क्या मुसलमान इसका विचार करेंगे?

आज के पाकिस्तान पर मैंने हाल ही में एक किताब लिखकर पूरी की है। यह लेख उस पुस्तक के बारे में नहीं है, परंतु पुस्तक के लिए किये गये अध्ययन के दौरान भारतीय मुसलमानों के बारे में अनेक पहलू मेरे समक्ष उजागर होते गए। इससे मेरे मन में अनेक प्रश्न पैदा हुए। कई वर्ष पहले मैंने भारतीय मुसलमानों से संबंधित सेतु महादेवराव पगड़ी की किताब पढी थी। भारतीय मुसलमानों का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा था, ‘भ्रमजाल में भटकता मूर्ख समाज’। वे इतिहास के गहन अध्येता थे। पाकिस्तान पर किताब लिखने के बहाने मुस्लिम समाज का जो खाका मेरे समक्ष उपस्थित हुआ उससे मुझे सेतु महादेवराव पगड़ी का कथन एकदम सही लगा, ‘भ्रमजाल में भटकता मूर्ख समाज’।
अकबरुद्दीन ओवैसी ऑल इंडिया मजलिस के नेता हैं। आंध्र प्रदेश की विधानसभा के सदस्य हैं। 24 दिसंबर 2012 को उन्होंने आदिलाबाद जिले के निर्मल शहर में भाषण दिया। इस भाषण के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। इस भाषण में उन्होंने अपनी अक्ल के जो घोड़े दौड़ाये हैं वे हैं, ‘सौ करोड़ हिंदुओं की तुलना में पच्चीस करोड़ मुसलमान अधिक शक्तिशाली हैं। यह साबित करने के लिये मुसलमानों को केवल पंद्रह मिनट का समय पर्याप्त है। केवल पुलिस का हस्तक्षेप न हो। हिंदु नपुंसक हैं और पुलिस दल भी नपुंसकों की फौज है। एक हजार नपुंसक एक बच्चे को भी जन्म नहीं दे सकते। हिंदू, मुसलमानों की बराबरी नहीं कर सकते और जहां कहीं भी मुसलमान कुछ करने की कोशिश करते हैं वहां पुलिस हस्तक्षेप करती है। हम मुसलमान, हिंदुओं को शांति से नहीं जीने देंगे और मुसलमान पूरे भारत को सबक सिखाएंगे।’
अकबरुद्दीन ओवैसी का यह वक्तव्य पढ़कर ‘भ्रम में भटकते मूर्ख समाज का महामूर्ख राजनीतिक नेता’ कैसा हो सकता है इसका दर्शन होता है। भारत के मुसलमान शूर और पराक्रमी हैं यह पहला भ्रम है। इस समाज के कुछ लोग क्रूर होते हैं यह सच है, परंतु वे पराक्रमी नहीं हो सकते; क्योंकि उनके पूर्वजों का तलवार की नोंक पर धर्मांतरण किया गया था। प्राण जाने के भय से मुसलमान बन गये लोग कदापि पराक्रमी नहीं हो सकते। दूसरा भ्रम यह है कि मुसलमान आक्रमण करें तो हिंदू मार खा लेंगे। ऐसी परिस्थिति अब है नहीं। हिंदू स्वभाव से शांत है, वह हिंसक नहीं होता; परंतु अगर हो गया तो उसका गुजरात बन जाता है। किसी तरह का सैन्य बल, शस्त्रास्त्र और पर्याप्त धन न होते हुए भी शिवाजी नामक मराठा युवक ने मुगलों और पांच सल्तनतों को ललकारा था। संताजी और धनाजी ने ओवैसी के ‘शूर मुसलमानों’ के मन में इतना भय निर्माण कर दिया था कि अगर उनका घोड़ा पानी नहीं पीता तो वे ‘शूर सैनिक’ उससे पूछते थे कि क्या तुम्हें पानी में धनाजी-संताजी दिखाई देते हैं? व्यर्थ की बकबक करना आसान होता है; परंतु ‘घी देखा लेकिन बड़गा नहीं देखा’ जैसी स्थिति आने पर ओवैसी जैसे लोगों का हकलाना स्वाभाविक है।

आज भारतीय मुसलमानों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। इसे नकारने का कोई कारण नहीं है और उनकी इस स्थिति के लिए हिंदू जिम्मेदार नहीं हैं। मूर्ख सेक्यूलर लोग मुसलमानों की इस स्थिति के लिए जिस तरह संघ, विश्व हिंदू परिषद, भाजपा को जिम्मेदार बताते हैं वह भी सच नहीं है और मूर्खतापूर्ण वक्तव्य ही है। मुसलमानों की दयनीय स्थिति के लिए स्वयं मुसलमान समाज ही जिम्मेदार है। किस तरह, आइए इसे देखें-

भारत में रहनेवाले मुसलमानों के माथे पर बंटवारे का पाप लिखा है। देश के बंटवारे की मांग मुहम्मद अली जिन्ना ने की थी। मुसलमान समाज धीरे-धीरे जिन्ना के साथ खड़ा हो गया। मुसलमानों के प्रादेशिक नेता, मुल्ला-मौलवी जिन्ना का समर्थन करने लगे। पाकिस्तान की मांग का समर्थन करके वे आत्मघात कर रहे हैं, यह बात उस समय के मुसलमानों के ध्यान में नहीं आई। सामान्य जनता इस तरह के दूरगामी विचार नहीं कर सकती। दूरगामी विचार समाज के नेताओं को करना होता है, विचारकों- लेखकों को करना होता है। मुसलमान समाज के दुर्भाग्य से उसे ऐसे नेता नहीं मिले। जिन्ना व्याक्तिगत महत्वाकांक्षाओं में लिप्त थे। अंग्रेजों को रूस पर नजर रखने के लिये और मध्यपूर्व के तेल भंड़ारों को सुरक्षित रखने के लिये आज के पाकिस्तान की भूमि की आवश्यकता थी। मुहम्मद अली जिन्ना अंग्रेजों के एजेंट बन गये। मुसलमान समाज को यह समझ में नहीं आया। वे धर्मांध होकर पाकिस्तान की मांग का समर्थन करने लगे। पाकिस्तान का निर्माण हो गया; लेकिन पाकिस्तान की मांग करनेवाले भारत में ही रह गये। उनके माथे पर यह मुहर लग गई कि यह समाज विश्वासघाती, धर्मांध और भारतीय संस्कृति से द्वेष करनेवाला है। यह मुहर किसी और ने नहीं लगाई; बल्कि मुसलमानों ने स्वयं ही अपने शरीर पर यह जख्म किया है।

भारत में रहनेवाले वाले मुसलमानों ने क्या कभी विचार किया है कि पाकिस्तान में गये मुसलमानों का क्या हश्र हुआ? पाकिस्तान में सुन्नी शियाओं को मारते हैं, शिया सुन्नी को मारते हैं। दोनों मिलकर भारत से पाकिस्तान में गये मुसलमानों को मारते हैं। वहबी, तालिबानी, सुन्नी दरगाहों में विस्फोट कराते हैं और वहां दुआ मांगने गये मुसलमानों को मारते हैं।

वर्ष  घटनाएं मौतें   जख्मी
1998
1999
2000 
2001 
2002 
2003 
2004 
2005 
 188 
 103 
 109 
 154 
 63
 22 
 19 
 58 
 157 
 86 
 149
 261 
 121 
 102 
 187 
 156 
 231
  189
  0
  495
  257
  103
  619
  354

2007 से 2011 के आंकड़ें कुछ इस प्रकार हैं- इस कालखंड में धार्मिक हिंसाचार की 671 घटनायें हुईं। इसमें 1649 लोग मारे गये। सुन्नी मुसलमान शियाओं को कहां मारते हैं? उन्हें मारने की जगहें हैं- 1. शिया मस्जिद 2.शिया तीर्थयात्री 3. मजार और कब्रगाह। शिया संगठन इस हमले का बदला सुन्नियों की मस्जिदों या उनके सम्मेलनों पर हमला करके लेते हैं। लोगों को मारने के लिये एके-47 रायफलों, कार बम, मानव बम का खुलकर उपयोग किया जाता है। पाकिस्तान का निर्माण करके आखिर क्या मिला? विश्वासघात का एक धब्बा और पाकिस्तान में अपने ही धर्मबंधुओं का कत्ल। पाकिस्तान निर्माण करते समय नारा दिया गया ‘इस्लाम खतरे में है’। और, अब पाकिस्तान में नारा लगाना पड़ता है ‘मुसलमान खतरे में है।’ पाकिस्तान में सारी मारकाट इस्लाम के नाम पर ही चलती है।

क्या मुसलमानों ने कभी भी एक मूलभूत प्रश्न पर विचार किया है? वह प्रश्न है ‘हम कौन हैं?’ कोई मुल्ला-मौलवी कहेगा, ‘यह भी क्या कोई प्रश्न हुआ, हम मुसलमान हैं।’ परंतु यह उत्तर स्वाभाविक हुआ। ‘हम कौन हैं’ इस प्रश्न मेें छिपा प्रश्न यह है कि ‘मुसलमान बनने के पहले हम कौन थे? हमारे पूर्वज कौन थे?’ भारत में तुर्की मुसलमान, अरबी मुसलमान, मुगल मुसलमान आक्रमणकारियों के रूप में आये। इन आक्रमणकारियों की संख्या कुल मुसलमानों में कितनी होगी? वह नगण्य है। भारत के बहुसंख्य मुसलमान हिंदू समाज से धर्मांतरित कराए गए मुसलमान ही हैं। पाकिस्तान का भुट्टो घराना भले ही मुसलमान हो परंतु वह मूलत: राजपूत घराना है। पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश का नाम है इफ्तिकार अली चौधरी। चौधरी क्षत्रीय नाम है अर्थात उनका मूल घराना क्षत्रीय है। भारत के सभी गायक घरानों के मूल पुरुष हिंदू ही थे। कोल्हापुर संस्थान के महान गायक अल्लादियां खान का मुंबई में निधन हुआ। उनकी अंतयात्रा में बहुत ज्यादा मुसलमान नहीं थे। इसका कारण पूछने पर मुसलमानों ने कहा , ‘वो तो बम्मन (ब्राह्मण) मुसलमान था।’ यह मूल पहचान क्या उन्हें याद है?

भारतीय मुसलमानों के कभी नेता रहे सैयद शहाबुद्दीन स्वयं को मुस्लिम इंडियन कहा करते थे। उनका ‘मुस्लिम इंडियन’ नामक अखबार भी था। मुस्लिम इंडियन का क्या अर्थ होता है? मुस्लिम इंडियन का अर्थ होता है मुस्लिम भारतीय। अर्थात मैं पहले मुसलमान हूं फिर भारतीय हूं। मैं प्रथम मुसलमान हूं अर्थात वैश्विक मुसलमान समाज का घटक हूं। मुसलमान के रूप में मेरी अलग राष्ट्रीय पहचान नहीं है। मैं मुस्लिम हूं और भारत में रहता हूं यही उसका अर्थ हुआ। सामान्य मुसलमानों को भयानक अनर्थ परंपरा में धकेलनेवाला यह अर्थ है।

भारत में रहनेवाले मुसलमानों की असली पहचान भारतीय मुसलमान के रूप में ही है। प्रथम भारतीय होने का अर्थ यह है कि मेरी संस्कृति भारतीय है, मेरी परम्परा भारतीय है, मेरा इतिहास भारतीय है, मेरे जीवन मूल्य भारतीय हैं, भारत मेरी कर्मभूमि, मातृभूमि, पितृभूमि है। ‘मैं भारतीय मुसलमान हू’ं इसका अर्थ यह है कि भारत में रहनेवाले सभी मेरे देशबंधु हैं और यह हम सभी का देश है। केवल एक शब्द आगे-पीछे करने से कैसे अर्थ का अनर्थ हो जाता है यह इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। शहाबुद्दीन जैसे नेता मुसलमान समाज को मिले, मुसलमानों ने उन्हें स्वीकार किया, इसमें भाजपा और विश्व हिंदू परिषद कहां आती हैं?

मुसलमानों ने कभी यह विचार किया है कि उनका इतिहास क्या है? क्या एकाध मुसलमान नेता भी उन्हें उनका इतिहास बताता है? फ्रेन्काइज गोटिए नामक एक फ्रेंच पत्रकार हैं। उनका एक लेख है ‘इंडियन मुस्लिम्स: बाबर या राम’। इस लेख में वे कहते हैं, ‘भारत के बहुसंख्य मुसलमान हिंदू समाज से धर्मांतरित मुसलमान हैं। उन्हें मुसलमान बनाने के लिये मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हिंदुओं का अति भीषण नरसंहार किया। अफगानिस्तान की विजय के बाद ई.स. 1000 में वहां की सम्पूर्ण हिंदू प्रजा का नाश कर दिया गया। हिंदुकुश पर्वत का नाम हम सुनते हैं जिसका अर्थ है हिंदुओं का नरसंहार! वहाबी सुलतान एक वर्ष में एक लाख हिंदुओं के संहार का संकल्प लेते थे। सन 1399 में तैमूर लंग ने एक ही दिन में एक लाख हिंदुओं का संहार किया था। प्रख्यात इतिहासकार प्रा. के. एस. लाल कहते हैं,‘ई.स. 1000 से लेकर 1525 के कालखंड में लगभग 8 करोड़ हिंदुओं का कत्ल किया गया जो कि इतिहास का सबसे बड़ा वंशसंहार था। आज के मुसलमानों के पूर्वज भी इस नरसंहार में मारे गये मुसलमानों के ही वंशज हैं।” मुसलमानों को अपना यह इतिहास शांतिपूर्ण तरीके से समझना चाहिये।
हम मुसलमान हुए यानी क्या हुआ? इसका विचार करना चाहिये। हम पर अरबी संस्कृति लादी गयी है, अरबी पहनावा लादा गया है, अरबी रीतिरिवाज लादे गये हैं और ये सभी काम इस्लाम के नाम पर किये गये हैं। दूसरी भाषा में कहें तो हमें सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से गुलाम बनाया गया है। अब यह गुलामी गौरवचिह्न के रूप में प्रदर्शित करने की बात है या जल्द से जल्द उसका त्याग करने की बात है इस पर मुसलमान कभी विचार करेंगे कि नहीं?

वे जानते हैं कि पाकिस्तान के मुसलमान ‘मैं कौन हूं?’इसका बहुत गंभीरता से विचार कर रहे हैं। अब्दुल गफ्फार खान के बेटे वली खान कहा करते थे, ‘पाकिस्तानी के रूप में मेरी आयु पचास साल है, मुसलमान के रूप में चौदह सौ साल और पख्तून के रूप में पांच हजार साल।’ पाकिस्तान के सिंधी मुसलमान अपने को सिंधु संस्कृति का वंशज मानते हैं। यह सिंधु संस्कृति पांच हजार साल पुरानी है। बलुची मुसलमान कहता है, ‘मैं पहले बलुची हूं और मेरी परम्परा भी तीन-चार हजार साल पुरानी है।’ पाकिस्तान के एक विद्वान रजा हबीब कहते हैं कि, ‘मैं पाकिस्तानी भारतीय हूं।’ इसका अर्थ यह है कि मैं पाकिस्तान का नागरिक हूं परंतु मेरी पहचान भारतीय है। मेरी राष्ट्रीय पहचान भारतीय है।

मुसलमान इस बात का विचार करनेवाले हैं कि नहीं कि दुनिया कहां जा रही है? दुनिया अब इक्कीसवीं सदी में पहुंच चुकी है। मानव सभ्यता ने बहुत प्रगति कर ली है। लोकतांत्रिक राजव्यवस्था का विकास किया है। लोगों का राज व्यवस्था में, उसे चलाने में महत्वपूर्ण सहभाग मिला है। 1947 से भारत में लोकतंत्र है। मुसलमानों ने पाकिस्तान प्राप्त कर लिया। वहां तीस साल तक सैनिक शासन था। सेना ने वहां की जनता को अपने पांव तले दबाए रखा था। वहां के मुसलमानों को किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता नहीं है। पाकिस्तान में प्रसार माध्यमों को स्वतंत्रता नहीं है। पांच साल तक जरदारी मुक्त रहे तो कैसे रहे, इस बात का पूरे विश्व को आश्चर्य है। भारत कीें लोकतांत्रिक प्रणाली में डॅा. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बने। जाहिर भारतीय वायु सेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल बने। भारत के मुख्य न्यायाधीश एक बार हिदायतुल्ला रहे और एक बार अहमदी। खेल के क्षेत्र में भी पटौदी, अजहरउद्दीन, युसुफ पठान, सानिया मिर्जा इत्यादि कई नाम लिये जा सकते हैं।

ये सभी लोग मुस्लिम इंडियन के रूप में नहीं बल्कि इंडियन मुस्लिम के रूप में सामने आये और इन सभी पर भारतीयों को गर्व है। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तो सभी भारतीय युवकों के गले के ताबीज हैं। इनमें से किसी ने भी अपने मुसलमान होने को छोड़ा नहीं है और वे ऐसा करें ऐसी किसी की अपेक्षा भी नहीं है। वे एक अच्छे मुसलमान बने रहें यही सभी की अपेक्षा है और साथ ही यह भी अपेक्षा है कि वे ऐसे कार्य करें जिससे भारत का नाम रोशन हो।

क्या भारतीय मुसलमान यह जानते हैं कि उन्होंने अपने को राजनीतिक सौदेबाजी की वस्तु बना लिया है। उनके नेता, चाहे वे धार्मिक हों या राजनैतिक, उनके मतों का सौदा करते हैं, उन्हें बिकाऊ माल बनाते हैं इसका उन्हें कोई ज्ञान कराता है? चुनाव पास आते ही आश्वासनों की खैरात शुरू हो जाती है। आप हमें वोट दो हम आपको फलां फलां चीजें देंगे। खुद को सेक्यूलर कहलवानेवाले सभी दल इस तरह के व्यापारी सौदे करते हैं। इस सौदेबाजी के दो घातक परिणाम हैं। पहला परिणाम मुसलमान अपने मतों की कीमत नहीं समझ पाते। मतदान करने का अधिकार एक राजनैतिक शक्ति है और इस शक्ति का उपयोग बिना सौदेबाजी किए करना चाहिए। खुद को बाजारू बिकाऊ वस्तु बनाना स्वयं का अपमान करने जैसा है। दूसरा घातक परिणाम यह है कि बहुसंख्य लोगों के मन में यह भावना बनती है कि मुसलमानों को अधिक देकर हम पर अन्याय किया गया है। इस अन्याय के कारण चिढ़ निर्माण होती है और जब यह मन में संचित होती जाती है तो उसका रूपांतरण क्रोधशक्ति में होता है और इसका कब विस्फोट होगा कहा नहीं जा सकता।

एक समुदाय के रूप में मुसलमानों का हित किसमें है ये उन्हें कौन बताएगा? यह काम मुसलमान समाज के नेताओं को ही करना होगा। उन्हें बताना होगा कि अपनी पृथकता बनाए रखने में अपना हित नहीं है, बहुसंख्य समाज के साथ बराबरी से बर्ताव करने में ही हमारा हित है। अपने नाम से झूठे आंसू बहानेवाले, अपने हितों की झूठी बातें करनेवाले ही हमारे असली शत्रु हैं। उनके कारण तात्कालिक लाभ होता है, परंतु दीर्घकाल में नुकसान ही नुकसान है। हमें आधुनिक बनना चाहिये। अपने बच्चों को सक्षम बनानेवाली आधुनिक शिक्षा देनी चाहिये। अपनी बुद्धि से अपना विचार करना चाहिये, उसे किसी और के पास गिरवी नहीं रखना चाहिये, इस्लामपूर्व की अपनी पहचान हम भूल नहीं सकते। धार्मिक कट्टरता, आक्रमण, जिहाद इत्यादि बातें कालबाह्य हो चुकी हैं। आधुनिक बातें, आधुनिक विचार, मानवीय स्वतंत्रता, मानवाधिकार से ही विश्वकल्याण हुआ है। हमें भी इसी दिशा में जाना चाहिये। हिंदुओं से शत्रुता रखने का अर्थ है अपने हिंदू बाप-दादाओं से शत्रुता रखना। इससे कुछ हासिल नहीं होगा। मुसलमानों को यह भी बताना चाहिये कि हिंदू समाज कभी भी आक्रामक नहीं हो सकता। हिंदू समाज का यह स्वभाव बदलने की शक्ति किसी भी संगठन में नहीं है। अत: उसका डर पैदा करना कपोलकल्पना मात्र है। इस तरह का डर पैदा करनेवाले राजनीतिक नेता और तथाकथित बुद्धिजीवि लोगों को घातक समझना चाहिये।

एक और विचार के साथ यह लेख समाप्त करता हूं। पिछले कई सालों में देश में अनेक स्थानों पर आतंकवादी हमले हुए। मुंबई, हैदराबाद, पुणे, जयपुर, दिल्ली, बैंगलोर पर हमला करनेवाले हमलावर मुसलमान थे यह साबित हो चुका है। जांच में यह भी पता चला है कि वे सभी पाकिस्तानी थे। हमले में मरे अधिकतर लोग हिंदू थे। हिंदू समाज शांत है। भारतीय मुसलमानों का यह कर्तव्य है कि अपने देश बंधुओं की रक्षा के लिए वे मैदान में उतरें। सच्चा भारतीय मुसलमान बनकर अपने देशबंधुओं से हाथ मिलाकर उनके कंधे से कंधा मिलाकर बड़ी संख्या में खड़ा रहना चाहिए। हिंदू समाज आज शांत है, शासन व्यवस्था आज शांत है परंतु यह तूफान के पहले की शांति है। यह शांति भयावह रूप न ले इसके लिए सभी को सचेत रहना चाहिए। अपनी प्रगति के लिए, समृद्धि के लिए, विकास के लिए, सभी के कल्याण के लिए, अंतर्गत शांति कामम रखना सभी का कर्तव्य है, पवित्र कर्तव्य है। आज के पाकिस्तान की स्थिति अगर हम खुली आंखों से देखते रहे तो एक अलग रास्ता हमारे मुस्लिम बंधुओं को मिले बिना नहीं रहेगा।
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