन ग्रउन ने 1874 के आसपास ब्रज के कई कवियों की कविताओं का छंदबद्ध अनुवाद अंग्रेजी में किया। ग्रउन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक उपलब्धि तुलसीकृत रामचरित मानस का अंग्रेजी अनुवाद है, जो आज भी दुनिया में सबसे प्रामाणिक अनुवाद माना जाता है। डॉ. एफ. ई. के. का जन्म 29 मार्च 1879 में लंदन में हुआ। 1922 में लंदन विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘कबीर एण्ड हिज फॉलोअर्स’ नामक शोध ग्रन्थ पर डी.लिट. की उपाधि प्रदान की। इससे पहले 1918 में उन्होंने ‘प्राचीन भारतीय शिक्षा’ नामक पुस्तक लिखी थी। 1935 को वे इंग्लैण्ड लौट गये। वहां से वे अपने मित्रों को भारत में देवनागरी में पत्र लिखा करते थे। एक अन्य अंग्रेज हिंदी विद्वान हैं‡ फ्रेडरिक पिंकाट। ब्रिटेन के हिंदी प्रेमियों के बीच एक सम्मानित नाम है। 1887 में ‘बाल दीपक’ नामक उनकी पुस्तक चार खण्डों में प्रकाशित हुई। प्रो. रोनाल्ड स्टुअर्ट मैकग्रेगर का जन्म 1929 में हुआ। ऑक्सफोर्ड और लंदन विश्वविद्यालय से उन्होंने हिंदी का अध्ययन किया। उन्होंने अंग्रेजी‡हिंदी में पुस्तक लिखी ‘मौखिक हिंदी अभ्यास’।

डॉ. आंदोलन स्मेकल चेकोस्लोवाकिया गणराज्य के नागरिक हैं। 18 अगस्त, 1928 को जन्मे डॉ. स्मेकल ने पार्ल्स विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए.किया और बाद में पीएच.डी. की उपाधि हासिल की। डॉ. स्मेकल भारत में चेक गणराज्य के राजदूत रहे। वे हिंदी जगत में अपनी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। उनके आठ कविता‡संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. स्मेकल ने ‘गोदान’ का चेक भाषा में अनुवाद भी किया है। वे भारत‡प्रेम और हिंदी समर्पण के लिए विख्यात रहे। वे हिंदी को अपनी दूसरी मातृभाषा के रूप में मानते रहे हैं।

जर्मनी के लोठार लुत्से हिंदी के विदेशी साहित्यकार के रूप में अत्यंत चर्चित नाम है। 7 सितंबर 1927 को साईलेशिया में जन्में डॉ. लोठार लुत्से हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष रहे। डॉ. लुत्से ने हिंदी कविताओं का जर्मन में अनुवाद किया। डॉ. लुत्से ने हिंदी छात्रों के लिए एक पाठ्य पुस्तक भी तैयार की। उन्होंने अशोक वाजपेयी और विद्या खरे की कविताओं का जर्मन में अनुवाद किया है।

रूस के डॉ. येवर्गनी चेलीशेव का जन्म 27 अक्तूबर, 1921 में हुआ। वे भारती साहित्य व संस्कृति के विद्वान रहे हैं। कविता में उन्हें विशेष रुचि रही। ‘आधुनिक हिंदी कविता’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि से विभूषित हुए। उन्होंने रूसी और भारतीय साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर लगभग 200 पुस्तकों की रचना की। रूस के ही एक अन्य हिंदी विद्वान पी. ए. वारान्निकोव हैं, जिन्होंने रामायण का रूसी भाषा में अनुवाद किया है।

प्रोफेसर मारिया बृस्की का जन्म पोलैण्ड में 1937 में हुआ। वे भारत में पोलैण्ड के राजदूत भी रहे। हिंदी और संस्कृत से पोलिश भाषा में सराहनीय अनुवाद कार्य उन्होंने किया। 1966 में बनारस विश्वविद्यालय से पीएच.डी. प्राप्त की। उन्होंने कई हिंदी‡संस्कृत नाटकों के अनुवाद किये। साथ ही, मनु स्मृति, इडा स्मृति आदि का पोलिश में अनुवाद किया।

जापान में हिंदी को लोकप्रिय भाषा बनाने में निवाको कोईजुका की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मिनाको ने हिंदी सिनेमा के माध्यम से जापान में हिंदी शिक्षा में क्रान्तिकारी सम्भावनाओं की तलाश की। टी.वी. और नाटकों के माध्यम से हिंदी शिक्षण की व्यापक सामग्री तैयार की। रामायण को हिंदी पाठ्य सामग्री के तौर पर तैयार किया गया। उनके नेतृत्व में भारत के प्रमुख शहरों में हिंदी नाटकों का सफल मंचन किया गया है। प्रोफेसर क्यूमा दोई ने जापानी‡हिंदी और हिंदी‡जापानी शब्दकोष का निर्माण कर दोनों भाषाओं को एक‡दूसरे के करीब ला दिया है। प्रो. दोह ने ‘गोदान’ का जापानी में अनुवाद किया है। इनके अलावा डॉ. तोजियो मिजेकेनी मूल रूप से हिंदी में कहानी लिखते रहे। उन्होंने पंजाबी भाषा में पीएच.डी. प्राप्त की। प्रो. तोशियो तनाका ने भारत में हिंदी का अध्ययन किया और अब भी वे हिंदी के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं।

विदेशों में कई हिंदी विद्वानों ने हिंदी के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। कनाडा की डॉ. कैथरिन जी. हैन्सन ब्रिटिश कोलम्बिया विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा और साहित्य की प्रोफेसर हैं। हिंदी के आंचलिक उपन्यासों पर उन्होंने पीएच.डी. हासिल की है। धर्मवीर भारती, राजेन्द्र यादव आदि रचनाकारों की कहानियों का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। हंगरी की मारिया नैजेशी हिंदी का अच्छा ज्ञान रखती हैं। उन्होंने भर्तृहरि पर पीएच.डी. प्राप्त की। हिंदी से हंगेरियन में अनुवाद कार्य भी किया है। चीन के प्रो.जिन डिंगहान ने हिंदी सीखी और रामचरित मानस का चीनी में अनुवाद किया। चीन के ही एक अन्य विद्वान डॉ. गीनशेंवा ने वाल्मीकि रामायण का चीनी अनुवाद किया। प्रो. जोर्जो मिलाएनेति ने हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण रीति कालीन कवियों का इतालवी में अनुवाद किया है।

ब्रिटेन में हिंदी की तमाम संस्थाएं भी हैं। ‘यू. के. हिंदी समिति’ का संचालन श्री पद्मेश गुप्त व श्रीमती उषाराजे सक्सेना करते हैं। बर्मिंघम में ‘गीतांजली बहुभाषीय समुदाय’ नामक संस्था डॉ. कृष्ण कुमार व सुश्री तितिक्षा आनंद की देखरेख में चलती है। ‘भाषा संगम’ का संचालन महेन्द्र वर्मा करते हैं, साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी कवि सम्मेलन, भाषा सम्मेलन आयोजित होते हैं। छठां विश्व हिंदी सम्मेलन लंदन में ही आयोजित किया गया।

पिछले तीन वर्षों से कथाकार तेजेन्द्र शर्मा के नेतृत्व में इंग्लैण्ड में हिंदी साहित्य की गतिविधियां बहुत तेज हो गयी हैं। लंदन में वे ‘अन्तर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान’ का आयोजन करते हैं। इस अवसर पर विभिन्न गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों के संयोजन सहित लंदन के और भारत से जाने वाले साहित्यकारों के बीच महत्वपूर्ण विचार‡विमर्श होता है। इंग्लैण्ड में कई ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने वर्तमान को हिंदी में शब्दबद्ध कर रहे हैं। सत्येन्द्र श्रीवास्तव भी उनमें से एक हैं।

लंदन में हिंदी रचनाकारों का बड़ा कारवां है। भारत में कथाकार सूरज प्रकाश ‘अन्तर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान’ का संयोजन करते हैं। सूरज प्रकाश ने ‘कथा लंदन’ नामक एक कथा‡संग्रह का सम्पादन भी किया है।

अमेरिका में ‘अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी समिति’ की ‘विश्वा’, ‘विश्व हिन्दी समिति’ की ‘सौरभ’, विश्व हिंदी न्यास की ‘हिंदी जगत’ पत्रिकाएं नियमित रूप से प्रकाशित होती हैं। साथ ही, न्यूयार्क स्थित भारतीय विद्याभवन की ओर से हिंदी से सम्बन्धित कार्यक्रमों का संचालन, भवन के कार्यकारी निदेशक डॉ. पी. जयरामन बिलकुल नयी संकल्पनाओं के साथ करते हैं।

डॉ. राम चौधरी, न्यूयार्क, विश्व हिंदी न्यास के अध्यक्ष हैं। उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह हिंदी के लिए समर्पित कर दिया है। वे न्यूयार्क से ‘हिंदी जगत’ नामक पत्रिका का सम्पादन करते हैं । हर वर्ष वे हिंदी अधिवेशन का आयोजन भी करते हैं, जिसमें पूरे अमेरिका के प्रतिनिधि भाग लेते हैं। इसमें हिंदी कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का समावेश होता है।

डॉ. सुषमा बेदी कोलम्बिया विश्वविद्यालय में हिंदी की विभागाध्यक्ष हैं। वें हिंदी की यशस्वी कथाकार हैं। उनके उपन्यास ‘हवन’ ने विदेशों में बसे भारतीयों के बीच जीवन‡मूल्योें के संघर्ष को बखूबी से रेखांकित किया है। उनकी लगभग 10 पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित हो चुकी हैं और चर्चित भी रही हैं। उनका नवीनतम उपन्यास है ‘नवाभूम की रसकथा’। उसी विश्वविद्यालय की डॉ. अंजना संधीर का ‘यह कश्मीर है’ कविताओं का संकलन प्रकाशित हुआ है। अंजना संधीर ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने अमेरिका की महिला रचनाकारों की कविताओं का व्यापक संकलन ‘प्रवासिनी के बोल’ में किया है। इसके अलावा ‘सात समुंदर पास से’, ‘इजाफा’ आदि का सम्पादन उन्होंने किया है। ‘तुम मेरे पापा जैसे नहीं हो’ उनका चर्चित काव्य संग्रह है। ‘बारिशों का मौसम तथा धूप‡छांव’ और ‘आंगन’ उनका गजल‡संग्रह है। गुलशन मधुर ‘वाइस ऑफ अमेरिका’ में अधिकारी हैं। उनकी कविताओं में अत्यंत संवेदनशील विषय समेटे गये हैं। डॉ. विशाखा ठाकुर का ‘तीसरा छल’ चर्चित कविता‡संग्रह है। डॉ. विशाखा की कविताएं व्यक्तिगत अनुभूतियों की सार्थक अभिव्यक्तियां हैं। विभिन्न देशों से गुजरते हुए उन्होंने अपने भीतर सम्पूर्ण भारतीय अनुभूतियों को समेटा हुआ है।

अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में समाज विज्ञान की प्रोफेसर डॉ. उषा देवी विजय कोल्हटकर हिंदी और मराठी में समान रूप से अपना लेखन कर रही हैं। उनका हिंदी उपन्यास ‘जमी हुई बर्फ’ और ‘प्रलय के पार’ अमेरिकी जन‡जीवन की भीतरी दास्तान है। ‘चाबी का गुड्डा’, ‘अंधेरी सुरंग में’, ‘बटर, टॉफी और बूढ़ा डॉलर’ उनके कहानी‡संग्रह हैं। इन संग्रहों में उन्होंने अमेरिका के घर‡परिवार‡समाज की घटनाओं को कथारूप दिया है। एक माह की अमेरिका यात्रा के दौरान वहां के प्रमुख नगरों से प्रवास करते समय यह बात स्पष्ट हुई कि

हिंदी भाषा ने सभी भारतीयों को एक सूत्र में पिरोया है। अमेरिका में बेहतर आजीविका के लिए आये मूल भारतीयों में हिंदी के उत्कृष्ट रचनाकार भी हैं। हिंदी पत्र‡पत्रिकाओं के बारे में उनमें गहरी उत्कंठा लगी।

कनाडा में भी हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर बहुत उत्साह है। डॉ. स्नेह ठाकुर ‘वसुधा’ नामक पत्रिका का प्रकाशन कर रही हैं, जिसमें कविता‡कथा आदि के प्रकाशन के साथ हिंदी भाषा विषयक लेखों को भी प्रमुखता से स्थान दिया जाता है।

विश्व स्तर पर हिंदी साहित्य के माध्यम से जहां दूर‡दराज तक फैले आप्रवासियों को आपस में जोड़ने का कार्य किया जा रहा है, वहीं आप्रवासियों की आन्तरिक अनुभूतियां, सांस्कृतिक विरासत, चिन्तन और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए हिंदी अपनी सार्थक भूमिका निरंतर निभाती रही है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि सम्प्रेषण की नव‡नवीन तकनीक के साथ तालमेल स्थापित कर हिंदी की भूमिका को और अधिक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।

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