अच्छे दिनों का ऐतिहासिक आगाज

भारत के चुनावी विजय का संकल्प पूरा कर नरेंद्र मोदी 17 मई को हवाई अड्डे से शानदार रोड शो के बाद नई दिल्ली में भाजपा मुख्यालय पहुंचे। मुख्य गेट पर ‘मोदी-मोदी’ की जुनूनी गर्जना कर रहे उत्साही समर्थकों को दिये संक्षिप्त संबोधन में उन्होंने 1952 में जनसंघ की स्थापना से लेकर अब तक नेताओं-कार्यकर्ताओं के परिश्रम और संघर्ष, सुदूर दक्षिण के केरल जैसे राज्य में राष्ट्रवादी विचारों के विरोधियों की क्रूरता का शिकार हुए कार्यकर्ताओं के बलिदान और अपनेे दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल करने की भाजपा की शानदार सफलता में सभी के महती योगदान का स्मरण कराते हुए इसका सारा श्रेय भाजपा को दिया। दूसरे कुछ पार्टी नेताओं के उलट इस रिकॉर्डतोड जीत का श्रेय अपनेे दल-भाजपा को देने के मोदी के इस ऐलान में कोई तंज नहीं, किसी सामान्य कार्यकर्ता का-सा विनम्र भाव था। और ऐसा बखूबी जानते हुए था कि यह उनकी ही अगुआई थी कि भाजपा के पूर्वावतार जनसंघ की स्थापना के बाद पहली बार पार्टी अकेले अपनेे संख्याबल के आधार पर केंद्र की सत्ता तक पहुंची और 1984 के बाद पहली बार लोकसभा में अपनेे बूते बहुमत हासिल करने वाला दल बनी। देश की सत्ता के केंद्र दिल्ली और पार्टी आलाकमान से लगभग पूरी तरह बाहर रहे मोदी अच्छी तरह जानते थे कि सामान्य कार्यकर्ता का यह विनयभाव और ‘मजदूर नंबर-1’ के बतौर खुद को पेश करने की सहजता ही पार्टी और देश में शीर्ष पर उनका आरोहण आसान कर सकती है। पिछले वर्ष जून में पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति का मुखिया बनाए जाने और फिर सितंबर में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद मोदी के अश्वमेध का अश्व जब हर तरह की विविधताओं भरे इस देश में निकल पडा तो किसी को उम्मीद नहीं थी कि मोदी पार्टी को पिछले दो लोकसभा चुनावों में मिली पराजय को विजय में बदलकर भारत की सत्ता भाजपा की अगुआई में ला पाएंगे।

देश में कुशासन, आर्थिक बदहाली, भ्रष्टाचार, महंगाई और बढती बेरोजगारी की वजह से सत्तारूढ यूपीए के खिलाफ सामान्य जनता के गुस्से के उबाल के बावजूद पार्टी हद से हद चुनावों में स्वाभाविक तौर पर पैदा होने वाली सत्ता-विरोधी लहर का लाभ हासिल करने की फिराक में दिखाई देती थी। बाकी का काम सत्ता में हिस्सा पाने को आतुर महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय खिलाडी समर्थन देकर कर देते। लेकिन सत्ता घर बैठे शायद ही किसी को मिली हो। खैरात, अनुकंपा, अपनों को रेवडियां और दिखावटी उपायों-नीतियों की झांसेबाजी से एक दशक से सत्ता पर काबिज गठजोड से सत्ता छीन लेने की जिजीविषा और देश को गर्त से उबारने के लिए नवोन्मेषी द़ृष्टि देने की उद्यमिता पार्टी से नदारद थी। 65 प्रतिशत से अधिक युवाओं की आबादी वाले, नए युग और नए विचारों वाले भारत को अपील करने वाला कोई विश्वसनीय चेहरा उसके पास नहीं था। निष्क्रिय और बेअसर आलाकमान, ढीला-ढाला पार्टी संगठन, निराश और दिशाहीन कार्यकर्ता, कामचलाऊ कार्यक्रम और नीतियां, सहयोगी दलों का टोटा दुर्दशा की यह कहानी पूरी किए देते थे। और ऐसा तब था जबकि कई राज्यों में हाल के वर्षों में उभरे लोकप्रिय नेताओं की अगुआई में पार्टी की सरकारों को चुनाव-दर-चुनाव राज करने का जनादेश मिल रहा था और भाजपा की ये सरकारें सुशासन और विकास के नए प्रतिमान गढ रही थीं। यह सुद़ृढ शरीर लेकिन सुन्न मस्तिष्क जैसा मामला था। नए भारत की बेचैनी को समझ्कर उसकी आशा-आकांक्षा को वाणी देने के लिए राज्यों के सफल नेताओं को आगे करने की वृत्ति समाप्त-सी थी जो किसी जमाने में पार्टी का यूएसपी हुआ करती थी। लेकिन एक प्रदेश के तौर पर गुजरात और दशक भर से भी अधिक समय से घनघोर विरोध और विपरीतताओं के झंझावात को बेमानी कर देने वाले उसके मुख्यमंत्री की चमत्कारी सफलता की दुंदुभि पार्टी के गलियारों में लगातार गूंज रही थी। पार्टी ने इसे भले देर से सुना लेकिन देश और दुनिया इसे अचंभे और उत्सुकता से सुन-देख रहे थे, और सराह रहे थे। पार्टी के किसी अहम केंद्रीय फोरम का प्रमुख बनाए जाने से काफी पहले राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिद़ृश्य में मोदी और उनकी सफलता का आगमन हो चुका था। चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाए जाने के बाद मोदी ने जरा भी वक्त नहीं गंवाया। वे भारत की उम्मीदों को वाणी देने के लिए निकल पडे। पहली बार मतदान करने वाले 12 करोड से अधिक युवा मतदाताओं के साथ देश परिवर्तन के लिए तैयार बैठा था। उसे चाहिए था सुशासन और विकास की सफलताओं वाला एक मजबूत, ईमानदार, विश्वसनीय तथा नए विचारों का नेता! महज साल भर में अहर्निश यात्रा और 45 से अधिक विशाल और जीवंत रैलियों के जरिए मोदी ने संपूर्ण भारत को मथ डाला। बडी-बडी सभाएं मतदाताओं से सीधे संवाद का कारगर माध्यम बन गईं। धुर लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक मोदी एक ऐसे करिश्मे के रूप में उभरे जिसने हर मन में अपनी जगह बना ली। यह पहली बार हुआ कि जिन इलाकों में कभी किसीने भाजपा का नाम भी नहीं सुना था, वे मोदी के नाम से परिचित हो गए। लेकिन सबसे बडी बात यह हुई कि पार्टी में नवजीवन का संचार हुआ और संघर्ष की वृत्ति जगी। लगभग 25-30 वर्षों से क्षेत्रीय अस्मिता, धर्म, जाति, समुदाय, क्षेत्र और खैरातों की राजनीति का घुन लगे देश में सटीक चुनावी अभियान का संचालन, कारगर चुनावी रणनीति बनाना और जीत सकने वाले उम्मीदवारों का चयन टेढा काम था। 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी में विलीन हुए जनसंघ को इसकी खास जरूरत नहीं पडी थी, वह तानाशाही को उखाड फेंककर लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का पर्व था जिसे सामान्य लोगों ने निभाया। 1999 में पार्टी के दिग्गज अटल बिहारी वाजपेयी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे जिनका करिश्मा कांग्रेस की ऑक्सीजन पर चली अल्पजीवी गठबंधन सरकारों के निराशाजनक कार्यकाल पर बहुत भारी था। लेकिन 2014 एकदम अलग था। मोदी को आगे करने से पहले तक भाजपा केंद्र की सत्ता की स्वाभाविक दावेदार होने का दम नहीं भर सकती थी। कांग्रेस के कुशासन से आजिज देश को विकल्प देने के दावेदार कई थे-उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु के सूबाई क्षत्रप, जैसी स्थापित राजनैतिक समीकरणों के उलट चलने वाली आम आदमी पार्टी; और खुद कांग्रेस जो चुनावों में पिटने की हालात में किसी ढीले-ढाले गठजोठ को आगे कर पिछले दरवाजे से सरकार चलाने की ताक में बैठी थी। भाजपा के मोदी को आगे करते ही वोट बैंक की राजनीति करने वाले सारे दलों का कर्कश-नाद गूंजने लगा। इनमें कांग्रेस की तरह गैर-कांग्रेसी क्षेत्रीय दल भी उतने ही थे। खचाखच भरी रैलियों में मोदी के लिए सामान्य लोगों के जुनून की हद तक उमडते उत्साह ने इन दलों को इतना आतंकित कर दिया कि वे सामान्य लोकाचार की मर्यादाएं तोडने पर उतर आए। 16वीं लोकसभा के चुनाव को मोदी बनाम अन्य के चुनाव में तब्दील कर दिया गया।

लेकिन नतीजों ने दिखा दिया कि मोदी को देश ने जाति-समुदाय, मजहब और क्षेत्र के संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर उम्मीद और चमकीले भविष्य के प्रतिनिधि के बतौर खुले दिल से स्वीकार किया। देश में पडा हर तीसरा वोट भाजपा की झेली में गिरा। युवा मतदाता मोदी के सम्मोहन से बंध गए। 31.2 प्रतिशत के साथ भाजपा ने 282 सीटें और 17.2 करोड कुल वोट हासिल किए जो 29 के लोकसभा चुनाव में उसे मिले वोटों के दोगुने से भी ज्यादा हैं। ये कांग्रेस को मिले वोटों से 6.5 करोड से भी अधिक हैं। भाजपा के हर विजयी प्रत्याशी की जीत का औसत अंतर 1.7 लाख से ज्यादा वोटों का रहा है जो कांग्रेस के विजयी उम्मीदवारों की जीत के अंतर से करीब 1 लाख वोट अधिक है। 334 सीटों के साथ एनडीए महज 61 सीटों वाले यूपीए (कांग्रेस-44 सीटें) तथा तीसरे-चौथे मोर्चे के मंसूबे पालने वाले अन्य दलों के 138 सदस्यों पर जबरदस्त ढंग से हावी है। मोदी का ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का प्रण देश ने इस शिद्दत से पूरा किया कि सत्तारूढ पार्टी 10 राज्यों में खाता भी नहीं खोल सकी। और केरल-कर्नाटक जैसे जिन राज्यों में उसे सीटें मिलीं भी तो वह एक अंक में ही रही। कांग्रेस का खाता भी न खुलने या उसे एक अंक में सीटें मिलने का मोदी का कई सभाओं में ऐलान तब उनके विरोधियों को उनका शेखी बघारना लगता था। मोदी को ‘वडाप्रधान’ बनाने के लिए गुजरात ने चुनावी इतिहास में पहली बार सभी 26 सीटें भाजपा को सौंपी तो राजस्थान में हाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को रौंदकर सत्ता में लौटीं वसुंधरा राजे ने सभी 25 सीटें देकर मोदी को मजबूत किया। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली लगभग पूरी तरह भगवा रंग में रंग गए। मोदी की सूनामी में लस्तपस्त कांग्रेस इस हालत में पहुंच गई है कि उसे लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी नहीं मिल सकता। सेक्यूलरिज्म के नाम पर खास तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु तक में मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की तिकडमों ने उलटा असर किया। भाजपा ने उत्तर प्रदेश और बिहार की 12 सीटों में से न केवल 14 सीटें जीत लीं, बल्कि असम में भी सहयोगिमों के साथ 7 सीटें जीतकर सत्तारूढ कांग्रेस को तीन सीटों पर पहुंचा दिया। उत्तर प्रदेश में 42 फीसदी वोट और 71 सीटें (सहयोगी अपना दल की दो सीटों के साथ कुल 73 सीटें) ‘न भूतो न भविष्यति’जैसा रिकॉर्ड है तो उत्तर प्रदेश में बसपा का पूरा सफाया किसी आश्चर्य से कम नहीं। बिहार की 4 में से 22 (सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के साथ 31 सीटें) भाजपा की झोली में आईं। उत्तर भारत के इन दो प्रमुख राज्यों में जातियों की दीवारें टूट गईं-बसपा कट्टर समर्थक दलितों, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव के समर्थक युवा यादवों तथा दूसरे ओबीसी मतादाताओं ने अपना पार्टी प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर मोदी के लिए वोट दिए। उत्तर और पश्चिमी भारत भी भगवा हो गया। महाराष्ट्र में पार्टी जिन 24 सीटों पर उतरी उनमें से 23 उसने जीत लीं। शिवसेना और दूसरे सहयोगियों के संग एनडीए ने राज्य की 48 में से 42 सीटें जीतकर कांग्रेस-एनसीपी गठजोड का सूपडा साफ कर दिया। यह मोदी का ही जादू था कि कर्नाटक के अलावा आंध्र प्रदेश में बडी कामयाबिमों के साथ पार्टी ने तमिलनाडु में खाता खोला और केरल में कोई सीट न जीत पाने के बावजूद 2 में से आधी सीटों पर उसके प्रत्याशियों ने 2009 के मुकाबले अपनेे वोट दोगुने कर लिए। नगण्य उपस्थिति वाले केरल में पार्टी को 10 फीसदी, ओडीशा में 22 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 17 प्रतिशत वोट मिले। मोदी की सूनामी ऐसी चली कि बसपा के अलावा द्रमुक, नेशनल कांन्फ्रेंस और भाकपा अपने खाते भी नहीं खोल सकीं।

भाजपा और एनडीए की ऐतिहासिक विजय के तुरंत बाद मोदी ने ट्विट किया कि ‘अच्छे दिन आने आने वाले हैं।’ 16 मई की शाम को ही वडोदरा के अपनेे मतदाताओं का आभार व्यक्त करने पहुंचे मोदी ने सभा में कहा, ‘अच्छे दिन आ गए हैं।‘ ‘देश के सवा सौ करोड लोगों को साथ लेकर चलने’ का कौल उन्होंने वडोदरा, अमदाबाद, दिल्ली और वाराणसी में भी दोहराया। मोदी को सचमुच ऐसा ही करना होगा, अच्छे दिन तभी आएंगे।

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