आर्थिक जगत के कृष्ण विवर

अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ब्रह्माण्ड में कुछ ऐसे तारे भी हैं जो अपने प्रकाश को बाहर नहीं निकलने देते, इसलिए शक्तिशाली दूरबीन से भी दिखायी नहीं पड़ते। इन्हें ‘ब्लैक होल’ (कृष्ण विवर) कहा जाता है। यहां पर द्रव्य (पदार्थ) अत्यधिक घनीभूत अवस्था में होता है इस कारण इनका गुरुत्वाकर्षण अत्यंत प्रबल रहता है, जिससे वह आस-पास के पदार्थ को खींचकर वैसे ही लील जाता है, जैसे मगरमच्छ छोटी मछलियों को। यह प्रकाश के कणों (प्रोटॉन) तक को खा जाता है, उन्हें बाहर नहीं निकलने देता। अत: कृष्ण विवर कैसे भी दिखायी नहीं देता। इसके कारण पड़ोस के उन तारों की गति अवश्य प्रभावित होती है जो हमें दिखायी देते हैं। इन प्रकाशमान पिण्डों की गति के विचलन से परोक्षत: कृष्ण विवर के अस्तित्व का पता चलता है।

हमारी पृथ्वी पर भी अनेक कृष्ण विवर हैं- उपरोक्त प्रकार के नहीं, आर्थिक प्रकार के। यह हैं काले धन के विपुल भण्डार, जो होते हुए भी दिखायी नहीं देते। इनका सबसे बड़ा जमावड़ा है स्विस बैंकों में। इनका आकर्षण इतना प्रबल है कि दुनिया भर का काला और सफेद पैसा भी द्रव्य (धन-दौलत) खिंच कर यहां के गुप्त खातों में जमा होता रहता है किसके खाते में कितना है, किसी दूसरे को ज्ञात नहीं हो सकता। अपने देश में भी इस प्रकार के छोटे-बड़े अनेक कृष्ण विवर हैं। कुछ विभिन्न बैंकों के लॉकरों में, कुछ घरेलू तिजोरियों, फर्नीचर के भीतर, सोफों, गद्दों, तकियों में तथा दीवार में बने गुप्त आलमारियों में। पुराने जमाने में जब धन सोने-चांदी के सिक्कों के रूप में होता था तब लोग उसे घड़ों या कलसों में भर कर जमीन में गाड़ देते थे। आर्थिक जगत के यह कृष्ण विवर भी दिखायी नहीं देते।

जैसे दृश्यमान तारों की गति में विचलन से ब्रह्माण्डीय कृष्ण विवर का अनुमान और आकलन होता है, वैसे ही सरकारी खरीद-फरोक्त नीलामी आदि कर्मों में हुए नियमों के विचलन (उल्लंघन) से काले धन के हस्तांतरण का पता चलता है। यह कहना मुश्किल है कि काला धन भ्रष्टाचार का जनक है या भ्रष्टाचार काले धन का। शायद दोनों बातेें सही हों। जैसा एक अंग्रेजी कवि ने कहा है। ‘चाइल्ड इज द फादर ऑफ मैन।’ काला धन गुपचुप तरीके से वैसे ही बढ़ता है, जैसे शरीर के भीतर कैंसर। कैंसर अधिक बढ़ने से उसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इसी प्रकार अधिक बढ़ जाने पर काले धन के लक्षण प्रकट होते हैं यह लक्षण हैं विलासितापूर्ण जीवन, अनाब-शनाब खर्च तथा आय से अधिक सम्पत्ति। इन लक्षणों के आधार पर छापामारी‡आपरेशन किया जाता है। यदि निदान सही हो तो उसे निकाल बाहर किया जाता है। इसके पश्चात सजा रूपी कीमोथेरेपी अथवा निलम्बन या बर्खास्त जैसे रेडिएशन थेरेपी की जाती है। ब्रह्माण्डीय कृष्ण विवरों पर छापामारी अभी तक तो सम्भव नहीं हुई, शायद भविष्य में भी न हो। पृथ्वी के आर्थिक कृष्ण‡विवरों और ब्रह्माण्ड के विवरों ये यह एक मूलभूत अन्तर है।
आर्थिक कृष्ण विवरों का आकर्षण भी इतना प्रबल होता है कि अच्छों-अच्छों का ईमान डिग जाता है। लगभग उसी भ्रान्ति जैसे पौराणिक कथाओं में महान तपस्वियों का तप इन्द्र द्वारा भेजी अप्सराओं के आकर्षण से भंग होता बताया गया है। बड़े-बड़े सत्ताधीश, अधिकारी और धन कुबेर जिन्हें वैसे भी धन की कमी नहीं होती तथा जिन पर लक्ष्मी की विशेष कृपा रहती है, वे भी प्राय: इसकी ओर खिंचते हैं, तो फिर छोटे-मोटे कर्मचारी, बाबू, चपरासी आदि की क्या बिसात जो इसके आकर्षण से बच सकें।

भारत ही क्यों विश्व के प्राय: प्रत्येक देश में इस प्रकार के कृष्ण विवर मौजूद होंगे और हैं। यह पुरातन काल से चले आ रहे हैं, जब इन्हें अनैतिक और गैर कानूनी नहीं माना जाता था और न ही ऐसे धन को काला समझा जाता था। आर्थिक कृष्ण विवरों से धन का इस्तेमाल होता है काले कारनामों के लिए, भ्रष्टाचार के लिए लाइसेंस और ठेका प्राप्त करने के लिए। भारत में इसका उपयोग वोट खरीदने के लिए भी होता है।

स्विस बैंकों में भारतीय धन कुबेरों का कितना काला धन जमा है, इसका ठीक ठाक पता किसी को नहीं है। केवल अनुमान है। बाबा रामदेव जैसे लोग चाहते हैं कि उस धन को भारत सरकार वापस ला कर जनहित के कार्यों में लगाये। कोई उन्हें समझाये कि सफेद को काला करना तो सरल है परन्तु काले को सफेद करना अति दुष्कर कार्य है। दुष्कर है, पर असम्भव नहीं। हमारे यहां ऐसे-ऐसे चतुर सुजान हैं जो काले को सफेद करना जानते हैं। उन्होंने ऐसा ब्लीचिंग पाउडर ईजाद कर लिया है जो काले से काले धन को चकाचक सफेद कर देता है। धन्य हैं वे। इस महान देश में वैज्ञानिक अविष्कारों का भले ही अभाव हो, किन्तु आर्थिक क्षेत्र में काले को सफेद बनाने के ऐसे ऐसे नायाब आविष्कार हो चुके हैं और हो रहे हैं जिनके आगे बड़े-बड़े वैज्ञानिक अविष्कार पानी भरते नजर आते हैं।

पता नहीं काले को क्यों प्राय: बुरा समझा जाता है, उससे हीनता का बोध होता है, जबकि काले का महत्व सफेद से कुछ कम नहीं। सफेद पृष्ठभूमि पर काला ऐसा फबता है जैसे गोरे गाल पर काला तिल। सफेद कागज पर काले अक्षरों का लिखना यदि न ईजाद हुआ होता तो दुनिया भर में साहित्य सृजन कैसे होता? तब तो अक्षर शिल्प लेखों, ताम्रपत्रों और ईंटों पर कलाति के रूप में सिमटे रह जाते। शुरुआत काले-सफेद से ही होती है, रंगीनी तो बाद में आती है। फोटोग्रॉफी, सिनेमा, टी.वी., इन सभी का आरम्भ श्वेत-श्याम से हुआ था। अब भले ही सब रंगीन हो गये हैं। जब किसी के पास यथेष्ठ काला और सफेद धन जमा होता है, तो उसके जीवन में रंगीनी आती है। यही प्रकृति का नियम है।
आर्थिक कृष्ण विवरों के स्वामियों की नैतिक दृष्टि से भले ही भर्त्सना की जाये, व्यवहारिक रूप में उन्हें आदर की दृष्टि से देखा जाता है। दुनिया उन्हें सलाम करती है। ब्रह्माण्ड के कृष्ण विवरों से चाहे कुछ भी बाहर न निकलता हो, आर्थिक कृष्ण विवरों से धन निकलता रहता है और उसमें जमा भी होता रहता है। हां, बाहर निकलने पर वह अपनी चमक-दमक दिखाता है, चकाचौेंध पैदा करता है

वास्तव में दीपावली ऐसे धनपतियों की ही सार्थक होती है। क्यों न हो? लक्ष्मी का मुखारविंद कान्तिमान जो है। लेकिन उनका वाहन उल्लू है जिसे अंधकार (कालापन) पसंद है। वह उन्हें वहीं ले जाता है जहां कालिया हो। तभी तो देवी जी अमावस की काली रात को पधारती हैं और जब पधारती हैं तो अपनी कारिस्त से रात्रि को जगर-मगर कर देती हैं। आर्थिक विवरपति धन्य हो जाते हैं। आम आदमी तो जैसे-तैसे करके मात्र रस्म अदायगी के तौर पर इस त्योहार को मना लेते हैं ताकि लक्ष्मी के प्रति उनका आदर भाव बना रहे। शायद भूले-भटके कभी देवी की कृपा उन पर भी हो जाये। काले के न सही, कम से कम सफेद के धनी तो बनें।
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