तेल युद्ध

सारी दुनिया इस समय तेल के पीछे दीवानी है। तेल के लिए चल रहा यह युद्ध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह का है। यह इसलिए है क्योंकि सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था तेल पर ही निर्भर है। अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देश जिस तरह तेल पर हावी होना चाहते हैं उसी तरह चीन, रूस और भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश भी इस संघर्ष में मजबूरन खिंचे गए हैं। प्रथम विश्व युद्ध हो या दूसरा विश्व युद्ध हो- तेल ही संघर्ष का कारण बना है। यहां तक कि अफगानिस्तान में रूसी कब्जा व उसे भगाने के लिए नाटो देशों की कार्रवाई के पीछे तेल पर प्रभुता स्थापित करना ही कारण रहा है। इराक के सद्दाम हुसैन का कुवैत पर कब्जा और बाद में सद्दाम के पतन व कुवैत पर अमेरिकी कब्जा या सीरिया में आसन्न अमेरिकी हमले अथवा लेबनान में हो रही उथल-पुथल का एक प्रमुख कारण तेल पर स्वामित्व की जद्दोजहद ही है। इस संघर्ष में सऊदी अरब अमेरिका के साथ है। क्योंकि, सुल्तान को डॉलर चाहिए और अमेरिका को तेल। इसलिए अन्य अरब देशों में एक तरह का असंतोष है। अरब देशों में जनाक्रोश अर्थात ‘अरब बसंत’ के पीछे दो कारण हैं- एक कारण है अमेरिका जिसने अपने तेल साम्राज्य को कायम रखने के लिए इसे हवा दे रखी है। दूसरा कारण है- तेल के धंधे में अरब देशों के सुल्तान या शासक अथवा उनके रहनुमा बेहद अमीर बने। इनकी संख्या गिनी-चुनी है। यह सम्पन्नता आम अरबों तक नहीं पहुंची। जनता में यह भावना बल पकड़ गई है कि तेल अरबों का और अमीर बन रहे हैं अमेरिका व पश्चिमी देश। चीन इसमें अब नया खिलाड़ी है। तेल के इस खेल का इतिहास रक्तरंजित और रोंगटे खड़े कर देने वाला है।

पूर्वेतिहास

तेल का इतिहास करीब दो सौ साल पुराना है। 1829 में रूस के बाकू इलाके में तेल मिला। उसका कारखाना भी वहां लगा। लेकिन रूसियों ने तेल के महत्व को नहीं समझा। वह बंद पड़ गया। इसलिए रूसी भले ही तेल उत्खनन के जनक हो, लेकिन तेल क्रांति की शुरुआत अमेरिकियों ने ही की। अमेरिका के पेनसिल्विनिया प्रांत में 1859 में तेल कुआं खोदा गया। भारत में जब 1857 के स्वातंत्र्य समर की ज्वाला धधक रही थी, तब दूर अमेरिका में तेल क्रांति आकार ले रही थी। दुनिया पर राज करने वाले अंग्रेज भी देर से जागे। ब्रिटेन में तो तेल था नहीं, इसलिए उन्होंने अपने उपनिवेश भारत की ओर नजर दौड़ाई। भारत में सब से पहले 1866 में ब्रिटिश कम्पनी मैक्लीलौप स्टुअर्ट ने असम में तेल खुदाई का प्रयोग किया। वह असफल रहा। तेल तो मिला लेकिन उसका व्यावसायिक उत्पादन करने की क्षमता प्राप्त नहीं की जा सकी। इसी धागे को पकड़ा ब्रिटिश इंजीनियर डब्लू. एल. लेक ने। वह असम रेल्वे ट्रेडिंग कम्पनी का इंजीनियर था। यह ब्रिटिश कम्पनी थी। उसका का काम असम में रेल पटरियां बिछाना था। फिर भी उसने तेल खुदाई में भी हाथ आजमाने की कोशिश की। इससे कम्पनी को व्यापार का एक नया क्षेत्र मिला। दिग्बोई का पहला तेल कुआं इसी तरह खुदा। उसकी गहराई 600 फुट थी। 1982 में वहां पहला तेल शुद्धिकरण कारखाना बना। उससे रॉकेल, रेल इंजनों को लगने वाला तेल और मोम आदि का उत्पादन शुरू हुआ। यह कारोबार इतना बढ़ा कि अंत में ‘असम ऑयल कम्पनी’ नाम से नई कम्पनी बनानी पड़ी। इस कम्पनी ने असम में लगभग 80 कुएं खोदे। 1917 तक उसका काम अबाधित रूप से चलता रहा। ‘बर्मा ऑयल’ फिर इस स्पर्धा में उतरी और उसने असम ऑयल को खरीद लिया। तेल के लिए संघर्ष की यह पहली चिंगारी थी।
उधर, अमेरिका में लोग के तेल के पीछे पड़े हुए थे। पेनसिल्विनिया राज्य में पत्थरों की दरारों से निकलने वाले ज्वालाग्राही द्रव की उन दिनों चर्चा थी। कनाड़ा के डॉ. अब्राहम जेसनर ने इस द्रव से ज्वलनशील हिस्से को अलग करने की प्रक्रिया विकसित की। इस ज्वलनशील हिस्से का नाम उसने ‘केरोसिन’ रखा। यह दो यूनानी शब्दों की संधि था- केरास अर्थात मोम और इलन अर्थात तेल। 27 अगस्त 1859 को कर्नल एडविन ड्रेक को पहला कुआं खुदवाने में सफलता मिली। ड्रेक की सफलता देखकर अन्य लोग भी इस व्यवसाय में उतरे। जॉन विलियम डी. रॉकफेलर उनमें से एक है। वही बाद में दुनिया का तेल सम्राट बना। उसकी स्टैण्डर्ड ऑयल कम्पनी की तूती बोलती थी। उसने एक के बाद एक तेल कम्पनियों का अधिग्रहण किया। 40 कम्पनियां उसके साम्राज्य में आईं। उनमें से 14 बड़ी कम्पनियां थीं।

अमेरिकी तेल रूसी बाजार में आने लगा। रूसियों के कान खड़े हो गए। रूस से लगे बाकू में तेल के अथाह भंडार थे। 1829 में वहां एक तेल शुद्धिकरण कारखाना भी लगा था। लेकिन उसका व्यापारिक मूल्य समझने में रूस ने भूल की। अमेरिकी तेल आते ही रूस जागा। 1870 में रूसी सम्राट ने तेल क्षेत्र निजी कम्पनियों के लिए खुला कर दिया। 1872 तक कोई 20 कारखानें लग गए। इसी समय स्वीडन से इमैन्यूअल नोबेल परिवार रूस में स्थलांतरित हुआ। वे उद्यमी थे। अनेक क्षेत्रों में उनका काम था। उन्होंने डायनामाइट की तकनीक विकसित की थी। वे बंदूकें भी बनाते थे। उन्हें प्लायवुड का जनक माना जाता है। उनके तीन पुत्र थे- रॉबर्ट, अल्फ्रेड और लुडविंग। रॉबर्ट और लुडविंग तेल के दीवाने थे। अल्फ्रेड रसायनशास्त्र समेत विज्ञान के कई विषयों में रुचि रखते थे। आज जो विश्वप्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार दिया जाता है उसकी नीव अल्फ्रेड ने ही रखी। रॉबर्ट ने बाकू में तेल कारखाना लगाया। बाकू देखते-देखते तेल का गांव बन गया। कोई 200 कारखानें वहां शुरू हो गए। स्पष्ट है कि तेल सम्राट रॉकफेलर से मुकाबला शुरू हो गया। इससे अमेरिका और रूस में अप्रत्यक्ष शीत संघर्ष की शुरुआत हो गई। इस बीच फ्रांस के रॉथशील्ड परिवार का रूसी तेल की ओर ध्यान गया। रॉथशील्ड यहूदी थे। यहूदियों का रूस में विरोध था। लेकिन तेल के खातिर उन्हें आने दिया गया। इस तरह तेल की दुनिया में अब तिकोना संघर्ष शुरू हो गया- रॉकफेलर (अमेरिका), नोबेल (रूस) और रॉथशील्ड (फ्रांस)।
यूरोप की राजनीति तेजी से बदल रही थी। राथशील्ड का रॉकफेलर से कड़ा संघर्ष था। इससे रास्ता निकालने के लिए उन्होंने नये बाजार की खोज शुरू की। इसमें सहयोग के लिए एक और यहूदी व्यापारी सर मार्क्स सैम्युअल उनके साथ हो लिए। इस तरह ‘शेल’ तेल व्यापार में उतरी। दोनों ने मिलकर एक साहसी योजना बनाई। उन दिनों अर्थात 1869 में सुवेज नहर शुरू हो गई थी। दोनों ने इसके जरिए अपने तेल टैंकर भारत की ओर भेजने का निर्णय किया। इससे रॉकफेलर के तेल साम्राज्य को पहला झटका लगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नये आयाम आए।

उधर, हालैण्ड अर्थात आज का नीदरलैण्ड भी इस युद्ध में उतरा। जावा-सुमात्रा हालैण्ड के कब्जे में था। वहां टोबैको नामक कम्पनी तम्बाकू की खेती करती थी। आइल्को जिलेकर वहां प्रबंधक नियुक्त था। उसने तेल की ओर मोर्चा लगाया। 1885 के आसपास उसने एक तेल कुएं की खुदाई की। तेल कम्पनी का नाम रखा ‘रॉयल डच।’ जिलेकर के निधन के बाद कम्पनी के सूत्र जीन केसलर के हाथ आए। उसने कारखाने से लेकर बंदरगाह तक पाइप लाइन बिछा दी। इससे सुविधा हुई। कम्पनी का तेल ‘क्राउन ऑयल’ के नाम से बाजार में आया। अब रॉयल डच को शेल का मुकाबला करना था। फिर भी खेल का नियंत्रण रॉकफेलर की ‘स्टैण्डर्ड’ के हाथ में ही था। क्योंकि यह युद्ध जितना तेल का था उससे अधिक तेल मूल्यों पर नियंत्रण का था। जिसके पास तेल भंडार अधिक थे वह मूल्यों पर नियंत्रण रखता था और स्टैण्डर्ड के पास तेल की कमी नहीं थी।

इस बीच तेल सारी दुनिया में छाने लगा था। संघर्ष केवल कम्पनियों तक सीमित नहीं रहा था। विभिन्न देश भी अपनी- अपनी कम्पनियों की सुरक्षा के लिए इस संघर्ष में कूद पड़ते थे। इसकी मिसाल है जर्मनी के रुडाल्फ डीजल। उन्होंने पहली बार तेल पर चलने वाला इंजन बनाया। 28 फरवरी 1893 को उन्होंने इसका पेटेंट भी ले लिया। तब से यह इंजन ‘डीजल इंजन’ कहलाता है। इस इंजन का विभिन्न यंत्रों में उपयोग होने लगा। डीजल इसकी प्रोद्योगिकी विभिन्न देशों को देने लगे। इंग्लैण्ड की रोवर कम्पनी ने इसमें रुचि दिखाई। वह यह प्रोद्योगिकी खरीदना चाहती थी। 29 सितम्बर 1913 को डीजल इंग्लैण्ड जाने के लिए नौका पर सवार हुए। लेकिन वे इंग्लैण्ड नहीं पहुंचे। बाद में उनका शव मिला। कहते हैं कि इंग्लैण्ड को प्रौद्योगिकी हस्तांतरित न हो इसके लिए जर्मनी के जासूसों ने उनका ही खात्मा कर दिया। इसके बाद कार्ल बेंझ, गॉटलिब डेम्लर ने भी नए-नए इंजन बनाए। नए- नए नामों से कम्पनियां बनाईं। डेम्लर का नाम ‘मर्सिडिज’ कर दिया गया। राइट बंधु भी इसी समय विमान बनाने में सफल रहे। इस तरह तेल उद्योग- व्यापार और अर्थव्यवस्था का चक्र चलाए रखने के लिए अनिवार्य और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष का कारण बन गया।

यही नहीं, अक्तूबर 1917 की रूसी क्रांति के पार्श्व में भी तेल ही था। बाकू-बाटुम में तेल कामगारों के संघर्ष की शुरुआत ब्लादिमीर लेनिन ने की थी। बोल्शेविक क्रांति की प्रयोगशाला बाकू बनी। इसमें जोसेफ स्तालिन भी तेल युद्ध की ही संतान है। निकोलस उस समय रूस का सम्राट था। उसके शासन के अंत की यही शुरुआत थी। एक ओर जापान के साथ संघर्ष और दूसरी ओर बाकू के कामगारों की व्यापक हड़ताल ने रूसी शासन को संकटापन्न कर दिया। बाकू में भी दो यूनियनें थीं। एक का नेतृत्व स्तालिन के पास तो दूसरी का नेतृत्व फादर गेपान के हाथ था। स्तालिन के कामगारों ने राजमहल पर विशाल मोर्चा आयोजित किया। यहां निकोलस ने संयम बरतने के बजाय गोली चलवा दी। आग जब भड़क उठी तो तेल मालिकों ने अपने मुस्लिम कामगारों को हथियार दिए। इन कामगारों ने आर्मेनियन ईसाइयों को कत्लेआम कर दिया। तेल कुओं में आग लगा दी। इस संघर्ष से रूस तेल के मामले में 20-25 वर्ष पिछड़ चला गया। रूस का तेल आधार छूट जाने से तेल कम्पनियां रूमानिया की ओर मुखातिब हुईं। तेल की दुनिया में इस तरह हो रहे उलट-फेर के दौरान प्रथम विश्व युद्ध के नगाड़े बजने लगे थे।

प्रथम विश्व युद्ध

इंग्लैण्ड के विंस्टन चर्चिल के नस-नस में राजनीति थी। वे जान गए कि भविष्य में ब्रिटेन को जर्मनी से ही खतरा है। उन्होंने अपनी युद्धनौकाओं को तेल आधारित बनवाया, ताकि जर्मनी से मुकाबला किया जा सके। तेल के राजनीतिक व सामरिक महत्व को चर्चिल ने जान लिया था। तेल को पाना अब जरूरत बन गया। ब्रिटेन की भूमि में तेल नहीं है। इसलिए अन्यत्र खोज शुरू हुई। बर्मा उसका उपनिवेश था ही। वहां स्टैण्डर्ड ऑयल, रॉयल डच पहले से काम कर रही थी। ब्रिटेन ने आपूर्ति का ठेका उन्हें देने के बजाय अपनी मातहत नई कम्पनी बर्मा ऑयल को दिया। खाड़ी देशों की ओर उन्होंने मोर्चा लगाया। ब्रिटिश नागरिक डीआर्सी ने पर्शिया इलाके में पहला तेल कुआं खोदा। वह अन्य देशों के नियंत्रण में जाने के पहले ही ब्रिटिश सरकार ने डीआर्सी की मदद की। इस तरह मध्य पूर्व के देशों में तेल का व्यावसायिक उत्पादन पहली बार शुरू हुआ। बाद में वह ब्रिटिश पेट्रोलियम बन गई। तब तक प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो चुका था। इस युद्ध में तेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सारे वाहन, नौकाएं, जहाज तेल पर ही चलते थे। जर्मनी की पराजय में तेल के अभाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस के पास तेल ही तेल था, जबकि जर्मनी की सेना कोयले पर निर्भर थी। तेल के लिए जर्मनी ने रूस के बाकू की ओर मोर्चा लगाया। वहां अब बोल्शेविक सत्ता में थे। स्तालिन सत्ता पर काबिज थे। उन्होंने जर्मनी को तेल आपूर्ति का आदेश दिया। जर्मनी का विरोध करने वाला उसका हितरक्षक बन गया। यह थी तेल की महिमा! इससे स्पष्ट है कि इस युद्ध में देशप्रेम के अलावा तेल हितों को संरक्षण देना भी मायने रखता था।

खाड़ी देशों का संघर्ष

नवम्बर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन इसने नये तेल युद्ध को जन्म दिया। प्रथम विश्व युद्ध साथ-साथ लड़ने वाले फ्रांस, ब्रिटेन व अमेरिका में खाड़ी देशों में तेल के लिए अनबन शुरू हो गई। उस समय तक केवल ईरान में एक ही तेल कुआं था। अन्य खाड़ी देशों में तेल उत्खनन शुरू नहीं हुआ था। ब्रिटेन और फ्रांस ने आपस में तेल इलाकों का बंटवारा कर लिया। अमेरिका को हिस्सा न मिलने से वह नाराज हुई। उसे मेसोपोटिमिया के तेल क्षेत्र में हर कीमत पर प्रवेश करना था। युद्ध के बाद बंटवारे में बगदाद व बसरा ब्रिटेन को मिले थे। मोसूल अर्थात वर्तमान सीरिया फ्रांस को मिला था। उसके ईसाई बहुसंख्यक प्रदेश को तोड़कर लेबनान बनाया गया। ब्रिटेन की तरह फ्रांस में भी तेल नहीं था। इसलिए फ्रांस खाड़ी देशों में रुचि रखता था। नाटो देश खाड़ी में तोड़फोड़ व तेल पर कब्जा बनाए रखने के लिए तत्पर रहे।
खाड़ी देशों में तेल के लिए जोरशोर से खोज शुरू हुईं। 1923 में मेजर फ्रांक होम्स ने सऊदी, बहरीन में तेल भंडारों का पता लगाया। ब्रिटिश पेट्रोलियम उस पर नजर रखे हुए थी। उसके पास तेल भंडार बहुत थे, लेकिन वह किसी भी हालत में अमेरिका के हाथ यह जाने नहीं देना चाहती थी। अमेरिका अपनी कम्पनी ‘सोकैल’ के पीछे खड़ी हुई और ब्रिटेन को पीछे हटना पड़ा।

उधर, सऊद अरब में दुनिया के सर्वाधिक तेल भंडार मिले। सऊदी और अमेरिका के वर्तमान रिश्तों के पीछे यही कारण है। कुवैत भी तेल से समृद्ध है। इराक ने इसीलिए उसे काबिज किया था। अमेरिका संतप्त हुई, क्योंकि उसके हाथ से तेल क्षेत्र छीना गया था। इराक के पास सामूहिक नरसंहार के अस्त्र होना आदि के अमेरिका ने बहाने बनाए। सभी असलियत जानते थे, पर अमेरिकी ताकत के आगे सब चुप रहे। नाटो देशों ने अमेरिका का इसलिए साथ दिया क्योंकि एक तो वे संधि से बंधे थे और तेल उन्हें भी चाहिए था। इसे वे रूसी हाथ में कतई जाने नहीं देना चाहते थे। कुवैत-इराक पर हमले का कारण इस तरह तेल था। सऊदी सुलतान इब्न सऊदी का सलाहकार था एक ब्रिटिश नागरिक जॉन फिल्बी। उसने ही सुलतान को तेल बेचने की सलाह दी और एक कफल्लक सल्तनत अमीर बन गई। बाद में अमेरिका में जो सम्पन्नता आई उसके पीछे अरब तेल ही था। इसलिए अमेरिका हर समय अरबों की खुशामदी करते रहता है अथवा कूटनीति के जरिए उन्हें विभाजित रखता है।

दूसरा विश्व युद्ध

दूसरे विश्व युद्ध के पीछे भी तेल की राजनीति है। अमेरिका की छत्रछाया में मित्र देशों को तेल मिल रहा था और उनकी अर्थव्यवस्था फलफूल रही थीं। लेकिन जर्मनी, जापान व इटली को कुछ नहीं मिल रहा था। इन देशों ने खाड़ी से तेल प्राप्त करने की कोशिश की, परंतु अमेरिका के दबाव में वे पा नहीं सके। इसलिए दूसरे युद्ध में इटली का पहला निशाना तेहरान और बहरीन के तेल कुएं ही थे। जर्मनी में भी हिटलर ने वैकल्पिक सिंथेटिक पेट्रोल बनाने के प्रयास किए लेकिन उसे उतनी सफलता नहीं मिली। अमेरिकी कम्पनियों से जर्मनी ने तेल आपूर्ति के करार किए। जर्मनी ने युद्ध शुरू होते ही पराभूत देशों के तेल भंडारों पर कब्जा कर लिया। लेकिन रूस का तेल क्षेत्र बाकू उसके हाथ नहीं लगा। इस बीच जापान ने चीन पर हमला किया था। इसे निमित्त बनाकर अमेरिका ने जापान की तेल आपूर्ति रुकवा दी। जापान के साथ जर्मनी और इटली भी युद्ध में उतर गए। तेल आपूर्ति रुक जाने से जापान क्रुद्ध हुआ। उसने अमेरिका के पर्ल हार्बर पर हमला कर उसे तहस-नहस कर दिया। बदले में अमेरिका ने जापान पर परमाणु बमों से हमला किया। इससे जापान सकते में आ गया। उसकी युद्ध क्षमता जवाब दे गई। उसके पराजय स्वीकार करते ही युद्ध समाप्त हो गया। लेकिन तेल के लिए विभिन्न देशों की आपसी मारकाट खत्म नहीं हुई। रूस ईरान के तेल पर नजर रखे हुए था, क्योंकि उसका बाकू इलाका ईरान के तेल भंडारों के निकट ही था। 1946 में युद्ध समाप्त होने पर अरब देशों में 9 तेल कम्पनियां थीं। अगले 25 वर्षों में उनकी संख्या 81 हुई। 1972 तक उनकी संख्या बढ़कर 350 हो गई। इनमें से अधिसंख्य कम्पनियों पर अमेरिका का ही वर्चस्व था।

चीन की भूमिका

चीन ने विश्व रंगमंच पर दमदार भूमिका अदा करना शुरू की। उसकी अर्थव्यवस्था में उछाल के साथ उसकी तेल की मांग भी काफी बढ़ी हुई है। वह तेल बाजार पर नियंत्रण रखने की हर तरह से कोशिश कर रहा है। 2005 में तो उसने विशाल अमेरिकी कम्पनी ‘सोकैल’ की खरीदी के लिए सब से ऊंची बोली लगाई थी। इससे अमेरिका में सनसनी फैल गई थी। अमेरिकी सरकार की कूटनीति के कारण चीन बाद में पीछे हट गया। जापान व फिलीपीन के समुद्र में तेल खोज के लिए उसका निरंतर संघर्ष जारी है। जापान व फिलीपीन इसका विरोध कर रहे हैं। फिलीपीन ने तो भारत की सरकारी कम्पनी ओएनजीसी को वहां के समुद्र में तेल खोजने का ठेका दिया था। लेकिन चीन ने विरोध में अपनी नौसेना को वहां लाकर खड़ा कर दिया। ड्रेगन की ताकत के आगे कोई कुछ नहीं कर सका।

जहां तक भारत की बात है विभिन्न क्षेत्रों में तेल की खोज जारी है। भारत में तेल उत्पादन विश्व की तुलना में केवल 0.1 प्रतिशत के आसपास है। उत्पदान की तुलना में मांग 8-10 गुना अधिक है। तेल आयात पर सन 2011-12 में देश को 1 लाख 60 हजार करोड़ रु. की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ी। इसका अर्थ यह कि आयात पर जितना खर्च होता है उसमें अधिकांश खर्च केवल तेल पर है। भारत में बढ़ते आटो युग और व्यापारिक और औद्योगिक क्षेत्र में तेल की बढ़ती मांग के कारण तेल की मांग तेजी से बढ़ने वाली है। हमारी आवश्यकता की तुलना में बहुत कम तेल हमारे यहां पैदा होता है। इसलिए दुनिया के अन्य देशों में तेल खोज के संयुक्त प्रकल्प भारत ने लगाए हैं। भारत के अरब अनुनय के पीछे भी तेल ही है। बीच में ईरान से लेकर सीधे भारत तक तेल पाइप लाइन बिछाने की विशाल परियोजना की चर्चा थी। पहली योजना अफगानिस्तान- पाकिस्तान की जमीन पर यह पाइप लाइन बिछाने की थी। भारत ने पाकिस्तान को भी मना लिया था, लेकिन अमेरिका ने यह योजना अलग-अलग कारण देकर व अंतरराष्ट्रीय दबाव लाकर रुकवा दी। फिर पाकिस्तान छोड़कर समुद्री तटों के किनारे यह पाइप लाइन बिछाने की बात आई, लेकिन उसकी व्यावहारिक उपयोगिता, उस पर होने वाले विशाल खर्च और अंत में अमेरिकी दबाव में यह भी नहीं हो पाया है। अमेरिका को लगता है कि इस तरह भारत को तेल मिले तो खाड़ी देशों में उसके तेल साम्राज्य को झटका लगेगा।
जाहिर है, भविष्य में तेल के लिए संघर्ष और तेज होने वाला है।

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