सत्ता की डोर मध्यम वर्ग के हाथ

भारतीय लोकतंत्र की स्वयं की एक पहचान और इतिहास है। स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान के शिल्पकारों ने इसकी नींव रखी है। कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका ये भारतीय लोकतंत्र के मूल तीन स्तंभ हैं। चौथा स्तंभ मीडिया को माना गया है, हालांकि संविधान में ऐसा स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इन स्तंभों का मूल आधार चुनाव प्रणाली है। इसी कारण राजनैतिक पर्टियां और प्रसार माध्यम भारतीय लोकतंत्र के अविभाज्य घटक हैं। अन्याय के विरोध में अपना मत प्रकट करने या किसी बात का समर्थन करने का यह ऐतिहासिक अवसर होता है। अवसर का उपयोग करने का यह उत्सव अब शुरू हो चुका है। आगे-आगे इसकी रंगत बढ़ती जायेगी और इसका समापन चुनाव परिणामों के साथ होगा।

मुख्यत: चुनावों में मूलभूत व आधारभूत सुविधाओं के प्रश्नों पर ध्यान देना चाहिये। प्रचार में मतदाताओं का विश्वास संपादन करने की ओर ध्यान दिया जाना चाहिये। परंतु पिछले कुछ समय में राजनैतिक उम्मीदवारों का यह पक्का विश्वास हो गया है कि मनोरंजन ही प्रचार की आत्मा है। परिणामस्वरूप रोड शो, कलाकारों के दर्शन, आरोप-प्रत्यारोप और विज्ञापनों की चकाचौंध में अब तक के चुनाव संपन्न हुए हैं। क्या उम्मीदवारों को यह महसूस नहीं होता कि देश के और समाज के विकास के मुद्दे की अवहेलना हो रही है? लोगों की राजनीतिज्ञों से बहुत अपेक्षाएं होती हैं। वे पूरी नहीं होंगी यह जानते हुए भी भोली जनता उम्मीद तो करती ही है। अपने आस-पास की परिस्थितियां सुधरे, अपने शहर का विकास हो, रेल्वे सेवा सुधरे, शहरों की अंतर्गत सेवा-सुविधा, आवश्यक बिजली व जल की आपूर्ति हो, परिसर में रोजगार के अवसर निर्माण हों, मनुष्य होने के नाते जीवन को आधार और आकार देनेवाली सुविधाएं मिलने की स्वाभाविक अपेक्षा मतदाता रखते हैं। परिवार और समाज के रूप में अगर व्यापक विचार किया जाये तो उपरोक्त सुविधाओं के साथ शिक्षा, पर्यावरण, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवा-सुविधाएं आदि महत्वपूर्ण होती हैं। पिछले दस सालों में इन सभी सुविधाओं और अपेक्षाओं का क्या हुआ?
चुनावों के बारे में अगर विचार किया जाये, तो यह बात सच है कि अभी तक के चुनाव बिना किसी हिंसाचार के सम्पन्न हुए हैं। परंतु क्या इतने भर से यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र देश में अपनी जडें जमा चुका है? पिछले तीन-चार चुनावों पर गौर करें तो दिखाई देगा कि 50 फीसदी से अधिक मतदान नहीं हुआ है। विभिन्न दलों में मतों के बंटवारे के बाद विजेता दल मात्र 30-32 प्रतिशत मतों के बल पर सत्ता प्राप्त करता है। इन 30-32 प्रतिशत मतदाताओं की पसंद से देश चलाने की जिम्मेदारी एक पार्टी पर आ गयी है। क्या यह लोकतंत्र है? लोकतंत्र का सही अर्थ क्या लोगों को समझ में आया है? लोकतंत्र जहां लोगों को कुछ अधिकार देता है वहीं कुछ जिम्मेदारियां भी उन पर डालता है। इन जवाबदारियों को निष्ठा से निभाना पड़ता है। मतदान करना अपना राष्ट्रीय कर्तव्य है, क्या यह शिक्षा लोगों को किसी ने दी है? शालेय जीवन में ‘पहले कर्तव्य फिर अधिकार‘ यह सूत्र समाजशास्त्र में पढ़ाया जाता है। उस शिक्षा का क्या हुआ?

भारत में सत्ता का उपभोग करनेवाले राजनेताओं के पीछे क्या सही मायनों में जनता का बहुमत है? यह एक रोचक विषय है। नागरिकों की मतदान के प्रति उदासीनता ही मतदान कम होने का कारण है। इसलिये सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि लोकनियुक्त सरकार को कितने लोगों का समर्थन है। देश को अच्छी-बुरी परिस्थिति की दहलीज पर खड़ा करने के लिये मध्यम वर्ग की उच्चकोटि की उदासीनता भी कारणीभूत है। जो मध्यम वर्ग किसी जमाने में देश और समाज का वैचारिक और सामाजिक नेतृत्व करता था, वही अब समाज से अलग-थलग पड़ा दिखाई देता है। हमारा इतिहास कहता है कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो या उसके बाद के आंदोलन हों, सभी का नेतृत्व मध्यम वर्ग ने किया है। आज वही मध्यम वर्ग राजनैतिक -सामाजिक आंदोलनों की ओर से, समाज हित की ओर से मुंह फेर कर खड़ा है। अब मध्यम वर्गीय समाज ने नेतृत्व करना तो दूर किसी महत्वपूर्ण निर्णय में सहभागी होना भी छोड़ दिया है। इससे देश और समाज का बहुत नुकसान हो रहा है। यह मूलभूत बदलाव क्यों हुआ इस प्रश्न पर अगर विचार किया जाये तो यह समझ में आता है कि अब मध्यम वर्ग की यह मानसिकता बन गयी है कि देश और शासन में अगर हमारी कोई पूछ-परख नहीं है, स्वार्थी राजनैतिक नेताओं को हमारे हितों की परवाह नहीं है, तो हमें भी उस समाज से, राजनैतिक नेताओं से, पार्टियों से, आंदोलनों से कोई लेना-देना नहीं है। अगर हमारे मतों की कोई कीमत ही नहीं है तो मतदान करने की मशक्कत क्यों की जाये? इन सभी अनुभवों के कारण मध्यम वर्गीयों ने अपना सारा ध्यान अपने हितों की ओर देना शुरू कर दिया। राजनीति-समाजनीति का विचार तक मन में आने नहीं दिया। हर मध्यम वर्गीय व्यक्ति केवल अपना ही विचार करके अपनी उन्नति साधने का प्रयास करता दिखाई देता है। स्वार्थी राजनीति से तंग आने के कारण मध्यम वर्गीय समाज अपने कर्तव्यों की पूर्ति करने से भी कतराने लगा।

मध्यम वर्गीयों के इस विचार प्रवाह के कारण राजनीति में एक रिक्तता आ गई। धूर्त राजनेताओं ने दलगत और मतदान का संख्यात्मक गणित सामने रख कर इस रिक्तता को भरने का प्रयास किया। सत्ता अपने हाथ में रखने का प्रयत्न करनेवाले राजनीतिक दल और राजनेता महंगाई से त्रस्त जनता को क्षणिक प्रलोभनों के जाल में खींचने लगे। क्षणिक मोह में फंसकर सामान्य मतदाता मतपेटी की ओर बढ़े और स्वार्थी नेताओं की इच्छाओं के अनुसार मतदान करे इसके लिये राजनेता प्रयास करने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि 70 प्रतिशत जनता को पसंद न आनेवाली राजनैतिक पार्टियां देश का कामकाज चलाने लगीं। गांधीजी के स्वदेशी विचारों का कांग्रेस ने कब से त्याग कर दिया है। अब विदेशी मूल की व्यक्ति उसे संचालित कर रही है गठबंधन सरकार चला रही है। नीतिगत मार्ग स्पष्ट न होने के कारण भ्रमित कांग्रेस हाथ-पैर पटख रही है। देश को किसी निश्चित दिशा में ले जाने का लक्ष्य व नीति कांग्रेस के पास नहीं है। महंगाई का ज्वालामुखी सरकार की असफलता ही है। अर्थनीति, विदेश नीति, महिला असुरक्षा, भ्रष्टाचार इत्यादि अनेक क्षेत्रों में मिली असफलता कांग्रेस की प्रगति पुस्तिका में शामिल है। संपूर्ण देश में सभी क्षेत्रों में अराजकता का माहौल है। इसका परिणाम देश के सभी स्तर के नागरिकों को सहन करना पड़ रहा है। मुश्किल में फंसी कांग्रेस ने मतों के लिये ‘भारत निर्माण’ के विज्ञापन दिखाकर एक चाल चली है। हाल ही में चार राज्यों के चुनाव परिणामों पर नजर डालने पर यह सत्य सामने आता है कि कांग्रेस के अस्त की शुरुआत हो चुकी है। इस पार्श्वभूमि पर एक आनंद की बात भी है। गांधी जी चाहते थे कि स्वतंत्रतता मिल गई है अत: अब कांग्रेस को विसर्जित कर देना चाहिये। तब तो नहीं हो सका, लेकिन अब की बार उनकी इस इच्छा को सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मौनीबाबा मनमोहन सिंह पूर्ण कर कर देंगे ऐसा चित्र है।

अण्णा हजारे के आंदोलन में देश के द्वारा जलाई गयी मोमबत्तियों के प्रकाश में स्वयं को चमकानेवाले और तत्पश्चात अण्णा हजारे को ही सीढ़ी बनाकर सत्ता का अवसर पानेवाले धूर्त केजरीवाल को भी देश ने देखा। जलाई गयी मोमबत्तियों से और नागरिकों द्वारा दिये गये अवसर से केजरीवाल ने कितना प्रकाश फैलाया इसका अनुभव सारे देश ने लिया है।

कांग्रेस कहती है हमें सेक्युलर भारत चाहिये और भाजपा कहती है कि हमें गुड गवर्नेंस चाहिये। अब अगर भारत की सभी क्षेत्रों की दुर्व्यवस्था को देखा जाये तो भारत को गुड गवर्नेंस की नितांत आवश्यकता है। दुर्बल और नेतृत्वविहीन कांग्रेस भले ही घोषित करे या न करे परंतु यह स्पष्ट होता है कि वह राहुल गांधी के बल पर चुनाव लड़ रही है। युवा राहुल से बहुत अपेक्षाएं थीं कि वे कांग्रेस में कुछ नये ताजे विचारों का समावेश करेंगे। परंतु ऐसा कुछ हुआ नहीं। राहुल गांधी राजनीति की ओर ‘पार्ट टाइम’ दृष्टिकोण से देखते हैं। इससे यह जाहिर होता है कि उनमें राजनैतिक बदलाव की इच्छा नहीं है।

भारतीय राजनीति में निर्माण हुई रिक्तता का वास्तविक कारण मध्यम वर्गीयों की सामाजिक-राजनैतिक विषयों की ओर नकारात्मक दृष्टि से देखने मानसिकता भी है। इसका परिणाम भी देश विभिन्न क्षेत्रों में भुगत रहा है। परंतु पिछले दो सालों में एक आशा की किरण दिखाई देने लगी है। अब तक राजनीति से दूर रहने वाला मध्यम वर्गीय समाज सन 2012-2013 से फिर एक बार सामाजिक-राजनैतिक परिवेश में झांकता प्रतीत हो रहा है। केन्द्र में सतत हो रहे दुर्व्यवहार, नेताओं की भ्रष्ट छवि आदि पर पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर चर्चा का विषय रही है। यह मत प्रदर्शन भारत के मध्यम वर्गीयों की ओर से बडी मात्रा में हुआ है। मध्यम वर्ग अब अधिक मुखर हो गया है। सार्वजनिक-राजनैतिक क्षेत्रों से जानबूझकर दूर रहनेवाला मध्यम वर्ग अब इंटरनेट, ब्लॉग, फेसबुक, वॉट्सअप इत्यादि माध्यमों के जरिये अपनी प्रतिक्रियाएं प्रकट कर रहा है। राजनैतिक व्यवस्था, सत्ता, भ्रष्ट राजनेता इत्यादि के प्रति रोष व्यक्त करने के लिये इस प्रणाली का प्रभावी उपयोग मध्यम वर्ग कर रहा है। इसका परिणाम समाज पर भी हो रहा है। क्या ट्विटर, इंटरनेट, ब्लॉग, फेसबुक, वॉट्सअप पर लगातार मत प्रदर्शन करने वाला मध्यम वर्ग लोकसभा चुनावों में प्रत्यक्ष मतदान करने उतरेगा? इस प्रश्न का उत्तर आगामी लोकसभा ही चुनाव देंगे। स्वयं के उत्कर्ष की चिंता करने वाला, करियर की ओर ध्यान देने वाला और एक निश्चित परिधि में जीवनयापन करने वाला मध्यम वर्गीय समाज इस समय क्या करता है यह महत्वपूर्ण है। देश की व्यवस्था सुधारनेवालेे, ‘गुड गवर्नेंस’ देनेवाले मोदी का नेतृत्व स्वीकारता है या फिर ‘कंर्फट जोन’अर्थात गांधी परिवार की विरासत लेकर आये (प्रत्यक्ष में कर्तृत्वहीन) राहुल गांधी को स्वीकार करता है यह इस बार तय हो जायेगा।

मतदान भारतीय लोकतंत्र का उत्सव है। यह उत्सव एक तरह से वोटों का प्रत्यक्ष युद्ध का ही है। जब युद्ध होता है तब मोमबत्ती जलाना, मौन रहकर मोर्चे निकालना, फेसबुक का स्टेट्स लाइक करना इत्यादि से कुछ होगा ऐसी उम्मीद करना व्यर्थ है। अगर परिवर्तन चाहिये तो इसके लिये एक ही सर्वोत्तम मार्ग है। वह मार्ग है अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करना। विश्व के सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का अभिमान जताते समय उसके एक घटक के रूप में अपने मतदान के अधिकार का इस चुनाव में प्रयोग करना अपना परम कर्तव्य है। अगर इस चुनाव में अपने अधिकार का प्रयोग नहीं किया, मतदान के दिन को छुट्टी का दिन समझकर मौज-मस्ती करने चले गये तो फिर एक बार भ्रष्ट राजनेता, ढुलमुल अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर बोलने का नैतिक अधिकार हम खो देंगे, यह बात ध्यान में रखनी होगी।

मध्यम वर्ग जागृत हो रहा है परंतु क्या इसके प्रत्यक्ष दर्शन लोकसभा के चुनावों में होनेवाले वृद्धिगत मतदान से होगा? मतदान में वृद्धि देश में योग्य और देशहित का विचार करनेवाली सरकार लाने में मदद करेगी? यह सब कुछ इस बार के लोकसभा चुनावों में भारत अनुभव करेगा। लोकतंत्र का यह उत्सव इस बात पर निर्भर करता है कि व्यवस्था के प्रति नाराजगी व्यक्त करनेवाला और इसे बदलने की जिद करनेवाला मध्यम वर्ग इस लोकसभा चुनाव में क्या करता है। अंत में कहना चाहूंगा-

आओ पहले मिलकर इन राहों से कांटे दूर करें
होंगी फिर कलियों की बातें, फूलों के अफसाने भी।
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