जो बाइडेन का आगमन और परिवर्तन के संकेत

अमेरिका में सामाजिक आधार पर जो ध्रुवीकरण हो रहा है, वह ज्यादा बड़ी चिंता का विषय है। यह सामाजिक विभाजन खत्म नहीं हो जाएगा, बल्कि अंदेशा है कि बढ़ेगा। नए राष्ट्रपति जो बाइडेन के सामने ज्यादा बड़ी चुनौती उस सामाजिक टकराव को रोकने की है, जो अब शुरू होगा। अमेरिका के गोरे बाशिंदे, जो खेती या औद्योगिक मजदूर हैं अपने देश में बाहर से आए लोगों को लेकर परेशान हैं। उनके सामने रोजगार की समस्याएं भी खड़ी हुईं हैं।

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के पराभव के साथ नए राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने कार्यभार संभाल लिया है और उसके साथ ही यह सवाल पूछा जा रहा है कि भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते कैसे रहेंगे। बहरहाल शुरुआत अच्छी हुई है और संकेत मिल रहे हैं कि भारत और अमेरिका की मैत्री प्रगाढ़ ही होगी। उसमें किसी किस्म की कमी आने के संकेत नहीं हैं। अलबत्ता नए प्रशासन की आंतरिक और विदेश नीति में काफी बड़े बदलाव देखने में आ रहे हैं। बाइडेन ने जो फैसले किए हैं, उनमें भारत को लेकर सीधे कोई बात नहीं है, पर उनके रक्षामंत्री लॉयड ऑस्टिन ने जो कहा है, वह जरूर महत्वपूर्ण है। हमें आने वाले समय में भारत के प्रति उनकी नीति की प्रतीक्षा करनी होगी

कोरोना को वरीयता

बाइडेन ने सबसे ज्यादा वरीयता कोरोना को दी है, जिसका मुक़ाबला करने के लिए उन्होंने एक विस्तृत योजना पेश की है। इसके तहत गुरुवार को उन्होंने दस ऐसे कार्याधिकारी आदेश जारी किए हैं, जिनसे सरकारी एजेंसियों, निजी क्षेत्र और नागरिकों को कोरोना वायरस के रोकथाम में मदद मिलेगी। उन्होंने मास्क को जरूरी कर दिया है। इसके साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका के हटने के फैसले को वापस ले लिया है। उन्होंने कहा है कि देश में टीकाकरण अभियान के पहले सौ दिन में 10 करोड़ लोगों को टीके लगाए जाएंगे। सौ दिन का मतलब है मध्य अप्रैल तक। पर यह भी सच है कि भले ही ट्रंप ने कोरोना के संक्रमण की उपेक्षा की, पर टीकों का विकास उनके प्रशासन की देख-रेख में हुआ है।

ट्रंप प्रशासन के मुख्य चिकित्सा अधिकारी रहे एंथनी फाउची ने कहा कि बाइडेन प्रशासन पिछले प्रशासन के कार्यक्रम को ही आगे बढ़ा रहा है। यदि देश की 70-80 प्रतिशत आबादी को गर्मियों के अंत तक टीका लगा दिया गया तो इस साल के अंत तक स्थिति सामान्य हो जाएगी। ज्यादा बड़ी चिंता लोगों को मनाने की है जो इस वैक्सीन को लेकर संशय में हैं। फाउची का देश में बहुत सम्मान है और वे जो बाइडेन प्रशासन में भी मुख्य चिकित्सा सलाहकार बनाए हैं। उनके बयान में ट्रंप प्रशासन के दूसरे फैसलों को लेकर कड़वाहट भी है, जिनसे लगता है कि ट्रंप ने मनमानी की।

पुराने फैसले बदले

पहले से ही माना जा रहा था कि बाइडेन शपथ लेने के बाद डोनाल्ड ट्रंप के कुछ फैसले पलट देंगे, वैसा ही हुआ। कामकाज संभालते ही बाइडेन ने कम से कम 17 नए आदेश एक झटके में दे डाले। उन्होंने कई ऐसे आदेशों पर दस्तखत किए हैं, जिनकी लंबे समय से मांग चल रही थी। कोरोना के अलावा आव्रजन और जलवायु परिवर्तन के मामले में उनके आदेशों को अमेरिका की नीतियों में बड़ा बदलाव माना जा सकता है।

बाइडेन ने कार्यभार संभालते ही ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ कम करने की वैश्विक लड़ाई में अमेरिका को फिर से शामिल कर दिया है। उन्होंने अपने पहले भाषण में कहा, पृथ्वी खुद को बचाने की गुहार लगा रही है। उन्होंने कहा, यह आह्वान पहले कभी इतनी हताशा भरा और स्पष्ट नहीं था।

बाइडेन ने शपथ ग्रहण करने के कुछ घंटे बाद ही ‘पेरिस जलवायु’ समझौते में अमेरिका को पुन: शामिल करने के लिए एक शासकीय आदेश पर हस्ताक्षर किए और अपने एक बड़े चुनावी वादे को पूरा किया। ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया था। पेरिस समझौते में शामिल 195 देशों और अन्य हस्ताक्षरकर्ताओं के लिए कार्बन प्रदूषण को कम करने और उनके जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन की निगरानी करने तथा उसकी जानकारी देने का लक्ष्य रखा गया है। चीन के बाद अमेरिका दुनिया का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है।

सीमा पर दीवार

देश के बाहर से आ रहे लोगों को रोकने के लिए ट्रंप प्रशासन मैक्सिको की सीमा पर जो दीवार खड़ी कर रहा था, उसे रोक दिया गया है। जिन मुस्लिम देशों के लोगों के आगमन पर ट्रंप ने रोक लगाई थी, उस आदेश को वापस लेने का फैसला किया है। बाइडेन ने अपने भाषण में नस्ली भेदभाव को खत्म करने की भी बात कही है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट में नए प्रशासन के फैसलों प्रतीकात्मकता को रेखांकित करते हुए एक रिपोर्ट में कहा है कि बाइडेन ने राष्ट्रपति कार्यालय में, जिसे ओवल ऑफिस के नाम से पहचाना जाता है, कुछ बदलाव किए हैं। उन्होंने अमेरिकी इतिहास के प्रतिष्ठित नेताओं में से कुछ के चित्र और प्रतिमाएं बढ़ाई हैं और कुछ कम की हैं, जिनसे उनकी राजनीतिक दृष्टि सामने आती है। देश के सातवें राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन का चित्र हटा दिया गया है। ट्रंप उनमें अपनी छवि देखते थे।

बाइडेन ने अपनी मेज़ के सामने मार्टिन लूथर किंग जूनियर और रॉबर्ट एफ कैनेडी की प्रतिमाएं लगाई हैं। दोनों का अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन पर असर है। बाइडेन की कुर्सी के पीछे मेज़ पर उनके परिवार की तस्वीरों के साथ मैक्सिकन-अमेरिकी श्रमिक नेता सीज़र शावेज़ की प्रतिमा रखी है। शावेज़ ने साठ और सत्तर के दशक में खेत-मजदूरों के अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी थी। इन बातों से साफ है कि बाइडेन अपने जनाधार तक कोई संदेश देना चाहते हैं।

रक्षामंत्री का बयान

अमेरिका के रक्षामंत्री लॉयड ऑस्टिन ने कहा है कि ’जो बाइडेन प्रशासन का उद्देश्य भारत के साथ अमेरिका की रक्षा साझेदारी को बढ़ाना रहेगा।’ राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह के एक दिन पहले अपने नामांकन पर सुनवाई के दौरान सीनेट की एक समिति से ऑस्टिन ने कहा, भारत के साथ हमारे रक्षा संबंधों के मामले में मेरा उद्देश्य दोनों देशों के बीच साझेदारी और सहयोग को और मज़बूत करना रहेगा, ताकि भारत और अमेरिका, दोनों देशों के सैन्य हित सुरक्षित रह सकें।

उन्होंने कहा, हम क्वॉड सुरक्षा वार्ता और अन्य क्षेत्रीय बहुपक्षीय कार्यक्रमों के माध्यम से भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को और गहरा, और व्यापक बनाने की भी कोशिश करेंगे। ऑस्टिन ने पाकिस्तान के संदर्भ में कहा, मैं पाकिस्तान को यह संदेश ज़रूर देना चाहूंगा कि आप चरमपंथियों और हिंसक समूहों को बढ़ने न दें। हालांकि उसने भारत विरोधी समूहों, जैसे लश्करे-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के ख़िलाफ़ कुछ क़दम उठाए हैं, पर यह प्रगति अधूरी है।

ट्रंप का हिंसक अवसान

अंततः ट्रंप युग का अवसान हुआ। वे नए राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में नहीं गए। अमेरिकी राजनीति में यह एक नई परंपरा है। हालांकि ट्रंप की पहचान सिरफिरे व्यक्ति के रूप में जरूर थी, पर उनकी विदाई इतनी कटुता भरी और हिंसक होगी, इसका अनुमान नहीं था। अमेरिका के इतिहास में ट्रंप पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं, जिन पर दो बार महाभियोग चलाया गया। बुधवार 13 जनवरी अमेरिका की प्रतिनिधि सभा ने 232-197 के बहुमत से उनके विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव पास कर दिया। यह महाभियोग गत 6 जनवरी को देश की संसद कैपिटल हिल पर हुए हमलों को भड़काने के आरोप में लगाया गया है।
हालांकि इस प्रस्ताव के आधार पर ट्रंप को हटाया नहीं जा सका, पर इस बात का सांकेतिक महत्व है। महत्व इस बात का भी है कि इस प्रस्ताव के पक्ष में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के 10 सदस्यों ने भी वोट दिया। ट्रंप को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर दरार है। यह दरार कितनी गहरी और व्यापक है, इसका पता कुछ समय बाद ही लगेगा।

ट्रंप के विरोधी उनके खिलाफ कार्रवाई की कोशिशें फिर भी करते रहेंगे। सवाल है कि क्या उन पर भविष्य में मुकदमा चलाया जा सकता है? क्या उनकी गिरफ्तारी संभव है? ऐसे कई सवाल सामने हैं, जिनका जवाब समय ही देगा। देखना यह भी होगा कि क्या ट्रंप राजनीति में सक्रिय रहेंगे। क्या वे राष्ट्रपति के 2024 के चुनाव में भी कूदेंगे? ट्रंप की हार के बाद अमेरिका का परंपरागत समाज बेचैन है। उनके आह्वान पर जिस तरह से भीड़ कैपिटल हिल के संसद भवन में प्रवेश कर गई थी, वह अभूतपूर्व घटना है।

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