चीन के चंगुल से आजाद होगा तिब्बत

भारत-चीन तनाव के बीच अमेरिका ने दुनिया में तिब्बत का मुद्दा उठाकर एक तरह से भारत को मौका दिया है चीन के विस्तारवादी नीति का जवाब देने का। भारत के सामने भी ‘करो या मरो’ की स्थिति है। भारत के पास नेहरू की गलती को सुधारने का यही आखरी और सबसे अच्छा मौका है। यदि भारत भी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देकर अमेरिका की तरह अपनी नीति में आक्रामक बदलाव करे तो निश्चित रूप से चीनी ड्रैगन का फन कुचला जा सकता है।

आये दिन चीन विस्तारवाद की भूख में अंधे होकर भारतीय सीमा सहित हिन्द महासागर में घुसपैठ कर अतिक्रमण करता रहता है। चीन के सभी पड़ोसी देश चीन की खुराफात से परेशान है और डरे-सहमें से हैं। चीन रूपी भस्मासुर के आग की आंच सात समुंदर पार अमेरिका तक भी महसूस की जाने लगी है। आज दुनिया में चीन की छवि एक विस्तारवादी साम्राज्यवादी देश की बन गई है। कुछ देश चीन को ‘राक्षस’ देश के रूप में अधोरेखित कर रहे हैं और यह वास्तविकता भी है। जिस तरह से चीन तिब्बत में लोगों के मानव अधिकार को कुचल रहा है, तिब्बत वासियों को प्रताड़ित कर रहा है, उनके धार्मिक मान्यताओं को नकार कर कम्युनिस्ट नीतियां लागू कर रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि वाकई चीन संवेदनहीन राष्ट्र है, उसे मानवता और विश्व शांति की तनिक भी परवाह नहीं है। ऐसी स्थिति में चीन की चालाकियों का जवाब भारत समेत विश्व को देना होगा। इसमें भारत अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है और उसे राष्ट्रहित में भारतीय सीमाओं की रक्षा के लिए उपयुक्त आक्रामक ठोस कदम उठाने भी चाहिए।

भारत करे चीन के खिलाफ शीतयुद्ध की शुरुआत

अमेरिका दुनिया में सैन्य और आर्थिक महाशक्ति कैसे बना हैं ? क्या कभी आपने यह सोचा है ? द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही वह अब तक दुनिया की सर्वोच्च महाशक्ति का दर्जा बरकरार रखने में कामयाब कैसे हैं ? द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र देशों की सेना की विजय हुई, जिसमें अमेरिका ने अहम भूमिका निभाई। उस समय तक रूस- अमेरिका एक ही खेमें में थे। बावजूद इसके अमेरिका ने स्वयं को विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति बनाये रखने के लिए अपने संभावित प्रमुख प्रतिद्वंदी सोवियत संघ के खिलाफ शीतयुद्ध प्रारंभ कर दिया। अमेरिका किसी भी हाल में सोवियत संघ को दुनिया की सर्वोच्च महाशक्ति बनते हुए नहीं देखना चाहता था। आख़िरकार अमेरिका के सतत प्रयास से दुनिया के सबसे बड़े देश सोवियत संघ के टुकड़े-टुकड़े हो गए और वह बद से बदतर स्थिति में पहुंच गया तथा आर्थिक रूप से पूरी तरह से तबाह हो गया। सनद रहे आर्थिक महाशक्ति बने बिना दुनिया की सर्वोच्च महाशक्ति बनना असंभव है। इस तरह अमेरिका अपनी रणनीति में कामयाब हो गया। अमेरिका के तर्ज पर भारत भी चीन के खिलाफ शीतयुद्ध की शुरुआत करें और चीन द्वारा कब्जाए गए तिब्बत, हांगकांग, ताइवान, जिनजियांग, मंगोलिया आदि देशों को आजाद कर चीन के टुकड़े-टुकड़े कर दे। तब जाकर चीन अपने औकात में आएगा। वैसे भी वामपंथी देश लोकतांत्रिक देशों के टुकड़े टुकड़े करने का मंसूबा पालते हैं, अब उनकी ही नीति ‘जैसे को तैसा’ एवं ‘सठे शाठ्यं समाचरेत्’ का उपयोग उनके खिलाफ करना ही रणनीतिक रूप से आवश्यक हो गया है। इसी में हमारे राष्ट्र की भलाई है।

तिब्बत पर अमेरिका ने की पहल, भारत भी करे अमल

अब बात करते है अमेरिका-चीन की। अमेरिका और चीन के बीच लम्बे समय से व्यापार युद्ध चल रहा है। अपनी विराट जनसंख्या के बल पर चीन, अमेरिका को सैन्य और आर्थिक मोर्चे पर पटखनी देना चाहता है। इस बात से अमेरिका अनभिज्ञ नहीं है इसलिए चीन के नापाक इरादों को भांपते हुए अमेरिका ने भी चीन की घेराबंदी करनी शुरू कर दी है। अभी हाल ही में अमेरिका ने ‘तिब्बत पॉलिसी एण्ड सपोर्ट एक्ट’ नामक विधेयक पारित कर दिया है और इस तरह अमेरिका ने चीन की सबसे कमजोर एवं दुखती नस पर उंगली रख दी है। जिससे चीन तिलमिला गया है और बौखलाकर चीन, अमेरिका के इस कानून का विरोध कर रहा है। चीन हमेशा की तरह ‘वन चाइना पॉलिसी’ का हवाला देकर अपना बचाव करने में जुटा हुआ है। भारत-चीन तनाव के बीच अमेरिका ने दुनिया में तिब्बत का मुद्दा उठाकर एक तरह से भारत को मौका दिया है चीन के विस्तारवादी नीति का जवाब देने का। भारत के सामने भी ‘करो या मरो’ की स्थिति है। भारत के पास नेहरू की गलती को सुधारने का यही आखरी और सबसे अच्छा मौका है। यदि भारत भी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देकर अमेरिका की तरह अपनी नीति में आक्रामक बदलाव करे तो निश्चित रूप से चीनी ड्रैगन का फन कुचला जा सकता है।

तिब्बत की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करना चाहता है चीन

नास्तिक कम्युनिष्ट देश चीन को नागरिकों के सांस्कृतिक-धार्मिक अधिकारों से कोई सरोकार नहीं है इसलिए क्रूरतापूर्वक वह तिब्बत्तियों को रौंदता जा रहा है। उनकी धार्मिक पहचान को नष्ट करता जा रहा है। यहां तक की तिब्बतियों के सर्वोच्च धर्म गुरु दलाई लामा के स्थान पर भी वह अपने पिट्ठू दलाई लामा की जबरदस्ती नियुक्ति करना चाहता है। जिससे तिब्बत में तनाव का माहौल है और तिब्बती चीन के इस खुराफात का जमकर विरोध कर रहे है। अमेरिका ने भी तिब्बत की धार्मिक सांस्कृतिक पहचान बरक़रार रखने के लिए विशेष विधेयक पारित कर चीन को चेतावनी दे दी है। इस विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि तिब्बती बौद्ध धर्म का उत्तराधिकारी या दलाई लामा तिब्बती बौद्ध लामा की पहचान बिना किसी भेदभाव और दखलंदाजी के होनी चाहिए। अमेरिका ने साफ किया है कि दलाई लामा के नये अवतार की पहचान करने का अधिकार केवल उनके अधिकारियों के पास है। यदि चीन की ओर से दलाई लामा को परम्परा से हटाकर जबरन थोपने की कोशिश की गई तो उसके लिए जिम्मेदार चीनी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी।

अमेरिका लगाना चाहता है चीन पर लगाम, भारत कर सकता है यह काम

अमेरिका में ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ को सर्वाधिक प्राथमिकता दी जाती है। वहां के नागरिक अमेरिका को नंबर वन देश के रूप में देखना चाहते हैं। इसके लिए वह कुछ भी करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। अमेरिकियों की यही प्रतिबद्धता एवं जिजीविषा उसे दुनिया का सिरमौर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन बन जाएगा और फिर चीन दुनिया की सर्वोच्च महाशक्ति बनने की ओर तेजी से अग्रसर हो जाएगा। चीन के इसी मंसूबों पर पानी फेरने के लिए अमेरिका दुनिया के सभी मित्र देशों से तालमेल बिठाकर चीन पर लगाम लगाने के जुगत में लगा हुआ है। यदि भारत भी अमेरिका की तरह चीन के विस्तार की काट में जुट जाए तो भारत अपनी सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगा और 1962 का बदला लेकर चीन द्वारा कब्जाई गई अपनी 45 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन को भी वापस ले सकता है।

तिब्बत की आजादी की अलख जगाता ‘भारत-तिब्बत संवाद मंच’

विगत कई वर्षों से तिब्बत की आजादी के लिए ‘भारत-तिब्बत संवाद मंच’ अलख जगाता आ रहा है और तिब्बतियों पर चीन के अत्याचार के खिलाफ राष्ट्रीय पटल पर अपनी आवाज बुलंद कर रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक रहे डॉ. संजय शुक्ला जी के नेतृत्व में देशव्यापी अभियान चलाया जा रहा है। इसके साथ ही सांसदों से यह भी आग्रह किया जा रहा है कि संसद के अगले सत्र में वह तिब्बत के संदर्भ में अपनी आवाज बुलंद करें। 1962 युद्ध के दौरान चीन ने भारत की हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन अपने कब्जे में ले ली थी। उस भूमि को पुनः वापस लेने का संकल्प संसद द्वारा पारित किया गया था। इस अभियान के तहत पदाधिकारी देश के सभी सांसदों को ज्ञापन देकर 14 नवंबर 1962 को संसद द्वारा पारित की गई संकल्प पत्र की याद दिला रहे हैं। कैलाश मानसरोवर की मुक्ति से ही भारत की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है इसलिए मोदी सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करने का काम ‘भारत-तिब्बत संवाद मंच’ द्वारा सतत किया जा रहा है।

मंच ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा है कि –

सुन ले चीन, तेरे टुकड़े करेंगे तीन,
तिब्बत, ताइवान, हांगकांग…

मंच के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. संजय शुक्ला ने ‘हिंदी विवेक’ से बातचीत में कहा कि तिब्बत की आजादी से ही भारत की सुरक्षा होगी इसलिए हम पूरी ताकत से चीन के खिलाफ देश में व्यापक जनजागरण अभियान चला रहे है। इस अभियान को समर्थन देने के लिए सर्वप्रथम सभी भारतीय नागरिक चीनी सामानों का पूर्ण बहिष्कार करे। इसके अलावा उन्होंने मोदी सरकार से मांग की है कि जैसे आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान का पर्दाफाश करके भारत ने उसे दुनिया से अलग थलग कर दिया, उसी तरह विस्तारवादी साम्राज्यवादी चीन की दमनकारी अमानवता वादी गतिविधियों का अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पर्दाफाश कर उसे भी सबक सिखाये।

जैसे ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हुआ वैसे ही चीन का भी होगा

एक समय दुनिया के बड़े हिस्से में ब्रिटिश साम्राज्य फैला हुआ था। अपनी ताकत और बुद्धिमत्ता के बल पर ब्रिटिश शासकों ने लंबे समय तक दुनिया के कई देशों पर राज किया। उस समय यह कहा जाता था कि ब्रिटिश राज का सूरज कभी नहीं डूबेगा लेकिन उनकी ही दमन नीति से त्रस्त होकर जनता में राष्ट्रभाव का जागरण हुआ और जनता के विद्रोह एवं आन्दोलन को देखते हुए अंततः अंग्रेजों को आजादी देनी पड़ी। ठीक उसी तरह आज चीन की दमन नीति के खिलाफ तिब्बत, ताईवान, हांगकांग, जिनजियांग आदि जगहों पर विद्रोह की आग धधक रही है। बस उसे हवा देने की जरूरत है, उस आन्दोलन को समर्थन देने की जरुरत है। ऐसा होने पर चीन अधिक समय तक उसे सैन्य बल के बूते रोक नहीं पायेगा और उसका भी ऐसा ही अंत होगा जैसे सोवियत संघ व ब्रिटिश साम्राज्य का हुआ था।

चीनी सामान की तरह चीनी सेना भी है फिसड्डी

दुनिया में चीनी सामान सबसे घटिया दर्जे का माना जाता है जिसकी कोई गारंटी नहीं होती कि वह कब तक टिकेगा। हालांकि देखने में वह बहुत ही आकर्षक व सुंदर होते है। उसी तरह चीनी सेना के सैनिकों की भी कोई गारंटी नहीं है कि युद्ध के मैदान में वह ज्यादा देर तक टिक पाएंगे। चीन की यह नीति है कि छोटे से खोखले चीज को भी वह बहुत अच्छा शानदार और बड़ा बना कर पेश करता है लेकिन वास्तविकता में वह केवल दिखावटी होता है, मायावी होता है। धरातल पर उसका कोई अस्तित्व नहीं होता। कई बार चीन के युद्धाभ्यास का फर्जी प्रोपेगेंडा वीडियों सामने आता रहा है।

वियतनाम, जापान, रूस से हार चुकी है चीनी सेना

चीन की कम्युनिस्ट सरकार चीनी सेना का कितना भी बड़ा बखान कर ले, उसके पराक्रम की डींगे हांके लेकिन इतिहास गवाह है कि जब तब चीनी सेना अपने से बेहद छोटे से देश और सेना के हाथों बुरी तरह से पिट चुकी है तथा पराजित हो चुकी है। बेहद छोटे से देश वियतनाम ने चीनी सैनिकों को इतनी बुरी मार मारी थी कि युद्ध के मैदान से चीनी सैनिक भाग खड़े हुए। उस युद्ध में बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की लाशों का अम्बार लग गया था और जापान के सैनिकों ने तो चीनी सैनिकों को बद से बदतर होने तक पीटा, आख़िरकार चीन को अपनी पराजय स्वीकार करनी पड़ी। रूस-चीन के युद्ध का भी यही हाल हुआ और इस युद्ध में रूस ने चीन के एक तटीय शहर पर ही कब्जा कर लिया।

बुद्ध से नहीं ‘युद्ध’ से करे चीन का हल

जब चीन को आत्मिक-आध्यात्मिक उत्थान की आवश्यकता थी तब हमने उसे ‘बुद्ध’ दिया लेकिन अब वह बात-बात में युद्ध की धमकी देता है तो हमारा यह नैतिक कर्तव्य हो जाता है कि उसे युद्ध की भिक्षा देकर तृप्त करे। राक्षसों और असुरों की ललकार को स्वीकार करते हुए हमने अनेकों धर्मयुद्ध किये है और इन धर्मयुद्धों में अंततः विजय सदैव धर्म की ही हुई है। आगे भी धर्म की ही विजय होगी। वैसे भी चीन की चाल, चरित्र, चालाकी को देखते हुए उसके दिमाग के युद्ध का भूत उतारना ही होगा और हम भूत भगाने में माहिर है। हमें पता है कि बल की मार से अच्छे से अच्छा भूत भी भाग जाता है इसलिए हमारे यहां कहा जाता है कि ‘मार से तो भूत भी भाग जाते है’। मेरा स्पष्ट मानना है कि अखंड भारत के संकल्प को साकार करने के लिए ‘युद्ध’ ही आखरी उपाय है और जब हमें युद्ध का मौका मिले तो इसे भुनाना जरुर चाहिए। इजराइल इसका उत्तम उदाहरण है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ताकत के दम पर ही चीन से समाधान मुमकिन है और युद्ध से ही चीन का हल निकलेगा क्योंकि चीन बोली की नहीं गोली की भाषा समझता है। स्मरण रहे मैं केवल सैन्य युद्ध की बात ही नहीं कर रहा बल्कि हर मोर्चे पर चीन से युद्ध करने हेतु हमें तत्पर रहना होगा।
वीर भोग्या वसुंधरा…

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