ज्योतिषां ज्योति :

दीपमालिका प्रकाश का पर्व है। घर-आंगन, गली और चौबारा-सर्वत्र दिये जलाकर आलोक के प्रति आस्था व्यक्त करने का यह पावन प्रसंग प्रतिवर्ष हमारे सम्मुख आता है और ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ (हे प्रभु! हमें अन्धकार से उजाले की ओर ले चलो -) की प्रार्थना अनायास मुखरित कर जाता है। इसी क्रम में यजुर्वेद का एक मन्त्र हमें इस ओर भी सचेत करता है कि दूर तक जानेवाली और ज्योति की भी ज्योति है हमारा मन। इसे भी शिवसंकल्प के प्रकाश से आलोकित करना है – ‘दूरङ्गम ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु’ (यजु. 34.1)। कहीं ऐसी भूल न हो जाये कि सब जगह तो रोशनी रहे, लेकिन मन अंधेरे में ही पड़ा रह जाये। मन के इस अंधेरे को दूर करने के लिए ही भागवत के एक श्लोक के माध्यम से कोई भक्त भगवान् से प्रार्थना करता है कि मक्खन चुराकर तुम भागना चाहते हो, छिपना चाहते हो, तो कहां भागोगे? जहां तुम जाओगे, वहीं उजाला हो जायेगा। हां, एक जगह बड़ा घना अंधेरा है, और वह है हमारा मन, उसमें आकर तुम क्यों नहीं छिप जाते! तुम्हारा भी प्रयोजन सिद्ध हो जायेगा और हमारे मन का अंधेरा भी दूर हो जायेगा-

‘नवनीत सारमप द़ृत्य शंकया स्वीकृतं यदिपलायनं त्वया!
मानसे मम घनान्धतामसे नन्दनन्दन! कथं न लीयसे॥’

रामायण में महर्षि वाल्मीकि भी मन की निर्मलता की याद दिलाते हैं। तमसा के तट पर स्नान के लिए गये महर्षि को नदी का जल किसी सज्जन के मन की भांति ही प्रसन्न और रमणीय प्रतीत होता है –

‘अकर्दममिंद तीर्थ भरद्वाज! निशामय।रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यमनो यथा॥

अपने उपमा-वैशिष्ट्य के लिए विख्यात कविकुलगुरु कालिदास को भी रामायण की यह उपमा बहुत भाई। उज्जयिनी के पास बहनेवाली गम्भीरा नदी के जल की निर्मलता उन्हें भी चित्त की प्रसन्नता के ही तुल्य प्रतीत हुई – ‘गम्भीराया: पयसि सरितश्चेतसीव प्रसन्ने’ (मेघदूत) इसी कारण ‘शाकुन्तल’ में उन्होंने सन्देह की स्थितियों में अपने मन को ही टोलने का परामर्श दिया है – ‘संतां हि सन्देहपदेष्ाु वृत्तिसु प्रमाणमन्त : करण प्रवृत्तय:।’ अनिश्चय के निवारण हेतु इसी को प्रमाण मानना चाहिए।

रामायण के सुन्दरकाण्ड में, हनुमान जी ने भी इसी का सहारा लिया। सीता की, लंका में, खोज के अभियान में यह स्वाभाविक ही था कि वे उन्हें सर्वप्रथम रावण के अन्त: प्ाुर में खोजते। वहां उन्हें रावण के द्वारा वैध या अपहरण करके लाई गई बहुसंख्यक य्ाुवती और सुंदर स्त्रियां सोती हुई दिखायी पड़ी। उनमें से बहुतों के वस्त्र उनके अंगों से खिसक गए थे। बहुत सी स्त्रियां आपस में ही, एक-दूसरे को रावण समझकर कामुक मुद्राओं में लिपटी पड़ी थी। उन सभी में सीता को पहचानने का प्रयत्न करने पर भी जब उन्हें वहां वे नहीं दिखीं, तो वे वहां से बाहर निकल तो आये, लेकिन मन में एक सन्देह भी उठ खड़ा हुआ कि रावण के अन्त:प्ाुर में रमणियों के अवलोकन से कहीं उनके धर्म का लोप तो नहीं हो गया

‘निरीक्षमाणश्च ततस्ता: स्त्रिय: स्व महाकपि:।
जगाम महतीं शंकां धर्मसाध्वस शंकित:॥’
‘परदारा व रोधस्य प्रसुप्रस्य निरीक्षणम।
इदं खलु ममात्यर्थ धर्मलोपं करिष्यति॥’

लेकिन जब आंजनेय ने अपने मन की जांच की, तो उन्हें वहां कोई परिवर्तन या विकार नहीं मिला, इस कारण धर्म-लोप की आशंका उन्हें निर्मूल प्रतीत हुई, क्योंकि सभी श्ाुभ और अश्ाुभ स्थितियों का निर्णय तो मन के ही आधार पर किया जाता है –

‘कामं द़ृष्टा मया सर्वा विश्वस्ता रावणस्त्रिय:।
न तु ये मनसा किज्चित् वैकृत्यय्ाुपपघते।
मनो हि हेतु: सर्वेषामिन्द्रियाणां प्रवर्तने।
श्ाुभाश्ाुभास्ववस्थासु तच्च में सुव्यवस्थितम्॥’
(रामा., सुन्दर. 11.37-42)

कालिदास ने इसी तथ्य को ‘विकारहेतावपि विक्रियन्ते येवां न चेतासि त’ अर्थात विकार की स्थितियों में भी जिनका मन अविक्रत रहता है, वे ही धीर है -’ कहकर रेखाकित किया है।

व्यक्ति और समाज, दोनों के ही जीवन में, सर्वाधिक अपरिवर्तनीय वस्तु मन ही है। सब कुछ बदल जाता है, तन के कपड़े बदल जाते हैं, रसोई में पीतल-कांसे के बरतनों की जगह स्टील के बरतन आ जाते हैं। दरवाजों और खिड़कियों के प्ाुराने पर्दे हटाकर हम नये पर्दे लगा देते हैं, घर के दूसरे साज-सामान भी बदल जाते हैं, लेकिन अगर कोई चीज जल्दी नहीं बदलती, तो वह है हमारा मन, जो प्ाुरानी केंचुल की तरह रूढ़ियों और कुसंस्कारों से चिपका ही रहता है। मन का बहाव पानी की तरह होता है, जो नीचे की ओर ही उन्मुख होता है। उसे ऊपर उठाना थोड़ा कठिन कार्य है। दीपावली के सन्दर्भ में ही देखें, तो आज भी इसके आयोजन में हम दुर्व्यसनों का त्याग नहीं कर पाते। राजा नल और य्ाुधिष्ठिर की द्युत-क्रीड़ा के भीषण दुष्परिणामों से अवगत होने पर भी, कितने ही लोग आज भी दीपावली की प्ाूरी रात जुआं खेलने में इसलिए प्रवृत्त होते हैं कि इससे घर में लक्ष्मी जी का आगमन होगा! इस अन्धविश्वास के विरुद्ध हजारों वर्षों से ॠग्वेद का ॠषि हमें सावधान कर रहा है कि जुआं मत खेलो, खेती या उद्यम करो और उससे प्राप्त धन को ही सर्वस्व समझते हुए आनन्द प्राप्त करो – ‘अक्षैर्या दीव्य: कृषिमित् कृषस्व, वित्ते रमस्व बहु मन्यमान:।’ इस अक्षसूक्त के अनुसार जुआरी की पत्नी उसे छोड़ देती है, उसका उपभोग दूसरे लोग करने का प्रयत्न करते हैं। जुआरी प्ाुत्र की माता भी दु:खी होती है। वह कर्जदार होकर ॠण देनेवालों से बचता फिरता है। मजबूरी में उसे चोरी तक करनी पड़ जाती है –

‘जाया तप्यते कितवस्य हीना, माता प्ाुत्रस्य चरत: कव स्वित्।’
ॠणावा बिभ्यद्धनमिच्छमानोऽ न्येषामस्तमुप- नक्त मेति
(ॠग्वेद, 10.34.13;10)

अब भी हम कहां ॠषि के इस आह्वान को सुनकर इस दुर्व्यसन से मुक्त होने का मानसिक संकल्प कर पाते हैं।
दीपावली स्वच्छता, सुवास और श्ाुचिवातावरण के निर्माण के आग्रह का पर्व है, लेकिन रातभर बेहद पटाखे फोड़कर हम इसे मलिनता और दुर्गन्ध से दूषित कर देते हैं। दीये में जलती हुई बाती पर्यावरण में छायी उदासी और उबास को जहां दूर करती है, वहीं पटाखों का जहर सम्प्ाूर्ण वातावरण को विषमय कर देता है। वाय्ाु सांस लेने लायक भी नहीं रह जाती। पटाखों पर इतनी अधिक धनराशि खर्च हो जाती है कि उससे प्ाूरे समाज का कायाकल्प हो सकता है। अनेक अभावग्रस्त बालकों को शिक्षा मिल सकती है, निर्धनता के कारण, कन्याओं के रूके हुए विवाह सम्पन्न हो सकते हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि जो पटाखे बनाने के लाइसेंस पा जाते हैं, वे ही उनकी आड़ में बम और इथगोले भी बनाते हैं – उनसे भी समाज में जन और धन की हानि होती ही है। क्या हम दीपावली- जैसे लक्ष्मी- गणेश की आराधना और उपासना से जुड़े पर्व को कालक्रम से आ गयी उपर्य्ाुक्त विकृतियों से मुक्त नहीं कर सकते? कर सकते हैं, लेकिन उसके लिए मन बदलने की आवश्यकता है। वहां बैठे रूढ़ियों के तमस् को हटाकर सुसंस्कार और परिष्कार के उजास को फैलाने के उपक्रम की सार्थकता है। रामायण से सुन्दरकाण्ड में ही हनुमान जी ने सतत अपनी समीक्षा करने और प्रत्येक क्रिया-कलाप की गम्भीरता से जांच करने पर बल दिया है –

‘समीक्षितात्मा समवेक्षितार्थ:’ (1.210)।

लंका में निरन्तर अन्वेषण करने पर भी जब उन्हें जनकबन्दिनी नहीं दिखीं, तो हनुमान जी में कुछ देर के लिए निराशा जगी, लेकिन शीघ्र ही उन्होंने उसे झिटक कर दूर फेंक दिया। मन में छाये निर्वेद या अनुत्साह को किनारे कर उन्होंने नये सिरे से, नये संभावित स्थानों पर सीता की खोज करने का उत्साहसम्पन्न संकल्प किया – क्योंकि मानसिक उत्साह ही जीवन में सभी सफलताओं का मन्त्र है –

‘अनिर्वेद: श्रियो मूलमनिर्वेद: परं सुखम्।
भूयस्तत्र विचेष्यामि न यत्र विचय: कृत:॥
अनिर्वेदो हिसततं सर्वार्थेष्ाु प्रवर्तक:।
करोति सफलं जन्तो: कर्म यच्च करोति स:॥ (12.10-11)’

आइए, गुरु गोरखनाथ के अनुसार हम मन के क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त प्रवृत्तियों से मुक्त करके उसे एकाग्र करें और उसमें सत्संकल्प का एक नन्दादीप जलायें –

‘अलख बिनांणी दोई दीपक रचि लै तीन भवन एक जोती।
तासु विचारत त्रिभु – वन सूझैं, चुनि ल्यो माणिक मोती।’
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